Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

भुलाए न भूले ( वलेन्तीन रस्पूतिन)

 

हेमचन्द्र पाँडे
वाई-81, हौज खास
नई दिल्ली-110016
hcpandev@rediffmail.com
14मार्च 2015 को रूसी लेखक वलेन्तीन रस्पूतिन (1937) का मास्को में अपने जन्मदिन (15 मार्च) से एक दिन पूर्व निधन हो गया। वलेन्तीन रस्पूतिन समकालीन रूसी साहित्य के शीर्षस्थ लेखक रहे हैं। उनकी कई कृतियों को फि़ल्माया गया है और रंगमंच पर भी प्रस्तुत किया गया है। सन् 1999  में आपको साहित्य अकादमी ने अपने वार्षिक साहित्योत्सव में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया था।
साहित्य अकादमी में दिए गए अपने भाषण में रस्पूतिन ने साहित्य के विषय में कई गम्भीर बातें कही थीं जो पन्द्रह साल बाद भी पूरी तरह से प्रासंगिक हैं। उनका कहना था कि हम जिस समय में जी रहे हैं वह बड़ी तेजी से बदल रहा है। संसार में घटित हो रहे भौतिक परिवर्तनों का दबाव साहित्य पर भी पड़ रहा है जिसके कारण साहित्य में कुछ विकृतियाँ भी आ रही है। एक समय था जब रूस में लोकजीवन, साहित्य, समाज और संस्कृति आपस में घुले-मिले थे। दस साल पहले तक बहुपठित समझा जाने वाला रूसी समाज अब अल्पपठित हो गया है। इसकी मुख्य वजह दुनिया में हो रहा भौतिक बदलाव है।
अपने उस भाषण  में रस्पूतिन ने यह भी कहा कि दोस्तोयेव्स्की ने कहा था कि सौन्दर्य ही संसार को बचा सकता है। पर इधर साहित्य में भी सौन्दर्यहीनता आ गई है। फि़ल्मकार फ़ेलिनी को उद्धृत करते हुए रस्पूतिन ने कहा कि सिनेमा कभी-कभी नैतिक मूल्यों को बिगाड़ भी देता है। लेकिन वह समकालीन सच्चाइयों को दिखाने से बच नहीं सकता। आज के साहित्यकार के सामने चुनौती यह है कि वह सच्चाई को भी दिखाए तथा असुन्दर भी न हो और साथ ही नैतिक मूल्यों को भी सुरक्षित रखे। साहित्य मनुष्य के प्रति सहानुभूति से पैदा होता है। उसमें मनोरंजन भी होता है पर वही उसका लक्ष्य नहीं है। ऐसा साहित्य जो हमें उदात्त की ओर ले जाता है, हमारा उन्नयन करता है वही श्रेष्ठ साहित्य है।। साहित्य और कला के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है। रस्पूतिन ने यह भी कहा कि उन्हें यह लगता रहा है कि दुनिया में आज कोई ऐसी जगह नहीं बची है जहाँ साहित्य के प्रति आस्था हो परन्तु भारत आने पर लगता है कि यहाँ अब भी साहित्य के प्रति आस्था बची हुई है।
रस्पूतिन मूलत: साइबेरिया के निवासी थे और पिछले कुछ सालों से सर्दी के मौसम में मास्को में भी रहने लगे थे। यह सिलसिला गोर्बाचोव के समय में शुरू हुआ था जिन्होंने रस्पूतिन को इस स्थानान्तरण के लिए प्रेरित किया था और ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ही मास्को में उनके रहने की व्यवस्था करवाई थी। रस्पूतिन का गद्य साहित्य, मुख्यत:, रूस के ग्रामीण जीवन पर आधारित है जिसे रूसी में ग्रामीण गद्य कहा जाता है। अपनी भाषा में हम उन्हें आँचलिक लेखक कहेंगे।
