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Wednesday 22 Nov 2017

मुर्गा लड़ाई


रजनी शर्मा
 116 सोनिया  कुंज नगर निगम कालोनी रायपुर (छ.ग.),
मो. 9301836811
रात गहरी हो चली थी। चांदनी पूरे शबाब पर अपनी छटा ऐसे बिखेर रही थी जैसे कि किसी बस्तरिया माडिऩ (महिला) ने सफेद धागे कात कर सफेद बरकी (चादर) गन्ने के खेतों में सुखा दी हो, और जब-जब गन्ने के लम्बे कंटीले, धारदार पत्ते इस चादर को गुदगुदाते तो चादर की खिलखिलाहट वाली चांदनी पूरे ''मोरटपालÓÓ (गांव का नाम) को दूधिया कर जाती। सफेद लांदे (मदिरा) का सुरूर जिस प्रकार बस्तरिया के सर चढ़ कर बोलता वैसे ही गन्ने का मीठा सुरूर भी पूरे गन्ने के खेत में बहा जा रहा था।
''लाल डेंगाÓÓ ने मुंह में सुरती (तम्बाखू) दबाई और गन्ने के खेत में बने मचान पर धूनी जमा कर बैठ गया। ''लाल डेंगाÓÓ उसका नाम न जाने क्या सोच कर उसके अभिभावकों ने रखा होगा। छ: फुटिया कद, चमड़ी का रंग आठ-आठ घंटे गन्ने के खेत में काम करने के कारण ताम्बई लाल हो चला था। बस्तर शिल्प सी चपटी नाक, लम्बे-लम्बे हाथों में धमनियां ऐसी उभरी थी जैसे किसी शिल्पी ने टेराकोटा के लाल पात्र में नसों वाली बेल-बूटी उकेर दी हो।
सतरंगी दांत जो सुरती की भेंट चढ़ चुके थे। बाल खुद काटने के कारण जंगली बागड़ की तरह कपाल पर फैले हुए। सीने पर पसलियां ऐसी उभरी थी मानो किसी अभिजात्य वर्ग के ड्राइंग रूम में ''एम्बासिंगÓÓ से सजी कोई महंगी कलाकृति हो। ''डेंगाÓÓ का अर्थ ही होता है लम्बा, ''लालÓÓ का अर्थ स्थानीय भाषा में गोरा न होकर ललहुंवा होना ही उसे पूरे मोरटपाल गांव में लाल डेंगा के नाम से प्रसिद्धि दे रहा था।
''लाल डेंगाÓÓ गोंड बाहुल्य ग्राम ''माड़पालÓÓ से नौकरी के लिए मोरटपाल आया था। बस्तर में गन्ने के खेतों की रखवाली के लिए सबसे विश्वसनीय काम के रूप में गोंड जनजाति पर ही सर्वाधिक विश्वास किया जाता था। दिन में गन्ने के खेतों में कमरतोड़ मेहनत व रात में उसकी रखवाली यह कार्य लाल डेंगा बड़ी मुस्तैदी से करता। एवज में जितना धान उसे मिलता वह उसी में अंगद की तरह खुश रहता।
सोनाधर ने जल्दी से गमछा ओढ़ा और शहर की ओर जाने के लिये निकला ही था कि सोनारिन पंचम स्वर में चिल्लाने लगी। जानुआंय तूचो बाट हुन लेकी देखसी आचे (तुम्हारी राह वह लड़की देख रही होगी।) आने दो मेरे भाइयों को गन्ने की सूटी से उसकी ऐसी पिटाई करूंगी कि सारे इश्क का भूत खत्म हो जायेगा। सोनाधर की दो पीढिय़ां गन्ने के मालिक के घर अपनी सेवाएं देती आ रही थी। मालिक के वरदहस्त से ही सोनारिन व सोनाधर का विवाह हुआ था। सारा मोरटपाल, भड़ीसगांव और वह पुराना इमली का पेड़ सारे गवाह थे।
