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Tuesday 21 Nov 2017

मैं भी दिया जलाऊंगा, मां! (2003 में प्रकाशित भीष्म साहनी की कहानी)

उसने जो किस्सा सुनाया वह मन-गढ़ंत था। और सुनाते हुए, मैं सोचता हूं, वह खुद भी जानता था कि वह मन-गढ़ंत किस्सा सुना रहा है। पर उसे सुनाते हुए कभी-कभी उसका गला रूंधने लगता और उसकी आवाका कांप-कांप जाती थी। तभी मैंने जाना कि झूठ होते हुए भी कुछ था जो उसके दिल को बांधता था, मानो उसमें छिपी किसी अन्य सच्चाई की झलक मिल रही हो। सच पूछो तो उसे सुनते हुए मैं स्वयं उद्विग्न-सा महसूस करने लगा था। क्या मालूम वह घटना सच्ची ही रही हो।
घटना पांचेक साल के  एक बच्चे को लेकर थी और उन दिनों घटी थी, जब गुजरात में नरसंहार चल रहा था। अपना किस्सा सुनाते हुए वह कह रहा था, ‘‘उस रात जब नन्हें शाहिद की मृत्यु हुई। वह सपना देख रहा था। देख ही नहीं रहा था, उसकी आंखों के सामने उसका सपना मानो साकार हो रहा था। वह स्वयं अपने सपने को चरितार्थ होता देख रहा था और उसमें स्वयं भाग ले पाने के लिए बेचैन हो रहा था।’’ पर था तो वह सपना ही और सपने कब खुली-अधखुली आंखों के सामने साकार होते हैं, सपने तो सपनों में साकार होते हैं।
यों, पिछली शाम से ही नन्हें शाहिद का सपना आकार ग्रहण करने लगा था, जब वह अपनी मां के हाथ पकड़े अपनी कोठरी के बाहर खड़ा था और उसकी मां कोठरी के बाहर, बस्ती के बड़े आंगन में, शहर से आने वाली किसी बीबी के साथ बतिया रही थी। नन्हा शाहिद कभी मां के मुंह की ओर और कभी शहर से आने वाली उस बीबी के चेहरे की ओर देख रहा था।
अहमदाबाद में सांप्रदायिक हिंसा का पहला झटका किसी भूचाल के पहले झटके की तरह, शहर-भर को झकझोर जाने के बाद थम चुका था। लगता था उस झटके के बाद शहर संभल जाएगा। मानो हिंसा के जन्तु ने चीर-फाड़ के बाद अपने पंजे खींच लिए हों।
पहला विस्फोट तीन दिन तक रहा था। तीन दिन के बाद अब स्थिति में स्थिरता-सी आने लगी थी। कहीं-कहीं पर दुकानें खुलने लगी थी, इक्का-दुक्का लोग दाएं-बाएं झांकते हुए, घरों के बाहर निकलने लगे थे. हम सब घरों में से निकल-निकलकर जगह-जगह गांठ बांधे स्थिति पर विचार कर रहे थे। हवा में आशा और घबराहट तो अभी भी थी पर इस बात की आशा भी थी कि $िफकाा बदल जाएगी, कि साम्प्रदायिकता की आग ठंडी पड़ जाएगी। बाहर से भी हमदर्द, हितैषी लोग, समाजसेवी, लेखक, पत्रकार, जगह-जगह से पहुंचने लगे थे। इससे भी स्थानीय लोगों को आश्वासन-सा मिलने लगा था। कुछ जानकारी हासिल करने के लिए, कुछ मदद-इमदाद करने के लिए हितचिंतक, हितैषी लोग आने लगे थे।
एक टूटी-फूटी बस्ती में, शाह आलम की दरगाह के निकट, अब दोपहर में नन्हा शाहिद, अपनी मां का हाथ पकड़े अपनी कोठरी के बाहर खेल रहा था और उसकी मां, शहर से आने वाली किसी बीबी के साथ बतिया रही थी।