वलेन्तीन रस्पूतिन ठेठ देहाती लेखक थे जो हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे थे। उनका जन्म साइबेरिया के विश्वप्रसिद्ध बाइकाल सरोवर से निकलने वाली अन्गारा नदी के निकट स्थित ऊस्त-उदा नामक गाँव में हुआ था जो इर्कूत्स्क नगर से कोई 70 किलोमीटर दूर पड़ता है। रस्पूतिन ने उच्च शिक्षा इर्कूत्स्क विश्वविद्यालय में पाई थी। विश्वविद्यालय में रूसी भाषा और साहित्य का अध्ययन करने के बाद उन्होंने क्रास्नोयासर््क में पत्रकार के रूप में काम करना आरम्भ किया। तभी रचनात्मक साहित्य की ओर उनका झुकाव पैदा हुआ। आपकी पहली कहानी ('मैं लेश्का से पूछना भूल गयाÓ) सन् 1961 में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी की विषय-वस्तु यह है कि जंगल में पेड़ काटने के लिये स्कूल के बच्चों को ले जाया गया है।  पेड़ काटते समय चीड़ का पेड़ अचानक दूसरी तरफ गिर जाने से लेश्का नाम के लड़के को गम्भीर चोट आ जाती है। पास में कोई अस्पताल नहीं है। लेश्का के साथी तम्बू का कामचलाऊ स्ट्रेचर बना कर और उसमें लेश्का को लिटा कर पैदल ही शहर को चल देते हैं जो वहाँ से पचास किलोमीटर दूर है। गाँव का व्यक्ति जब पहली बार शहर में पहुँचता है तो उसकी जो हालत होती है उसी के वर्णन से यह कहानी शुरू होती है। लेश्का का इलाज नहीं हो पाता है क्योंकि वह रास्ते में ही दम तोड़ देता है। रास्ते भर उसे ढो कर ले जा रहे लड़के कम्यूनिज़्म के बारे में बहस करते हुए जाते हैं जो अधूरी की अधूरी रह जाती है। इस पहली कहानी की अनोखी मौलिकता से ही रस्पूतिन को प्रसिद्धि मिल गई थी।
सन् 1973 में प्रकाशित 'फ्रान्सीसी भाषा की कक्षाएँÓ कहानी भी आपकी सबसे अधिक लोकप्रिय कहानियों में से एक है।  गाँव के ग्यारह साल के लड़के को शहर में पढऩे के लिए भेजा जाता है क्योंकि शहर में सुविधाएँ अधिक हैं। उसके पिता का देहान्त हो चुका है। अन्य सब विषयों में तो वह लड़का अच्छा है किन्तु फ्रान्सीसी भाषा में वह कमजोर ही रहता है। धन की तंगी होने के कारण वह सिक्का उछालने के खेल में कभी-कभी पैसा भी लगाने लगता है और जीते हुए पैसों से अपने शरीर में विटामिन की कमी को दूर करने के लिये दूध खरीद कर पीता है। फ्रान्सीसी भाषा की अध्यापिका लीदिया मिख़ाइलोव्ना को जब इस बात का पता चलता है तो उसे डाँटना छोड़ कर वह उसकी मदद करना चाहती है। किन्तु बालक को ऐसी मदद अस्वीकार्य है। तब वह स्वयं उसके साथ पैसे लगा कर खेलना शुरू कर देती है और हारती जाती है। बालक को यह समझ में आने लगता है। दूसरी ओर, जब स्कूल के प्रधानाध्यापक को पता चलता है कि फ्रान्सीसी भाषा की अध्यापिका बच्चे के साथ 'जुआÓ खेलती है तो वह उसका तबादला करवा देता है। बच्चे के मनोविज्ञान की सशक्त प्रस्तुति के कारण इसे रस्पूतिन की श्रेष्ठतम कहानियों में गिना जाता है। इस पर बनी फि़ल्म भी बहुत लोकप्रिय रही है।
