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Friday 24 Nov 2017

आधा गांव व तमस का तुलनात्मक अध्ययन


संदीप कुमार
हिन्दी विभाग
 दिल्ली विवि
दिल्ली-110007
मो. 9654282253
15अगस्त 1947 ई. को भारत आजाद हुआ और साथ ही दो टुकड़ों, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में विभाजित हो गया। इस विभाजन ने हिन्दुस्तान की साझी संस्कृति को तो तोड़ा ही, साथ ही साम्प्रदायिकता और नफरत का एक ऐसा बीज भी भारतीय समाज में बो दिया जिसके वृक्ष को आज जड़ से उखाडऩे में हम अपने आपको असमर्थ पाते हैं। इस विभाजन से सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को हुआ तो वो थी भारतीय समाज व हिन्दू-मुस्लिमों की कई सदियों में खड़ी की गई साझी विरासत। ''भारत के तीस करोड़ हिन्दू और चार करोड़ मुसलमानों के बीच फूट डालने का नाटक जैसे ही अन्तिम अंक में प्रवेश कर गया, अंग्रेजों ने यह जान लिया कि विभाजन न किया तो भी रक्तपात होगा और विभाजन किया तो भी। रक्तपात उस कूटनीति का फल था जिसे एक दिन फलना ही था, माउण्टबेटन को केवल सिर्फ  इतना सुनिश्चित करना था कि यह रक्तपात अंग्रेजों के भारत छोड़ देने के बाद हो ताकि अंग्रेज प्रशासन की योग्यता बदनाम न हो तथा दुनिया देख सके कि एक दूसरे के खून के प्यासे भारतीय स्वतन्त्रता के योग्य थे ही नहीं।ÓÓ
    विभाजन की त्रासदी के संदर्भ में 'आधा गाँवÓ व 'तमसÓ दोनों ही कालजयी उपन्यास हैं। इन दोनों उपन्यासों ने अपने समय की गाथा को बहुत गहराई से दिखाने का प्रयास किया गया है। दोनों उपन्यासों के 'लोकेलÓ (खास जगह) अलग-अलग हैं, और आसन्न विभाजन का वातावरण भी इन्हें विभिन्न रूपों में प्रभावित कर रहा है। इसके बावजूद उस ऐतिहासिक त्रासदी को लेकर दृष्टिकोण तथा कई ब्योरों की समानता दोनों जगह दिखलाई पड़ती है। तमस सिर्फ  चार दिनों की कथा है और इन चार दिनों में विभाजन की भूमिका निर्मित करने वाला हिन्दू-मुस्लिम तनाव खूनी दंगे की शक्ल में अपने चरम बिन्दु पर पहुंचा हुआ है। वहीं दूसरी ओर 'आधा गाँवÓ एक अपेक्षाकृत लम्बे कालखण्ड को लेकर लिखा गया उपन्यास है, जिसमें दंगे जैसी स्थितियाँ दूर-दूर तक नहीं है, इसके बावजूद भावनात्मक स्तर पर एक पूरे समुदाय की बेचैनी और वेदना के सघन चित्र हैं। यहाँ माहौल सतह पर उतना आविष्ट नहीं है जितना तमस में, पर यहाँ भी सतह के नीचे वैसी ही तीव्र वेदना की गाथा है। 'आधा गाँवÓ मुख्यत: आँचलिक उपन्यास हैं क्योंकि यह एक क्षेत्र विशेष अर्थात एक छोटे से गाँव की संस्कृति-सभ्यता व वहां की सामाजिक चेतना को उजागर करने में सक्षम रहा है लेकिन विभाजन के बाद उस गाजीपुर जिले के गंगौली गाँव पर क्या असर पड़ता है, इसका मार्मिक चित्रण 'आधा गाँवÓ में देखने को मिलता है। विभाजन को लेकर यहाँ की जनता बहुत अनजान है, क्योंकि इनके लिए तो गंगौली गाँव ही हिन्दुस्तान है। साथ ही हम देखते हैं कि हिन्दू-मुस्लिम समुदायों में आपसी व्यवहार अच्छा है सभी घुलमिलकर रहते हैं एक-दूसरे को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।
