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Thursday 23 Nov 2017

जिद


वीरा चतुर्वेदी
गुडग़ांव, हरियाणा
कहते हैं  कि अपराध करने के बाद अपराधी एक बार फिर अपराध स्थल पर ज़रूर लौटता है। उसके अन्दर का अपराध बोध शायद खतरों के अहसास से ज्यादा बलवान होता है और उसे अपराध स्थल की ओर  ठेलता है।
लेकिन अपनी जानी हमने कोई खतरनाक अपराध नहीं किया था। हां अगर भाई के साथ पांच-छह बरस की उम्र में चिडिय़ों को पकड़ उन्हें नीली लाल स्याही से रंगना अपराध था तो, हम अपराधी थे। तेज़ बहाव से जब बरसात का पानी तालाब के ऊपर बह कर नाले  में आता तो उसमें खड़े हो कर मछलियां पकडऩा यदि गुनाह है तो हम गुनाहगार थे। उन मछलियों को हम अपने देसी जूतों में पानी भर कर जिंदा रखते और घर लाकर पास के कुएं में छोड़ देते। ये भी कोई गुनाह तो नहीं था। भाई हमसे पांच छह साल बड़ा था, मैं कोई पांच साल की और बहन सात साल की। मालपुरा (राजस्थान) में पिताजी नाजिम (जिलाधीश) पद पर तबादला हो कर आये  थे। तीन बड़ी बहनें घर पर पढ़ती-पढ़ाती रहती या बैडमिन्टन  खेलतीं, सबसे बड़े भाई हॉस्टल में रहते कभी-कभार आते और हमें फूल पौधों के बारे में बहुत कुछ बता जाते। सब्जियां लगाते और फिर वापस कृषि महाविद्यालय लौट जाते, तो हम तीनों खिलंदड़े स्कूल से बचे खाली समय में बस यही सब किया करते। रुईपेच यानी रुई का बड़ा सा कारखाना था उसी परिसर में। कपास की ऊँची ऊँची ढेरियाँ सम्मोहित करती और हम उनमें खूब खेलते। कारखाने के भीतर की भीमकाय मशीनें हमें डरा देती, पर आस-पास बिखरे कपास के खेत खूब लुभाते। कपास से रुई और उनसे बड़े-बड़े बेल्स बनते देखना जादू जैसा लगता। अंदर से ऊब जाते तो झाडिय़ों में सांप की बाम्बियाँ खोजते और झाऊ मूसे ला कर अनाज की कोठरी में छोड़ देते चूहे पकडऩे के लिए। सड़क पर फर्लांग दर्शाते मूक पत्थरों को उखाडऩा सब से बड़ा शगल था। एक पत्थर ले कर चलते जाते और उसे दूसरे पर फ़ेंक मारते।
लेकिन हाँ अब याद आ रहा है एक बार चिडिय़ा के पैर में धागा बांध दिया था, सोच कर कि उड़ेगी तो दूर से पहचान लेंगे अपनी चिडिय़ा को। लेकिन यही चिडिय़ा एक बहुत ऊंचे पेड़  की डाल  से जा लटकी थी। बहुत कोशिश करने पर भी उसे न उतार पाए थे न वह उड़ सकी थी। तो क्या इसीलिए मुझे और बुज़ुर्ग हो आई नाती-पोतों वाली मेरी बहन को मालपुरा अपनी ओर खींच रहा था। भाई दुनिया से विदा हो चुके थे। दो बड़ी बहनें भी असमय मुख मोड़ नाता तोड़ गयीं थीं। बड़े भाई रिटायर हो चुके थे और एक बहन बीमारी से लाचार कहीं आ जा नहीं पा रहीं थी।
मेरे घर में जमावड़ा जमा था। मेरे बेटे-बहुएं, नाती-पोते सभी गर्मियों की छुट्टियों में आये हुए थे, बहन भी अपने बेटे के साथ कुछ दिन के लिए आ गयीं थीं। समय मिलते ही हम बचपन की यादों में खो जाते। राजस्थान के न जाने कितने गांव छान मारे थे हमने बचपन में, पर मालपुरा न जाने क्यों बड़ा मोहक लगता। शायद रुईपेच की यादें कुछ ज्यादा आकर्षक थीं या शायद वो हमारे बचपन कि पहली स्पष्ट झलक थी जो यादों में ऐसी समाई हुई थी कि हम