सोनारिन के उम्र का उतार, पुरुष की लम्पटता, मांसलता की खोज ने घर के कलह को आखिर चौराहे तक पहुंचा ही दिया। सोनाधर सारी बातों को अनसुना करके तेजी से सायकल पर सवार होकर जगदलपुर की ओर तेजी से निकल पड़ा। बीच दरवाजे पर कुकड़ी (मुर्गी) के बच्चे दबते-दबते बचे, पर बतख के पंखों को सायकल के चक्के ने अपने लपेटे में ले ही लिया।
''बांझÓÓ सोनारिन के लिये मुर्गियां, चूजे, बतख, बकरी ही उसके नौनिहाल थे। उनकी चीख की तारतत्वता से वह जान जाती कि मूक प्राणी क्या कह रहे हैं? ''तूके बाघ धरेÓÓ (तुझे शेर खा जाये) जैसी भद्दी गाली देते हुए वह बाहर निकली तो सोनाधर उस सौतन के लिये रफूचक्कर हो चुका था।
''नकारे जाने को स्वीकारÓÓ करने लगी थी अब सोनारिन। तभी तो उसने अपने लंपट पति द्वारा दिये गये आघात के खिलाफ  प्रतिक्रिया व्यक्त करके मायूस होकर एक भी क्षण समय गंवाना उचित नहीं समझा। वह बतख को पुचकारने लगी। ये मूक पशु सवाक पति से बेहतर है, वो संवेदना की भाषा तो कम से कम समझते हैं।
कोदू, तुमा (लौकी को सुखाकर बनाया गया पात्र) में मंडिया पेज (तरल सूप) पकड़े तालाब की ओर जा रहा था। तालाब लगभग उथला ही था पर उसने जाल पानी में डाला। दो घंटे बस्तरिया गीत गाने के बाद उठा तो पाया कि रात की सब्जी के लायक चिंगड़ी मछलियों का जुगाड़ हो चुका था। दिन के बारह बजे अचानक जरमन की नक्खी (एल्यूमिनियम की गंज) को पानी में डुबाने की आवाज आई।
मछली पकडऩे के मनपसंद कार्य के दौरान यह बिना निमंत्रण के व्यवधान के लिये वह बिल्कुल भी तैयार नही था। उसने बेहद अनमने ढंग से देखा। अ_ारह उन्नीस वर्षीया षोडशी ''मोहरीÓÓ। जाने क्या सोचकर उसका नाम उसके अभिभावकों ने मोहरी रखा होगा।
सांवला रंग, सामान्य से जरा ऊंचा कद, खोपा (जूड़ा) ककनी, दोनों हाथों में सतरंगी प्लास्टिक की चूडिय़ां माड़ी (घुटने) के ऊपर घर की बनी बरकी वाली साड़ी, कसे कंधे, चपटी नाक, कानों में गोदने के टप्पे, मुख में सुरती दबाये स..स.. की आवाज का उच्चारण काले हुए तालाब में घुटनों तक झुकी नक्खी (गंज) को मांज रही थी। कोदू ने उचटती सी नजर मोहरी पर डाली-काय करसी आसीज लेकी (क्या कर रही है लड़की?)
इस ढिटाई से पूछे जाने वाले प्रश्न के लिये मोहरी तैयार नहीं थी। पर उसने पलट कर वार किया तुके काय आय (तुझे क्या मतलब) तूय काय करसी आसीस (तुम क्या कर रहे हो)। मछली पकड़ रहा हूँ और क्या? नक्खी को पानी से भरने के बाद मोहरी ने सिर पर गुंडरी (कपड़े का गोल घेरा) बनाया और बांये हाथ से नक्खी (गंज) के नीचे को पोंछा। जिससे पानी की बूंदों से उसका सिर गीला ना हो और गुंडरी को सर के ऊपर रखा और उसके ऊपर गंज रखा। वह तालाब से निकल कर चलने लगी। मोरटपाल के उस गांव का वह तालाब जिस तरह विकट स्थिति में था वह पनिहारिनों के लिये तकलीफ देह ही था।
तालाब तक आने के लिये सीधी सपाट ढलान। अगर पैरों में संतुलन न हो तो पनिहारिन व गंज दोनों की जल-समाधि होगी ही। पानी भरने के बाद गंज के साथ पुन: सीधी चढ़ाई, बेचारी पनिहारिनों लिये यह पानी भरना उत्तरांचल स्थित मंदिर के दर्शन जैसा ही था, जहां ऊपर की चढ़ाई चढ़ते वक्त कमर झुक ही जाती थी।
