Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

खिच्याक


 अनिल कार्की
पिथौरागढ़, उत्तराखंड
मो. 09456757646
आइये आपको ले चलते हैं 'बंबई फोटोग्राफरÓ के पास। 'बंबई फोटोग्राफरÓ ऐसे ही नहीं पड़ा उनका नाम, सन् सत्तर में बेरीनाग के ग्यूर गाँव से बंबई जाकर फोटोग्राफर का काम सीखा था और सन् नब्बे तक समकालीन रहे 'कोडेकÓ का कैमरा गले में और गोल हंटिंग हैट सर पर, सौभाग्य रहा कि वे हमारे गाँव के सर्व डबल जीजा घोषित हो गये। 'डबलÓ इसलिए कि उनकी फोटोग्राफी का हुनर उनकी साली को भा गया और दूसरी शादी भी उन्होंने अपनी साली से की।
नाटा, गोल-मटोल कद-काठी और रसिक फोटोग्राफिया लहजा उन दिनों का एक बड़ा चार्म हुआ करता था। बढिय़ा रोजी-रोटी ऐसी कि दो बीबी की जगह वो चार का भरणपोषण कर सकते थे। उनके पाँच बच्चे हुए-तीन लड़कियाँ पहले से और एक लड़की एक लड़का दूसरी घरवाली से। उनकी फोटो की बात थी, वे फोटो को गजब फिल्मी वाली स्टाइल में खींचते थे। मेरी एक फोटो हाथ में गेंदे का फूल पकड़वा कर उन्होंने ही खींची थी पहले पहल।
फोटुक भिन्ज्यू कहते थे कि-फोटो खींचने वाला तो भगवान का काम कर रहा है। फाम को जिन्दा रखना कोई मामूली बात जो क्या ठैरी।
हमारे उछलवे दाज्यूओं की खूब खचा-खच की उन्होंने, कभी नदी में कूदते हुए, कभी पेड़ में चढ़ते हुए या फिर पहाड़ पे चढ़कर छाती के बटन खोल कर छाती की कालपट्टपना दिखाते हुए। दाज्यूओं के फौज में जाने के बाद ईजा अक्सर उनकी इन्हीं उछलवे फोटुकों में पूजा -पाठ करते हुए पीठ्याँ लगाया करती थी। एक समय बाद ईजा ने इन फोटुकों पर इतना पिठ्याँ थोपड़ दिया था कि चेहरे की जगह लालपट्ट दिखायी देने लगा। तब वीडियो कैमरा नहीं था और मेरे ही दाज्यू की शादी में पहली बार वीडियो कैमरा आया था 'थल चंद वीडियोजÓ का। उस जमाने में पाँच हजार में बुक हुआ बहुत बड़ी बात थी और बात से ज्यादा बहुत बड़ी घटना भी। उस दिन बम्बई फोटोग्राफर दूर-दूर तक नहीं दिखे। उनके पुरखे ल्वार थे बेरीनाग के, जो दमदार रेत की पिटवा दरातियों और पट्टों की बड़ीयाठ के लिए पूरे इलाके में जाने जाते थे। लेकिन उनकी पीढ़ी ने ये काम नहीं किया, वो फोटोग्राफर बने। दुर्भाग्य से जिस छुवा- छूत के चक्कर में उन्होंने पुश्तैनी काम छोड़कर ये फोटोग्राफरी का काम किया था, उस छुवा-छूत ने उनका पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा। यहाँ भी वो उसी तरह पीडि़त हुए जिस तरह उनके पुरखे पुराने पेशे में हुए थे। उनके पुरखों के कारोबार को खत्म करने के पीछे जितना हाथ उस दौर के स्टील और प्लास्टिक का था उतना ही पहाड़ी अभिजन वर्ग का भी था। बाद के वर्षों में बेरीनाग में उनकी बनी बनायी बंबई फोटोग्राफर की दुकान भी उजड़ गयी। उनकी ही खिंची एक पुरानी फोटो देखकर मुझे उनकी धुंधली सी कहानी याद आ गयी।
शादी का मंडप लगा हुआ है और फोटुक भिन्ज्यू अभी तक आए नहीं हैं। सगुन आखर गाये जा रहे हैं-
सुवा रे सुवा! बनखंडी सुवा
हरियो तेरो गात पिंगली तेरो ठून,
लला तेरी आँखी, नजऱ तेरी बाँकी,
दे सुवा नगरी न्यूत!