ये दोनों तथा इसी तरह की कुछ अन्य कहानियाँ लेखक के निजी परिवेश को प्रतिबिम्बित करती प्रतीत होती हैं क्योंकि उनका स्वयं का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा था। निश्चय ही वे बाल मनोविज्ञान के अच्छे पारखी रहे हैं।
रस्पूतिन की कई रचनाओं के प्रमुख पात्र गाँव की बूढ़ी औरतें हैं। सन् 1970 में प्रकाशित उनका दूसरा उपन्यास अन्तिम घड़ी का केन्द्रीय पात्र बूढ़ी माँ आन्ना हैं। इस उपन्यास में बूढ़ी माँ को बीमारी की अवस्था में दिखाया गया है। उनके साथ उनका सबसे छोटा बेटा मिखाईल रहता है। बाकी सब भाई–बहन बाहर, कहीं और रहते हैं और एक-एक करके अपनी माँ से मिलने को आते हैं। सबसे छोटी बेटी तान्चोरा नहीं आ पाती है क्योंकि वह साइबेरिया के इस गाँव से हजारों किलोमीटर दूर कीव शहर में रहती है। यह उपन्यास रुग्ण माँ की कहानी के बहाने से पारिवारिक सम्बन्धों और जीवन-मूल्यों में आए बदलावों तथा सामान्यत: मनुष्य और जीवन के प्रति वृद्धा माँ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता हुआ चलता है। बीमार को देखने आए हुए बच्चे जो अब सभी बुजुर्ग हो चुके हैं बहुत लम्बे अन्तराल के बाद एक साथ मिलते हैं, जैसा कि अनेक परिवारों में आजकल देखा जाता है। लेकिन अपनी-अपनी मजबूरियों के कारण वे लोग मुश्किल से तीन दिन भी अपनी माँ के पास नहीं रह पाते हैं और इतने समय में ही अपने विगत जीवन को उलट-पलट कर देख लेते हैं। बीच-बीच में भाई-बहनों में तकरार और नोक-झोंक भी होती रहती है – कभी कोई किसी पर नाराज  हो जाता है, तो कभी कोई। सबसे अधिक आक्षेप और उलाहने छोटे भाई मिख़ाईल को झेलने पड़ते हैं जो गाँव में माँ के साथ रह रहा है और वही उनकी देखभाल भी करता है। उसके भाई-बहन यही समझाने में लगे रहते हैं कि माँ की सेवा कैसे की जाए। मिख़ाईल की पत्नी नाद्या अपने पति पर लगाए जा रहे आरोपों और आक्षेपों को चुपचाप बस सुनती रहती है। यदि वह बीच में पड़ जाती तो कहानी की दिशा ही बदल जाती – यह बात रस्पूतिन बखूबी समझते हैं। मिख़ाईल को शराब की बुरी लत है, इसलिये बहनों की उँगली उसी की ओर उठती है हालाँकि उसका बड़ा भाई इल्या भी मद्यपान में उससे कम नहीं है। माँ की आसन्न मृत्यु की आशंका को देखते हुए दोनों भाई कुछ तैयारी पहले से ही कर लेने का फ़ैसला करते हैं। यह तैयारी है मृतक की याद में दिए जाने वाले भोज के साथ परोसी जाने वाली वोदका की खरीद। दोनों भाई शराब पहले से ही खरीद कर ले आते हैं मगर उनमें इतना भी संयम नहीं है कि उसे हाथ तो ना लगाएँ। उनकी शराबखोरी से मँझली बहन ल्यूस्या खीझ जाती है। ल्यूस्या अपने आप को औरों से अधिक शिष्ट और सभ्य समझती है। मिख़ाईल का धैर्य टूटने लगता है और वह अपनी उत्तेजना को रोक नहीं पाता है। ल्यूस्या और मिख़ाईल का टकराव तो उस समय चरम सीमा पर पहुँच जाता है जब वह यह बताता है कि उसने सबसे छोटी बहन तान्चोरा को तार द्वारा सूचित कर दिया है कि अब वह ना आए क्योंकि माँ की तबीयत में सुधार होने लगा है। फिर तो ल्यूस्या को और भी अधिक गुस्सा आ जाता है - उसने अकेले