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Thursday 23 Nov 2017

मानवाधिकार और प्रेमचंद


राजेन्द्र उपाध्याय
अकाशवाणी, नई दिल्ली
प्रेमचंद की दो सर्वश्रेष्ठ कहानियां - कफन और पूस की रात में मानवाधिकार के लक्षण सबसे अधिक दिखाई पड़ते हैं। इन दोनों ही कहानियों में व्यक्ति की अस्मिता और स्वतंत्रता का उद्घोष दिखाई देता है। जहां एक ओर कफन में व्यक्ति समाज और उसकी गलत प्रथाओं की परवाह न करके अपने लिए जीता है, उसी तरह पूस की रात में भी व्यक्ति अपना खेत जल जाने के बाद भी कोई अफसोस नहीं करता, उल्टे यह कहकर सो जाता है कि चलो अब खेत की रखवाली तो नहीं करनी पड़ेगी। समाज की  रखवाली करने, परंपराओं की रखवाली करने की विपरीत परिस्थितियों की जरूरत नहीं है जो है सो वह व्यक्ति है और उसका परिवार है। व्यक्ति स्वयं में एक इकाई है और दोनों कहानियों से प्रेमचंद ने रवीन्द्रनाथ की यह उक्ति सार्थक ही की है कि सबार ऊपरे मानुज सत्य, सबसे ऊपर मनुष्य सत्य है, बाकी सब गौण है।  मनुष्य को अपनी, अपनी देह की परवाह करनी चाहिए। थोथी परंसपराओं की गठरी होने से कुछ नहीं होने वाला। परंपराओं की गठरी वे ढोते हैं जिनका पेट भरा होता है। भूख लगने पर अन्न ही देवता है। भूखे भजन न होए गोपाला। श्रृषि चार्वाक भी कह गए हैं कि ऋण लेकर भी घी पीना चाहिए।
प्रेमचंद ने ठाकुर का कुआं में भी व्यक्ति की अस्मिता का जयघोष किया है। आखिर क्यों कोई दलित सड़ा गला पानी पीने को मजबूर है जबकि सवर्ण लोग अच्छा साफ  पानी पीते हैं। यह कहानी भी प्रतीकात्मक है। हमारे समाज में आज भी जगह-जगह ठाकुर के कुएं हैं जिन पर उच्च वर्ग के लोग काबिज हैं और निम्न वर्ग के लोग उनकी मुंडेर पर चढऩे का साहस भी नहीं कर पाते हैं। आज भी दलित वर्ग के दूल्हे की घोड़े पर चढऩे पर पिटाई होती है और उसके मानवाधिकार का हनन होता है।
प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास के किसान अपनी जमीन को सवा सेर गेहूं के लिए गिरवी रखने को मजबूर हैं और उनको मजूरी करनी पड़ती है। गोदान का गोबर इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। आज जिस तरह आंध्र प्रदेश के किसान आत्महत्या करने को मजबूर है इस दारूण सच को बहुत पहले प्रेमचंद ने पहचान लिया था। भूमंडलीकरण और बाजारवाद के कारण मध्यवर्ग जिस तरह की कुंठा के शिकार हो रहे हैं उसका चित्रण बहुत पहले प्रेमचंद ने गबन और निर्मला में कर दिया था। गबन में लालच एक सुखी गृहस्थी को तबाह कर देता है और निर्मला में एक कमवयस स्त्री को एक बुजुर्ग को अपना पति बनाना पड़ता है।
प्रेमचंद को हिन्दी कहानी में देशप्रेम, गांव, दलित तथा स्त्री विमर्श को पहली बार उठाने का श्रेय है, लेकिन इसके साथ ही मजदूरों की आवाज़ को उठाने तथा पूंजीपतियों के हाथों मजबूर नेताओं के शहीद होने तथा मजदूरों के हिंसक बनने का पहली बार चित्रण करने का श्रेय भी प्रेमचंद को ही जाता है। डामुल का कैदी नामक कहानी में पूंजीपतियों की नीतियों के विरूद्ध मजदूरों को संगठित करके, उनकी हड़ताल के साथ उनके नेताओं के शहीद होने की घटनाओं के चित्रण से प्रेमचंद मजदूरों के हितैषी के रूप में सामने आते हैं। यह कहानी मजदूरों के प्रश्नों तथा अधिकारों के साथ उनकी हड़ताल में उनके नेताओं की मौत को बड़ी सहानुभूति के साथ प्रस्तुत करती है। 1932 में प्रेमचंद ने मजदूरों की आवाज उठा दी थी।