मोहरी का रोज चढ़ती धूप में पानी भरने को जाना और कोदू का मछली पकडऩा शायद विधाता ने इनकी नियति तय कर दी थी। आंखों में जहां अनमनापन झलकता था वहां नि:संकोच और फिर अपनेपन ने कब जगह ले ली पता ही नहीं चला। ''यह यात्रा कितनी विचित्र, कितनी निष्ठुर होती है जहां अनजाने पर भरोसा करना पड़ता है।ÓÓ मोहरी को अपने कोदू पर भरोसे को लेकर कोई पछतावा नहीं था।
बस्तर के आदिवासियों में एक स्वस्थ परंपरा होती है जहां दिन भर की थकान को मिटाने लोक संगीत को गुनगुनाने किशोर-किशोरियों का झुंड गन्ने के खेतों में नि:संकोच विचरता था।
''हाय चो पापड़ी लेकी कोन लेका दिलो कोन लेका दिलोÓÓ
''पनारापारा जाउन रे लो पनारा लेका दिलोÓÓ
आज गांव मोरटपाल में मंडई थी। मंडई क्या था साक्षात बस्तर के जनमानस का उत्साह उफान पर था। आसपास के सात गांवों में मुनादी करवा दी गई थी। बायले (स्त्रियों) के कतारबद्ध झुंड, सर पर टुकनी (टोकनी) बिना ब्लाउज की देह, सुस्पष्ट, जिम जाने पर भी नवयौवना ऐसा फिगर पाने को तरसे। सिर की बांयी तरफ  बांधा गया जूड़ा (खोपा) खोपे पर सरगी की लकड़ी को तराश कर बनाया गया ''ककवाÓÓ। इस खोपे पर चटकीले पीले लाल रिबन, गिलेट के क्लिप, प्लास्टिक की सतरंगी चूडिय़ां, पैर में पारंपरिक बस्तरिया ''पायड़ीÓÓ (पायल)। इन सबसे सजी जब बस्तरिनों की कतार मड़ई की ओर कतारबद्ध चलती तो बस्तर के मेहनतकशों का यह लापरवाह सौंदर्य और खिलकर राह चलतों को सम्मोहित करता।
टुकनी की नक्खी में ''सल्फीÓÓ (मद्य), लांदा, सुक्सी (सूखी मछली), कोदो, कनकी, मडिय़ा, चिरौंजी और ना जाने क्या-क्या। नवप्रसूताओं ने अबोध बच्चों को कपड़े से बांध रखा था। तेजी से चलती नवप्रसूताओं की कतार अबोध शिशुओं की निश्छल मुस्कान, उनकी बेफिक्र नींद ही बस्तर की मांओं को पूरे विश्व में अलग मान दे जाती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन कतारों के बीच-बीच अधनंगे बच्चों की दौड़, अधेड़ महिलाएं और लाठी टेक चलते कर्मठ प्रौढ़ भी थे।
जगदलपुर से मोरटपाल गांव का रास्ता पतली सी सड़क, दोनों ओर धूल से भरी पगडंडिया, पक्की सड़क पर सिर्फ दोपहिया, बड़ी गाडिय़ां ही चल सकती थी। ग्रामीणों के लिए तो किनारे की जगह ही चलने के लिये सुनिश्चित कर दी गई थी। सड़क के दोनों किनारे धूल से भरे। पर ना जाने बस्तर की मिट्टी में जाने क्या बात थी। विधाता ने उसे क्या बड़े से आसमान वाली चलनी में छान कर नीचे विसरित किया था। बिल्कुल चिकनी टेलकम पावडर की तरह। डनलप के गद्दे, रूई जैसी नरम धूल में बस्तर के ग्रामीणों के पांव उस मिट्टी में धंस जाते जब वो अगला पैर बढ़ाते तो पिछले पैर के निशान उसी धूल में रह जाते।
