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Monday 20 Nov 2017

बिभूति बाबू का घाटशिला


विनोद साव

मुक्त नगर, दुर्ग (छ.ग.)
मो. 9301148626

जब हम किसी कस्बाई स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरकर चलते हैं तब लगता नहीं है कि हम घर से सैकड़ों कोस दूर किसी दूसरे प्रांतर में कहीं उतर आए हैं। किसी किस्म की कोई हड़बड़ी नहीं होती और हम मद्धिम चाप लिए हुए चुपचाप चलते रहते हैं अनजाने होकर भी अपनापन लिए हुए। लंबी दूरी तय कर लेने के बाद ट्रेन से भी अपनापा हो सा जाता है। उसे भी बिदा करते समय हमारे भीतर कुछ-कुछ होता है। लगता है उसमें बैठी बिरादरी हमसे छूटती चली जा रही है। छोटे स्टेशनों पर ट्रेनें बमुश्किल एक मिनट ही रुक पाती हैं पर जाते समय हमारे भीतर टनों, वजनों का कोई भार छोड़ जाती हैं। ऐसे ही उद्वेलन के साथ अपने ट्रालीबैग को खींचता मैं चले जा रहा था। पता नहीं चला कि कब सिर झुकाए हुए प्लेटफार्म के क्रमश: अंधेरे होते हिस्से में आ गया था जहां वह खत्म हो गया था- ''आप शायद बाहर निकलना चाहते हैं- सीढ़ी आपके पीछे की ओर हैं।ÓÓ एक आवाज आई तब दिशा बोध हुआ था।
मोबाइल पर रिंग टोन बजी, तब नाम उभर गया मंतोष मंडल का, जिसे मैंने आज शाम को ही 'सेवÓ किया था। सीढ़ी से उतरकर खड़ा था कि एक नौजवान ने आकर पैर छुए। उसने एक थैले को लपक कर ले लिया था और मैं ट्राली बैग खींचते हुए उसके पीछे चलता बना था। ''होटल पास ही है सरÓÓ यह कहते हुए उसने अपनी बाइक में मुझे ले लिया था। स्टेशन के सामने बाइक जहां खड़ी थी वहां इंदिरा-राजीव की एक साथ मूर्ति थी- नीचे शिला पर लोकार्पण करने वाले तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री अजीत पांजा का नाम लिखा था।
बाइक पर पीछे बैठने से पहले मैंने एक नजर स्टेशन भवन की ओर देखा- लिखा था 'घाटशिलाÓ। किसी हिल स्टेशन के रेलवे स्टेशन की तरह खूबसूरत और प्यारा दिख रहा था। हिल स्टेशन को अगर छोड़ दें तो यह पहली बार है जब किसी कस्बे को मैंने अपना 'डेस्टिनेशनÓ चुना था। अभी कुछ देर पहले ही यहां उतरा था जमशेदपुर-खड़कपुर लोकल से। कल शाम जमशेदपुर में 'व्यंग्य साहित्यÓ पर अपने धुआंधार व्याख्यान के कारण आज जमशेदपुर के सारे अखबारों में छाया हुआ था। बोलते हुए कई प्रोफाइल चित्र भी छपे थे। इस उत्तेजना में जमशेदपुर के एक 'ब्यूरोचीफÓ सत्यम ने मुझे दलमा वन्य अभ्यारण्य घुमाने की पेशकश की थी और दिन भर 'दलमाÓ घुमाने का काम किया था। दलमा जमशेदपुर से पैंतालीस किलोमीटर दूर एक राष्ट्रीय अभ्यारण्य है। यह विशेषकर हाथी संरक्षण की परियोजना में लगा है। शाम तक जंगलों, आदिवासी गांवों और हाथियों को देखता रहा था। अचानक मैंने सत्यम से पूछ लिया था कि 'घाटशिला कितनी दूर है?Ó