1932 में ही उनकी बेटों वाली विधवा कहानी मिलती है। जिसमें एक हिंदू विधवा की करूण कथा है। फूलमती से वे पशु की तरह सारा काम कराते हैं और आखिर में वो गंगा में डूब मरती है। प्रेमचंद हिंदी परिवार की इस अमानवीय स्थिति का भंडाफोड़ करते हैं जहां संपत्ति के कारण मां-बेटे के संबंध टूट गए हैं। वे संयुक्त हिंदू परिवार में पत्नी के पति की संपत्ति में कानूनी अधिकार का भी सवाल खड़ा करते हैं। आज यह अधिकार उसे है।
आज भी प्रेमचंद के विचार हमारे देश की ज्वलंत समस्याओं के प्रति न केवल सामयिक और प्रासंगिक हैं, बल्कि कहीं-कहीं प्रेमचंद भविष्यदृष्टा के रूप में भी मौजूद हैं। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई को अलग-अलग नहीं लडऩा है, इनको एक दूसरे से भी नहीं लडऩा चाहिए, बल्कि इन सबको मिलकर देश की प्रमुख समस्याओं का डटकर मुकाबला करना चाहिए। यहां प्रेमचंद राष्ट्रीय एकता का संदेश देते हैं। उनके सामने केवल हिन्दुओं की समस्या नहीं है जबकि वे हिन्दी में लिखते थे, उनके सामने केवल मुसलमानों की समस्या नहीं है जबकि वे उर्दू में लिखते थे। बेकारी से सभी दुखी हैं। दरिद्रता सभी का गला दबाए है। नित नई-नई बीमारियां पैदा होती जा रही हैं। उसका वार सभी संप्रदायों पर समान रूप से होता है। कर्ज में सभी गिरफ्तार हैं। ऐसी कोई सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक दुव्र्यवस्था नहीं है, जिससे राष्ट्र का प्रत्येक अंग पीडि़त न हो। दरिद्रता, बीमारी, अशिक्षा, बेकारी, हिंदू-मुसलमान का विचार नहीं करती है।
प्रेमचंद के इन विचारों की आज के भूमंडलीकरण और वैश्वीकरण के जनविरोधी समय में सबसे ज्यादा जरूरत है। जब मनुष्य के मानवाधिकार का पल-पल हनन हो रहा है। गोदान का गोबर पल-पल पर कदम-कदम पर अन्याय का प्रतिकार करता है और रोटी के हक की लड़ाई करता है। आखिर में वह भी शहर आकर हारता ही है और शहर के कोल्हू में पिसता है।
दुनिया के हर महान साहित्यकार की किसी एक साझी विशेषता के विषय में कहना हो तो आसानी से कहा जा सकता है कि वह अपने कालजीवी होने की शर्त पर ही कालजयी रचनाकार हो पाता है। प्रेमचंद के विषय में भी यह तथ्य पूरी तरह लागू होता है। आज के प्रश्न अपनी प्रारंभिक अवस्था में प्रेमचंद के समक्ष उपस्थित हैं। प्रेमचंद अपने काल में गहरे धंसे होकर भी काल का अतिक्रमण कर जाते हैं। लेखक अपने समय से निरपेक्ष नहीं हो जाता है। समय की सीमाएं तोडऩे का प्रयास प्रेमचंद पूरी निष्ठा के साथ करते हैं।
