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Monday 20 Nov 2017

सुर से सुर मिलते ही रहना चाहिए : गुलाम अली


राजीव रंजन श्रीवास्तव
506, आईएनएस बिल्डिंग
नई दिल्ली-110001

9971879007
मशहूर गज़़ल गायक उस्ताद गुलाम अली विगत 5 दशकों से संगीत प्रेमियों को अपनी गज़़लों से आनंदित करते रहे हैं। अपनी मखमली आवाज़ से जब वे किसी शायर की लिखी गज़़ल को गुनगुनाते तो मानो उसे एक नया अर्थ मिलता, एक नयी पहचान मिलती। गुलाम अली का नाम सुनते ही निकाह फिल्म के मशहूर गीत चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है, की याद आ जाती या फिर हंगामा है क्यों बरपा, ये दिल, ये पागल दिल मेरा, कल चौदहवींकी रात थी, जैसी गज़़लें जुबान पर आ जाती। ये गुलाम अली की गायकी का ही जादू है कि आधी सदी बाद भी उनकी आवाज में एक अजीब कशिश और ताजगी श्रोता महसूस करते हैं और आज भी उनके कार्यक्रमों में आधी रात तक उन्हें सुनने के लिए लोग बैठ रहते हैं।
यूं कहने को उस्ताद गुलाम अली पाकिस्तान के गज़़ल गायक हैं, लेकिन हिंदुस्तान में उन्हें कभी पराया नहींसमझा गया। जैसा कि मशहूर सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खां कहते हैं कि दुनिया में हर जगह संगीत सा,रे,ग,म,प,ध,नि पर ही आधारित है। फूल, खून, आग, हवा, पानी जैसे इनकी कोई जाति या धर्म नहींहोता, वैसे ही संगीत का भी कोई धर्म नहींहोता। सुरों को देश या मजहब में बांटा नहींजा सकता। शायद यही वजह है कि भारत में और पूरी दुनिया में जहां भी गज़़ल प्रेमी हैं, वे गुलाम अली की गज़़लों के दीवाने हैं।
विगत अप्रैल माह में जब वाराणसी के विख्यात संकटमोचन मंदिर में यहां का सबसे बड़ा छह दिवसीय संगीत समारोह आयोजित हुआ तो इसके उद्घाटन समारोह में उस्ताद गुलाम अली ने भी प्रस्तुति दी। फासले इतने बढ़ जाएंगे, सोचा न था, गज़़ल के ऐसे मुखड़े से शुरुआत करने वाले गज़़लों के शहंशाह ने आगे गाया कि मोहब्बत का पैगाम लेकर आया हूं। उनके चाहने वाले शाम से ही समारोह स्थल में जुटने लगे थे और जब वे मंच पर आए तो श्रोता आधी रात तक झूमते हुए उन्हें सुनते रहे। संकटमोचन संगीत समारोह में पहली बार किसी पाकिस्तानी गायक ने प्रस्तुति दी, और जिस तरह लोगों ने मगन होकर उनकी गायकी का आनंद लिया उससे यही संदेश जाता है कि संगीत को सरहदों में बांटने की नाकाम कोशिश इंसान को नहींकरनी चाहिए।
1940 में सियालकोट पाकिस्तान में जन्मे गुलाम अली ने संगीत की शिक्षा-दीक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खां से ग्रहण की। और उनके छोटे भाई उस्ताद बरकत अली खां से भी संगीत की तालीम ली। दरअसल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और गज़़ल गायकी के बीच तालमेल बिठाना उन्होंने उस्ताद बरकत अली खां से ही सीखा। अपने गुरुओं की तरह उस्ताद गुलाम अली भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पटियाला घराने के गायक हैं। अपने गुरुओं को शिद्दत से याद करने वाले गुलाम अली मानते हैं कि उनके गुरु आज भी उनके साथ हैं, और उनकी गायकी गुरुओं के आशीर्वाद से ही पूरी हो रही है।
अप्रैल में वाराणसी में कार्यक्रम पेश करने के बाद, देश की राजधानी दिल्ली में भी उनके कार्यक्रम हुए, जिसका गज़़ल प्रेमियों ने भरपूर आनंद लिया। मई के आखिरी सप्ताह वे अपने वतन वापस लौटे, इस उम्मीद के साथ ही जल्द ही दोबारा हिंदुस्तान आएंगे। उनकी वतन वापसी के एक दिन पहले उनसे बातचीत का मौका मिला, यहां पेश है उस लंबी चर्चा के संक्षिप्त अंश-

भारत आकर आपको कैसा लगता है?