जब तब लौट फिर कर मालपुरा पहुँच जाते। आखिर एक दिन किसी भावुक पल में हमने मालपुरा जाने की ठान ली। जब लोकसभा में ये प्रस्ताव आया तो जैसे पूरा सदन विपक्ष में जा बैठा। बड़ा बेटा प्रवक्ता बना- क्या हुआ है आप लोगों को इस उम्र में (सठिया तो हम कब के चुके थे) ऐसा प्रोग्राम ! गर्मी की ये हालत कि ए. सी. से बाहर आते ही पसीने की धार छूटने लगे। इसमें राजस्थान के एक बेहद पिछड़े इलाके में जाने की जिद। लानत मलामत का दौर चलता रहा पर हम थे कि डटे रहे।
पति को लग रहा था कि मेरा दिमाग फिर गया है और अपनी नाज़ुक सी बहन को अपने जाल में फंसा कर एडवेंचर खोज रही हूं इस उम्र में। समझाते हुए बोले- देखो विभा, घूमने का मन है तो कहीं पहाड़ पर चलते हैं, मीना दी को भी साथ ले लेंगे। मीना दी ने झट मोर्चा संभाला -अरे नहीं कहां मालपुरा और कहां पहाड़। हमारी कितनी यादें बिखरी पड़ी हैं वहां और वहां पहाड़ भी हैं, क्यों विभा, क्या नाम था उस पहाड़ का? हम दोनों यहीं मात खा गए। सत्तर की उम्र बाद नाम ग्राम कैसे फिसल कर गुफा में जा छिपते हैं कि हाथ ही नहीं आते। छोटा बेटा चुप बैठा था, उसे मौका मिला- बस ये तो हाल है ट्रेन में बैठ कर दोनों सोचियेगा कौन से स्टेशन पर उतरना है। जब तक याद आएगा, गाड़ी आगे निकल जायेगी। पूरा परिवार मज़े ले रहा था। मीना दी का बेटा रौब से बोला इस उम्र में लोग तीर्थयात्रा पर जाते हैं, ये थोड़े कि बचपन में जहाँ-जहां गुल्ली डंडा खेलते थे वहां की धूल फांकने चल दें। उसका कहना भी वाजिब था। हर वक्त माँ  के शरीर के किसी न किसी भाग की कराह वो सुनता रहता था। फिर उनका बेचारा दिल भी एक बार हलकी सी पटकी खा चका था। ऐसे में नाराजग़ी जायज़ थी।
लेकिन हम दोनों की लेंस लगी आंखों में अतीत कुछ ऐसा उतर आया था कि कोई भी दलील कोई भी तर्क गले नहीं उतर रहे थे। हमने भूलने वाली बात का उत्तर दिया- ट्रेन से क्यों बस से जायेंगे। जयपुर से मालपुरा का रास्ता आज भी याद है ज्यों का त्यों। फिर रुई पेच तो शहर के नुक्कड़ पर ही है, वहीं उतर जायेंगे। पति अब तल्ख़ हो उठे - हाँ वहां गेट पर आपका पुराना नौकर रामशरण माला ले कर खड़ा होगा स्वागत को, वहीं पुराने घर में ठहर भी जाइएगा - ठीक है न? उनका धैर्य अब समाप्ति पर था, बड़बड़ाते हुए बोले बच्चों को कोई समझाए इन बुजुर्गों को कौन समझा सकता है। मैं खीज उठी - बोल तो ऐसे रहे हैं जैसे इनकी कोई जिद होती ही न हो। पुराने से पुराने जूते भी रैक में सजा कर रखना क्या सनक नहीं है। मैंने मन ही मन में सोचा और अपने इरादे और पुख्ता कर डाले, तो आखिर छोटे बड़े सभी ने हथियार डाल  दिए। कूच की तैयारी शुरू हो गयी। मीना दी ने अपना कैमरा सूटकेस में रखना चाहा कि मैंने टोक दिया - कैमरा बाहर ही रहने दो, रास्ते भर नीम, आम,पीपल, शीशम के पेड़ों की फोटो खींचते चलेंगे। दी कि आँखों में चमक आ गयी, तैयारियां पूरी थीं, बस बड़ी दीदी को फ़ोन ही करना था। फ़ोन मिलाया तो लगा वो फ़ोन से ही लगी बैठी थीं बोली- हैलो, तो तुम लोग आखिर जा ही रहे हो मालपुरा। उनकी आवाज़ जैसे रुंध गयी। मैंने फ़ोन पकड़ा- जीजी आप भी चलती तो मज़ा आता। पीछे से बड़ी पोती बोली-अम्बुलेंस भी साथ ले जानी थी। चुप कर मैंने उसे बरजा तो उधर से आवाज़ आयी, जऱा जोर से बोलो, सुनाई नहीं दे  रहा है, हाँ वो कौन सा तालाब था -हम लोग तो उसे गू तालाब कहते थे। वहां से शंख, सीपी ज़रूर लाना, पेंट कर के सजा लेंगे।