स्त्री समस्या जैसे मुददे पर भी प्रेमचंद ने खुलकर कलम चलाई है। निर्मला में मूलत: स्त्री की समस्या ही केन्द्र में है। अपने से काफी बड़ी उम्र के पति के साथ निर्मला को निभने में कितनी शारीरिक, मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ता है। विधवा विवाह, तलाक, वेश्यावृति जैसे प्रश्नों पर प्रेमचंद ने अपना दृष्टिकोण रेखांकित किया है। विधवा विवाह का वे खूब समर्थन करते थे, यहां तक कि खुद भी एक विधवा से ही दूसरा विवाह किया था। प्रेमचंद तलाक का समर्थन और विरोध दोनों करते हैं। प्रेमचंद नैतिक पक्ष पर बल देते हैं और स्त्री के मानवाधिकार की लड़ाई लड़ते हुए लिखते हैं कि विवाह महज एक सामाजिक-आर्थिक-समझौता नहीं होता है, इससे कहीं ज्यादा एक आत्मिक समझौता होता है और आत्मिक समझौते को पति-पत्नी अपनी उपेक्षा से तोड़ दें, यह आनेवाली संततियों के हित में अच्छा नहीं होता।
इसी तरह मिस पद्मा कहानी में वे लिव-इन रिलेशनशिप की समस्या आज से 77 साल पहले सन 1936 में उठाते हैं, जबकि यह प्रथा आज की तरह इतनी आम नहीं थी। अब भी यह बड़े-बड़े शहरों में ही मौजूद है। प्रेमचंद ने इस कहानी में लिव-इन रिलेशनशिप के दुष्परणिाम दिखाए हैं। इसमें अक्सर स्त्री ही छली जाती है। उसके साथ धोखा होता है। लिव-इन रिलेशनशिप विवाह का विकल्प कभी नहीं हो सकती है, क्योंकि इनमें जब टूटन होती है तो स्त्री को ही अधिक निराशा होती है इसमें विवाह जैसा दायित्व बोध, पारिवारिक, सामाजिक सुरक्षा और बच्चों का स्वस्थ विकास नहीं हो पाता है। मिस पद्मा में प्रोफेसर प्रसाद और पद्मा हैं। ऐसा ही एक जोड़ा गोदान में प्रोफेसर मेहता और मालती का भी है, जो अपना निजत्व मिटाकर स्त्री-पुरूष  की जगह मित्र बनकर रहना चाहते हैं। इनके स्वछंद भोग में कोई नैतिक बंधन नहीं हैं। मुक्त भोग में पुरूष में आधिपत्य जल्दी आ जाता है और वह स्त्री को दासी समझने लगता है। यह नए युग का आज का स्त्री विमर्श है। आज की लेखिकाएं भी स्त्री विमर्श की ऐसी ही कहानियां लिख रही हैं। स्त्री  आधुनिक बन रही है, पर उसके मानवाधिकार का आज भी हनन हो रहा है। स्वछंदता की कीमत उसे ही चुकानी होगी। उसके हिस्से छल, कपट, धोखा ही आता है। प्रेमचंद के स्त्री विमर्श में प्रेम, विश्वास, समर्पण तथा विवाह अनिवार्य है।
प्रेमचंद को हिंदू समाज व्यवस्था के विषय में किसी प्रकार का भ्रम न था।  वे अपने तीक्ष्ण विवेक और पैनी दृष्टि से इस समाज के समस्त कुकर्मों और पाखंडों का खुलासा करके उसके कुरूप चेहरे के प्रति सार्थक घृणा पैदा करते हैं। कफन में भी समाज की सड़ी-गली प्रथाओं पर कुठाराघात किया गया है। गोदान से हम आजादी के पहले के और बाद के भी किसान की तथा गांव की भी व्यथा कथा दशा दुर्दशा अच्छी तरह देख समझ सकते हैं। महाजनी सभ्यता के वे गहरे चितेरे थे। गोदान लिखे जाने को 77 बरस हो गए हैं, न गोदान अप्रासंगिक हुआ, न होरी, धनिया, गोबर आदि इसके अमर पात्र। मास्टर मातादीन, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, ईदगाह का हामिद, न बड़े घर की बेटी और नहीं बड़े भाई साहब। अब भी पंचों का आह्वान करने की जरूरत है, आज भी बुजुर्गों की देखभाल की जरूरत है और आज भी समझदार बहू ही टूटते संयुक्त परिवारों को बचा सकती है। मंत्र में एक आदिवासी हमारे शहरी तथाकथित आधुनिकों का ज़मीर जगा सकता है। एक आदिवासी के बेटे को भी चिकित्सा का उतना ही अधिकार है जितनी एक शहरी डॉक्टर के बेटे को। बिहार में भूख से मरते बच्चे सरकारी अन्न खाने से मर जाते हैं और उन्हें समय पर चिकित्सा नहीं मिल पाती है जबकि शहरी पढ़े-लिखे वर्ग के लिए अच्छे से अच्छे अस्पताल खुले हैं। उन्हें अमरीका तक ले जाने की व्यवस्था है।
