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Tuesday 21 Nov 2017

यह समय चिन्तन का है


रवि श्रीवास्तव
20बी, सड़क-30
सेक्टर-10,
भिलाईनगर-490006
मो. 9300547033
आपने बहुत दिनों से कुछ भी नहीं लिखा। लिखने की कोशिश जरूर की आपने। लिखा नहीं गया। यहां तक कि चिट्ठी-पत्री भी नहीं। अपने लिखे को देखकर यह भ्रम होने लगता है कि क्या ये सब हमने लिखा है? कुछ माह से आपके पढऩे का सिलसिला भी लगभग बंद है। पत्रिकाओं का ढेर लगा है। पलटने की इच्छा नहीं होती। यही अखबार वगैरह पढ़ लेते हैं। मित्रों से मिलना-जुलना कम हो गया है। कोई मित्र पके आम की तरह घर में टपक जाए तो मिल लेते हैं। पनलुकुवा नहीं बने रहते। गोष्ठियों में आना-जाना नहीं के बराबर है। दाल में नमक जितना। ऐसा भी हुआ कि आपको किसी कार्यक्रम में अध्यक्षता के लिए निमंत्रण मिला। लेकिन आपने अपनी व्यस्तता बताकर टाल दिया हो। किसी कार्यक्रम में शामिल भी हुए तो बेमन से। बीच में चुपके से निकल लिए। आप अधिकांश समय घर में या फिर किसी एकांत में बिताने लगे हैं। आपकी पटर-पटर करने की आदत है। लेकिन कम बोलकर काम चला लेते हो।
इसका मतलब यह न समझा जाए कि आप जैसे समर्थ, अवसाद में हैं। या फिर आपकी चुप्पी, किसी रहस्यमयी बीमारी का संकेत है। दरअसल आजकल आप चिन्तन के दौर से गुजर रहे हैं। आपकी यह खामोशी चिंतन के कारण है। सबके लिए इसको समझ पाना जरा मुश्किल है। लम्बी उम्र पार करने के बाद एक ऐसा पड़ाव आता है। यह एक भाग्यशाली प्रक्रिया है। ऊंट किस करवट बैठेगा कोई नहीं जानता। आप चिन्तक बनने के सुखद दौर से गुजर रहे हैं। ऐसी भाग्यरेखा हर किसी की हथेलियों में संभव नहीं है। समाज में एक मनीषी की श्री वृद्धि होगी। भारतीय मनीषा के लिए यह एक शुभ संकेत है। आप हिन्दी पट्टी से ताल्लुक रखते हैं। हिन्दी में लिखते हैं। अत: राष्ट्रभाषा हिन्दी का गौरव बढ़ेगा। हिन्दी विदेशों में भी फल-फूल रही है। हिन्दी सेवियों के विदेशी दौरे, इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं।
चिन्तन की कई दिशाएं हैं। आपका चिन्तन किस दिशा में जा रहा है, समय ही तय करेगा। देश में आज भी गांधीवादी चिन्तकों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। वे लम्बे समय तक देश की दशा-दिशा के नियामक बने रहें। आज भी सक्रिय हैं। पूरे देश के भूगोल में इनकी मौजूदगी है। इतिहास के पृष्ठों में सुरक्षित हैं। छेड़छाड़ की कोई गुंजाइश नहीं बनती। वैसे मौजूदा दौर राष्ट्रवादी चिन्तकों का है। अब तक इन पर खामोशी की चादर पड़ी थी। वहां भारी हलचल देखी जा सकती है। यह अंतरराष्ट्रीय किस्म की हलचल है। जिसकी धमक बराक ओबामा तक है। इसी से मिलता-जुलता सांस्कृतिक किस्म का चिंतन है। यह भी उफान पर है। जलवायु परिवर्तन का इसे लाभ मिला है। सांस्कृतिक चिन्तकों की बाढ़ सी आई हुई है। कई जगह तो रेस्क्यू ऑपरेशन जरूरी हो गया। इन्हें संरक्षण भी अच्छा मिल जाता है। संरक्षण मिल जाने से बहुत कुछ फलता-फूलता है। ठूंठ में भी पत्ते देखे जा सकते हैं।
