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Wednesday 22 Nov 2017

मुनियप्पा का मैन पावर सप्लाई ( मूल : बी.एम. हनीफ)

 

अनुवाद : डी.एन. श्रीनाथ
नवनीता, सेंकंड का्रस अन्नाजी राव लेआउट
1 स्टेज विनोवा
नगर सिमोगा,
कर्नाटक- 577204
मो. 9611873310
गौरा को बार-बार बेल्लि का चेहरा ही आँखों के सामने दिखता था। उसके नाक के बाएँ तरफ  गोलाकार जो नथ थी, हँस रही थी। माथे से घुंघराले बाल नीचे उतर रहे थे, उन्हें काले रंग के दो क्लिप से बांधकर ऊपर दबाकर खड़ा किया था। माथा निशान से गोदाई थी। खुरदरी नाक। बिंबाफल जैसे अधर। गले में मणिहार। सचमुच मेरी बेल्लि बड़ी खूबसूरत है। वह बड़ी भोली-भाली थी और उसे मुनियप्पा ही झूठ बोलकर, धोखे से ले गया होगा। वह झूठ-मूठ कुछ भी जानती नहीं। जो भी कुछ कहे, विश्वास कर लेती है। उस आदमी ने जाने उससे क्या कहा होगा, कहाँ ले गया होगा, कल मुनियप्पा के साथ अवश्य बातें कर लेनी चाहिए, चाहे झगड़ा ही क्यों न हो जाय, जरूर पूछना चाहिए ।
     गौरा को अपने छोटे गाँव की याद हो आई जो तमिलनाडु के पार जंगल के पास था। वह रो पड़ा । अगर उसे पता होता कि इस वृहत बेंगलोर के चमक दमक में उसकी बेल्लि इस तरह गायब हो जाएगी, वह उसे यहाँ लेकर आता ही न था । जब गौरा जंगल में था, बिना किसी डर के रहता था । खाने-पीने और कपड़े की कमी के होने पर भी मन में चैन था, शांति थी । पेट के लिए कुछ रागी (एक कंद जो दक्षिण भारत में ज्यादा पैदा होता है और ज्यादा लोग खाते हैं) उपजाना काफी था । इलिग जाति के लोग जिन्होंने जंगल की जमीन को साफ  कर खेत के रूप में बदल दिया था, वहाँ काफी मात्रा में रागी उपजाते थे। खेत के मेंड़ में जो चूहे मिलते थे, पकड़कर मसाला लगाते थे और उन्हें भूनकर खाते थे, बड़ा स्वादिष्ट खाना हो जाता था। गौरा चूहे पकडऩे में माहिर था। खेत के मेंड़ में लंबे बिलों का निर्माण कर जमीन के अंदर जीवन यापन करनेवाले बड़े-बड़े चूहों के लिए गौरा जान भी देने के लिए तैयार था। चूहे जो बाहर आने में सताते थे, गौरा पल भर में बाहर निकालता था। एक मटके के अंदर गोबर डालकर उसमें आग लगा देता और गाढ़ा धुआँ बिल के अंदर छोड़ देता तो पाँच-दस मिनिटों में चूहे मर ही जाते थे । बिल के अंदर हाथ डालकर चूहे की पूंछ को पकडऩे का मजा ही कुछ और है।
    बेंगलोर में दलित मोर्चा होनेवाला था, उसमें लोगों को ले जाने के लिए मुनियप्पा एक लारी ले आया, जो मिट्टी लादती थी। गौरा न जाने किस घड़ी में मुनियप्पा के आँखों के सामने आया।  
     आ जाओ, बदमाश ! यहाँ बैठ कर मिट्टी खा रहे हो न..बेंगलोर में आकर तो देखो, यहां तुम कंधे पर चूहों को ढोकर जाते हो न...इसी प्रकार तुम बेंगलोर में रुपयों की थैली लादकर घूम-फिर सकते हो.. मुनियप्पा ने उसमें आशा जगाई थी। गौरा ने कभी बेंगलोर की तरफ  मुँह करके नहीं देखा था। मुनियप्पा के मुँह से बेंगलोर की चकाचौंध और शान-शौकत की कहानियों को सुन सुनकर रोमांचित हुआ था। उसने टेंट सिनेमा में रजनीकान्त की एक फिल्म देखी थी जहाँ एक जगमगाते हुए शहर की तस्वीर उसके मन की गहराई में ताकती बैठी हुई थी।