बीमारी के बावजूद जीजी की रचनात्मकता में कहीं ज़र्ब नहीं आया था। मेरी आंखें भर आयीं। ठीक है जीजी ज़रूर ले आयेंगे। उनकी आवाज़ फिर आयी-अरे दिग्गी में विष्णु भगवान के भी दर्शन कर आना, हां थोड़ा भोडल (अभ्रक) भी ले आना। दिग्गी में भोडल की फैक्ट्री थी, कुछ भी तो नहीं भूले थे हम। बार-बार ख्याल आता -अगर भाई भी होते तो उनके तो ढेरों दोस्त थे वहां। उम्र हो गयी होगी पर यादें जवान होंगी हमारी तरह। दो एक नाम याद भी आये देखेंगे कोई मिलता है क्या। माँ, पिताजी, बहनों, भाइयों को याद करते हुए हमने राह पकड़ी। बड़े भाई एक बार छुट्टियों में आये थे तो खूब घुड़सवारी करते थे - शायद एक बार किसी अडिय़ल घोड़े ने उन्हें गिरा भी दिया था। ये सभी यादें मालपुरा से जुड़ीं थीं। अब हम वहीं जा रहे थे जहां हमारा बचपन बीता था, उन्हीं जगहों पर जाना था जो हम कभी भूले न थे, और गुलाम लकड़ी खेलते हुए पेड़ पर चढऩा सीखा था। अदालत के पास पेड़ों के नीचे चिकने पत्थर पर अर्जीनवीस का छोटा सा चलित  दफ्तर और उसी पर तारों को न जाने कहाँ कहाँ मोड़ कर पटाखे चलाना हमें याद था। पटाखे की आवाज़ से घबरा कर उड़े परिंदों की घबराहट भरी चों चों से हमें क्या आनंद मिलता था पता नहीं। अरे हाँ वहीं हमारे घर के सामने एक मकान की नींव भरी पड़ी थी। रोज़ सवेरे पीली पगड़ी और सफ़ेद धोती कुरते में सजे कोई रोकडिया जी वहीं खड़े हो कर खरखरी सी आवाज़ में पुकारते-आओ कब्बो, आओ कब्बो। पलक झपकते ढेरों कबूतर न जाने कहाँ  से आकर गुतुरगुं से माहौल गुंजाते हुए दाना चुगने लगते। बड़ा सुहावना दृश्य होता। कहाँ होंगे वे -मन में प्रश्न उठा- तो बिटिया मुस्करा कर बोली- कहीं आकाश में दाना चुगा रहे होंगे कबूतरों को, धोती संभालते हुए। सभी हंस पड़े थे इस बात पर। लेकिन सच तो यही था। उस घर में, अगर वह बना होगा तो आज उन बुजुर्गवार का पोता रहता होगा।
आज जब बड़े-बूढ़े सब हमारा बचपन समेत संसार से विदा ले चुके थे तो मालपुरा हमें बुला रहा था। वहां अब भी महफूज़ था हमारा बचपन। उसी की तलाश में निकल पड़े थे हम दोनों। मन में बस यही था कि जयपुर सही सलामत पहुँच जाएँ। दिल्ली से जयपुर करीब पांच घंटे का सफर था। सामान थोड़ा ही था। दवाओं का बैग  ही सबसे भारी था। बीमारी की हर शक शुबह पर गोली निगल लेना, हर टीसते हुए अंग पर मरहम लगा दर्द से राहत पा लेना खूब सीख चुके थे हम। पर सफर शुरू हुआ तो मन में थोड़ी घबराहट थी ज़रूर पर फिर भी हम अपने को भरसक संभाले हुए थे। बस में सवार हुए तो आरामदेह सीट और ए.सी.की तरावट  ने मन खुश कर दिया। शुरुआत अच्छी हुई तो अंत भी भला होगा, पुरानी कहावत याद कर सबसे विदा ली। मोबाइल में हर छोटे-बड़े का नंबर फीड किया हुआ था। हमें मालूम था ये ही हमें फ़ोन कर कर के हलकान करते रहेंगे, हमें नंबर लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी।
