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Wednesday 22 Nov 2017

तमस की कहानी भीष्म जी की जुबानी

 

मुझे ठीक से याद नहीं कि कब बंबई के निकट, भिवंडी नगर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। पर मुझे इतना याद है कि उन दंगों के बाद मैंने ‘तमस’ लिखना आरंभ किया था। बलराजजी बंबई में रहते, मैं अक्सर उनके पास जाता रहता था। एक बार पहुंचा तो दो ही दिन पहले भिवंडी में दंगा हुआ था, और बलराजजी अपने कुछ साथियों-ख़्वाजा अहमद अब्बास, आई एस जौहर आदि के साथ भिवंडी का दौरा करने जा रहे थे। मोटर कार में एक आदमी की जगह खाली थी, मैं उनके साथ हो लिया।
भिवंडी में दा$िखल हुए तो मुझे लगा जैसे मैं उस नगर का दृश्य कहीं देख चुका हूं। चारों ओर छाई चुप्पी, बरामदों, छतों पर खड़े इक्का-दुक्का लोग, $खाली सडक़ें, मानो समय की गति थम गई हो। शहर में दा$िखल होने पर पुलिस के संतरियों के दो-एक तंबू और तंबुओं के बाहर जगह-जगह बैठे संतरी, वर्दी में, पर किसी ने वर्दी की टोपी उतार रखी है, किसी ने पेटी खोल रखी है,मानो दंगों की थकान उतार रहे हों। जगह-जगह घूमते आवारा कुत्ते। चारों ओर छाई चुप्पी-बरामदों-छतों पर खड़े लोग भी मूर्तिवत से जान पड़ते हैं। चारों ओर एक प्रकार का सूनापन छाया था।
थोड़ा आगे बढ़े तो झुग्गियों की बस्ती थी। लगता था उस पर ‘शूरवीरों’ का हमला बेरहमी से हुआ था। और लोग वहां बदहवासी में भागे थे। जगह-जगह घरों के ‘भांडा-टिंडर’ बिखरे पड़े थे। एक झुग्गी के बाहर चूल्हे के ऊपर केतली अभी भी रखी थी। एक और झुग्गी के बाहर तोते का पिंजरा रखा था और तोता, पिंजरे के अंदर मरा पड़ा था। जगह-जगह कपड़े-लीड़े बिखरे हुए मानो भागनेवालों की समझ में नहीं आया हो कि क्या उठाएं और क्या छोड़ जाएं। और बाद में लूटने वाले भी फैसला न कर पाएं हों कि चिथड़ों में से क्या चुनें। यहां भी कुत्ते झुग्गियों के बीच इधर-उधर घूम रहे थे।
भिवंडी नगर बुनकरों का नगर था, शहर के अंदर जगह-जगह खड्डियां लगी थी, उनमें से अनेक बिजली से चलने वाली खड्डियां थी, पर घरों को आग की नकार करने से खड्डियों का धातु बहुत कुछ पिघल गया था। गलियों में घूमते हुए लगता हम किसी प्राचीन नगर के खंडहरों में घूम रहे हों।
पर गलियां लांघते हुए, अपने कदमों की आवाका, अपनी पदचाप सुनते हुए लगने लगा जैसे मैं यह आवाका पहले कहीं सुन चुका हूं। चारों ओर छाई चुप्पी को भी सुन चुका हूं। अकुलाहट-भरी इस नीरवता का अनुभव भी कर चुका हूं। सूनी गलियां लांघ चुका हूं। घरों में परिवार बसे हुए हों तो कहीं से हंसने की आवाज आती है, कहीं से किसी को पुकारने की, कहीं से बच्चे की किलकारी की, कोई बच्चा दौड़ता हुआ गली लांघ जाता है, एक घर से दूसरे घर में जा पहुंचता है, कहीं कोई गृहणी अपने घर की दहलीज पर खड़ी किसी की राह देख रही होती है। बसा हुआ नगर किसी खिली फुलवारी का-सा भास देता है। पर वीरान नगर पर दुर्भाग्य के साए डोल रहे होते हैं।