वे चौंक उठे और बोले 'पास ही है, नक्सली क्षेत्र है? पर अभी थोड़े नियंत्रण में है। अगर आप जाना चाहें तो वहां के अपने पत्रकार मंतोष मंडल को बोल देता हूं। वे घुमा देंगे।Ó और यहां घाटशिला में मैं मंतोष मंडल की बाइक के पीछे अपना ट्राली बैग लिए बैठा था। होटल मत्स्य गंधा था यानी मछली की बिसरइन गंध थी। मंतोष ने बताया कि 'यह घाटशिला है तो झारखंड में पर बंगाली बहुल हैÓ और होटल की हवा यह प्रमाणित कर रही थी।
'यहां बंगाली आते भी बहुत हैं कलकत्ता से मौसम चेंज के लिएÓ रिसेप्शनिस्ट ने यहां कमरे की चाबी देते हुए कहा था। होटल कलकत्ता में चलने वाले पुराने मेस की तरह का था। इसका ज्यादा हिस्सा लकडिय़ों से बना था। जिसका जिक्र भी बिभूति बाबू की बांग्ला कथाओं में देखने में आता है। तब कलकत्ता में नौकरी चाकरी करने वाले और आगे पढ़ाई जारी रखने वाले लोग इन मेसों में रहा करते थे। यहां पारस्परिकता और सामूहिकता की भावना पनपती थी।
जब-जब भी बंगाल या कलकत्ता जाना हुआ तब जमशेदपुर के बाद यह स्टेशन पड़ा करता था 'घाटशिलाÓ अमूमन दुर्ग से हावड़़ा जाने वाली ट्रेनें घाटशिला में नहीं रुकतीं सिवाय कुर्ला-हावड़ा एक्सप्रेस के। मुझे कल लौटना भी है इसी ट्रेन से, यहां से गुजरते समय घाटशिला का यह नाम इतना सुन्दर और स्पर्शीय लगता कि मन सोचता कि क्या यह फूलों की घाटी वाला कोई मनोरम देश है जहां किसम किसम के फूल पुष्पित पल्लवित होते होंगे और जिनकी सुरभि लिए कोई मंद बयार बहती होगी इसकी स्वर्ण रेखा नदी के घाटों और शिलाओं के बीच। अपने नाम से यह मेरे लिए एक कल्पित प्रदेश बना रहा, शायद औरों के लिए भी, क्या बिभूति बाबू इसीलिए यहां आ बसे थे?
स्टेशन के ठीक सामने ही घाटशिला का मेनरोड है और यही उसका बड़ा बाजार। बांग्ला प्रभाव वाले शहरों का बड़ा बाजार कुछ इस तरह से गुलजार होता है जहां निम्न मध्यमवर्गीय आकांक्षाओं का माया बा•ाार दिखाई देता है। कम मोलभाव वाला चकाचक और सस्ता बाजार। कभी बर्दवान का बा•ाार देखा था वह भी मनमोहक लगा था।
कस्बे की शाम थोड़ी अलसाई हुई सी मगर अपनी अपनी सी होती है। यहां महानगरों जैसी भीषण चकाचौंध से भरी शोरयुक्त शामें नहीं होतीं। हर शाम लोग किसी एक मंदिर में मिल लेते हैं एक दूसरे का हालचाल पूछ लेते हैं। सामूहिक स्वर में आरती गा ली, नारियल पेड़े का प्रसाद खा लिया और आस्था से कृत-कृत होकर चल दिए। न कोई उन्माद न नारेबाजी। फिर भी आने वाले शुचिता और पवित्रता से भर गए।