     मैं भी दस साल पहले लारी में सिंधगी से बेंगलोर आया था, बदमाश! मुनियप्पा ने बेंगलोर-बीजापुर मिश्रित कन्नड़ भाषा में धीरे से उसके कान में कहा और हँसा।
    गौरा ने दूसरी बात नहीं सोची और लाल मिट्टी से सना हुआ लारी में चढ़ कर बैठ गया। दो घंटे का बेंगलोर का सफर उसे दुश्कर नहीं लगा था। मोर्चा में भाग लेने के लिए जो-जो आए थे, रात में मांसाहारी खाना खाये, शराब पिये और लारी में चढ़ कर गाँव चले गए। मगर गौरा मुनियप्पा पर भरोसा करके बेंगलोर में ही ठहर गया। उसे मुनियप्पा ने मेजेस्टिक के ऊपरी पुल के पास जो सुलभ शौचालय था, छत पर कंबल ओढ़कर लेट जाने का सौभाग्य प्रदान किया था। मुनियप्पा गौरा से यह कहकर चंपत हो गया था कि कल सुबह यहीं नहाकर तैयार रहना, तुम्हें एक नौकरी दिला दूंगा।
    मुनियप्पा एक छोटा नेता था। बेंगलोर के सहज-गुण के अनुसार नौकरों को जुटाना उसके कार्य-कलाप का एक राजनैतिक हिस्सा था। मोर्चा में लोगों को जुटाना भी एक तरह से पार्टटाइम काम था। उससे भी बढ़कर उसने कई नौकरियां पुरुष-स्त्री और लड़के-लड़कियों को दिलाई थी जो जंगल के अँचल से आए थे। उसने कई लड़कियों की नींद में सपने बो दिये थे और वे आज गाँधी नगर के समूह-नृत्य में ख्याति के शिखर पर चढ़े थे। उसने उन लड़कों को भी नौकरी दिला दी थी जो एक अक्षर भी नहीं पढ़ सकते थे। गौरा को एक नौकरी दिला देना, वह भी बेंगलोर जैसे वृहत शहर में, मुनियप्पा के लिए कठिन बात तो नहीं थी ।  
   सुबह सरक गयी और सूर्य सिर पर चढ़ा, मगर गौरा को मुनियप्पा का दर्शन भाग्य प्राप्त नहीं हुआ। गौरा भूख से तड़पने लगा और इधर-उधर देखने लगा। जब वह लारी से उतर रहा था, मुनियप्पा ने उसके अंदर के जाँघिया में जो रुपये सरका दिया था, याद आए। टटोलकर देखा, पचास का नोट था ..गौरा खुश हुआ । वहीं नाले पर एक ठेला खड़ा था, इडली-चटनी खाई, पानी पिया और डकारकर चैन की साँस ली। अब उसे बड़ा चूहा याद आया जिसे वह जंगल में पकड़ता था। बड़े चूहे के मांस का एक अलग ही स्वाद है। उसमें ठीक-ठाक से मसाला लगाकर तेल में भूनकर खाने का मजा ही कुछ और है..रात के वक्त गौरा जब सुलभ शौचालय की छत पर लेटा था, नीचे के नाले में छोटे-बड़े चूहे दरबार चला रहे थे, इस आवाज से उसे नींद ही नहीं आई थी। सोचा था कि नीचे जाकर एक-दो चूहे पकड़ लूँ, मगर वह सफर और मोर्चा के धूल-झंझट के कारण तन-मन से थक गया था, इसलिए ठीक से नींद नहीं आई।
     गौरा ने इडली खायी, चाय पी, तीन-चार बार जंभाई ली, इधर-उधर कदम डाले। तभी दूर से मुनियप्पा आता दिखाई पड़ा था।