पर मैंने यह चुप्पी और इस वीरानी का ही अनुभव नहीं किया था। मैंने पेड़ों पर बैठे गिद्ध और चीलों को भी देखा था। आधे आकाश में फैली आग की लपटों की लौ को भी देखा था, गलियों-सडक़ों पर भागते कदमों और रोंगटे खड़े कर देने वाली चिल्लाहटों को भी सुना था और जगह-जगह से उठने वाले धर्मान्ध लोगों के नारे भी सुने थे, चीत्कार सुनी थी। भिवंडी की सूनी गलियां लांघते हुए मैं तरह-तरह की आवाकों सुनने लगा था। शिविर में मेरे साथी वहां के निवासियों से मिले। मेरे भाई डायरी में टिप्पणी दर्ज करते रहे, अब्बास साहिब अपनी दृष्टि अनुसार ऐसी घटनाओं के ब्यौरे इकट्ठा करते रहे जिनमें साझे कारोबार, साझे-लेन-देन, साझे आदान-प्रदान के उदाहरण मिल सकें, कहीं पर हिन्दू और मुसलमान मिलकर दुकान चलाते रहे थे, कहीं बुनकरों के काम में हिन्दुओं-मुसलमानों की शिरकत रही थी।
दोपहर ढलने लगी तो हम लोग वहां से चल पड़े। बलराज ने फैसला किया कि हम दो-एक दिन में फिर से भिवंडी लौटकर आएंगे और सप्ताह भर के लिए वहीं पर रहेंगे।
कुछेक दिन तक बंबई में रहने के बाद मैं दिल्ली लौट आया। भिवंडी पीछे छूट चुका था। उसकी सूनी गलियां धीरे-धीरे विस्मृति में खोने लगी थी। जिन यादों को उसने जगाया था वे फिर से मेरे अवचेतन में जा पहुंची थी। दिल्ली की गहमा-गहमी वाली दिनचर्या फिर से चलने लगी थी।
आमतौर पर मैं शाम के वक्त़ लिखने बैठता था। मेरा मन शाम के वक़्त लिखने में लगता है। न जाने क्यों। पर उस दिन नाश्ता करने के बाद मैं सुबह-सबेरे ही मेज पर जा बैठा था। शायद छुट्टी का दिन था। पर कोई विशेष आग्रह रहा हो, ऐसा भी नहीं था। वास्तव में कुछ लिखने के इरादे से भी मेज पर नहीं जा बैठा था।
यह सचमुच अचानक ही हुआ, पर जब कलम उठाई और कागज सामने रखा तो ध्यान रावलपिंडी के दंगों की ओर चला गया। कांग्रेस दफ्तर आंखों के सामने आया, कांग्रेस के मेरे साथी, एक के बाद एक योगी रामनाथ, बख्शीजी, बालीजी, हकीमजी, अब्दुल अकाीज, मेहरचंद आहूजा, अकाीज जनरैल मास्टर अर्जुनदास... उनके चेहरे आंखों के सामने घूमने लगे। मैं उन दिनों की यादों में डूबता गया।
योगी जी सिर हिला-हिलाकर कह रहे हैं, ‘‘शहर पर चीलें उड़ेंगी! शहर पर चीलें उड़ेंगी!’’ उनकी आवाका में चिंता है, दर्द है। यही वाक्य वह बाद में अंग्रेका डिप्टी कमिश्नर से भी कहते रहे थे। ‘‘साहिब, इस समय $िफसाद रुक सकता है, उसे रोक दो। नहीं तो शहर पर चीलें उड़ेंगी!’’ और डिप्टी कमिश्नर मेज पर रखे कागज पर पेंसिल से टिप्पणी लिखता रहा था- वह लिख रहा था या यों ही पेंसिल चला रहा था, और सिर हिलाता हुआ कह रहा है, ‘‘मैं शहर में $फौज की गश्त का इंतजाम नहीं ंकर सकता। $फौज पर मेरा हुक्म नहीं चलता।’’ यादों की बाढ़, फिर कानों में भागते $कदमों की आवाकों पडऩे लगती हैं। कुछ चरित्र उभरने लगते हैं। वह जनरैल चला आ रहा है, अपनी बगल में बेंत दबाए हुए, लेफ्ट राइट करता हुआ। ‘‘गांधी जी कहते हैं पाकिस्तान मेरी लाश पर! मैं भी कहता हूं, पाकिस्तान मेरी लाश पर!’’ जरनैल जज्बाती आदमी था, सनकी था, अपनी मुचड़ी हुई वर्दी और फटी हुई चप्पलों में लेफ्ट राइट करता फिरता था, पर दिल का खरा, निर्भीक,देश पर निछावर... ‘‘साहिबान, जब कांग्रेस ने पूर्ण आजादी की शपथ ली थी तो मैंने भी शपथ ली थी। उस दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ मैं भी कौमी झंडे के नीचे नाचा था। साहिबान, यह सब अंग्रेज की शरारत है...।’’ किस तरह से आवाजें मेरे कानों में गूंजने लगी थीं और मैं उत्तरोत्तर भावोद्वेलित होता जा रहा था।
यह सच है। किसी उपन्यास की रचना लेखक की $कलम नहीं करती, उसका मस्तिष्क नहीं करता, उसका भावविह्वल हृदय करता है।
मेरी कलम चल निकली। कभी एक दृश्य आंखों के सामने उभरता, कभी दूसरा, उन्हें तरतीब देने का विचार ही उस समय मन में नहीं उठ रहा था। थोहा $खालसा की यात्रा आंखों के सामने घूम गई। मैं उस कुएं के पास खड़ा हूं जिसमें दसियों सिख स्त्रियां अपनी इज्जत बचा पाने के लिए कुएं में कूद मरी थी। मेरी बगल में खड़ा सरदार जो अपने दुख और क्लेश के कारण नीमपागल हुआ जा रहा था, फूली हुई लाशों की ओर इशारा करते हुए कह रहा है:
‘‘वह है जी, मेरी घरवाली, वीरजी। यह देखते हो न? उसकी कलाई पर सोने का गोखड़ू है। वह गोखड़ू निकलवा दो वीरजी। वह तो चली गई, उसके किस काम का। वह मैंने बनवाकर उसे पहनवाया था, वीरजी। वह मेरी चीका है।’’
लाशें फूलकर कुएं के ऊपर तक आ गई हैं। उन पर सफेद पाउडर (डिसइन्फै़क्टेंट) छिडक़ा जा रहा है। पाउडर छिडक़ दिए जाने पर, लाशें- उनके अंग एक दूसरे से उलझे, अब लाशें नहीं, संगमरमर की मूर्तियां-सी नकार आने लगी हैं। कुएं के आसपास अनेक सरदार, हाथ बांधे खड़े हैं। ये उन औरतों और बच्चों के सगे संबंधी हैं। किसी-किसी वक़्त कोई सरदार फफक उठता है, पर फिर, अपने रुदन को दबाने, संयम रहने की चेष्टा करते हुए, सिर झुकाकर गुरुवाणी के शब्द बुदबुदाने लगता है। पर उसकी आंखें कुएं पर से हट नहीं पातीं। ‘‘वह औरत जी, जिसकी टांगों में बच्चे की लाश फंसी पड़ी है, वह मेरी घरवाली है जी, और वह मेरा बेटा हरनाम है जी, मेरा बेटा...’’ और वह फिर से फफक उठता है।
लिखते हुए, ज्यों-ज्यों रचना आगे बढ़ती है, वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व ग्रहण करने लगती है। कथानक, मूलरूप से भले ही वास्तविक जीवन में से उठाया गया हो, भले ही सच्ची घटनाओं पर आधारित हो, फिर भी वह घटना जब उपन्यास के पन्नों में आती है तो उसकी संगति उपन्यास की मांगों के अनुरूप होने लगती है।
