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Friday 24 Nov 2017

जो सौ-सौ ग़म उठाना चाहता है ( गज़़ल)

 


दरवेश भारती
डी-38, निहाल विहार, नाँगलोई,
नयी दिल्ली-11 0041, मो. 09268798930
1
जो सौ-सौ ग़म उठाना चाहता है
वो अश्कों का खज़ाना चाहता है
असीरे-खौफ़ो-दहशत है जो खुद ही
वही सबको डराना चाहता है
सवालों से घिरे रहते हो अक्सर
कहाँ तुमको ज़माना चाहता है
बनाकर ज़ह्र आलूदा हवाएँ
वो इक मौसम सुहाना चाहता है
तेरे गिर्द उडऩेवाला इक परिन्दा
तेरे दिल में ठिकाना चाहता है
उलझ जाये न खुद वो मुश्किलों में
जो सबको आज़माना चाहता है
जवानी में बुने ख्वाबों की ताबीर
ऐ दरवेश अब तू पाना चाहता है
2
वो जो नजऱें फेरकर जाने लगा है  
और ज़्यादा ज़ेह्न पर छाने लगा है
धूप हमको की अता जिसने, वही अब
साये की मानिन्द लहराने लगा है
आज तक जो बाप से सुनता रहा था
बाप को बेटा वो समझाने लगा है
जिसकी फि़तरत थी हमेशा काँटे बोना
लो, वही राहों को महकाने लगा है
खूब वाकिफ़ हैं हम उसकी हरकतों से
साफग़ोई से जो पेश आने लगा है
क्या आजब है पहले देकर ज़ख्म गहरे
प्यार से अब उनको सहलाने लगा है
था अभी खामोश दहशत से जो दरवेश
पा के हमदर्दी वो मुस्काने लगा है
3
ये जो जग का नज़ारा लगता है
देखा-भाला ही सारा लगता है
बो रहा है जगह-जगह जो बबूल
कोई फूलों का मारा लगता है
कोठी-बँगले नहीं बने यूँ  ही
खेल ऊपर का सारा  लगता है
कोई महफि़ल से क्यों उठाता हमें
ये तेरा ही इशारा लगता है
अपनी माटी को लौटने वाला
शह्री मौसम का मारा लगता है
राहे-मंजि़ल तो सह्ल है, लेकिन
राही खुद मन से हारा लगता है
क्यों बतायें तुझे व्यथा दरवेश
तू भला क्या हमारा लगता है
4
आदमी जि़न्दा रहे किस आस पर
छा रहा हो जब तमस विश्वास पर
वेदनाएँ दस्तकें देने लगें
इतना मत इतराइए उल्लास पर
भर न पाये गर्मजोशी से खयाल
इस क़दर पाला पड़ा एहसास पर
जो हो खुद फैला रहा घर-घर इसे
पायेगा काबू वो क्या सन्त्रास पर
नासमझ था देखा सागर की तरफ़
जब न संयम रख सका वो प्यास पर
सत्य का पंछी भरेगा क्या उडाऩ
पहरुआ हो झूठ जब आयास पर
दुख को भारी पड़ते देखा है कभी
आपने दरवेश हास-उपहास पर