दोनों अपनी अपनी चिंताओं में ऐसे घिरे कि कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला। लगा पलक झपकते ही जयपुर आ गया। हम अचकचाकर उठे चारों ओर नजऱ डाली - मालपुरा की बस दिखाई तो सोचा सीधे उसी पर जा चढ़ें। तभी बेटे के एक दोस्त ने पास आकर पैर छुए तो जान में जान आयी। उसने मालपुरा जाने वाली बस में चढ़ा दिया बिना तकलीफ के। इत्मीनान से आगे की सीट पर जमकर दीदी बोली- बेटा ए. सी. नहीं है इसमें? बेटे का दोस्त मुस्कराया- आंटी मालपुरा  के लिए ए.सी. बस दो ही चलती हैं एक सुबह निकल गयी। दूसरी शाम को जाएगी। दीदी ने सर हिलाया- ना बाबा शाम तक कौन रुकेगा। बस चल जाए सब ठीक लगने लगेगा। दीदी शायद अपने को समझा रहीं थीं। हम उत्साह से भरे ही रहना चाहते थे। पानी का प्रबंध कर बेटे के दोस्त ने जब झुक कर विदा ली तो मुझे लगा वह मुस्कुरा रहा है पर उस मुस्कान में थोड़ी हैरत थोड़ी शरारत मिली हुई है। मैंने उसकी आँखों की  भाषा पढ़ ली थी बोली- दीदी, सोच रहा होगा कैसी हैं ये कारियां, गांठ की तो अकल कोणी और दूसरे की सुने कोणी।  हम दोनों खुल कर हंस पड़े। राजस्थान में प्रवेश करते ही वहां की कहावत जुबां पर चढ़ गयी थी। अब रास्ता मालपुरा की तरफ इशारा कर रहा था। हमें याद था कोई 60 मील की  दूरी थी जयपुर से मालपुरा की। अब जयपुर ने पैर पसार लिए थे तो दूरी घटी ही होगी। हम खिड़की से लगे जा रहे थे। सड़क के दोनों ओर नीम आम पीपल के पेड़ इसी क्रम में लगे थे। बचपन में हम इन्हीं नामों को दोहराते रास्ता पार कर लिया करते थे। पेड़ अब भी अपनी जगह लगे थे पर कहीं कहीं क्रम टूट गया था। फिर आम और नीम के घनेरे पेड़ अपनी सुखद छाया  लिए बुला रहे थे। बार-बार जी में आता ड्राइवर से कहें   जऱा रुक जाओ, एक बार छू लेने दो इन पेड़ों को, बीते पलों को याद कर लेने दो एक बार फिर से। वह वक्त जब आंखों में तितली से रंगीन सपने थे और रंगीन था सारा संसार। आज जब जिंदगी मकडज़ाल सी उलझी हुई है, कुछ पल को ही सही पुरानी  में जी लेने दो। पर बस थी कि भागे जा रही थी। हम बीच में आये गांवों के नाम पहचानने की कोशिश में लगे थे - फागी, एक साथ दोनों के मुंह से निकला, बस रुकी थी वहां और हमें फागी का रेस्ट हाउस व उसके सामने के फैले तालाब की याद आयी। तालाब में तैरती मुरगाबियाँ भूले नहीं थे हम। और भी कई नाम परिचित से लगे, पर मंजिल तो मालपुरा ही थी। आँखों में रुई पेच था जिसके अहाते में दूर-दूर तक रुई के ऊंचे ऊंचे ढेर लगे होते और हम उन पर चढ़ कर खूब खेलते। वहां मुख्य दरवाज़े पर बैठा एक बेहद काला चौकीदार हर वक्त लोहे की सलाइयों पर धागे से स्वेटर बुनता रहता। चारों ओर अहाते में बेर की झाडिय़ों और करोंदे और उन सब के नीचे छिपे अनगिनत नेवले, गुहेरे, सांप और झाउमूसे। मालपुरा पास आ रहा था।  