धीरे-धीरे उपन्यास में, वास्तविक जीवन में से उठाए गए पात्र, काल्पनिक पात्रों के सहगामी होने लगते हैं। सूअर मारनेवाला नत्थू काल्पनिक है। नत्थू और उसकी पत्नी, दोनों काल्पनिक हैं। इस तरह यथार्थ और कल्पना घुलने-मिलने लगते हैं। एक पात्र का काल्पनिक होना और दूसरे का वास्तविक होना, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दोनों का विश्वसनीय होना जरूरी है।
यही बात घटनाओं पर भी लागू होती है। उपन्यास के आरंभ में सूअर मारने का प्रसंग काल्पनिक है। उपन्यास की सच्चाई के मानदंड इस बात पर निर्भर नहीं होते कि अमुक घटना वास्तव में घटी थी या नहीं, बल्कि इस बात पर कि जीवन के समूचे यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में वह घटना विश्वसनीय बन पाई है या नहीं।
काल्पनिक और वास्तविक की चर्चा के संबंध में कहूं तो सजीव, विश्वसनीय लेखन के लिए जरूरी नहीं कि जीवन में उठाई गई किसी घटना का यथावत चित्रण कर दिया जाए। बल्कि मैं तो कहूंगा कि कभी-कभी वास्तविकता का यथावत् चित्रण इतना प्रभावशाली नहीं होता जितना कल्पना की मदद से किया गया चित्रण। कल्पना की उड़ान से मतलब मनगढ़ंत चित्रण नहीं है। कथानक के विकास के अनुरूप ही आपके पात्रों का व्यवहार होगा। और आपकी कल्पना द्वारा नई-नई स्थितियों का आविष्कार भी। बेशक, वास्तविकता की जानकारी आधार का काम करेगी, पर उसके अंदर पाई जाने वाली सच्चाई का उद्घाटन कल्पना द्वारा ही होगा। वरना आप पढ़ते रहिए, तथ्य और आंकड़े बटोरते रहिए। जितना अधिक आप किसी रचना को जानकारी के आधार पर, तथ्य-आंकड़ों की मदद से लिखेंगे, उतनी ही रचना कमजोर होती जाएगी।
इस तरह, यदि लेखक किसी ऐतिहासिक व्यक्ति अथवा कालखंड को अपने कथाकन के लिए चुनता है तो जितने कम तथ्य-आंकड़े इकट्ठा करेगा, उतना ही उसकी कृति के प्रभावशाली तथा विश्वसनीय होने की संभावना होगी। किसी हद तक तो यथार्थ के तथ्य-आंकड़े सहायक होंगे, उसके बाद वे रचना के स्वतंत्र विकास के आड़े आने लगेंगे, यहां तक कि तथ्य-आंकड़े लेखक के मस्तिष्क पर ऐसे हावी होने लगेंगे कि लेखक की कल्पना अवरुद्ध हो जाएगी, वह तथ्य आंकड़ों की जकड़ में ऐसी फंसेगी कि स्वतंत्र रूप से रचना के विकास में उसकी कोई भूमिका ही नहीं रह जाएगी।
फिर शरणार्थी शिविर आंखों के सामने आ गया। वहां मुझे आंकड़े इकट्ठे करने का काम किया दिया था। गांवों से भाग-भटककर आए शरणार्थी वहां पड़े थे। यहां पर मुझे उस सफेदरीश सरदार ने अपनी कहानी सुनाई थी जो अपनी अधेड़ उम्र की पत्नी के साथ अपना गांव छोडक़र भागा था।
‘‘बंतो, अगर हम पकड़े गए तो इस बंदूक से सबसे पहले मैं तुम्हें मार डालूंगा...’’