भारत आकर मुझे बहुत अच्छा लगता है। यहां बहुत प्यार मिलता है। भारत और पाकिस्तान में कोई अंतर नहींहै। दोनों देशों की संस्कृति एक है, जुबान एक है। लोग एक हैं।
आपकी शुरुआती तैयारी एक गंभीर क्लासिकल गायक वाली थी, उस जमाने में तो आपके सिर पर बड़े गायकों का हाथ रहा। उस जमाने के बारे में बताइए, कि आपने क्या पाया, क्या हासिल किया?
उन बड़े लोगों का हाथ अभी भी मेरे साथ ही है। म्यूजिक तो मेरा क्षेत्र ही है। लेकिन किस तरह के म्यूजिक पर काम करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, ये मैंने उन बड़े लोगों से सीखा। गायन में सोच कैसी होनी चाहिए, किस सोच के साथ आगे बढऩा चाहिए, ये मैंने सीखा और अब भी सीख रहा हूं। बिना सही सोच के तो कोई भी काम ठीक से नहींहो सकता।
ध्रुपद और खयाल के साथ-साथ गज़़लों की ओर आप कैसे निकल आए?
असल में भाईजान, मैं शुरु से केवल क्लासिकल वाला था। मैंने तय किया था कि केवल क्लासिकल गाऊंगा। लेकिन ऐसा जमाना आ गया है। देखिए क्लासिकल में नोट्स अधिक होते हैं, लफ्ज़ कम होते हैं। गायकी ज्यादा होती है, सरगम, तान, परदे, मुरकी, गमक ये सब होता है। हर आदमी इसे समझ नहींपाता। तो मेरे जो उस्ताद हैं, बड़े गुलाम अली खां साहब, जो अब नहींरहे, लेकिन मैं उन्हें आज भी अपने बीच मानता हूं, उनके छोटे भाई थे उस्ताद बरकत अली खान साहब, वे क्लासिकल जानते थे और लाइट क्लासिकल गाने के लिए क्लासिकल पर पकड़ मजबूत होना चाहिए, ऐसा मैंने उनसे सीखा। वे निहायत खूबसूरती से गज़़लें भी गाते थे। उनके गायन में ठुमरी, दादरा जैसी क्लासिकल गायकी के साथ-साथ सुगम संगीत भी होता था, उनका रियाज हम सुनते थे। तभी मैंने दिल में ठान लिया था कि ऐसा ही मुझे भी करना है। क्लासिकल गाने के साथ-साथ गज़़लें गानी हैं। ताकि अपना मन भी राजी रहे और दूसरों का मन भी लगा रहे।
आप अपनी गायकी के संदर्भ मेंंविरासत को किस प्रकार देखते हैं?
विरासत तो हमारी संगीत की ही है। मेरे दादा और पिता गाते ही थे, अब मेरे बच्चे भी गाते हैं। मेरा बड़ा बेटा भी गज़़लें गाता है, उसने शास्त्रीय संगीत सीखा है। उससे छोटा वाला भी गाता है। संगीत तो खुदा की देन है। खुदा ही गाने की ताकत देता है। ये जो दिमाग है, ये भी अल्लाह की देन है। इसी से सोचना है। रोको, मत जाने दो। रोको मत, जाने दो। ये चीजें सीखने से आती हैं। गज़़ल गाने के लिए कम से कम 16-18 बरस शायरों के पास बैठे। रेडियो पाकिस्तान, लाहौर में गाना गाया। उससे मुझे लोकप्रियता मिली। उस समय रेडियो सिंगर होना ऐसा था, जैसे फिल्मों में दिलीप कुमार।
रेशमा को भी रेडियो से ही पहचान मिली।
जी हां, बिल्कुल। तो इस तरह से हमने मेहनत की, उस वक्त कांपीटिशन भी बहुत तगड़ा होता था।
गुजऱे जमाने को जब आप याद करते हैं तो आपको किन लोगों की, किन तआसुर की याद आती है। जिन्होंने आपको कीमती और करआमद चीजें बख्शीं?