‘‘हाय, बहिन जी’’, शाहिद की मां कह रही थी, शाह आलम की दरगाह तो इधर पास में ही है। हम तो आए दिन दरगाह में दीया जलाते थे। शाह आलम की दरगाह पर तो दीया जलाना बड़े सवाब का काम है। दरगाह की किायारत करने वाला हर कोई दीया जलाता है। और नन्हें शाहिद की नकारें मां के चेहरे पर से हटकर उस दूसरी शहरवाली बीबी के चेहरे पर लग जाती थीं। वह औरत कौन थी शाहिद नहीं जानता था। उसने उसे पहले कभी नहीं देखा था। पर वह औरत उसकी मां जैसी नहीं थी। मां तो फटे-पुराने कपड़े पहने थी, वह औरत तो सा$फ-सुथरी, बनी-ठनी थी, चमचम करते, धुले हुए कपड़े पहने हुए थी, हंसती थी तो दांत कैसे चमकते थे। मां की तो ओढऩी भी फटी हुई थी जिसमें से उसके सिर के ढेर सारे बाल बाहर को निकल आते थे।
शहरवाली बीबी टिकटिकी बांधे, शाहिद की मां के चेहरे की ओर देखे जा रही थी। मैंने तो सुना है कि जो कोई $फर्द  शाह आलम की दरगाह पर दीया जलाता है, वह साथ ही साथ नरसी भगत के नाम पर दीया जलाता है, क्या यह सच है?
‘‘हां, बहिन जी, यही चलन है। शाह आलम के नाम का दीया जलाने से पहले नरसी भगत के नाम का दीया जलाया जाता है।’’
‘‘ऐसा क्यों?’’
‘‘ऐसी ही रवायत है, बहिनी जी, हमने ऐसा ही अपने बाप-दादा, के मुंह से सुना है। यही चलन है। हमारे बाप-दादा बताते थे। दोनों पहुंचे हुए, खुदा के बंदे थे, दोनों पहुंचे हुए पीर-$फ$कीर थे। दोनों एक-दूसरे को बहुत मानते थे, शाह आलम भी और नरसी भगत भी।’’
‘‘यह कब की बात है?’’ शहरवाली बीबी ने पूछा।
‘‘खुदा $खबर कब की बात है जी, हम तो छुटपन से दोनों का नाम सुनते आ रहे हैं कि किायारत पर आने वाला हर $फर्द उर्स को दीये जलाता है, पहला नरसी भगत के नाम पर, दूसरा शाह आलम के नाम पर।’’ यह कहते हुए शाहिद की मां झट से बताने लगी थी।
‘‘हमारे दादा तो बताया करते थे कि दोनों एक दूसरे का बड़ा एहतराम करते थे। एक दिन नरसी भगत ने शाह आलम से कहा, कि भाई जान, हमारे दिल तो एक तार में बंधे हैं, पर जब हम लोग दुनिया में नहीं रहेंगे तो लोग हमारी मोहब्बत, उन्स को क्यों कर याद करेंगे? इस पर शाह आलम ने कहा- ऐसा हमारे दादा बताते थे- ‘‘नरसी भगत, तुमने ठीक कहा है। आज से, जो खुदा का बंदा मेरे नाम से दीया जलाएगा, वह ईद से पहले तुम्हारे नाम का दीया रोशन करेगा। हमारे और तुम्हारे दोनों के नाम से दीये रोशन करेगा। हमारे और तुम्हारे,दोनों के नाम से दीये जलाए जाएंगे। तब से यही चलन है बहिन जी।’’
इस पर, शहर से आनेवाली बीबी, कलम हाथ में लेकर का$गज पर कुछ लिखती रही थी। ‘‘उर्स के दिन तो किायारत करने वाला हर $फर्द को दीये जलाता है। पास ही में तो नरसी भगत का स्थान भी है। तब यहां लोगों की भीड़ लग जाती है। और दीयों की ऐसी जगमग-जगमग भीड़ होती है कि क्या बताऊं। दीये ही दीये...।’’ शाहिद सुन रहा था और तभी उसके हाथ में कंपकंपी-सी हुई थी मानो उसका हाथ दीया जलाने के लिए मचल उठा हो।