     आओ गौरा...नाश्ता किया, चाय पी... मुनियप्पा ने सहजता से पूछा था । कल उसने सफेद कमीज और पैंट पहन ली थी। मगर आज उसके विरुद्ध बड़े-बड़े चैकवाला बुश-शर्ट और नीले रंग का पैंट पहना था और आज उसका रूप ही अलग था। उसने आँखों पर काला चश्मा पहना था। हाथ में हीरो होंडा की चाबी थी जिसे वह घुमा रहा था। उसका नया रूप दिख रहा था। गौरा यह सोचकर खुश हुआ कि एक पहलू से देखने से यह मुनियप्पा  फिल्म  स्टार रजनीकान्त के जैसा ही है।
      आओ गौरा...तुम्हारा काम करके ही आया हूँ...इसलिए आने में देरी हुई। मुनियप्पा ने गौरा को बाइक पर पीछे बिठा लिया और यशवंतपुरम की ओर मोटरसाइकिल दौड़ाई। वह कार, बस और रिक्शों के बीच बड़ी तेजी से चला रहा था, उसकी यह करामात देखकर गौरा आश्चर्य से उसके पीछे सिकुड़कर बैठा था। उसने तो जंगल के अंचल में स्थित टिन की पाठशाला में सिर्फ दो साल तमिल पढ़ी थी, वह पढ़ा-लिखा नहीं था, गंवार था, मुझे यह मुनियप्पा बेंगलोर महानगर में कैसी नौकरी दिलाएगा, यह आतंक उसके मन में था। फिर भी उसके व्यक्तित्व में एक आत्मविश्वास की रेखा थी जो गौरा को बरबस उसकी ओर आकर्षित कर रही थी।
     देखो, यही तुम्हारी नौकरी करने की जगह है, मुनियप्पा ने गौरा को एक भारी इमारत दिखाते हुए कहा। इमारत को देखकर गौरा ने दांतों तले उंगली दबाई ! मुनियप्पा ने खिलखिलाते हुए फिर कहा- अमरीका में इसका प्रधान कार्यालय है, वहीं से जहाज में चीजें, कपड़े,  बाल्टियाँ, दूध, घी सब कुछ आता है। यहीं से सेठ और मलयाली दुकानों को ये चीजें होलसेल सप्लाई किया जाता है। लोग यहाँ लारी में आकर माल ले जाते हैं। हर महीने करोड़ों रुपयों का व्यवहार होता है। इनका गोदाम ही मैसूर महल से भी बड़ा है...
   गौरा फिर अचरच में डूब गया। इतने बड़े गोदाम में इस गंवार को कैसी नौकरी दी जाएगी?
   तभी मुनियप्पा ने कहा.. डरो मत!  यहाँ तुम्हें वही काम दिया जाएगा जिसे तुम जानते ही हो। जंगल में तुम चूहों को पकड़ते हो, वहाँ तुम्हें पैसे कौन देगा ? मगर इस गोदाम में चूहों को पकड़ लो, उनकी पूंछ काटकर दिखाओ, बस। तुम्हें दुगुने पैसे दिला दूंगा..हा.हा.हा.. मुनियप्पा फिर ज़ोर से हँस पड़ा।
   इस प्रकार बेंगलोर महानगर में लाखों-करोड़ों नौकरों में गौरा भी एक हो गया। चूहा पकडऩा उसका प्रिय काम ही था। सारे दिन गोदाम के आसपास घूमता-फिरता और चूहों को पकड़ता जिसका मजा ही कुछ और था। यहाँ पर चूहों को पकडऩे के लिए अलग-अलग मशीन भी थीं। टेनिस रैकेट जैसे नमूनों के इलेक्ट्रानिक साधनों का इस्तेमाल करना गौरा को बिलकुल पसंद नहीं था। उसे चूहों को भगा-भगाकर पकडऩा ही पसंद था। उनकी पूंछों को पकड़कर खींचना उसे बाएँ हाथ का खेल था। शहरों में मोटे-मोटे चूहों की ही भरमार है। कुछ चूहे उसे गुर्र गुर्र गुर्र आवाज से डराते थे। मगर जब उनकी समझ में यह बात आई कि गौरा जंगली आदमी है, वे ही डरने लगे !
