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Monday 20 Nov 2017

जब भीष्म साहनी की जन्मशती पर विशेषांक निकालना तय हुआ तो मन में संशय था कि इतने विराट व्यक्तित्व को कुछ पन्नों में कैसे सहेजा, समेटा जाएगा।

उपसंहार
रचना वार्षिकी
सर्वमित्रा सुरजन
जब भीष्म साहनी की जन्मशती पर विशेषांक निकालना तय हुआ तो मन में संशय था कि इतने विराट व्यक्तित्व को कुछ पन्नों में कैसे सहेजा, समेटा जाएगा। वे महज लेखक होते तो विशेषांक उनके लेखन के इर्द-गिर्द चर्चा कर निकाल लिया जाता, लेकिन वे लेखक होने के साथ-साथ संगठनकर्ता थे, अभिनेता थे, विचारक थे, पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ अपनी वैचारिकता को सहज अभिव्यक्ति देने वाले ऐसे इंसान थे, जिनसे कोई भी मिलता, उनका मुरीद हो जाता। इस विशेषांक में जितने भी लेख शामिल किए गए हैं, सबमें यही बात प्रतिध्वनित होती है। इसलिए भीष्म जी पर केन्द्रित अंक निकालना एक चुनौती की तरह था। विशेषांक के सिलसिले में उनकी बेटी कल्पना साहनी से मुलाकात की। बड़ी सहजता, सरलता से उन्होंने विशेषांक की रूपरेखा को सुना और किन लोगों से बात करनी चाहिए, किनसे लिखवाना चाहिए, इसकी सलाह दी। भीष्म जी के भतीजे, उनके बड़े भाई बलराज साहनी के बेटे सुप्रसिद्ध अभिनेता परीक्षित साहनी ने भी अपने चाचा पर लिखने के अनुरोध को बिना विलंब के स्वीकार लिया। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच उन्होंने तय समय में अपना आलेख हमें भेज दिया। उन सभी लेखकों के हम आभारी हैं जिन्होंने हमारे आग्रह पर भीष्मजी पर आलेख हमें भेजे और इस अंक को समृद्ध बनाने में अमूल्य योगदान दिया। स्थानाभाव के कारण बहुत से आलेखों को हम फिलहाल शामिल नहींकर पाए हैं, किंतु भावी अंकों में उनका उपयोग भी अवश्य किया जाएगा। भीष्म जी पर चर्चा महज एक अंक में पूरी नहींहो सकती।
भीष्म साहनी जन्मशती वर्ष पर प्रकाशित प्रस्तुत विशेषांक में उनके उपन्यासों, नाटकों, कहानियों, विभिन्न संगठनों में उनकी भूमिका, सक्रियता पर लेखकों ने अपने-अपने तरीके से विचार व्यक्त किए हैं। यह देखना रोचक है, सुखकर है कि एक ही रचना को कितने नजरियों से देखा-परखा जा सकता है। सांप्रदायिकता का विरोध भीष्म जी की कई रचनाओं में प्रकट हुआ है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि उन्होंने न केवल भारत-पाक विभाजन देखा, बल्कि उसके बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे और 2002 में गुजरात के दंगे भी देखे। जिन जीवन मूल्यों में आपकी अटूट आस्था हो, उसे बार-बार छिन्न-भिन्न होते देखने पर आदमी का टूटना स्वाभाविक है। लेकिन भीष्म जी टूटने वाले नहीं, संभालने वाले इंसान थे। इसलिए उनकी रचनाओं में दर्द कितना भी गहरा होकर उभरे, उसे सहकर जीवन में आस्था कायम रखने वाली जिजीविषा अवश्य प्रकट होती है। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी ताकत है जो इंसान का इंसान और इंसानियत पर भरोसा बनाए रखने का संदेश देती है, बिना किसी जोर-जबरदस्ती के।
आज का समय पहले से कहींअधिक कठिन और जटिल हो गया है। लेकिन जैसा कि सूर्यबाला जी के संस्मरण मेंंभीष्म जी के हवाले से कहा गया है कि इस समय को भी तो हमने ही बनाया है। जैसे हम, वैसा समय। तो क्यों न इस समय को ही बेहतर बनाया जाए। भीष्म जी की रचनाओं को पढक़र, उन पर गहन मंथन कर हम इस समय को सचमुच बेहतर बना सकते हैं। जो कुछ गलत हो रहा है, इंसानियत के खिलाफ हो रहा है, उस पर अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं।
यह अंक आपको कैसा लगा, यह जानने की उत्सुकता बनी रहेगी। आपके पत्रों, सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।