आध्यात्मिक चिन्तकों की फौज में भारी इजाफा हुआ है। आध्यात्म की चर्चा बिना तो सारा विमर्श अधूरा जान पड़ता है। भारतीय दर्शन इन्हीं के बल पर है। स्पष्टवादी होते हैं। अपना प्रभामंडल साथ लेकर चलते हैं। स्पष्टवादी होने की वजह से सुर्खियों में बने रहते हैं। समय-समय पर सुर्खियां जरूरी हैं। आध्यात्मिक चिन्तकों के ठाठ-बाट निराले होते हैं। राजकीय अतिथि होने का सुख भी मिलता है। कई-कई राज्यों में इसकी व्यवस्था है। इस मामले में कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। ऐसा महसूस होता है कि समाजवादी चिंतक हाशिए पर हैं। लेकिन ऐसा नहीं। भारत के समाजवादी स्वरूप में हर जगह उनकी छाप मौजूद है। यह चिंतन संविधान की आत्मा है। भारतीय स्वभाव में मौजूद है। इनकी सरगर्मी घटती-बढ़ती रहती है। यह चिन्तन तो कारपोरेट जगत की आंख की किरकिरी है। बौद्धिक जगत में वामपंथी चिंतक अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। आधुनिक वैज्ञानिक युग की जटिलताओं से सुपरिचित होते हैं। ड्रेसिंग रूम से अभी-अभी हाथ-मुंह धोकर निकले युवा माक्र्सवादी चिन्तक, दिशाहीन भटकाव से निजात पाने में सक्रिय हैं। अपना पूरा जीवन संघर्ष के साए में बिता देने वाले बुजुर्ग चिंतक उगते सूरज की लालिमा में अपना विश्वास बनाए हुए हैं। एक नई नस्ल भी सामने आई है। आजकल पर्यावरणवादी चिंतकों का बोलबाला बढ़ा है। वे पर्यावरण की चिंता में लगातार घुलते जा रहे हैं। उनके चिंतन के केन्द्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं। बच्चों के कोर्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय सेमीनारों तक सुने व सराहे जाते हैं। इन्हें पृथ्वी से लेकर ब्रह्माण्ड तक बहुत कुछ बचाना है।
मैं हाल-फिलहाल एक संस्था की गोष्ठी में गया था। सरकारी अनुदान का आयोजन। अच्छी-खासी भीड़। भोजन से लेकर उठने-बैठने की उत्तम व्यवस्था। सरकारी अनुदान का सर्वथा उचित सदुपयोग। आयोजन की एक विशेष खासियत रही। चिंतकों की भरमार। लगभग सभी आमंत्रित के नाम के आगे चिन्तक का पुछल्ला जुड़ा हुआ था। एक शामियाने के नीचे भांति-भांति के चिंतक। आधुनिक चिंतक, अपना चिंतन ही विवाद पैदा करने के लिए करते थे। इस सोच में परिवर्तन का बवण्डर आया है। अब चिंतक अपने विचार दृढ़ता के साथ रखते हैं। कोई उसका खंडन-मंडन नहीं करता। दूसरा आकर अपने विचार रखता है। कुल मिलाकर विचारों की श्रृंखला बनते चली जाती है, जो झंडा फहराने के काम आती है। विवादों से परे रहकर पूज्यनीय बने रहने वालों के दिन फिरे हैं।
बिना पेंदी के ऐसे सारे चिंतक मिलकर देश को कहां ले जा रहे हैं, यह घोर चिंता का विषय है। लेकिन इस विषय पर चिंतन करने के लिए भी चिंतकों की जरूरत पड़ेगी। मैं उसी की खोज में निकला था। मैं निराश नहीं, बेहद आशावादी हूं। आपसे मिलकर प्रभावित हुआ। मुझे आपमें वे सारे गुण दिखलाई पड़ रहे हैं, जो एक आधुनिक चिंतक में होनी चाहिए। मैं आपको बधाई देता हूं। हमारे साथ बने रहिए। भारतीय मनीषा समृद्ध होगी।