कंडक्टर ने पास आकर पूछा- कठे उतरोगे आप लोग। हम जैसे सपने से जागे- रुई पेच बस वहीं उतार देना। रुई पेच उसने दोहराया और जैसे गहरे सोच में पड़ गया , बोला- ऐसी तो कोई जगह मेरी जानकारी में है नहीं जी। हम दोनों जैसे आसमान से गिरे- क्या कह रहे हैं, सभी जानते हैं रुई पेच, अरे रुई का कारखाना, आसपास कपास के खेत हैं, वहीं जहाँ नाजिम साहिब का बंगला था। कंडक्टर हैरान परेशान हमें घूरता खड़ा और हम उसे। तभी पीछे से एक आवाज़ उभरी- कद कि बात कर रिया हो माँ साब। रुई पेच बंद हुए 40 साल से ऊपर हो गया अब बठे जूतों का कारखाना चल रहा है। उसने अब हमसे सीधे प्रश्न किया- आप कब आये थे यहाँ? हमने अपने को संभाला, मुंह से निकल जाता यही कोई 60-65 बरस पहले। लोग हमें न जाने क्या समझते, वैसे ही सभी सवारियां घूर रहीं थीं।
अब सवाल ये था कि कहाँ उतरें? सोचा था रुई पेच पर उतर कर कुछ घूमघाम  लेंगे, रात में किसी धरमशाला में टिककर एक दिन मालपुरा से गले मिलकर शाम को वापस दिल्ली लौट जायेंगे पर यहां तो तस्वीर ही बदल चुकी थी। धीरे से पूछा यहां कोई धर्मशाला होगी न, वहीं उतार देना। ड्राईवर हमारी बातें गौर से सुन रहा था, बीच में बोला - किसी अच्छे होटल में जा ठहरो मां साब। धरमशाला में आपका गुजारा नहीं होगा खूब गंदगी है वहां।
मालपुरा  में होटल, हम चौंके, फिर याद किया 65 साल गुजर गए क्या मालपुरा बदला न होगा, बाक़ी जगहों की तरह। सब की मान बस अड्डे पर उतरे। मालपुरा हमारे चारों ओर था हम उसे छू भर नहीं पा रहे थे। रिक्शे ही नहीं ऑटो भी थे, दो चार, सवारी लपकने को तैयार। हमें सग्गड़ याद आ गया। लकड़ी के पहियों की रेंगती आवाज़, और धीरे-धीरे आगे सरकता सग्गड़ और उसके पर्दों के पीछे बैठी मां, जैसे कल ही की बात हो। मां फलोदी के बालाजी पर हर माह दो माह में चोला चढ़ाया करती थीं और हम आसपास बिखरे चने के खेत से हरे हरे बूट तोड़ कर खाते जाते थे।
अपने को अतीत से काट कर हम ऑटो वाले की ओर मुड़े ही थे कि एक बार फिर एक सभ्य से नौजवान ने पास आकर प्रणाम किया, हमारी आंखों में ढेर सारे सवाल देख वह बोला-आंटी जी मैं यहां के विधायक व्यासजी का पोता हूं। दामोदरलाल व्यास!। हम दोनों चहक उठे। पिताजी के ज़माने के नामी वकील थे और अक्सर घर आया करते थे। नौजवान फिर मुस्कराया, - उनका पोता हूँ मैं धर्मेश। फिर मुझ से बोला-आपके बेटे से एक बार जयपुर में मुलाकात हुई थी। मेरा पता और फ़ोन नंबर था उनके पास। उन्होंने ही बताया था कि मां और मौसी आ रहे हैं, जऱा ध्यान रखना, सो मैं चला आया। उसने बिना पूछे सामान कुली को थमाया और एक नयी सी कार का दरवाज़ा खोल हमें सावधानी से अन्दर बैठाया। सच में तो जब ए.सी.की परिचित हवा ने बदन को छुआ तो मन  संतोष से भर उठा। थकान से आँखे बंद हो गयी और ये भी न पूछा बेटा कहाँ ले जा रहे है दो सिरफिरी  बुढिय़ों को?  थोड़ी देर बाद आंख खोल बाहर देखा तो मालपुरा चलता फिरता दिखाई दिया - लाल पीले लहंगे, ओढऩी के साथ कहीं कहीं सलवार कमीज़ के छींटे भी दिखाई दे जाते। मालपुरा बदल चुका था पूरी तरह। तार रोड पर कार में थे, धूल भरी पगडंडी पर नहीं।