रेडियो पाकिस्तान की बहुत याद आती है, वहां के अफसरान की काफी याद आती है। अपने उस्तादों की बड़ी याद आती है। मां की याद बहुत आती है। पिता की याद आती है, जिन्होंने इस पटरी पर बनाए रखा। कभी मना नहींकिया। वर्ना उस दौर में लोग मना भी कर देते थे। सोचते थे कि गायकी में जाने से आवारा हो जाएगा, बिगड़ जाएगा। दुनिया की हवा लग जाएगी। 12-13 बरस का था, जब मैंने गाना गाना शुरु किया, पिछले 60-62 बरस से गायकी में हूं लेकिन मुझसे कभी किसी को शिकायत नहींहुई।
अमीर खुसरो से लेकर गालिब और बाद के शायरों की उम्दा गज़़लें आपने गाई हैं। आपने ऐसे शायरों की गज़़लें भी गाई हैं, जिनका अदब में कोई बड़ा मुकाम नहींहै। आपको इस बात को लेकर अफसोस भी होता है या ऐसा करना जरूरी लगता है?
ऐसी बात नहींहै। अमीर खुसरो और गालिब के सामने तो सभी शायर नए हैं। बाद में उन्हें पहचान मिली और वे बड़ा नाम बन गए। जिस शायरी में मुझे बात दिखी, मैंने उसे गाया, भले ही उन शायरों का अदब में खास नाम न हो। ऊपर चढऩे के लिए सीढ़ी का मटेरियल मजबूत होना चाहिए। जैसा कि हमारे हजरत अली फरमाते हैं- ये मत सोचो कौन बात करता है, ये सोचो कि बात क्या करता है। अच्छी शायरी नयी भी हो तो हमें नए-पुराने से क्या फर्क पड़ता है। नए शायर को गाने से उसकी भी शिनाख्त होती है। अपनी भी शिनाख्त होती है कि भई मैंने ये नया काम किया। दिल में इक लहर सी उठी है अभी, कोई ताजा हवा चली है अभी, या ये दिल ये पागल दिल मेरा, क्यूं बुझ गया आवारगी, इनमें भी बात तो है ना। बुर्जुगों के मुकाबले में इनकी पर्सनैलिटी दूसरी है।
पिछली सदी की लगभग आखरी तीन दहाइयों में गज़़ल ने नई ऊंचाइयां और गहराइयां हासिल करते हुए, खूब पापुलैरिटी पाई। भारत में बेगम अख्तर और जगजीत सिंह, जबकि पाकिस्तान मेंंफरीदा खानम, मेहदी हसन साहब, इकबाल बानो, नैयारा नूर और आप घर-घर में पहुंच गए। आम अवाम से लेकर खासो खवास भी गज़़ल के जादू में गिरफ्तार हुए। आज का जो आलम है, वो गज़़ल के हिसाब से कैसा है? गज़़ल के मुस्तकबिल के बारे में आप क्या सोचते हैं?
जिन-जिन का आपने नाम लिया है, इन सबसे छोटा फनकार हूं मैं। जिन फनकारों में गहराई अधिक होती है, उनके फन की उमर लंबी होती है। गज़़ल का जो मुस्तकबिल है, उसके बारे में मैं यही कहूंगा,- गज़़ल हो सही, गाने वाला हो सही, तो सुनने वाले मौजूद होते ही हैं। सच किसी जमाने में पुराना नहींहोता। सच, सच है।
कला का समाज में क्या रोल है और क्या होना चाहिए?