शाम को होने वाली आरती सम्पन्न हो गई थी 'माता रंकिनीÓ की। पुजारी महाराज ने बताया था कि 'माता रंकिनी मां काली का रूप हैÓ। मेरे सामने एक अनूठे भवन विन्यास का तीन सौ पचास वर्षों पुराना मंदिर खड़ा है। इस आदिवासी अंचल में ही पूजी जाने वाली माता रंकिनी के घाटशिला के आसपास चार और मंदिर हैं। घाटशिला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में हैं। संभवत: मेरा गाइड मंतोष मंडल भी एक बांग्ला आदिवासी है। 'संतोषÓ की तरह ध्वनि सामान्य वाला 'मंतोषÓ नाम है उसका। मैं उससे 'मंतोषÓ का अर्थ जानना चाहता हूं पर वह इसके अर्थ से अनभिज्ञ हैं। संभवत: 'मंतोषÓ का अर्थ भी वही है जो 'संतोषÓ का है अर्थात 'मन का संतोषÓ। मंतोष आदिवासियों की तरह शर्मीला और विनम्र है। मात्र चौबीस वर्षीय यह युवा भले ही अपने नाम के प्रति नहीं पर अपने समय के प्रति सतर्क है और इसीलिए पत्रकार है। आहिस्ते से बताता है 'मां हाउस वाइफ है और पिता दर्जी।Ó
किसी होटल या गेस्ट हाउस में रुककर मुझे वहां कमरे के भीतर खाना-पीना नहीं सुहाता। सुबह की चाय को किसी चौराहे के ठेले या गुमठी में पीना अच्छा लगता है। चाय पीते समय दिखा कि सामने तिराहे पर एक मूर्ति है। अमूमन महापुरुषों की मूर्तियों को हम किसी ऊंचे स्तंभ पर देखते हैं जहां उनकी दिव्यता और ऊंचाई पर होती लगती है, पर यहां स्तंभ पर लगी मूर्ति का जमीन से ही कुल कद पांच फुट का रहा होगा। इन स्थितियों में कोई महापुरुष राहगीरों को अपना सम-वयस्क भी लग सकता है। सड़क से लगी और इतनी कम ऊंचाई पर होने के कारण मूर्ति धूल धक्कड़ से भरी हुई थी। नीचे बांग्ला भाषा में लिखा हुआ था 'नेताजी सुभाषचंद्र बोस।Ó
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौर में दो सेनानी नेहरू और सुभाष लगभग एक समान लगा करते थे। दोनों ही नुकीली टोपी पहने हुए बड़े सुदर्शन व्यक्तित्व से संपन्न थे। दोनों ही युवकोचित ओज से भरे हुए थे। दोनों ही बड़े देशप्रेमी। मौके पर दोनों के गांधी से भले मतभेद हुए पर नेहरू और सुभाष की मित्रता बनी रही। नेहरू की तरह सुभाष भी हिन्दुस्तानी जुबान को पूरी दबंगई से बोला करते थे। बाद में उनकी इस हिन्दुस्तानी जुबान ने आजाद हिन्द फौज को खड़ा किया था। तब हिन्दुस्तान का जनमानस शीर्ष नेतृत्व के लिए इन दोनों महानायकों की ओर ताका करता था। राजनैतिक पेचीदगियों को अगर छोड़ दें तो उस समय देश का एक दूसरा वर्ग नेहरू की तरह सुभाष बोस को भी स्वतंत्र भारत के संभावित प्रधानमंत्री के रूप में देखा करता था और यह विश्वास था कि सुभाष बाबू अगर जी गए होते तो आज देश की हालत कुछ और होती। यह सही है कि नेहरू को विश्व इतिहास और राजनीति की गहरी समझ थी पर अपने चिंतन और कर्तव्यों को लेकर सुभाषचंद्र बोस ज्यादा गंभीर और प्रतिबद्ध थे।
मंतोष कहता है कि 'घाटशिला छोटी जगह है हम इसे बाइक पर भी घूम सकते हैं।