मोहरी ने आज बड़ी अच्छी तरह से खुद को सजाया संवारा था। बजरिया पान खाकर अपने होठों को रंगा भी था। देहाती पावडर भी चेहरे पर अच्छी तरह पोता था। प्लास्टिक की चप्पल भी आज उसने पहन रखी थी। पैरों की पायड़ी और हाथ की ककनी को इमली से तालाब में सी..सी.. की ध्वनि के मंत्रोच्चार के साथ मांजा था। चमकते ककनी को घुमा-घुमा कर उसमें अपना चेहरा भी देखने की कोशिश करती रहती पर ककनी के छिलाव में कभी पूरी सूरत उसे नजर नहीं आती। कभी नाक की लौंग तो कभी कान में गोदने के टप्पे ही उसे नजर आते और उनके लश्कारे की रोशनी से ही मोहरी खुश हो जाती। आज उसके पांव जमीं पर नहीं थे। आज कोदू से मड़ई में मिलना था। कोदू ने वायदा किया था कि वह आज उसे फीता, सात रंगों वाली चूड़ी दिलवा देगा। साथ ही खुद भी सल्फी पीने के बाद पान भी खायेगा।
पूरे मड़ई में तरह-तरह के तमाशों के बीच कोदू की आंखों का इशारा पाते ही मोहरी चूड़ी दुकान के सामने कोदू के पास जा खड़ी हुई। ''कोन बीती धरूआस आले घरÓÓ (कौन सा खरीदना है खरीदो)।
स्निग्धता से भरे आह्वान से उपजी हौसलों की ऊर्जा ने मोहरी के चेहरे पर अपनी रंगत दिखानी शुरू कर दी। चेहरा शर्म से लाल। पर प्रियतम का अधिकार पूर्ण निमंत्रण सदैव ही महिलाओं को लुभाता ही रहा है। एक बेफिक्री की चादर मोहरी के पूरे वजूद पर फैल चुकी थी। कोदू का भरोसेमंद निमंत्रण, भविष्य का आश्वासन, उम्र का काकटेल जैसे कुछ ऐसे तिलस्म थे जिसमें मोहरी बहने को आतुर थी। कोदू के चेहरे में पौरुष की चमक, उसके उदारमन को देख मोहरी का सम्मोहित हो जाना सही था। पुरुष के अधिकारमय आमंत्रण में स्त्री अपने को न्यौछावर करने में गौरवान्वित ही महसूस करती है। यह सच आज मंडई में मोहरी और कोदू जान चुके थे।
मंडई का सबसे बड़ा आकर्षण मुर्गा लड़ाई ही था। एक बड़े से जन समूह ने लगभग गोल घेरा बना लिया था। चार पाँच गांवों के अलग-अलग व्यक्तियों के पास मुर्गे, सूमो पहलवान की तरह अपने पंख फडफ़ड़ा रहे थे। मुर्गा लड़ाई शक्ति का प्रदर्शन, वर्चस्व की कामना, गांव, व्यक्ति की प्रतिष्ठा का भी सूचक होता है। अनेक गांवों का प्रतिनिधित्व करते थे मुर्गे। लाल कलगी वाले मुर्गे, प्रतिद्वंदी मुर्गे, वर्चस्व के वाहक मुर्गे आदि-आदि। शर्तों की सूली पर चढ़े मुर्गे, उन्माद की पराकाष्ठा के प्रतीक मुर्गे, हिस्टिरिया का भ्रम देते मुर्गे, हुंकारे भरते, जनमानस के मुख ध्वनि की तीव्रता के वाहक मुर्गे और ना जाने क्या-क्या। मुर्गों की इस लड़ाई में इन मुर्गों की शान में जितने कसीदे गढ़े जाये वो कम ही है।
मोहरी ने कनखियों से कोदू की ओर से देखा। उसने अपना मुंह स्थानीय लुंगी की ओट में आधा छुपा रखा था। कोदू की ओर आकर्षण से पगी नजर डाली तो देखा, कोदू के सिर पर सल्फी का सुरूर बढ़ चढ़कर बोल रहा था। उस पर पान की लाली, रोज धूप में खड़े होने के कारण ताम्बई त्वचा और इस पर पसीने की बूंदें ऐसी चमचमा रही थी मानो तांबे के देवपात्र में तुलसी मिश्रित पानी की बूंदे छलक रहीं हो। साथ ही मनचाहे साथी का साथ होने की खुशी से उसके व्यक्तित्व में पवित्र अगरबत्ती की खुशबू जैसी महक समाती जा रही थी।