उसके शब्द मुझे याद आए जो वह एक जगह से दूसरी जगह भटकते हुए अपनी पत्नी से कहता रहा था।
बाद में, गोविंद निहलाणी द्वारा फिल्माए जाने पर मैंने फिल्म में उसी सरदार की भूमिका निभाई थी।
शरणार्थियों के हर चेहरे के पीछे एक कहानी थी। जो कुछ उन दिनों देखा था, अनुभव किया था, कैसे याद न आता? कभी आंखों के सामने मिशन अस्पताल का बरामदा घूम आता जो जख्मी शरणार्थियों से भरा पड़ा था और त्रिलोक सिंह जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी थी, कह रहा था:
‘‘रब्ब झूठ न बुलवाए, मुझे हमीदे ने नहीं मारा। मेरे सिर पर गंडासा पिछली ढोक से आए किसी अनजान आदमी ने मारा था।’’
इस प्रकार की स्मृतियों के आधार पर लिखे जाने वाले उपन्यास का कोई बंधा-बंधाया कथानक नहीं होता। यादें ही कलम चलाती हैं। संयम, धैर्य कलम नहीं चलाते। अंदर की छटपटाहट चलाती है। कथानक के क्रमिक विकास की ओर ध्यान नहीं जाता। इतिहास का वह परिच्छेद ही मूल विषय होने के नाते, अपने पट स्वयं खोलता जाता है। उपन्यास की बनावट, कथानक का क्रमिक विकास और पात्रों का व्यवहार... सब बाद की बातें है। अब तो जो उद्गार मन में उठते हैं, जो प्रसंग आंखों के सामने उभरते हैं। उन्हें कलमबंद करो। करते जाओ। यदि उस भयानक परिच्छेद से जुड़ते हैं तो जरूर कहीं उनकी संगति बैठेगी।
शायद यही कारण है कि यादों के दबाव में लिखे उपन्यास, गठन की दृष्टि से शिथिल होते हैं। उनमें प्रसंगों की तो भरमार हो सकती है, और जिं़दगी की धडक़न भी सुनाई पड़ेगी, पर उपन्यास का ढांचा बहुत चुस्त-दुरुस्त नहीं होगा, क्रमिक विकास आदि की दृष्टि से।
मेरे अनुभव में कोई नत्थू जैसा किरदार नहीं आया था, जो जानवरों की खाल उतारता हो, न ही मैंने कभी कोई सूअर मरते देखा था और न ही मैं जानता था कि सूअर को कैसे मारा जाता है। बल्कि सूअरवाला प्रसंग लिखने से पहले और लिखने के बाद भी मैं इस कोशिश में रहा कि उसे मारने का ठीक-ठीक ढंग कहीं से पता चले। लीजा और रिचर्ड का प्रसंग भी कल्पना पर आधारित था। हां, मेरे ही एक अंग्रेज अध्यापक को गौतम बुद्ध की उध्र्यकाय मूर्तियां इकट्ठा करने का जुनून हुआ करता था। मुरादअली भी काल्पनिक पात्र था। अनेक प्रसंगों के पात्र कल्पना की उपज थे। पाशोवाला प्रसंग पूर्णतया काल्पनिक है। किताब लिखी गई। छप गई। छपने से पहले उसकी पांडुलिपि शीला ने पढ़ी। कृष्णा सोबती जी ने पढ़ी। सभी ने मेरा हौसला बढ़ाया।
यह 1974-75 की बात है। लगभग दस बरस बाद इस पर फिल्म बनी। इसके फिल्माए जाने से जुड़ी भी कुछ यादें मन में उठती है : जिस जज्बाती दबाव में मैंने किताब लिखी थी, वैसे ही जज्बाती दबाव में गोविंद निहलाणी ने वह फिल्म बनाई। फिल्माने से पहले वह मुझसे ऐसे सवाल पूछते कि मैं चौंक-चौंक जाता। तुम्हारे शहर में घरों की बनावट कैसी थी, अगर कोई मोहल्ला दिखाना हो तो वह कैसा होना चाहिए? (बाद में, बंबई शहर के बाहर, ‘फिल्मसिटी’ में, सेट के नाते वैसे ही घरों का पूरा का पूरा मोहल्ला बनवाया, लागत की परवाह नहीं की)। फिल्म स्टुडियो के अंदर पूरा का पूरा गुरुद्वारा बनवाया, यहां तक कि दीवारों पर भित्तिचित्र भी बनवाए। गुरुद्वारा इतना प्रभावशाली बना कि वह फिल्मी सेट न रहकर सचमुच का गुरुद्वारा माना जाने लगा। जो कोई उसमें प्रवेश करता, जूते उतारकर अंदर जाता। उसके अंदर बैठकर कोई सिगरेट नहीं पीता, ऊंची आवाका में बोलता नहीं था। ऐसा ही देहात के घरों को चुनते हुए भी किया।