    लेकिन तमस उपन्यास में परिस्थितियाँ कुछ विपरीत है यह उपन्यास मुख्यत: पंजाब के क्षेत्र को लेकर लिखा गया है जिसमें सिख समुदाय को लेकर वहाँ की विभाजन पूर्व व बाद की आपातकालीन घटनाओं का चित्रण किया गया है। उपन्यासकार के रूप में भीष्म साहनी को प्रथम पंक्ति में स्थापित करने वाला उपन्यास 'तमसÓ है। भीष्म साहनी उस अमानवीय और दिल दहला देने वाले अनुभवों के भोक्ता थे, अत: उनके अंकन में भोक्ता होने का दर्द भी शामिल है। उपन्यास के एक पात्र इकबाल सिंह को इकबाल मुहम्मद बनाये जाने तथा सैदपुर के सिखों और दंगाइयों के बीच संघर्ष के प्रसंग धार्मिक उन्माद, क्रूरता और आत्मबलिदान के त्रासद उदाहरण हैं। तमस उस अंधकार का द्योतक है जो आदमी की इंसानियत और संवेदना को ढँक लेता है और उसे हैवान बना देता है।
    विभाजन के पूर्व ही कलकत्ता, नोआखाली, बिहार, बम्बई एवं पंजाब में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए थे। हिन्दू-मुसलमान परम्परागत शत्रु की तरह एक-दूसरे के सामने खड़े हुए और एक-दूसरे पर टूट पड़े। सबसे भयावह स्थिति पंजाब में थी। विभाजन की घोषणा हो चुकी भी लेकिन अभी यह निश्चित नहीं हो पाया था कि कौन से जिले पाकिस्तान में जाने वाले हैं, और कौन से भारत में रहने वाले हैं। चारों ओर अफवाहों का बोलबाला था छोटे-मोटे कारणों से दंगे भड़क रहे थे। अंग्रेज प्रशासन एकदम निष्क्रिय हो गया था। अंग्रेज अधिकारी मूक दर्शक बन गए थे।
 हर हिन्दू और हर मुसलमान एक दूसरे को शक-डर और नफरत की नजरों से देखने लगा था। उसका विवेक समाप्त हो गया था, सदियों पुराने भाईचारे के सम्बन्ध वह भूल गया था। मित्रता को शक ने घेर लिया था। पड़ोसी-पड़ोसी का घर जलाने के लिए तैयार थे। कल तक जिनकी बहू-बेटियों को वह अपनी बहू-बेटियाँ समझता था आज सरेआम उनकी बेइज्जती कर रहा था। मनुष्य का घिनौना रूप इस समय देखने को मिला। सारे मानवीय और धार्मिक उच्च मूल्यों को भूल कर मनुष्य पशुता पर उतर आया था।
    भारत और पाकिस्तान की ओर से नागरिकों के लिए यातायात की सुविधा की गई थी। ''परन्तु दिल्ली से मुस्लिमों से खचाखच भरी हुई रेलें चलती थी जिसके यात्री करांची पहुँचने मात्र तक लाशों में बदल जाते थे। और करांची के हजारों हिन्दू दिल्ली में आते-आते प्रेत में बदल जाते थे।ÓÓ देशान्तर करने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि रेल यह कार्य करने में असमर्थ सिद्ध हुई। लाखों लोगों ने तो पैदल ही अपने गांवों को छोड़ देशान्तर करना शुरू किया। रास्तों से आते हुए फिर उन्हें लूटमार और अत्याचार का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि इस यात्रा के दौरान हजारों लोग लापता हो गये या उन्हें मार दिया गया।
    आधा गाँव उपन्यास का एक पात्र अब्बास बार-बार पाकिस्तान का प्रचार करता है परन्तु सिवा उसके अन्य कोई भी मुसलमान पाकिस्तान को कभी अच्छा नहीं कहता। यहाँ के मुसलमानों को तो आश्चर्य इस बात का है कि ''यह मुआ जिन्ना कैसे शिया है कि हिन्दुस्तान के खिलाफ है।ÓÓ क्योंकि शिया मुसलमानों का यह इमान है कि इमाम हुसैन मोहर्रम के दिनों में बड़े ताजिये के आगे हिन्दू ही चलते हैं। इसका उदाहरण गाँव की वह ब्राह्मणी है जो इम्माद मियाँ से अपने दरवाजे पर उलतियाँ न गिराने से शिकायत करती है और उलती गिराने की प्रार्थना करती है।ÓÓ स्पष्ट है कि गंगौली में अब्बास तथा अन्य मुल्ला-मौलवियों के बहकावे पर भी कोई अलगाव का चिन्ह दिखाई नहीं देता।