न बैल को तिनका है और किसान को रोटी है। प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास इसी शोषण और हाहाकार का कोई गीत सुनाती है।
1977 में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति के समय विधायकों, सांसदों को वापस बुलाने का जो नारा दिया था और अन्ना हजारे ने अभी हाल में इसे फिर दोहराया था, उसे प्रेमचंद ने प्रेमाश्रम में बहुत पहले लिख दिया था- यह एक बड़ी भूल है कि मैम्बरों को एक विशिष्ट काल के लिए रखा जाता है। वोटरों को अधिकार होना चाहिए कि जब किसी सदस्य को जी चुराते देखें तो उसे पदच्युत कर दें। प्रेमचंद आज भी कितने प्रासंगिक हैं। आज लगभग सभी सदस्य पदच्युत नजर आ रहे हैं। प्रेमाश्रम के लिखे जाने के 75 साल बाद भारत में कितना पानी बह गया। कितनी चांदनी, कितना प्रकाश और कितना अंधियारा ढल गया, पर प्रेमचंद के प्रकाश की चांदनी फैलती ही जा रही है।
प्रेमचंद के पात्रों की विविधता गजब की है। उनके यहां पूरा लमही मौजूद है। स्वतंत्र भारत का कोई चरित्र उनकी कलम से छूटा नहीं है। समाज के हर वर्ग की, हर पेशे की बारीकियों से वे परिचित हैं।  वे किसी पर चोट करने से नहीं चूकते, चाहे वह वकील हो डाक्टर हो, वैद्य हो या मास्टर हो। उनके यहां हिन्दी में प्रचलित सभी मुहावरे अपने प्रचलित रूप में मौजूद हैं। उनके यहां खिचड़ी भाषा है जो न एकदम हिन्दी है और न ही केवल उर्दू है वह गंगा जमुनी भाषा है।
उनके मुहावरों की झड़ी को जैनेन्द्र कुमार ने भी लक्ष्य किया था। कहीं-कहीं वे मुहावरे अनावश्यक होते हुए भी इस्तेमाल करते हैं।     प्रेमचंद ने दलित विमर्श को अपने साहित्य का मुख्य विषय बनाया था। उनके लेखन में हजारों साल से चले आ रहे सामाजिक अन्याय का बदला लेने के लिए मानो इतिहास खुद उतर आया था। कबीर के बाद जो आवाज सैकड़ों साल तक गुम थी, वह एक नया रूप लेकर प्रेमचंद ने फिर सुनाई थी। प्रेमचंद की सद्गति में ब्राह्मण रस्सी से समाचार की लाश नहीं, खुद अपने धर्मतंत्र और जड़ परंपराओं की लाश खींच रहा था। जिन्होंने सत्यजित राय की फिल्म सद्गति देखी है वे इसको ठीक तरह से समझ सकते हैं। प्रेमचंद को धुर दक्षिण में पढ़ाने के लिए उनकी कहानियों पर बनी फिल्म कफन, हीरामोती, गोदान, गबन, सद्गति, निर्मला को दिखाना चाहिए। शतरंज के खिलाड़ी और गुलजार की तहरीर देखनी चाहिए।
यह सही है कि उन्होंने दलित उत्पीडऩ को बाहर से देखा था पर उनके जैसा दलित मानवाधिकारों का प्रवक्ता दूसरा नहीं हुआ। दलितों में कितने प्रेमचंद हुए हैं। प्रेमचंद सवर्ण और अवर्ण दोनों की कलई खोलने में कामयाब हुए। वे न केवल दलितों की पीड़ा महसूस करते थे, बल्कि उसके मर्म की तहों तक भी पहुंचते थे और पाठक को पहुंचाते थे। पीड़ा की कोई नाकेबंदी नहीं हो सकती है। तुम्हारी पीड़ा तुम्हारी और मेरी पीड़ा मेरी करने से साहित्य नहीं लिखा जाता है। प्रेमचंद पराई पीर न केवल जानते थे बल्कि लोगों को जनवा भी देते थे।