पर इन दोनों को यह कहां मालूम था कि तीसरा कोई व्यक्ति इस पावन हवन कुंड में घात लगाये अपनी कुदृष्टि की राख छिड़कने को आतुर खड़ा है। गांव का सरपंच जिसने आज अपना मुर्गा दांव पर तो लगाया है साथ ही मोहरी पर उसकी नजर कई दिनों से अटकी थी।
कोदू की ओर निहारते मोहरी को देख ईष्र्या की आग और ओहदे के गर्व का नाग उसके अवचेतन में फुफकारने लगा। मन मथनी की तरह मथने लगा। मोहरी को हासिल करने व कोदू को पराजित करने का एकमात्र उपाय मुर्गा लड़ाई ही हो सकता है। कोदू कहां, उसकी बिसात कहां। दूसरे गांव से गन्ने के खेत की रखवाली करने के लिए निश्चित पगार पर मोरटपाल आया था।
मंड़ई खत्म, मुर्गे की लड़ाई में सरपंच के मुर्गे की जीत हुई। क्यों न होती, पैरों में उसके एक ऊंची चाकू जो बंधी थी। दुष्ट सरपंच ने उसे सल्फी मिला दाना जो खिलाया था। विजय के उन्माद सल्फी के कारण नशे में झूलते लगभग गिरते सरपंच को अचानक अपनी ओर लपकते देख मोहरी एक सेकण्ड के हजारवें हिस्से से भी कम समय गंवाये कोदू की बलिष्ठ बांहों के पीछे छिप गई और दूसरे ही क्षण कोदू का हाथ पकड़ खींचते हुए दौड़ पड़ी गन्ने के खेतों की ओर। कोदू हतप्रभ अचानक यह क्या हुआ।
स्त्री को जहां विधाता ने अतुल्य सौंदर्य की स्वामिनी बनाया था वहां उसे छठी इंद्रिय भी बख्शी थी। एक सेकंड के हजारवें हिस्से से भी कम समय में स्त्री, अंधी स्त्री भी पुरुष की नजरों को महसूस कर सकती थी। मोहरी सरपंच की लंपट नजरों को जान चुकी थी। भविष्य में घटने वाली अनहोनी की आशंका से उसका दिल बैठा जा रहा था। कोदू ने पूछा वूके काय होला (तुझे क्या हुआ?)
प्रत्युत्तर में टप-टप दो आंसू उसकी मोटी आंखों से छलक पड़े, जाने किसी ने रोहू मछली को पानी से बाहर निकाल दिया गया हो। पानी से बाहर आते ही जिस प्रकार मछली की आंखे उबलने लगती है उसके बाद छटपटाहट वाली मौत की आशंका से नीर रहित हो जाती है बिल्कुल वैसी ही स्थिति मोहरी की थी। गांव की निपट गंवार, निश्छल मोहरी।
मोहरी का वास्तविक अर्थ बस्तर के पारंपरिक वाद्य यंत्र ''मोहरी बाजाÓÓ पर ही उसके अभिभावकों ने रखा होगा। बस्तर की फिजा की हवा अब भी पूरी सादगी, निश्छल प्रेम से भरी धुन से ही ध्वनित होती है। सरपंच की वासना से दूषित, बेसुरी फूंक से तो अच्छा से अच्छा मोहरी बाजा भी भोथरा, बेसुरा हो जायेगा फिर मोहरी तो जीवित हाड़-मांस थी।
रात को गन्ने के खेतों में अजीब सी बेचैनी पसरी थी। सारे पत्ते जाने क्या फुसफुसा रहे थे। वहां कोई हर पत्ते की रग-रग पहचानता था। कुछ तो अलग घटने वाला था। अचानक कोई बदहवास दौड़ा तो देखा कि गन्ने की खेत में एक ओर से धुंआ उठ रहा है। कोदू बदहवास लगभग रोने की स्थिति में था। गन्ने के खेत, उसकी आत्मा को, उसके बच्चों को किसने आग लगाई? क्यों?