    मुस्लिम लीग ने सन् 1942 में आह्वान किया था कि कोई भी मुसलमान भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा न ले परन्तु गंगौली के हिन्दू और मुसलमानों ने जोर शोर से इसमें हिस्सा लिया था। गंगौली का पुलिस स्टेशन और वहां के थानेदार को उन्होंने जला दिया था। थाने को घेरने वालों में भौरों टोली के लोग, पृथ्वीपालसिंह तथा फुपन मियां और उनके लोग भी शामिल थे।
    फुपन मियां उन लोगों के प्रतीक हैं, जो हिन्दू-मुस्लिम एकता के केवल हिमायती ही नहीं उसके स्वयं उदाहरण भी है। फुपन मियां ने ही मातादीन पंडित को मंदिर बनवाने के लिए जमीन इनाम दी थी। तमस उपन्यास का आरम्भ विभाजन की पूर्व निर्धारित योजना से होता है नत्थू को सुअर मारने का काम दिया जाता है। वह गरीब होता है और अपने पेट के लिए आदमी कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। नत्थू को पता नहीं चलता लेकिन सुअर को मरवाने की बात उसके भीतर शंका उत्पन्न करती हैं। सुअर को मरवाने के बाद मुरादअली उसे मस्जिद के सामने फिंकवा देता है जो कि पूर्वनियोजित षड्यंत्र का भी कारण बनता है। वहाँ दंगा हो नहीं रहा था बल्कि दंगा जान बूझकर कराया जाता है। लोगों के जीवन में विभाजन को लेकर द्वेष भावना कैसे पनप रही है संप्रदायों के आधार पर लोगों के मोहल्ले बंटने लगे हैं। इन सभी बातों का वर्णन छोटे-छोटे प्रसंगों के द्वारा साहनी जी ने पहले खण्ड में किया है। तमस के दूसरे खण्ड में यह दिखाया है कि शहरों से बढ़ती विभाजन की त्रासदी गाँवों को भी कैसे अपनी चपेट में ले लेती है।
    तमस व आधा गाँव की विभाजन की त्रासदी के आधार पर तुलना करने पर ज्ञात होता है कि आधा गाँव की शुरूआत आँचलिकता को प्रमाणित करते हुए होती है लेकिन जब देश की राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगीं तो इसका प्रभाव गंगौली पर भी पड़ा। गंगौली में गंगौली वालों की संख्या कम होती जा रही है। गंगौली में सुन्नियों, शियाओं और हिन्दुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। गंगौली में सांप्रदायिक विचारों की पहली खेप अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पाकिस्तान के सपने के रूप में पार्सल होकर आयी। अलीगढ़ में पढऩे वाला अब्बास गाँव के लोगों को वहां के लतीफे सुनाता और जिन्ना साहब की राजनीति लोगों को समझाता- कहता था कि हिन्दुस्तान के दस करोड़ मुसलमान कायदे आजम के पसीने पर अपना खून बहा देंंगे।
आधा गाँव और तमस के विश्लेषण के माध्यम से यह स्पष्ट है कि विभाजन की त्रासदी को चित्रित करते हुए ये दोनों एक तरह के पूरक की भूमिका अदा करते हैं। एक हिन्दुस्तान के उस हिस्से से सम्बन्धित है जिसे विभाजन के बाद हिन्दुस्तान में ही रहना था और दूसरा उस हिस्से से सम्बन्धित है जिसे विभाजन में पाकिस्तान का हिस्सा बन जाना था। एक जगह दंगे नहीं हैं पर बँटवारे के ऐतिहासिक घटनाक्रम के बीच जिंदगी का पुराना सामंजस्य जड़ से उखड़ गया है। दूसरी जगह दंगे की आग में सब कुछ राख होता दिखाई पड़ता है। बंटवारे ने कितने अलग-अलग तरीकों से हिन्दुस्तान के जण-गण को प्रभावित किया। उसके दो मुख्तलिफ नमूनों के तौर पर इन दोनों उपन्यासों को पढ़ा जा सकता है।