     मगर इस शहर में पकड़े गए चूहों की पूंछों को हिसाब के रूप में देकर बाकी के भागों को जलाकर खाना है, इस बात से गौरा डरने लगा। तिम्मक्का को भी जो मल्टीनेशनल कंपनी में कूड़ा-कचरा साफ  करती थी, नाजुक रूप से साड़ी पहनकर स्वच्छता से आना पड़ता था। उसका रंग काला था, मगर उसका स्टाइल किसी गगन सखी से कम नहीं है। बाकी औरतें और लड़कियाँ भी चमक-दमक से ही आतीं थीं । गौरा ने सोचा कि मेरा यहाँ चूहों को जलाकर खाना किसी ने देख लिया तो क्या सोचेगा? उससे बातें करना ही बंद कर देंगे। न जाने ये चमक-दमक उसे क्यों नहीं भाती थी, यह बात उसके मन के कोने में पैठ गई थी। साथ ही उसे यह चिंता भी सताने लगी कि बिना चूहे खाये जीना कैसे?
     उस बड़े गोदाम में एक कंपनी के मालिक ने चूहा पकडऩे का ठेका लिया था जिसे मुनियप्पा ही अहम रूप से मैनपावर सप्लाई करता था। मुनियप्पा को महीने में ढाई हजार की पगार मिलती थी, मगर  इस बात पर गौरा को विश्वास ही नहीं था । सिंगापुर सड़क के किनारे मुनियप्पा ने चार छोटे-छोटे डेरों को किराये पर लिया था, उनमें बारह लोगों की एक वर्कफोर्स थी। उसमें गौरा भी एक हो गया। वह इधर-उधर घूमने लगा और थोड़ी-थोड़ी अँग्रेजी भी सीख ली । एक महीने में ही नौकरी करने में पक्का हो गया। बेंगलोर शहर भी जादू-टोना जानता है, यह बात गौरा को कैसे पता चले? छह महीने में बेंगलोर नामक मायानगरी ने उसकी वेशभूषा ही बदल दी। लो वेस्ट पैंट, जींस सभी उसके पिछले भाग के लिए ठीक लगने लगे। मगर अब भी उसका मन शुद्ध जंगल के अंचल का था। उसे झूठ, धोखे का पता ही नहीं था। जो भी, कुछ भी कहे, उसके लिए सच ही था।
     एक साल की कमाई के बाद गौरा जब गाँव आया तो उसे देखकर सारा गाँव अचरज में पड़ गया। रंग-बिरंगा चौकोर टीशर्ट और रजनीकांत वाला जींस और कैनवास शू में वह चमक रहा था। गौरा के इस रूप को देखकर लोग रोमांचित हुए। माँ को बेटे के आने की खबर पहले ही मालूम थी, इसलिए उसने गौरा की शादी के लिए एक लड़की की भी तैयारी कर दी थी । मदुरै में माँ की एक सहेली ने घर बसाया था, बेल्लि उसकी बेटी थी। माँ जब मदुरै मंदिर गई थी, उसका परिचय हुआ था। बेल्लि को देख कर माँ ने तभी निश्चय किया था कि अगर बेटे की शादी करूंगी तो इसी बेल्लि से करूँगी। वह उसकी जाति की नहीं थी, मगर समीप जातवाली थी ।