सुबह पंचायत में दुष्ट सरपंच, पाँच पंच, मोहरी के माता-पिता और कोदू को बुलाया गया। गन्ने के खेत के मालिक भी तमतमाई अवस्था में विराजमान थे। कोदू के कंधे झुके हुए थे मानो जीवन भर की निष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लग गया हो। दुष्ट सरपंच ने कहा कि इसने गोंड जनजाति का नाम नीचा किया है। इसके रहते, रखवाली करते हुए गन्ने के खेत में आग लगी। मतलब माड़पाल का नाम मिट्टी में मिल गया। पूरे बस्तरांचल में माड़पाल के लोगों की कर्तव्यनिष्ठा, स्वामीभक्ति की मिसालें दी जाती रही हैं। इसे भरपाई तो करनी ही पड़ेगी। इसे जी तोड़ मेहनत कर मालिक को हर्जाना देना ही पड़ेगा।
बीती रात को ही मोहरी जान चुकी थी कि यह काम सिर्फ  और सिर्फ सरपंच का ही है पर वह सिद्ध कैसे करे? अनहोनी की आशंका ने उसे माता-पिता के सामने मुखरित कर ही दिया। मैं कोदू संगे जोड़ा बनइबू (मुझे कोदू के साथ ही विवाह करना है।)।
आदिवासी समाज में जहां बस्तर में 'घोटुलÓ जैसी स्वस्थ संस्थाएं विद्यमान रही हैं वहां लड़की की यह घोषणा कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं थी। ''घोटुलÓÓ वह संस्था है जहां बस्तर के आदिवासी स्त्री पुरुषों को अपने मनपसंद जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता प्राप्त है। आज इसे विकृत कर पूरे विश्व में 'मसालेÓ की तरह प्रचारित किया जा रहा है।
सरपंच यह बात अच्छी तरह जानता था कि आदिवासी कन्या को वह बलपूर्वक हासिल नहीं कर सकता। सारा स्वांग रचकर उसने यह प्रबंध किया था। मुर्गे की लड़ाई जैसा खेल कब काम आयेगा? स्त्री को जीतने पर स्त्री की इच्छा का अंत तो सदैव के लिये हो ही जाता है। साथ ही जीती गई कन्या और वह भी मुर्गे की लड़ाई में, आदिवासी समाज में उसे प्रतिष्ठा तो दिलवायेगा साथ ही कोदू को अपमान।
कोदू तुम्हें मुर्गे की लड़ाई में सरपंच को हराना होगा तब ही तुम मोहरी को पा सकते हो। यह अप्रत्याशित प्रस्ताव मोहरी के माता-पिता की ओर से प्रायोजित होने पर कोदू धम्म से जमीन में बैठ गया। मोहरी और उसके बीच ''मुर्गे की लड़ाईÓÓ कैसे आ गई और क्यों। उसे तो बस यह ज्ञात था कि मोहरी उसकी और वह उसका। उसके पास तो मुर्गे के लिये भी पैसे नहीं थे।
खेतों में कुछ आहट सुनाई दी तो देखा मोहरी पस्त कदमों से उसकी ओर चली आ रही थी। यह कोदू की अग्निपरीक्षा थी। उसकी कर्तव्यनिष्ठा, स्वामीभक्ति दांव पर लग चुकी थी। ऊपर से मोहरी की घोषणा मैं तुम्हारे साथ भागूंगी नहीं न, ही तुम्हें पीठ दिखा कर भागने दूंगी। पर कैसे? तुम्हें मुर्गे की लड़ाई में हिस्सा लेना ही होगा आगे मेरी किस्मत।
मुर्गे की व्यवस्था कैसे होगी? अपनी चांदी की ककनी कोदू के हाथों में थमाती हुई मोहरी ने बिना किसी प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में यह घोषणा की - कल तुम्हारे हाथों में मुर्गा मुझे दिखना ही चाहिये।
हाट, बाजार गांव में घोषणा हो चकी थी। हल्बा और गोंड जनजाति में जाने किसका वर्चस्व होगा। मोहरी की किस्मत का फैसला अगले माह के हाट के मुर्गे की लड़ाई में स्पष्ट हो जायेगा।