पर जिस घटना का मैं उल्लेख करना चाहता हूं उसका संबंध फिल्म में दिखाए गए शरणार्थियों के एक दृश्य से है। जिस समय शरणार्थियों का सीन $िफल्माया जा रहा था तो मैंने शीला (मेरी पत्नी) को एक बड़ी उम्र की महिला के साथ बातें करते हुए देखा, जो उस सीन में एक्स्ट्रा का काम कर रही थीं। मुझे हैरानी हुई। फिल्म में कोई जलसा-जुलूस  दिखाया जाना हो तो $िफल्मवाले एक्स्ट्रा लोगों को भाड़े पर बुला लेते हैं। उनकी फिल्म में, व्यक्तिगत स्तर पर कोई भूमिका नहीं होती। वे केवल भीड़ का अंग होते हैं, बड़ी मामूली-सी उजरत पर इन लोगों को बुला लिया जाता है।
शीला उस एक्स्ट्रा औरत के साथ क्यों जा बैठी है, और क्या बातें कर रही है? पूरे के पूरे सीन में मैंने कई बार उन्हें बतियाते देखा। बाद में जब मैंने शीला से पूछा तो वह भावुक-सी होकर बोली :
‘‘तुम लोग तो रिफ्यूजियों का सीन दिखा रहे हो न, सचमुच की रिफ्यूजी हैं।’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘मतलब कि जब पाकिस्तान बना था तो ये लोग बेघर हो गए थे। यह अपने घरवाले के साथ अपना गांव छोडक़र भागती फिरी थी। जगह-जगह ठोकरें खाने के बाद ये लोग बंबई पहुंचे। पर इसकी हैसियत अभी भी रिफ्यूजी की ही है। इसका घरवाला खाट से जुड़ा है, न काम, न काज। एक्स्ट्रा के रूप में कभी-कभी इसे कोई बुला ले तो दो पैसे बन जाते हैं। मुझे कह रही थी ‘यह रिफ्यूजियों का सीन है न, मैं इसमें सचमुच की रिफ्यूजी हूं।’’
कुछ लोगों की जीवन कहानी में बंटवारे का अध्याय अभी तक खत्म नहीं हुआ था।
एक और चुभती-सी, किन्तु सुखद याद भी इस फिल्म के साथ जुड़ी है। फिल्मसिटी में शूटिंग चल रही थी। गर्मी बहुत थी, मैं कॉस्ट्यूम में थे, जिसका मतलब लंबी दाढ़ी, सिर पर पग्गड़ आदि सबसे लैस था। मेरे काम में अभी थोड़ी देर थी और मुझे गोविंदजी ने एक केबिन में आराम करने के लिए भेज दिया।  मुझे दाढ़ी-मूंछ लगाने का तो बचपन से शौक रहा है पर ऐसी दाढ़ी-मूंछ का नहीं जो गर्मी के मौसम में ‘तमस’ के लिए लगानी पड़ी थी।
केबिन के पंखे के नीचे लेटा मैं सुस्ता रहा था जब किसी ने केबिन का दरवाकाा खटखटाया। मैंने उठकर दरवाकाा खोला तो सामने स्मिता पाटिल खड़ी थीं। मैं चौंका। मैंने सोचा शायद इनकी फिल्म भी नहीं यही कहीं फिल्माई जा रही है और यह मेकअप करवाने के लिए आई हैं और भूल से गलत केबिन का दरवाकाा खटखटा दिया है।
‘‘नहीं जी, मैं आप ही से मिलने आई हूं। आप इस फिल्म के लेखक हैं न? मुझे गोविंदजी ने बताया तो मैं आपसे मिलने चली आई।’’
वह खाट के सिरे पर बैठ गई और बोलीं: ‘‘मेरी बड़ी इच्छा इस फिल्म में काम करने की थी, अब भी है, पर क्या करूं मजबूर हूं।’’ (स्मिता पाटिल गर्भवती थीं)
वह थोड़ी देर तक बैठीं, भावविह्वल-सी फिल्म के उस कथानक की, उसके उद्देश्य की चर्चा करती रहीं, फिर उठते हुए बोलीं :  ‘‘बस, मैं इतना ही कहने आई थी। आपसे मिलने आई थी। अपनी इच्छा और अपनी मजबूरी बताने आई थी।’’ और नमस्कार कर, उठकर चली गई।
‘‘और दुर्भाग्यवश, कुछ महीने बाद, वह चल बसीं।’’
सहमत द्वारा प्रकाशित भीष्म साहनी : एक मुकम्मल रचनाकार से साभार