पंडित अम्बादत्त जी दुल्हन पक्ष के पंडित हैं और रामदत्त दुल्हे पक्ष से। कन्यादान शुरू होने वाला है। दुल्हन का पिता अभी जमाई के पैर धो कर पानी की कुछ बूँदें अपने सर उलीचेगा। कहते हैं कि-
बेटी की शादी के दिन बेटी के बाप को झुकना ही होता है।
कार्यक्रम शुरू हो गया है पर फोटुक भिन्ज्यू नहीं पहुँचे। सब लड़के खासकर लड़की का फौजी भाई भुनभुना रहा था कि-
अभी तक आये नहीं फोटुक भिन्ज्यू, खाली रील भी मंगवा ली मुझसे।
तभी धार पर दिखाई दिये थे फोटुक भिन्ज्यू, गाँव के बच्चों ने चिल्ला कर कहा,
आ गये हो फोटुक भिन्ज्यू !
सब इसी ओर चले आये थे। पंडित अम्बादत्त के मन्त्र इस कोलाहल में अचानक कहीं दब से गये। लोगों को ऐसा करते हुए देख पंडित के मन में एक बात आई।
पंडित तो मात्र खानापूरी के लिए ही बैठा है बस। असल पंडित तो यही कैमरा वाला तलजात है।
भुनभुना गया था मन ही मन पंडित लेकिन उसने अपने मन्त्र जारी रखे। फोटुक भिन्ज्यू ने अपना मोर्चा संभाला और दनादन कैमरे का फ्लश मारने लग गए । बाराती और घराती अजब-गजब तरह के पोज देते थे। बच्चे भीड़ में धक्का-मुक्का करके मंडप के सबसे आगे सरक कर बैठ गये। अभी तक एक भी आदमी मंडप के पास फटक नहीं रहा था। यहाँ तक कि कई बार अंबादत्त को आवाज देनी पड़ी थी-
अरे! पानी लाओ रे, अरे! अक्षत लाओ रे, कोई परात तो ला दो।
लेकिन जैसे ही फोटुक भिन्ज्यू आये तो सभी खींचे आये थे मंडप की ओर। यह देखकर फोटुक भिन्ज्यू तो खुश थे लेकिन ंपंडित अम्बादत्त के चेहरे का पानी उतर गया, तब तो वह और ज्यादा भुनभुना गया जब किसी फौजी ने फोटुक भिन्ज्यू से कहा, चलो खाना खा लो, कुछ देर रेस्ट ले लो।
सामने आँगन में कुर्सी लगाकर उसमें बड़ी इज्जत से बैठाया गया था फोटुक भिन्ज्यू को। जब वह खाना खा रहे थे तब गाँव के बच्चे उन्हें घेरे खड़े थे। वह किसी न किसी बहाने से उनके कैमरे वाला पिठ्ठ, छूना चाहते थे, या कैमरा ही। वह खाकर उठे, फिर उन्होंने गहने के आदान-प्रदान, साड़ी की अदला-बदली और दूल्हे के मुकुट से झालर हटा कर फोटुक खींचे। अंबादत्त यह सब कुछ देखता रहा और मन ही मन भुनभुनाता रहा कि साला! ये इतना बड़ा हो गया। न गुरु जौद्या कहा, न मेरी तरफ  इसने एक बार भी कैमरा लगाया, सबकी फोटुक खींची मेरी नहीं खींची, सब पर कैमरा का फ्लश चमकाया मुझ पर नहीं चमकाया, ये अपने आप को क्या समझता है। अरे! अभी धरम मिट नहीं गया है, अभी सूर्ज पच्छिम से नहीं निकल रहा, सब अपनी जगह जैसे थे वैसे ही हैं, बस कैमरा क्या गले में लटका लिया कि जात-पात ही भूल गया। ऊँच-नीच सब बिसरा दिए।
अम्बादत्त मंडप पर यही सोचता रहा और पाठ भी करता रहा, इधर फोटुक भिन्ज्यू मस्त थे। मस्त क्या थे अलमस्त और बेखबर थे कि अंबादत्त क्या सोच रहा है उन्हें कोई भनक नहीं थी। पहाड़ी लड़कियाँ शरमा-शरमी कर पोज मारती थी, दुल्हन भी ज्यादा रोना-धोना नहीं कर रह थी। उसे लग रहा था कि - छि अगर रोते हुए फोटुक आ गयी तो कैसा दिखेगा मुँह? बानर जैसा।
इसलिए बूढ़ी औरतों को कहने का मौका मिल गया था,  ये तो आँसू भी नहीं ढाल रही है। अब पुराना जमाना कहाँ रहा कि बेटी बाप के घर से जाते वक्त रोए। हमारा भी एक टैम था। एक बुढिय़ा औरत गाते हुए बोली थी, आजकल तो सब खुश होते हुए जाते हैं, हमारी तरह के दु:ख देखे होते तब पता चलता।
कँुवारी लड़कियाँ मन ही मन रंगस्या रही थी। अपने भविष्य के पति की कल्पना कर रही थीं। उनकी इस मोहक कल्पना में और कोई हो या न हो पर फोटुक भिन्ज्यू जरूर शामिल थे। फोटुक भिन्ज्यू के कैमरे की खिच्याक...! वाली आवाज इन जवान होती लड़कियों के जीवन में हूक उठाती थी।। तभी अचानक अंबादत्त मंडप से उठ कर  भीतर जाकर लेट गया, जबकि अभी फेरे होने बचे थे। पीछे-पीछे लड़की का बाप भी चला आया। उसने लाचारी से पूछा,
पंडित जी क्या हुआ?