सोनाधर ने सुबह जगदलपुर से मोरटपाल लौटते समय अपनी रूठी पत्नी को मनाने हेतु बजरिया जलेबी, लाल रिबन ले रखा था। यह बात तो स्वयंसिद्ध थी कि पत्नियों को यदि उपहार देकर रिझाया जा रहा है तो अवश्य बदले में राह का रोड़ा ना बनने की शर्त भी समाहित होगी।
लाल डेंगा दूसरे मालिक के खेतों की रखवाली करता था। वह अवाक था, कोदू से काम में इतनी लापरवाही क्यों हुई होगी? लाल डेंगा ने बीड़ी सुलगा कर कोदू को दिया। कोदू ने एक कश लगाया और कहने लगा अब वह वापस अपने गांव चला जायेगा। तूके खोटला देन चो किरिया (तुझे खोटला देव की कसम) गोंड की औलाद है, पीठ दिखाकर भागना हमें शोभा नहीं देता। वीरता कभी-कभी मुद्रा राक्षस का दास भी हो सकती है यह बात कोदू से भला अच्छी तरह कौन समझेगा।
मन में भारी बोझ लिये उसे आज मंडई में जाना ही था। लाल डेंगा कोदू को सांत्वना देते चल रहा था। सोनारिन भी मंडई में पहुंच चुकी थी। इमली रूख (इमली के पेड़) के नीचे वक्राकार परिधि में लोगों का हुजूम जम चुका था। उन्माद की ऊर्जा को वह बड़ा इमली का दरख्त अपनी पत्तियों से हवा के झोंकों से कुछ कम करने का प्रयास किये जा रहा था। परिधि के एक कोने में मुरिया, पनका, हल्बा जनजाति के लोग तो दूसरे कोने में मांडिया, गोंड जनजाति के युवकों ने सिर पर बंधे साफे पर कौऐ के पंख खोंसे हुए थे। सुस्पष्ट, वृषभ स्कंधा, ताम्बई उनकी देह बलिष्ठ, कर्मठ भुजाएं। उस घेरे के सामने बच्चे उनके पीछे किशोर किशोरियों का सिर उचकाता समूह।
सरपंच ने आज अपने दांये हाथ में बंधी घड़ी की ओर देखकर एकमात्र बंगाली कुर्ते की बांह को महामहिम की तरह चढ़ाया। पान के साथ सुरती खाकर पच्च से थूककर अहंकारी नजरों से कोदू की ओर देखा। कोदू पस्त नजर नीचे कर बेमन से अपने मुर्गे को पुचकार रहा था।
मोहरी आज सुबह से चिड़चिड़ाये जा रही थी। धम्म से बेवजह बकरी को मारा, मुर्गियों को दौड़ाया। पानी की मटकी को एक लात मारी। मन जब अनमना हो तो गुबार इन्हीं निरीहों पर निकाले जा रही थी। मंगलदाई ने आवाज दिया ''जो री मंडई थाने जीबूÓÓ (चलो मंडई देखने चलें) नहीं मोहरी का हृदय गन्ने के रस निकाले जाने के बाद सूखे सोंटियों जैसा हो रहा था। जिसके शरीर में रक्त हो ही नहीं।
उसे सोंटियों की भांति सुखाया जायेगा और सूखने पर स्वयं कोई सरपंच के चूल्हे में उसे झोंक देगा। पल में बाड़ी, पल में केले के पौधे के नीचे जा जाकर, सुबक लेती। हे ''आंगा देवÓÓ कोदू के मुर्गे को ही जिताना। तुझे केले का पहला फल, सल्फी की पहली खेप चढ़ाऊंगी।
पर वह जानती थी मुर्गे की लड़ाई सिर्फ  मुर्गों की नहीं होती, कहां पूरा गांव सरपंच की ओर से चीखेगा कहां कोदू। दूसरे गांव का अकेला मुनुख (मानव) का पक्ष कोई क्यों लेगा। नियति तो मात्र छलावा कर रही है उससे, बलपूर्वक अपनी धारा में बहा ही ले जायेगी।
जय दंतेश्वरी माई का जयकारा भीड़ ने लगाया। सरपंच ने अपने सूमो पहलवान मुर्गे को पुचकारा, उधर कोदू के हाथ-पैर शिथिल। उसका गांव माड़पाल होता तो वह भी दिखाता कि उसकी कितनी कद्र उसके गांव में है। तीर-धनुष पकड़े हुए उसके मित्रों की टोली भी उसके साथ आ जुटती। यहां तो लाल डेंगा और मोहरी के अलावा उसका अपना सगा कोई नहीं। मोहरी भी उसके सामने नहीं है जिसने खुद अपनी चांदी की ककनी उसे दी थी।