धर्मेश ने हमें एक छोटे पर साफ़ सुथरे होटल में ठहराया। नहाना धोना, चाय, खाना जब सब हो गया मोबाइल हमारी तरफ बढ़ा कर बोला-लीजिये घर बात कर लीजिये। उधर से बेटे की आवाज़ आयी- हैलो मम्मी , यादों के ढेर पर बैठी हो क्या? बहुत गुस्सा आया। हमारा एक सपना टूट गया था और इन्हें हंसी सूझ रही थी। इतना ही बोला- तेरे दोस्त ने बहुत ख्याल रखा है हमारा, हम ठीक हैं अब कल बात करेंगे। फ़ोन मैंने काट दिया था। ज़रूर पास  खड़े लोग हंस रहे होंगे। पर अभी तो बहुत कुछ देखना था।
दूसरे दिन सुबह उठे तो बस के सफर की छाप पूरे  शरीर पर महसूस हो रही थी। दवाएं खायीं और कचौडिय़ों का नाश्ता किया। जीभ पर स्कूल के ज़माने की दो पैसे वाली कचौड़ी का स्वाद अभी बाक़ी था उसे ही फिर महसूसना चाहते थे हम। पेट भले बगावत करे पर कचौड़ी न खाना हमें अपराध लग रहा था। धर्मेश दस बजे हाजिऱ था गाड़ी ले कर। जून की गर्मी थी और आसमान आग बरसा रहा था। लगता था बारिश हो जाएगी पर अभी तो पसीने में नहाए खड़े थे। धर्मेश ने पूछा- कहाँ  चलें आंटी।  दोनों एक साथ बोले वो तालाब है न, हम लोग उसे गू तालाब कहते थे, असली नाम याद नहीं आ रहा , बस वही ले चलो। मीना दी ने उसे असमंजस में देख समझाया -तालाब के पास एक तरफ पहाड़ी से घिरी एक जगह थी शायद पुलिस चौकी थी और पुलिस  के अफसर वहां रहते  थे, बस वही देखना हैं हमें।
धर्मेश कुछ सोचता सा बोला-आंटी तालाब तो कब का सूख गया। वहां तो अब बाज़ार है। जो पहाड़ी आप बता रहीं हैं वो मेरी याद में तो कभी थी नहीं, शायद तोड़ दी गयी हो, तालाब के किनारे तो एक बहुमंजिली इमारत भर है।
हम दोनों अवाक- मुंह से बोल न फूटें- गाड़ी चल दी थी और जहां रुकी वहां एक अच्छा ख़ासा बाज़ार था। कभी इस  मालपुरा में सब्जी तक नहीं मिलती थी। कहीं नीचे हमारा गूतालाब हिलोरें लेता था। यहीं कहीं तालाब से बह कर आयीं मछलियां पकड़ कर जूतों में रख कर घर ले जाते थे, कुएं में डालने को। भाई को मछली खाने वालों से सख्त चिढ़ थी। एक बार ऐसे ही कुछ साथियों की मछलियां वापस पानी में फेंक कर झगड़ा मोल ले लिया था। कहां थी तालाब की काली मिट्टी जो हम नौकर के हाथ घर तक पहुंचा देते और तरह -तरह के खिलौने गढ़ते थे। शंख कहां से ले जायेंगे बड़ी जीजी के लिए। कुछ उदास हो कर मैंने कहा- हमारा स्कूल हुआ करता था यहां बाज़ार के बीच में। मास्साब, महाराजजी कहते थे टीचरों को या बहनजी। चांद बहनजी थीं, खूब लम्बी सी। धर्मेश ने गाड़ी बढ़ायी और एक बढिय़ा सी इमारत के आगे रोक दी उस पर लिखा था गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल। धर्मेश ने बताया जगह वही है। पहले ऊंची-नीची थी, उसके दादाजी ने तोड़कर बनवा दिया स्कूल। तब हमने उसे बताया कि हमारे पिताजी नाजिम थे इस जिले के और उसके दादाजी अकसर मिलने आते थे उनसे। लेकिन उसे ये सब पता था, बोला-आंटीजी आप दोनों यहीं पढ़ती थीं, मुझे मालूम है। चलिए स्कूल देखेंगी। हमने मना किया -हमारे मन में बसा धूल भरे दालानों और ऊंची छत वाला स्कूल, जहां बन्दर कूदते रहते थे और स्कूल की  नौकरानी खाली समय में बेटी के जुएं निकालती थी, आज भी वो चित्र ताज़ा था। हम उस तस्वीर को बिगाडऩा नहीं चाहते थे  तालाब तो सूख ही  चुका था, पहाड़ी का पता नहीं था, अब क्या करें। सोचा चलो लड़कों का स्कूल ही देख लें। हाईस्कूल था तब भी और मुझे अपने स्कूल से ज्यादा प्रिय था।  