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Monday 20 Nov 2017

दु:स्वप्न ( पेशावर में बच्चों पर किए गये हमले पर)


समासिनी श्रीवास्तव
76, दिन अपार्टमेंट्स  सेक्टर.4 , द्वारका,
 नई दिल्ली.110078
मैं वहाँ खड़ी
खूनी दृश्य पर नजऱ रखती
चारों ओर के दर्द सुनती
मैं हर किसी का हृदय
स्तब्ध होते
अनुभव कर सकती थी
मैं हर किसी की आँखों में देख सकती थी
सबसे बुरे सपने का आतंक
शिक्षकों के सीने पर धार दीं बंदूकें
नन्हीं आत्माओं के दिल में गोली
बाद में रखीं लकडिय़ाँ
सबसे बुरे सपनों से भी दर्दनाक थीं
विश्वासघात

मैं खड़ी यहाँ स्तब्ध
एक खोखली आत्मा की तरह
मेरे आस-पास कुछ भी नहीं है
काला छोड़ कर
मुझे विश्वासघात लग रहा है
दुनिया ने दिया है धोखा
कोई मेरी मदद करने के लिए नहीं
इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए
मैं यहाँ लेटी हूँ
लाल रंग में लिपटी हुई
रक्तिम-रक्तिम
श्वेत समय के आने की प्रतीक्षा करती हुई

दोष

मंैने अपने आप को
थप्पड़ मारा
फिर सोचा कि यह मेरी भूल थी
सोचा कि मैं एक बालिका हूँ
मुझ पर है जि़म्मेदारी दुनिया का ख्याल रखने की
कि हममें से ही कोई माँ है
हमें चाहिए था
सिखाऊँ व
अच्छा बनाऊँ इस दुनिया को
बताइए, उस खूंखार ने उस बच्ची की जि़ंदगी बर्बाद कर दी
वह सो रही है अचेत..संज्ञा शून्य...
वह निर्दयी पड़ा है काले कमरे में
यह सोचते हुए कि उस ने ग़लत किया है
उसे पश्चाताप नहीं हुआ
वह अधातुर हँसता रहा ठ_े मार के