आज दलित और स्त्री विमर्श की मार्केटिंग हो रही है। राजनीति हो रही है। दलित और स्त्री दोनों ही बाजार और राजनीति के द्वारा गलत इस्तेमाल हो रहे हैं। नई बाजार व्यवस्था सबको दलित बना रही है और गरीब और पिछड़ा बना रही है। दलित भी कई बार सवर्ण से ज्यादा अत्याचार करने लगे हैं। आज जब स्त्री-पुरूष संबंध तक बाजार केन्द्रित हो गए हैं, सारे संबंध अर्थ पर टिके हैं, प्रेमचंद ईदगाह में बाजार की लुभावनी चमक-दमक भरी चीजों के प्रति हमें आगाह करते हैं। प्रेमचंद की यह कहानी बाजार तंत्र की मिथ्या चेतना के विरूद्ध एक बच्चे के संघर्ष की कहानी है।  वह बाजार की सारी लुभावनी चीजें छोडक़र एक चिमटा चुनता है। आवश्यक चीजें ही घर में हों, घर को अनावश्यक चीजों का कबाडख़ाना न बनाएं । प्रेमचंद की ईदगाह का हामिद उपभोक्ता समाज में आशा का चिन्ह है। बाजारवाद और विदेशी वस्तुओं से पटे मॉल्स में आज भी हम एक चिमटे से होड़ ले सकते हैं। बाजार समाज को लगातार निगल रहा है, यह प्रेमचंद जानते थे।
    बाजारवाद के अमानवी उभार से प्रेमचंद युग के जानवरों ने भी लोहा लिया था। प्रेमचंद की दो बैलों की कथा तो है ही, घोड़े पर भी एक कहानी है स्वत्व रक्षा। बैल और घोड़े भी उन दिनों बिकने से इंकार कर रहे थे, जबकि आज आदमी हर चौराहे पर बिकने को तैयार खड़ा है। आज आदमी बेहिचक डॉलर में अपनी कीमत पूछ रहा है।
    सामंतवाद और उपनिवेशवाद के दीर्घ संघर्ष ने जिस जातीय विरासत का निर्माण किया है, प्रेमचंद उसके महान अंग हैं। प्रेमचंद ने जितना विखंडन किया था उससे कम पुनर्निर्माण नहीं। प्रेमचंद के विखंड और पुनर्निर्माण ने मिलकर विकास का पथ खोला है।
 प्रेमचंद ने महसूस किया कि भारतीय उपन्यास परिचय के पैटर्न के नहीं हो सकते। अत: उन्होंने इसे एक अनौपनिवेशिक और स्वतंत्र व्यक्तित्व देने को मध्यवर्गीय दायरे से विस्तृत करके निम्न वर्ग से जोड़ा । परवर्ती दौर में उन्होंने ऐसे उपन्यास ही लिखे जिसमें सेवासदन की तरह एक कथा न होकर बहुकथापरकता है। इनके उपन्यासों में न चेहरा विहीनता है और न चेहरे की मिथ्या पृथकता है। इनमें एक तरह से जातीय आत्म पहचान की समग्रता है। प्रेमचंद ने कहा था तंग सडक़ों पर चलने वालों के लिए अपने लक्ष्य पर पहुंचना उतना कठिन नहीं है जितना एक लंबे-चौड़े मार्गहीन मैदान पर चलने वालों के लिए। मार्गहीन मैदान पर चलकर उन्होंने जो मार्ग बनाया वह महत्वपूर्ण है ।
    गोदान केवल ग्राम केन्द्रित उपन्यास नहीं है। उसमें संपूर्ण धार्मिक सामंती व्यवस्था पर कारूणिक व्यंग्य है। गोदान में होली है, कबड्डी है और गोदान भी है। होली में गांव के युवक झींगुरीसिंह पर प्रहसन खेलते हैं, शहर की कबड्डी मिर्जा खुर्शीद की धर्मनिरपेक्ष जिंदादिली  दिखाती है। प्रेमचंद की आत्मा भारतीय संस्कृति में  रची बसी है और वे भारतीय परंपरागत जीवन मूल्यों, संस्कारों एवं आदर्शो की रक्षा करके भारतीयता का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।