उस स्कूल के कमरे में टीचर के पास बैठ कर न जाने कितनी किताबें पढ़ डालीं थीं मैंने स्कूल की लायब्ररी से ले कर, जब कि लिखना मैंने तब तक सीखा ही न था। एक स्वामीजी मास्टर साहिब थे पीछे की ओर काढ़े बाल और गठीले शरीर के। किसी जलसे के लिए उन्होंने एक गीत सिखाया था-माल्पुरे के हम सब बालक स्वागत सब का करते हैं।
स्कूल उसी जगह था पर इमारत में काफी फेर बदल हो चुका था। अब वो एक कालेज था। पेंट शर्ट में लड़के घूमते नजऱ आये तो आस-पास भी नजऱ डाली। यहीं पास के मैदान में कभी चील गाड़ी आकर उतरती तो पूरा मालपुरा उमड़ आता था। अब वहां बाकायदा एरोड्रोम बन गया था। मालपुरा बहुत आगे निकल गया था। कालेज के एक कमरे से हाजरी रजिस्टर बगल में दबाये प्राध्यापक निकले तो मैं बोल उठी- किसनी बिसनी, मीना दी ने जोड़ा- भूर जी कि रतनी। धर्मेश ने अचकचा कर पूछा- ये क्या आंटीजी, हम मुस्कराए - ऐसे ही हाजरी होती थी हमारे स्कूल में।
हमारा घर रुई पेच में था। अब जब रुई पेच ही नहीं रहा तो घर कहां रहा होगा। पिताजी का कमरा जहां वे फाइलें  देखते थे। उस घर की दीवार पर चढ़ी जूही की महकदार लतर और बीच-बीच में तुरई के पीले फूलों से लदी हरी-भरी लता सब खो चुके थे वक्त की अंधेरी गली में। पिताजी की अदालत भी कहीं और जा चुकी थी। यहां पर कोई नहीं पहचानता था उन बच्चियों को जो इसी गांव में खेल कर बड़ी हुई थीं। हम रुई पेच के दरवाज़े पर कुछ खोज रहे थे, कोई चिन्ह जो हमें हमारे अतीत से जोड़ सके, जिसे हम छुए तो लगे वह हमें   पहचान रहा है। सब कुछ नया-नया सा था। धर्मेश दूर गाड़ी के पास खड़ा हमारा इंतज़ार कर रहा था और हम खोये थे अपने ही ख्यालों में। तभी मीना दी दूर देखती हुई सी बोली - विभा याद है सामने वो चान्सैन का पहाड़। हम यहीं खड़े हो कर उधर से उठते पानी भरे बादल देखते थे और भीगने के डर से घर की ओर दौड़ लगाते थे, पर हां कभी जीत नहीं पाए बारिश हमें भिगो ही देती थी।  मीना दी की  बात पूरी होने न पाई थी कि सामने उसी चान्सैन के पहाड़ से एक पानी से लबालब बादल  हमारी ओर भागता नजऱ आया, धर्मेश चिल्लाया आंटीजी गाड़ी में बैठिये भीग जायेंगी, पर हम दोनों वहीं खड़े रहे।  एक पल में बादल हमें तर कर आगे बढ़ गया था। यहीं भीगे थे हम 65 साल पहले भी, ठीक इसी तरह, न जाने कितनी बार कभी चाह कर कभी न चाहते हुए भी। पानी की  बौछार हमें तर कर रही थी और हम खड़े थे बेहद प्रसन्न अन्दर तक अघाए हुए किसी ने तो पहचाना था हमें, किसी का तो स्पर्श तो जाना चीन्हा लगा था। 65 साल बाद भी इस स्पर्श में वही शरारत वही अपनापन था। धर्मेश हमें आश्चर्य से देख रहा था और हम मन्त्र मुग्ध खड़े अपने ऊपर से गुजरते बादलों को देख रहे थे, समय मानो थम सा गया था और हम फिर से नन्ही मुन्नी बच्चियों में तब्दील हो गए थे। हमने अपना बचपन खोज लिया था।