     अगर गौरा गाँव में ही रहता तो अपनी ही गाँव की हट्टी-कट्टी लड़की को उड़ाके जंगल ले जाता, एक सप्ताह के बाद वापस आता और अपनी जाति की रीति-रिवाज के अनुसार शादी कर लेता। अब माँ ने जिस लड़की को तय किया था, कुछ हद तक शहर से परिचित थी। मदुरै तो शहर ही था। गौरा ने खुशी से माँ के साथ जाकर लड़की को देखा। माँ ने जल्दी दिखाई और गौरा की शादी वहीं एक मंदिर में सरल रूप से करा भी दी।
    शादी के बाद गौरा बीवी के साथ गाँव आया, मगर ज्यादा दिन गाँव में नहीं रहा। उसने ऐसा बर्ताव किया कि उसके बिना कार्पोरेशन की घड़ी चलती ही नहीं। उसने बीवी के साथ महानगर में कदम रखे। मुनियप्पा से मिलकर अपने डेरे में रहनेवाले दो साथियों को दूसरे कमरे में भिजवाने की व्यवस्था की।
  बदमाश !..शादी किया...मगर मुझे इसकी खबर तक नहीं की...हां, बड़ी खूबसूरत लड़की को लाये हो...अच्छा हुआ !... मुनियप्पा ने कमरे की व्यवस्था के साथ उसकी तारीफ  भी की। साथ में उसके लिए एक कुर्ता और बेल्लि के लिए एक साड़ी भी खरीदकर दिया। साथ में दोनों को खड़ा किया और फोटो भी खींचा। आसपास के डेरेवालों को मिठाई भी खिलाई मानो शादी उसीकी हुई हो। बेंगलोर आकर छह महीने हो गए, गौरा और बेल्लि की जिंदगी स्वर्ग के समान थी। मुनियप्पा कभी-कभी घर आता, हालचाल पूछकर जाता। जब भी आता, मिठाई के साथ आता। गौरा को तो काम ही काम था। गोदाम इतना बड़ा था कि उस अकेले से काम निभाना मुश्किल था। मुनियप्पा और दो लड़कों को कहीं से पकड़कर लाया और गौरा की मदद के लिए उसके पास छोड़ दिया।
    बेल्लि का भोलापन आसपास के डेरेवालों के लिए तमाशे की बात बन गई थी। बेल्लि का बेंगलोर में अपना कहनेवाला कोई नहीं था। इतना पता था कि एक चाची केंगेरी में है, मगर उसने उनका घर नहीं देखा था। बेल्लि को बाहरी दुनिया का अता-पता नहीं था, गौरा ने उसके भोलेपन के बारे में ध्यान नहीं दिया। उसने एक-एक करके शहर के रीति-रिवाज सिखाए। उसकी तमिल-कन्नड़ मिश्रित भाषा का सुधार भी हुआ। बेल्लि ने केंगेरी तक बस में जाने-आने की विधि भी सीख ली। इस प्रकार बेल्लि बेंगलोर से जुड़ गई, तभी एक दिन उसने एक नई बात उठाई।
    तुम चूहों को खाते हो.. बेल्लि ने सीधा सवाल किया। उस समय के उसके चेहरे के भाव को देखकर गौरा सावधान हो गया। वैसे तो अब भी गौरा कभी-कभी चूहों को जलाकर खाता था, यह सच था । मगर यह बात बेल्लि को पता न चले, यह सावधानी बरतता था। शादी के बाद उसने अपनी इस आदत को दूर करने की  कोशिश भी की थी, मगर सफल नहीं हुआ था। बेल्लि से यह सच बताया जा सकता है।
    तुम्हें किसने कहा- गौरा ने यकायक गंभीर होकर गौरा को देखा।
     किसी ने भी कहा हो...क्या यह सच है, बताओ? बेल्लि ने जिद की।