ही, अपने आप ही ऐसा निर्णय कैसे ले लिया! वास्तव में मिख़ाईल ने ऐसा केवल माँ को बहलाने के उद्देश्य से कहा था क्योंकि तान्चोरा के न आने से माँ घुली जा रही थीं। तीसरे दिन ल्यूस्या अपना सामान समेट कर और यह कहते हुए वापस जाने की तैयारी करने लगती है कि आज के बाद अगला स्टीमर तीन दिन बाद ही मिलेगा। उसकी बड़ी बहन वार्वारा और इल्या भी यह कहते हुए ल्यूस्या के साथ निकल पड़ते हैं कि अच्छा साथ रहेगा। उन्हें जाते हुए देख कर बूढ़ी माँ की आँखें भर आती हैं। बच्चों के चले जाने के बाद अगले दिन माँ का देहान्त हो जाता है। रूसी आलोचक और रस्पूतिन के मित्र न.कोतेन्को के अनुसार बूढ़ी आन्ना में लेखक की दादी मारीया गेरासीमोव्ना का प्रतिरूप देखते झलकता है। दिल्ली में दो व्यक्तियों ने इस उपन्यास का नाट्य रूपान्तर/रेडियो नाटक प्रस्तुत करने की इच्छा जताई है।
बूढ़े लोगों को, सम्भवत:, अपनी मृत्यु का आभास होने लग जाता है। रस्पूतिन ने अपने इस उपन्यास में बूढ़ी आन्ना द्वारा मृत्यु की प्रतीक्षा का बहुत ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है –
बूढ़ी आन्ना ने मृत्यु के बारे में कई बार सोचा था। उसे वह उतना ही जानती थीं जितना कि स्वयं को। पिछले कुछ सालों से उनमें अच्छी मित्रता हो गई थी। बूढ़ी आन्ना उसके साथ अक्सर बातें किया करती थीं तथा किसी कोने में खड़ी हुई मृत्यु उनकी विवेकपूर्ण फुसफुसाहट को सुनती थी और ऐसे आह भरती थी जैसे सब समझ रही हो। उन्होंने आपस में यह तय कर लिया था कि बूढ़ी आन्ना रात के समय विदा होंगी, पहले सामान्य लोगों की तरह नींद में डूब जाएँगी, अन्यथा खुली आँखों को देख मृत्यु को भय लग सकता था, फिर मृत्यु उन्हें चुपचाप जकड़ लेगी और अल्पकालीन सांसारिक निद्रा से मुक्त करके उन्हें शाश्वत शान्ति प्रदान करेगी।
1975 में प्रकाशित उपन्यास मत्योरा से विदाई, बाँध और पनबिजलीघर बनने के कारण विस्थापित होने वाले लोगों की मनोदशा की कहानी है। इसका मुख्य पात्र भी गाँव की बूढ़ी औरत दार्या है। यह उपन्यास हमें यह अनुभव कराता है कि अपनी जमीन से लगाव का क्या अर्थ है जबकि बाहर से आए लोगों का उसी जमीन के प्रति प्रतिकूल भाव होता है। बाँध और पनबिजलीघर बनाने के लिये अन्य गाँवों के साथ ही टापू पर स्थित मत्योरा गाँव को भी खाली कराया जाना है। अधिसंख्य लोग शहरी ढंग की नई बस्ती में जा चुके हैं। और अब गाँव में कुछ ही लोग बचे हैं - मुख्यत: बूढ़ी औरतें जो अपना घर छोड़ कर कहीं और जाना नहीं चाहतीं। बाहर से कुछ लोग गाँव खाली कराने आ गए हैं। उनका काम है वहाँ की सफ़ाई करना और खाली कराए गए लकड़ी के मकानों को जला डालना। लेकिन जगह-जगह उन्हें लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। कब्रिस्तान की सफ़ाई की खबर पाते ही सारा गाँव उत्तेजित हो कर सीधे उधर को दौड़ पड़ता है। ग्रामवासी उन्हें यह कह कर भगा देते हैं कि हमारे पुरखों की कब्रों को हाथ लगाने वाले वे कौन होते हैं!