Ó मुझे लगा कि साइकिल या मोटर साइकिल में हम किसी जगह की स्थानीयता को और अच्छे से पकड़ सकते हैं बनिस्बत ऑटो या टैक्सी के! फिर बाइक में शहर घूमने का एक अच्छा मौका एक बार मैंने पुणे में आमा लिया था जो कारगर साबित हुआ था। एक फ्लाइओवर दिखा और उस पर मंतोष ने अपनी बाइक चढ़ा दी थी। यह फ्लाइओवर घाटशिला के एक ऐसे सेनानी के नाम समर्पित है जिसने कुछ बरस पहले कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाई थी। यह अपनी स्थानीयता के प्रति प्रेम का एक बड़ा प्रमाण है। बंगालियों के बारे में एक उडिय़ा प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं कि 'बंगाली चाहे बंगाल में रहे या बंगाल से बाहर, वे जहां रहते हैं उसकी स्थानीयता का अपने हिसाब से 'कन्वरशनÓ कर लेते हैं। जैसे ईसाई मिशनरियां 'कन्वरशनÓ कर लेती हैं वैसे ही बांग्ला समुदाय 'बंगाली कन्वरशनÓ कर लेता है। वे अपने रंग में रंग लेते हैं। अपनी भाषा और खान-पान दूसरों को सिखा लेते हैं। वे जैसा देश वैसा भेष में रम जाते हैं नहीं तो दूसरों को रमा लेते हैं। संभवत: वे देश में सबसे ज्यादा अंतरजातीय विवाह कर लेने वाले भद्र जन हैं।Ó
पहले इस जगह का नाम कुछ और था बाद में 'घाटशिलाÓ हुआ। यह झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में बंगाल और उड़ीसा के सिवान पर बसा हुआ है, पर रंग चढ़ा न बिहार का न उड़ीसा का। रंग चढ़ा तो बंगाल का। यहां कितनी ही निर्देश पट्टिकाएं बांग्ला में देखी जा सकती हैं। स्टेशन के बाहर तीन भोजनालय हैं- तीनों में भात-माछ की भरमार है। टट्टे से बनी गुमठियों में बंगालियों का प्रिय 'सिंगाड़ाÓ यानी छोटा समोसा ही मिलता है। फिर मैं जिस होटल में रुका हूं वह मत्स्यगंधा तो है ही।
स्टेशन के पास वाले भोजनालय में मैं और मंतोष खाना खाते हैं। आने वाले हर ग्राहक के सामने सीधे दाल-भात और आलू भटे की सब्जी लगा दी जाती है और नॉनवेज से सजी प्लेटों को एक परात में लाकर दिखा दिया जाता है- जिसको झींगा, चिकन, मीट जो लेना हो उठा ले फकत तीस रुपए प्लेट में। सस्ते में खाकर ग्राहक निकल सकता है। झींगा को परोसने वाला उसे 'चिंगरीÓ कहता है। हमारे छत्तीसगढ़ में भी इस मछली को चिंगरी कहते हैं।
मिठाई प्रेमी बंगालियों के लिए यहां मिठाई के नाम से ही एक दुकान है : 'गणेश कलाकंदÓ। यहां केवल कलाकंद ही बिकता है और गरमागरम कलाकंद निकलता है जो कत्थे रंग का है। यह खोवे की है छेने की नहीं और इसे बेचने वाला बंगाली नहीं बिहारी है। बांग्लाजनों में मिठाई को 'नगÓ हिसाब में लेकर खाने का चलन है। यहां कलाकंद का दाम है प्रति नग आठ रुपए। मिठाई वाले ने हमारे सामने ही एक थाली को उलटाकर उस पर कलाकंद के लोंदे को रखकर, बेलन में दबाकर उसके आकार को मोटी रोटी की तरह बनाया फिर उसे हलवा की तरह काटा और हमें खाने के लिए दो नग दे दिया। अब तक सफेद कलाकंद खाया था कत्थे रंग का नहीं। मैं खाते हुए गणेश कलाकंद के मालिक से कहता हूं यह मिल्क केक की तरह है।Ó वे कहते हैं 'पर यहां इसे कलाकंद ही कहते हैं।Ó