    हमारे गाँव में कुछ लोग खाते हैं, मैंने तो खाया नहीं है.. गौरा ने अपनी बात दूसरी तरफ  मोड़ दी।
     ठीक एक सप्ताह के बाद बेल्लि गायब हो गई। गौरा रात के वक्त नौकरी करके घर वापस आया तो बेल्लि डेरे में नहीं थी। सोचा कि कहीं गई है। मगर रात भर निरीक्षा करने पर भी बेल्लि नहीं आई। आसपास के लोगों से पूछने पर भी पता नहीं चला। गौरा ने मुनियप्पा को फोन किया। मुनियप्पा बाइक लेकर तुरंत आया ।
     क्यों रे ! उसे तुमने कुछ कहा  क्या? मुनियप्पा ने गौरा को ही  डाँटा।
लड़कियों के बारे में तुमने क्या सोचा है ! बेल्लि को किसी बात का दुख न हो, यह तुमसे नहीं हो सकती थी तो तुम उसे बेंगलोर लेकर आए ही क्यों...मुनियप्पा नाराज हुआ ।
    आधे घंटे तक चर्चा हुई, समस्या का हल नहीं हुआ । मुनियप्पा ने ताकीद की कि पुलिस कम्प्लेंट न किया जाय। फिर कहा.. दो दिन इंतजार करेंगे। वह नाराज होकर गाँव चली गई होगी, इसके बारे में पूछताछ करो। बदमाश ! बीवी को भली भांति देख नहीं सकता, अब रोता है ! उसने धमकाया और बाइक चलाकर निकल गया।
    एक सप्ताह तक इंतजार किया गया, मगर बेल्लि का अता-पता नहीं चला। वह गाँव भी नहीं गई थी। गौरा डर से कमजोर हो गया। मुनियप्पा ऐसा बर्ताव करने लगा कि कुछ हुआ ही नहीं है और कहने लगा कि इस मामले को भूल जाओ। गौरा ने आसपास के डेरेवालों से पूछताछ की तो पता चला कि गौरा की अनुपस्थिति में मुनियप्पा डेरे में आता था और सभी से जिस तरह बातचीत करता था, उसी प्रकार बेल्लि से भी बातचीत करके चला जाता था। गौरा को आश्चर्य हुआ कि बेल्लि ने यह बात उससे कभी नहीं कही।
    देखो, बेल्लि कहीं फिल्म-यूनिट में तो भर्ती नहीं हुई है..मुनियप्पा फिल्म के लिए डांसरों को भी सप्लाई करने का ठेका करता है, ऐसा कहा गया है। किसी ने कहा तो गौरा का अनुमान और बढ़ गया।
    पाँच-छह दिन हो गए, गौरा काम पर नहीं गया। एक दिन मुनियप्पा बाइक पर आया और कहा- बदमाश ! गोदाम में काम ज्यादा बढ़ गया है । तुम यहाँ देवदास के समान पड़े हो। उसने धमकी भी दी। गौरा आग बबूला हो गया। उसे ज़ोर से चीखने को मन हुआ। मगर मुनियप्पा को देखने पर लगा कि उससे झगड़ा करने की ताकत उसमें अब नहीं है ।
   मैं नौकरी छोड़ दूंगा। गौरा बड़बड़ाया।
   नौकरी छोड़कर क्या करोगे। पेट के लिए क्या करोगे? क्या चूहा खाएगा? मुनियप्पा ठहाका मारकर हँसा। गौरा अपना क्रोध सह न पाया। तुरंत उठकर मुनियप्पा पर हमला किया। गौरा हट्टा-कट्टा आदमी था, उसकी एक ही मार खाकर मुनियप्पा जमीन पर गिर पड़ा ।