विस्थापन के बारे में एक ही परिवार की तीन पीढिय़ों के सदस्यों के दृष्टिकोणों का अन्तर रस्पूतिन ने इस उपन्यास में अत्यन्त मार्मिक ढंग से दिखाया है। इसको ले कर सबसे बूढ़ी दार्या, उसके पुत्र पावेल और पोते अन्द्रेइ की सोच अलग-अलग है। दार्या ने तो लगभग पूरा जीवन ही यहाँ बिताया है और यहीं पर उसके पुरखों की कब्रें हैं जिन्हें वह अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहती है। दार्या का पुत्र पावेल अपनी माँ की भावनाओं को अच्छी तरह समझ रहा है जो नई जगह में अपने आप को ढाल ही नहीं पाएगी। पोता अन्द्रेइ नई जगह में नई सम्भावनाएँ देख रहा है। वहाँ से निकलने की जल्दी में वह अपनी जन्मभूमि से ठीक से विदा तक नहीं हुआ, न अपने गाँव की परिक्रमा की। उधर दार्या ने अपना घर छोडऩे से पहले उसकी पुताई की, साफ़-सफ़ाई की और अन्तिम यात्रा (मृत्यु) से पहले किए जाने वाले सारे रिवाज पूरे किए क्योंकि गाँव खाली हो जाने के बाद सारे मकानों को जला दिया जाना था।
विस्थापन-पूर्व गाँव की लगभग अन्तिम दशा को देखने के लिये एक विचित्र जीव वहाँ प्रकट हो जाता है जो वास्तव में वहाँ का ग्राम-देवता है। उस दृश्य का वर्णन रस्पूतिन के ही शब्दों में देखिए  -
जब रात हो गई और मत्योरा नींद में डूब गया तब पनचक्की की धारा में से एक छोटा-सा, बिल्ली से जरा-सा बड़ा, जीव प्रकट हुआ जो देखने में किसी भी जन्तु से नहीं मिलता था।  वही इस टापू का स्वामी था। अगर घरों में गृह-देवता होते हैं तो टापू का भी कोई स्वामी होना ही चाहिये। किसी ने कभी उसे देखा नहीं था, न ही कभी उससे भेंट हुई थी, पर वह यहाँ सबको और सब कुछ जानता था कि पानी से घिरी और पानी में से निकली इस अकेली भूमि के कोने-कोने में, एक-एक हिस्से में क्या-क्या घटित हो रहा है। इसीलिये तो वह सब कुछ देखता था, सब कुछ जानता था और कहीं कोई दखल नहीं देता था। केवल इसी तरह ही टापू का स्वामी बना रहा जा सकता था कि कोई उसे देख न पाए, कि उसके अस्तित्व के विषय में किसी को सन्देह न हो।
इस तरह तटस्थ रह कर गाँव को विलीन होता हुआ देखते-देखते अन्त में वह भी एक विषादपूर्ण हूक के साथ वहीं घुल कर रह जाता है।
हिन्दी में अनूदित रस्पूतिन का एक अन्य उपन्यास है आग। रूसी में यह उपन्यास 1985 में प्रकाशित हुआ था। इसका हिन्दी शीर्षक अग्निकाण्ड अधिक उपयुक्त होता। इसमें लेखक ने एक गोदाम में लगी आग के समय वहाँ मची लूट का वर्णन किया है और उस आग के माध्यम से साइबेरिया की प्रकृति के अन्धाधुन्ध विनाश की ओर ध्यान खींचा है। उस आग में से तप कर निकला है इवान पेत्रोविच जो पूरे उपन्यास के परिदृश्य और मन:स्थिति को साकार करता है। आग लगने के बाद मची लूट लोगों के नैतिक पतन को साकार करती है। प्राकृतिक और नैतिक पर्यावरण के संरक्षण की समस्या को प्रस्तुत करने वाले इस उपन्यास को पर्यावरणवादी उपन्यास भी कहा जा सकता है।
वलेन्तीन रस्पूतिन रूस के सभी बड़े पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके थे। आपकी रचनाओं के अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुके हैं। सन् 2010 में रूस के लेखक संघ ने उनका नाम नोबल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया था।