हम उस शिला पर जा खड़े होते हैं जहां कुछ मानव कद काठी जैसी विशाल आकृतियां वाली पांच रेखाएं दिखाई देती हैं। इस जगह का नाम पांच पांडव है। मान्यता है कि ये विशाल आकृतियां हजारों वर्षों पूर्व जन्मे उन पांच पाण्डव भाइयों की छाप है जो महाभारत काल में वनवास पर यहां आए हुए थे। कुछ इस तरह के रेखाचित्र भोपाल के पास भीमबैठका में भी दिखाई देते हैं जिनमें कुछ रंगीन भी हैं और उन्हें भी हजारों बरस पुराना बताया जाता है। सामने हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड का कारखाना और एक बड़ा जलाशय दिखाई देता है। घाटशिला झारखंड में जमशेदपुर के पास स्थित एक छोटा शहर है जो अपने यूरेनियम, तांबा और अन्य खनिजों की खान के लिए प्रसिद्ध है। मुझे अपने भिलाई इस्पात संयंत्र की खदान दल्लीराजहरा की याद आती है जहां लौह अयस्क का भंडार है और जिसके कारण भिलाई देश के सबसे बड़े इस्पात कारखाने के रूप में जाना जाता है और जिसके कार्मिक-अधिकारी होने का मुझे गर्व है।
इस कारखाने के पास से ही स्वर्ण रेखा नदी गुजरती है। हम बाइक चलाते हुए नदी में बने एनीकेट के पास चले जाते हैं जहां मछलियां पकडऩे के लिए बांसों की खपच्चियां बनाई गई हैं। इन खपच्चियों को लगाने वाले बीच-बीच में देख आते हैं कि उनमें कितनी मछलियां फंसी हैं। स्वर्ण रेखा नदी रेतों से अधिक पथरीले मार्ग पर बही है। इस कारण जब नदी भरी रहती होगी तब इसका बहाव भी तेज होता होगा।
नदी पर बने बड़े पुल से होकर जब हम गुजरते हैं तब पुल के नीचे नदी का एक हिस्सा स्वर्ण यानी सोने के समान दमक रहा होता है। मंतोष कहता है कि 'यहां पर नदी की रेत, मिट्टी और पानी सब पीले रंग के होते हैं और लोग यहां पर स्वर्ण कण तलाशा करते हैं।Ó नीचे गहराई पर छोटी-छोटी पुतलियों के समान जो लोग दिख रहे हैं वे महिलाएँ हैं जो स्वर्ण कण पाने की आस में आया करती हैं और नदी की पीली मिट्टी को ले जाया करती हैं फिर उन्हें चलनी से छानकर कुछ स्वर्ण कण निकाला करती हैं और बाजार में मोलभाव किया करती हैं। यह बड़ा ही श्रम-साध्य कार्य है जिसके लिए बड़े धैर्य की जरूरत होती है। उन सोना उपजाती मजदूर स्त्रियों की दशा देखकर यह भान हो जाता है कि बड़ी मेहनत के बाद ही उनकी थोड़ी कमाई हो पाती होगी। यह किसी मृगतृष्णा के समान है। संभवत: नदी के और भी हिस्सों में इस तरह की स्वर्ण युक्त मिट्टी निकला करती होगी इसलिए इस नदी का नाम 'स्वर्ण रेखाÓ है। मैं दूर तक जाती दृष्टि से नदी को देखता हूं उसमें वैसी ही इठलाहट है जैसे स्वर्ण आभूषणों से लदी किसी सुन्दरी में हो।