  क्यों रे, बदमाश ! तुम्हारी चर्बी बढ़ गई है। पकड़ लो इसे। मुनियप्पा  चिल्लाया। पड़ोस के डेरों से मजदूर भाग आए और गौरा को पकड़कर पीछे घसीटे और गौरा को धमकी दी... क्यों बे ! मालिक को ही मारता है। अपनी चर्बी दिखा रहे हो। एक मजदूर ने उसे थप्पड़ मार दिया ।
   गौरा जमीन पर गिरकर बैठ गया और रोने लगा। तभी मुनियप्पा ने ही आकर उसे सांत्वना दी। चाहे तो पुलिस थाने में शिकायत करेंगे । मगर पुलिस तुम्हें ही शक से देखेगी। यों ही उनके हाथ में पड़कर परेशान होते हो? यह बात तुम्हारी भलाई के लिए ही कह रहा हूँ । फिर भी तुम्हें मुझ पर शक है तो कल तुम्हें मेरे साथ फिल्म शूटिंग में ले जाऊंगा, चाहे तो तुम ही वहाँ पर पूछताछ कर लो।
    मुनियप्पा ने उसे सहलाया, गौरा में नई आशा पैदा हो गई।
    फिर गौरा डेरे में जाकर लेट गया, उसे रात भर नींद नहीं आई । कल शूटिंग की जगह पर जाना है। वहाँ अगर बेल्लि मिल गई तो उसे सांत्वना की बातें कहकर वापस लाना है। आगे से चूहा खाने की बात तो दूर, उसे पकडऩे की नौकरी ही छोड़ दूंगा, यह वचन बेल्लि को दूँगा। मुनियप्पा के मैन पावर सप्लाई नौकरी को लात मारकर कहीं और दूर जाकर नौकरी करनी चाहिए, यह सब सोचते-सोचते गौरा ऊँघने लगा ।
    गौरा रात भर बेल्लि का सपना देखने लगा। सपने में एक खूबसूरत नृत्य...मुनियप्पा और बेल्लि हाथ पकड़कर नाच रहे हैं। आसपास पंद्रह-बीस नृत्यांगनाएं...सभी नाच रहे हैं...मगर एकायक सभी चंपत हो गए ! बेल्लि भी नहीं है ! वह अकेला है ! वह डर गया, उसे चीखने को मन हुआ, मगर चीख न सका । आवाज ही नहीं उठ रही थी ।
     गौरा को लगा कि कोई उसे छूकर जगा रहा है, वह तुरंत उठ बैठा। देखता क्या है, उसके बगल में बेल्लि बैठी है !
     बेल्लि,  तुम कहाँ चली गई थी? मुझे छोड़कर कहाँ गई थी? गौरा ने कांपते हुए बेल्लि को देखा।
मैं कहाँ गई थी? तुम तो चूहा खाना नहीं छोड़ते हो? अलग से झूठ भी बोलते हो। मुनियप्पा ने कहा था कि दो दिन तुम्हें छोड़कर जाऊँ तो तुम्हें अकल आएगी? इसलिए चाची के घर गई थी? बेल्लि ने उसे ही देखते हुए कहा ।
 कौन चाची।
वही फिल्म में डांस करती है न  वही चाची। तुम्हें छोड़कर जाने पर मुझे भी बहुत दुख हुआ? इसलिए वापस आ गई। आगे से ऐसा नहीं करूंगी। तुम भी मुझे वचन दो कि आगे से चूहा नहीं खाओगे, बेल्लि ज़ोर से रो पड़ी।
हूँ, हूँ , सचमुच नहीं खाऊँगा, मैं वचन देता हूँ। तुमसे वह चूहा बड़ा है क्या? गौरा ने बेल्लि को खींचकर गले लगाया।
मगर उसके दिमाग में एक नया कीड़ा बिल खोदने लगा। मुनियप्पा को पता था कि बेल्लि कहाँ गई है, फिर भी उसने उससे झूठ क्यों कहा?