लाल डेंगा ने कोदू के मुर्गे को पुचकारा। लड़ाई शुरू हो चुकी थी। दोनों मुर्गे पहले राउंड में सिर्फ एक दूसरे से टकराये, पंखों से पंख, चोंच से चोंच, दोनों मुर्गे धड़ाम से गिरते फिर को-को की आवाज का क्रंदन।
अब शुरू हुआ दूसरा राउंड। मुर्गों ने भी अपने आप को पहचान लिया। साथ ही अपने प्रतिद्वंद्वी को भी कि उनका आपसी मुकाबला किसके साथ होने वाला है। सरपंच का मुर्गा हवा में उछला और अपनी चोंच से कोदू के मुर्गे की आंख में प्रहार। कोदू के मुर्गे की आंख से लहू टपकने लगा। सरपंच मस्त, कोदू पस्त। विद्रूप दृष्टि सरपंच ने कोदू के ऊपर डाली और हंसने लगा। कोदू की आत्मा रिस रही थी। वह सबके सामने रो भी तो नहीं सकता।
अब तीसरा और अंतिम राउंड शुरू होने वाला था। कोदू की आंखें मोहरी को ढूंढ रही थीं। उसकी जीवनदायिनी इंद्रावती मोहरी ही तो थी जिसके लिये वह सरपंच से भिडऩे को तैयार हो गया। भीड़ का उन्माद बढ़ता ही जा रहा था। हिस्टीरिया ने पूरी भीड़ को अपने चपेटे में ले रखा था। सरपंच का मुर्गा उड़ा कोदू का मुर्गा लहूलुहान। अचानक कोदू ने नजर उठाई तो देखा सामने मोहरी की आंखों में कुछ कर गुजरने की आभा, कुछ निराशा, थोड़ा प्रोत्साहन और ना जाने क्या-क्या। लड़ाई के उन अंतिम क्षणों में लहूलुहान मुर्गे को पुचकारते हुए कोदू में न जाने कहां से असीम ऊर्जा का संचार हुआ उसने लहूलुहान मुर्गे को पुचकारा और हवा में उछालते हुए कहा या तो मर के आना या मार के आना।
संवादहीन संप्रेषण कोदू और मोहरी के बीच हो चुका था। मोहरी ने बिना शब्दों का प्रयोग किए ही आंखों से कोदू को कह दिया था कि या तो मारना या फिर मर जाना। इस घोषणा का रास्ता अधिकार की पगडंडी पर पहले सीधे चलता है। उसके बाद उम्मीद के रास्ते चलकर कुछ कर गुजरने जैसी मंजिल पर। सर्वस्व समर्पण करने जैसे भाव के साथ अंत होता है। समर्पण की इतिश्री किसी के होने में होती है। यही परिभाषा मोहरी को समझ में आ चुकी थी कि स्त्री का समर्पण, पुरूष को मजबूत ही बनाता है और यही संबल इच्छाशक्ति आजीवन साथ निभाने के आश्वासन के रूप में पुरूष स्त्री को दे जाता है।
कोदू में जोश भर चुका था। उसने अपने लहूलुहान मुर्गे को पुचकार कर हवा में उछाल दिया। माड़पाल के माडिय़ा गोंड वापस मुड़ ही गये थे। उन्हें लगा कि जीत तो सरपंच की ही होनी थी यह क्या पहला और अंतिम घातक वार कोदू के मुर्गे ने सरपंच के मुर्गे पर दिया, माड़पालिया भीड़ जोश में चीखने लगी, नतीजा सरपंच के मुर्गे का काम तमाम हो चुका था।
पूरी भीड़ विजय के उन्माद में चीख चिल्ला रही थी और गन्ने के खेत से तालाब को पार करके जाने वाली पगडंडी जो मोटरपाल से कहीं और जाती थी उस राह पर चार पैर एक साथ चुपचाप जा रहे थे। कोदू और मोहरी ने भरी नजरों से अंतिम बार गन्ने की खेत की ओर निहारा, सारे गन्ने के पत्तों ने अपनी सरसराहट से उन्हें अंतिम विदाई दी। वे झुक-झुक कर इशारा भी कर रहे थे, जाओ बस्तर का कोई और जंगल तुम्हारे पदचाप की प्रतीक्षा कर रहा होगा नि:शब्द... चुपचाप...