क्या प्रकृति की ऐसी ही लीलाओं, स्त्री की ऐसी मृगतृष्णाओं, कला और संस्कृति से संपन्न होने के बाद भी संथाल आदिवासियों की विपन्नताओं की गाथा गाने के लिए बांग्ला लेखक बिभूति बाबू यहां रह गए थे? बुरुडीह बांध के रास्ते पडऩे वाले आदिवासी गांवों की झोपडिय़ां कितनी कलात्मक हैं। कितने सुन्दर रंग-रोगन से भरी हैं ! खपरैलों की एक-एक पंक्ति कितनी अनुशासनबद्ध है। फूसों की छप्पर रजत तारों की तरह चमकती हैं। दीवारों की चिकनाहट ऐसी जैसे गणेश कलाकंद हों। यहां गणेश भुइयां की गुमठी है। उसकी गुमठी भी ऐसी जैसे मॉडर्न ऑर्ट का कोई अमूर्त चित्र हो। जंगल में कहीं भी मिल जाने वाली सूखी लकडिय़ों से गूंथ ली गई हैं यह गुमठी। जिसकी झांई सी सुन्दरता आंखों को सुकून देती हैं और सुकून देती है उन राहगीरों को जो बारह किलोमीटर दूर बुरुडीह बांध को देखने आते जाते हैं और यहां थोड़ी देर थिराकर भजिया खा लेते हैं। शक्कर गुड़ नहीं है तो क्या हुआ, काला नमक और अदरक डली चाय पी लेते हैं। इस सबसे भी ज्यादा मन हर लेती है गणेश और निर्मला भुइयां की निर्मल हंसी। एक ऐसी हंसी जो उनकी सूखी लकडिय़ों से बनी झांईदार गुमठी से छनकर आती होगी। हम लौटकर शहर आते हैं उस छोटे से घर के सामने जिसकी दीवार पर एक शिलान्यास का काला पत्थर जड़ा हुआ है। उस पर सफेद अक्षरों में लिखा है 'बांग्ला के महान साहित्यकार बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय का निवास।Ó झारखण्ड सरकार की ओर से जीर्णोद्धार किए गए इस घर के प्रवेशद्वार से हम अंदर होते हैं। घर छोटा है पर आंगन बड़ा है। आंगन में ही स्वर्णिम रंगों वाली उनकी एक मूर्ति स्थापित की गई है। घर के अहाते में एक सहायक बैठा है एक रजिस्टर लेकर। वह हमें नमस्ते करता है। रजिस्टर में आगंतुकों के नाम-पते नोट करता है। मंतोष से वह आत्मीयता से मिलता है। मंतोष जहां भी जाता उसे सब जानते हैं। यह एक पत्रकार के प्रति स्थानीयजनों का जुड़ाव है।
इस घर में तीन कमरे हैं। यहां सहायक हमें एक-एक कमरे में ले जाता है। पहला कमरा अहातानुमा है जिसमें मनभावन रंगों से लोकचित्र वैसे ही उकेरे गए हैं जैसे 1930 में बिभूति बाबू के समय में चलन रहा होगा। दूसरे कमरे में बिभूति बाबू का एक बड़ा रंगीन चित्र है और कमरे की दीवार में बनी अलमारियों में उनकी किताबें रखी हुई हैं। तीसरे कमरे में उनके वस्त्र व जूते चप्पल, चश्मे व कुछ अन्य पोशाकें हैं। यहां एक श्वेत श्याम चित्र है जिसके सामने मंतोष ने मेरा चित्र खींचा। चित्र में बिभूति बाबू का बड़ा सिर है। उनके सिर पर घने बाल हैं। नाक-नक्श बड़े सुन्दर हैं। आंखें बड़ी हैं। सहायक हमें बांग्लानुमा हिन्दी में उन घटनाक्रमों को बताता है जो बिभूति बाबू के समय में घटे रहे होंगे। सहायक कहता है कि 'बिभूति बाबू 1930 से 1950 तक घाटशिला में रहे। एक बार आए तब अपनी अंतिम सांस तक घाटशिला के होकर रह गए थे। यहां वे बंगाल के चौबीस परगना जिले से आए थे। उनकी पत्नी गौरीदेवी की ब्याह के एक साल बाद हैजा से मृत्यु हो गई थी। तब बियालिस बरस की उम्र में दूसरा ब्याह रचाया था रमा चट्टोपाध्याय से। उनका एक बेटा हुआ तारादास नाम का।Ó सहायक आंगन में लगे आम के पेड़ की ओर इशारा करता है 'वह बिभूति बाबू का लगाया आम का पेड़ है और उसके नीचे बैठकर भी वे लिखा करते थे।Ó फिर हमसे कहता है कि 'आप लोग यहां से जाते समय 'फूलडूंगरीÓ जरूर जाइये क्योंकि उस टेकरी पर बैठकर बिभूति बाबू रोज लिखा करते थे और अंधेरा होते ही इस घर में आ जाया करते थे।Ó