तो जवाब मिला - कुछ नहीं यजमान ! मेरी तबीयत ठीक नहीं है। मैं अब कुछ नहीं कर सकता, तुमने मंडप को गू कर दिया है। मैं तो देवता का आदमी ठैरा तुम जानते ही हो।
पंडित जी की यह बात सुनकर दुल्हन का बाप भी सकपका गया। पंडित ने फिर कहा, सब कुछ जानते, सुनते हुए भी कुजर्त करना तो गलत ही हुआ ना! इस कलुवे फोटुक वाले को किसने बुलाया है?
दुल्हन के बाप ने कहा- पंडित जी, नरी ने। तभी जो कहूँ कि बात क्या है। पागल हो गया है क्या तुम्हारा लड़का यजमान! चार पैसे फौज से कमा लिए तो पितरों का पुण्य मिट्टी कर देगा वह!
इस बात पर दुल्हन के बाप ने भी पंडित के हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा,
कहा था पंडित जी, पर लड़का माना ही नहीं ! अब आप ही बतायें आगे क्या होगा?
 यह सवाल दुल्हन के पिता ने लाचार होते हुए पूछा था। कन्यादान में दी हुई आधे तोले की अंगूठी को अंगुली पर ही घुमाते हुए अंबादत्त ने कहा,
अभी के अभी उसे यहाँ से रफ्ता करो, नहीं तो अनिष्ट हो जाएगा यजमान !
हारे मन से दुल्हन का पिता बाहर आया और फोटुक भिन्ज्यू को गोठ में ले जाकर विनम्र होकर समझाया,
बुरा मत मानना तुम ! तुम्हारा ससुर मेरा अच्छा दोस्त था। दुनियादारी में भले ही उसकी और मेरी जात अलग-अलग थी पर जब भी अकेले में साथ रहे हमने कभी एक- दूसरे को जात-पात में नहीं देखा। आज कन्यादान है, नरी से पहले ही कह दिया था मैंने कि फोटुक से क्या करना पर माना नहीं। अब बहुत फोटो खींच ली आपने, मैं चाहता था कि और भी खींचो पर अंबादत्त रिसा रहा है, कह रहा है तबियत खराब हो गयी है सब अपवित्र हो गया है।
इस बात पर फोटुक भिन्ज्यू कुछ नहीं बोले। उसकी समझ में आ गया था कि बात आखिर क्या है। फोटुक भिन्ज्यू बाहर आये तब तक फेरों के लिये दुल्हन तैयार होकर आ गयी थी। दूल्हा पार्टी भी खाना खा कर आ गयी। अब शुरू होने थे फेरे। तभी नरी ने फोटुक भिन्ज्यू को पकड़ लिया,
अरे! कहाँ हो आप रम पी लो एक पैग।
फोटुक भिन्ज्यू ने कहा,
नहीं यार नरी ! कैमरे में गड़बड़ी  हो गयी है अब फोटुक नहीं खींच पायेगा यह। अब मैं जाता हूँ, फिर तुम्हारी छुट्टी से पहले फोटुक देनी भी पड़ेगी ना। सफाई को दे देता हूँ। यह कहते हुए फोटुक भिन्ज्यू चले गये। तभी फिर से आँगन में उतर आया अंबादत्त और फिर से पाठ हुए। इस बार कैमरे की झिझक नहीं थी सो दुल्हन जोर-जोर से रोई क्योंकि अब फोटुक भिन्ज्यू जा चुके थे... तो अंबादत्त के समझ ना आने वाले मन्त्र भी महत्वपूर्ण हो गये थे...जबकि फोटुक भिन्ज्यू के दिल में यह बुरी 'फामÓ कैमरे की 'खिच्याक..!Ó वाली आवाज के साथ आजीवन टसकती रही।