Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

मातला नदी पार करते हुए

नित्यानंद गायेन
1093 टाइप 2,
आर. के. पुरम
से.5, नई दिल्ली 110022,
मो. 8860297071
सागर के मुहाने पर नदी मचलती है
शायद मिलन की आतुरता है
मैं नाव पर बैठे हुए देखता हूँ लहरों को
नौका नाचती है जैसे नशे में हो
नदी के ठीक बीच पहुँच कर देखता हूँ
दोनों किनारों को
रोमांचित हो उठता हूँ
अभी और कोई शब्द नहीं है मेरे पास
किन्तु लगता है कुछ ऐसा, जैसे मैं एक लम्बे अरसे से इसी क्षण की प्रतीक्षा में था
दोनों किनारों के घाटों पर प्रतीक्षा में हैं यात्री
उन्हें जाना है आर-पार
और मैं चाह रहा था रुकी रहे यहीं पर नाव
ताकि मैं देख सकूँ आकाश को लहरों पर नाचते हुए
किन्तु, किनारों पर यात्री प्रतीक्षा में थे
मांझी ने देखा गौर से मेरे चेहरे को
और मुस्कुरा दिया
और फिर मैंने भी।

ये बाघ को आदमखोर कहते हैं
सुंदरवन में अब बाघ नहीं
आदमी रहते हैं
ये बाघ को आदमखोर कहते हैं
और मैं इन्हें।
मैनग्रोव के बचे अंश गवाह हैंविनाश का
कुछ कंकाल और हड्डियां
जो अब बोल नहीं पाते दर्द के बारे में
खो गयी है नदी की भाषा
अब सिर्फ आदमी बोलता है।

अपनी माटी से

मेरे गांव की हरियाली मुझमें समा गयी है
बहुत गाढ़ा है ये हरा रंग
मासी रोज लगा देती है मेरे गालों पर हल्दी
तब-तब मैं खिल उठता हूँ
सुबह की तरह
खेत, पंछी, तालाब
और गांव की कच्ची सडक़ उभर-उभर आते हैं
लीची का लाल रंग उतर आता है आँखों में
मैं आकाश को देखता हूँ
नीला हो जाता हूँ
रंगोंका यह समागम
मुझे उल्लासित कर देता है
और तब मैं देखता हूँ क्षितिज पर डूबते सूरज को
झींगुर गाने लगता है
और मचलने लगते हैं जुगनू
सपने नहीं
अब एक नयी उम्मीद देखता हूँ
अपनी आँखों में।

मैंने तुम्हें देखा चाँद के रूप में
खामोश थी रात
वृक्ष नीरव
जुगनू मचल रहे थे जंगल में
आकाश में चमक रहे थे तारे
मैंने तुम्हें देखा चाँद के रूप में
सुबह फूलों को मैंने मुस्कुराते देखा।