मैं स्मरण करता हूं 'पाथेर पांचालीÓ जैसी अमरकृति के उस लेखक को जिस पर महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत राय ने फिल्म बनाई थी। स्तयजीत राय केवल फिल्म निर्देशक ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे कथाकार भी थे। बंगाल में उन्हें किशोरों का कथाकार भी माना जाता है। सत्यजीत राय कहते हैं कि 'बिभूति बाबू के संवाद ही चरित्र को खड़ा कर देते थे। वे चित्रण करते समय पात्रों के धरे स्वांग या पोशाकों का जिक्र लगभग नहीं करते थे। उनके पात्रों के द्वारा कहे गए संवादों में से ही उनके स्वांग या लिबास अपने आप उभरते चले जाते थे, यह उनकी एक अलग व अनूठी विशेषता थी।Ó पाथेर पांचाली उनका आत्मकथनात्मक उपन्यास था। शरतचन्द्र की तरह बिभूति बाबू भी अत्यंत लोकप्रिय लेखक थे और इसीलिए उनकी कृतियों पर भी बांग्ला में अधिक फिल्में बनी। इनमें फिल्म 'अपूर संसारÓ को भी बड़ी प्रसिद्धि मिली थी। यहां उपस्थित सहायक भाव विभोर होकर बिभूति बाबू के योगदान पर बोले जा रहा है। मैं उससे कहता हूं कि 'हिन्दी में शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की फिल्म 'अमरप्रेमÓ भी एक उम्दा फिल्म थी जो उनकी कहानी 'हिंगर कोचूरÓ पर बनी थी।Ó यह सुनकर सहायक किंचित आश्चर्य से भर उठा और बोल पड़ता है 'ये हमको मालूम नहीं था। पर आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा भैया। आजकल इतनी बातें करता कौन है और सुनता कौन है?Ó
सहायक ने हमें फूलडुंगरी पहाड़ जाने को कहा था। यह ढालदार पहाडिय़ों का घुमावदार घाटियों वाला वक्र है जहां हमारी बाइक हम दो सवारों को लेकर ऊपर खींचे जा रही थी। साल के वृक्षों की वीथिकाएँ हैं जो रोमान जगाते हैं। इस जगह में बिछड़े प्रेमी फिर आकर मिलते हैं। अपने टूटे प्रेम को फिर जोड़ते हैं। अपने खोये हुए प्रेमी को फिर से पाने की आस लिए प्रतीक्षा और प्रार्थना करते हैं। हम सबसे ऊपर पहुंच जाते हैं। यहां एक चबूतरा है जहां बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय की लेखन पिपासु से भरी कलम दिन ढले तक निरंतर चलती रहती थी। यहां चल रही है पूर्व सिंहभूम की पुरवैया। अपनी मंथर गति में बांग्ला के महान कथाकार बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय की गाथा को गा रही है।
हम यहां से देख रहे हैं उस नगर को जिसका नाम लेते ही लोग कहते उठते हैं कि 'आप घाटशिला जाएंगे तो बिभूति बाबू का घर देखकर जरूर आएंगे।Ó हम फूलडुंगरी से नीचे देख रहे हैं बिभूति बाबू के घाटशिला को।