कला का बहुत बड़ा रोल है। संगीत से प्यार करने वाला, उसे सुनने वाला आदमी सुकून से रहेगा। अच्छा काम करेगा। सुलझा हुआ रहेगा। किसी को धोखा नहींदेगा। किसी से प्यार करेगा। किसी के दुख में खड़ा हो जाएगा, तो ये सारी संगीत की ताकत है।
भारत और पाकिस्तान के अलावा किन देशों में प्रस्तुति देकर आपको अच्छा लगता है और क्यों?
इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया में मुझे बहुत अच्छा लगता है। अमरीका मैं हर साल जाता हूं। कनाडा. फार ईस्ट, मिडिल ईस्ट, सिंगापुर, हांगकांग ऐसे तमाम मुल्कों में कार्यक्रम करता हूं। कुछेक देश ऐसे हैं जहां मैं नहींजा सका। जहां भी अपने लोग हैं, वहां गाने में अच्छा लगता है। विदेशी तो हमारी गायकी को समझ नहींसकते, पर अपने लोगों से भरपूर प्यार मिलता है।
आपका कोई नया अलबम आने वाला है?
अलबम तो इन दिनों कोई नहींकर रहा। पहले ही जितने अलबम किए हैं, उससे ही लोगों को फुर्सत नहींमिल रही और मुझे भी नहींमिल रही। और फिर पायरेसी के कारण म्यूजिक कंपनियों को फायदा नहीं, न मुझे, तो फिर अलबम करने का क्या मतलब।
उस्ताद और शार्गिद की परंपरा, रियलिटी शो के दौर में खत्म हो रही है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
शागिर्द वाली परंपरा तो बहुत जरूरी है। वैसे ही जैसे खाना खाना जरूरी है। बाकी ये जो रियलटी शो के मंच है इनसे भी लोगों को कुछ सीखने तो मिलता ही है। जो ज्ञान लेगा, वो आगे जाएगा। मैं तो अपने उस्तादों को आज भी याद करता हूं। मैं मानता ही नहींहूं कि वे दुनिया से चले गए हैं। मैं आज भी उन्हें अपने साथ महसूस करता हूं।
आपको नए उभरते गज़़ल गायकों में कौन ज्यादा प्रतिभाशाली लगता है?
माशाअल्लाह बहुत सारे अच्छे हैं। हरिहरण, तलत अजीज, अनूप जलोटा ये सब बड़ी खूबसूरती से गाते हैं। सुनने वाले जितने समझदार होंगे, उतना ही गाने वालों को मजा आता है। मेरे सभी अजीज हैं। जगजीत भाई भी मुझे बहुत प्यार करते थे।
आपका गायन भारत-पाकिस्तान में एक जैसी मकबूलियत कायम कर चुका है। भारत में आपकी कला के लिए जो आदर और प्रेम पैदा हुआ है, उसे दोनों देशों के बीच की सियासी दीवारों और दूरियां पैदा करने वाले दांवपेंच से कोई मतलब नहींरहा। ऐसे में आप इन दो मुल्कों के बीच के मसाइल को कैसे देखते हैं? क्या कभी ये दोनों मुल्क आपस में एक-दूसरे का हाथ थामे, कदम मिलाते हुए, बेहतर मुस्तकबिल की ओर बढ़ सकते हैं?
इसके लिए हम अल्लाह से दुआ मांग सकते हैं कि इनका आपस में प्रेम बढ़ता रहे, और बढ़े, और बढ़े । क्योंकि इनका आपस में दुराव होना दोनों के लिए नुकसान है। आम जनता तो शांति चाहती है। बड़ी-बड़ी ताकतें आपसी झगड़े के लिए जिम्मेदार हैं कि अगर ये दोनों शांति से बैठ गए तो उनका माल कैसे बिकेगा। आप देखिए, यहां से बड़े-बड़े लोग पाकिस्तान जाते हैं, वहां उन्हें प्यार मिलता है, हम यहां आते हैं यहां लोगों का प्यार हमें मिलता है। मैं तो यही कहूंगा कि सुर से सुर मिलते ही रहना चाहिए।