रस्पूतिन की पत्नी स्वेत्लाना इवानोव्ना का देहान्त मई 2012 में हुआ था जो स्वयं साहित्यिक परिवार से थीं। स्वेत्लाना की बहन येव्गेनिया रूसी कवि व्लदीमिर स्कीफ़ को ब्याही हैं। रस्पूतिन के पुत्र सेर्गयेइ अंग्रेजी के प्राध्यापक हैं। रस्पूतिन की पुत्री मरीया संगीतकार थीं जिनकी अत्यन्त दर्दनाक मृत्यु माता-पिता की आँखों के सामने ही हुई थी – इर्कूत्स्क हवाई अड्डे पर विमान उतरते ही फिसल गया था और दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
वलेन्तीन रस्पूतिन के मित्रों में से सबसे घनिष्ठ थे नाटककार अलेक्सान्द्र वम्पीलोव जिनकी मृत्यु अगस्त 1972 में हुई थी। वह भी एक दुर्घटना थी जो रस्पूतिन की आँखों के सामने घटित हुई थी – अन्गारा नदी के तट से थोड़ी ही दूरी पर वम्पीलोव की किश्ती कहीं जा टकराई और देखते-देखते डूब गई। इस दुर्घटना के अगले दिन वम्पीलोव का पैंतीसवाँ जन्म-दिन था। दोनों ही घनिष्ठ मित्रों की मृत्यु अपने-अपने जन्म-दिन की पूर्व-सन्ध्या पर हुई।
स्वयं रस्पूतिन के जीवन में सत्तर के दशक के उत्तराद्र्ध में एक भयानक दुर्घटना घटित हुई दी जब उन्हें कुछ बदमाशों का सामना करना पड़ा था। उनके सिर में गम्भीर चोट आई थी और उनका साहित्यिक जीवन समाप्त हुआ लगने लगा था। कुछ सालों तक उनका रचना-कर्म बिल्कुल रुक गया था। उस अत्यन्त कठिन परिस्थिति से उबर कर उन्होंने रूसी साहित्य को अपनी गौरवशाली रचनाएँ दीं। ऐसे लेखक का जीवन ही अपने आप में एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
रस्पूतिन के चार उपन्यास और कुछ कहानियाँ हिन्दी में प्रकाशित हो चुकी हैं और प्रशंसित भी हुई हैं। भुलाए न भूले (झि़वी इ पोम्नि) नामक उपन्यास का अनुवाद जितेन्द्र रघुवंशी ने किया है जिनका इसी साल फऱवरी में स्वाइन फ़्लू के कारण दिल्ली में स्वर्गवास हो गया। जितेन्द्र रघुवंशी आगरा विश्लविद्यालय में रूसी भाषा के प्राध्यापक थे और सक्रिय रंगकर्मी भी थे। अन्य अनुवाद इन पंक्तियों के लेखक ने किए हैं।
रस्पूतिन का लेखन अपनी सूक्तियों के लिये भी जाना जाता है। उनकी कुछ सूक्तियाँ आगे दी जा रही हैं –
1)    धरती अजन्मदात्री नहीं होती।
2)    मनुष्य लम्बी आयु से नहीं बुढ़ाता है बल्कि वह तब बुढ़ाता है जब वह बच्चा नहीं रह जाता है।
3)    सच्ची भलाई की स्मृति उसे करने वाले को उतनी नहीं रहती है जितनी कि उसे पाने वाले को।
4)    आत्मिक स्मृति और आत्मिक अनुभव जैसी अवधारणाएँ हम सब में, किसी भी आयु के व्यक्ति में होनी चाहिये।
5)    आत्म-सम्मान के साथ-साथ दूसरों का सम्मान करना भी आना चाहिये; अपने आप को जानने के साथ-साथ दूसरों को जानने की भी पिपासा होनी चाहिये।
6)    किन्हीं बाहरी घटनाओं से प्राप्त कोई नैतिक अनुभव यदि हमें महत्वपूर्ण प्रतीत होता है तो हम उसे अन्य लोगों के साथ साझा करना चाहते हैं।
हिन्दी में प्रकाशित वलेन्तीन रस्पूतिन की रचनाएँ –
1)    भुलाए न भूले (हिन्दी अनुवाद – जितेन्द्र रघुवंशी), रादुगा प्रकाशन, मास्को, 1983।
2)    तीन रूसी उपन्यास (हिन्दी अनुवाद – हेमचन्द्र पाँडे), साहित्य अकादेमी, 1996।