‘‘हमारे दादा तो हर शाम दो दीये दरगाह पर जलाते थे। शाम के साये उतरने लगते तो वह दीये लेकर चल पड़ते। घर से निकलते ही कहते, या अल्लाह! कुल की $खैर, कुल का भला।’’ यह कहते हुए जाते, यही कहते हुए लौटते। शहर से आने वाली बीबी सिर हिलाती हुई मां की बातें सुनती और का$गका पर लिखती जाती।
‘‘अब तो तबाही ही तबाही है, बहन जी’’ शाहिद की मां ने कहा था। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप खड़ी रही थी। शाम के साये उतरने लगे थे, लोग अपनी कोठरियों की ओर जाने लगे थे। शहर से आने वाली बीबी ने तभी यह कहते हुए:
‘‘खुदा तुम्हें और तुम्हारे बेटे को सलामत रखे,’’ एक छोटी-सी गठरी मां के हाथों में दी थी। ‘‘कुछ कपड़े हैं, तुम्हारे काम आएंगे।’’ फिर उसने शाहिद के सिर पर भी हाथ फेरा था और बस्ती का मैदान लांघने लगी थी। वह औरत चली गई तो अपनी कोठरी की ओर लौटते हुए शाहिद मचल कर बोला, ‘‘मां, अबकी बार मैं भी दीया जलाऊंगा।’’ इस बार मां ने शाहिद का नन्हा-सा हाथ अपनी मुट्ठी में दबाते हुए कहा था, ‘‘अल्लाह रहम करे, तुम भी दीया जलाना बेटा’’ और कहते हुए मां की आवाका कांप गई थी। ‘‘मां, मैं भी दो दीये जलाऊंगा। मैं भी कहूंगा कुल की $खैर, कुल का भला।’’
शाहिद को लग रहा था जैसे वह किसी मेले में जाने की तैयारी कर रहा है। और मां ने थकी-सी आवाका में कहा था, ‘‘हां-हां, तुम भी दो दीये जलाना।’’ और शाहिद के सिर पर हाथ फेरती रही थी। ‘‘तुम भी जलाना, मैं भी जलाऊंगा।’’ शाहिद ने बड़ी उत्सुकता से कहा था।
जब शाहिद बार-बार इकाहार करने लगा तो उसकी मां खीझ उठी, ‘‘क्या रट लगाए जा रहा है। ले चलूंगी, जब वक़्त आएगा।’’
उस दिन, अंधेरा उतरने से पहले, कुछ लोग उनकी कोठरी में आ गए थे। शाहिद की मौसी, मौसा जी, नानी मां। मां ने शाहिद से कहा था हि$फाकात के लिए आ गए हैं। पर शाहिद नहीं जानता था, हि$फाकात क्या होती है। वे लोग देर तक धीमे-धीमे बतियाते रहे थे, कभी-कभी शाहिद की मां की आवाका सुनाई पड़ती।
‘‘अल्लाह $खैर करे, कल तक दुकानें खुल जाएंगी’’ मां कह रही थी। ‘‘अमन चैन लौट आएगा।’’ इसी बीच शाहिद गहरी नींद सो गया था।
पर रात के ही किसी पहर में, बाहर की ओर से तरह-तरह की आवाकों सुनाई पडऩे लगी और कोठरी में लोग उठ बैठे थे। कभी उन्हें लगता आवाकों दूर से आ रही हैं कभी लगता कहीं नकादीक से ही आरही है। वातावरण शांत हो जाता, कभी जैसे धडक़नें लगता। कोठरी के अंदर घुप अंधेरा था। कोठरी का दरवाकाा बंद था और टिमटिमाता दीया बुझा दिया गया था। कोठरी की एकमात्र खिडक़ी के पीछे दूर से आती आवाज जान पड़ती, कभी नकादीक से। धीरे-धीरे से आवाकों नन्हें शाहिद की नींद में घुलने मिलने लगीं।
बाहर की आवाजें ऊंची उठने लगी थीं। शाहिद की नींद टूटी जब नानी-मां के मुंह से निकला!
‘‘या अल्लाह, खैर कर।’’
तभी कहीं खटका हुआ था। तभी वह घटना भी घटी थी जो सच्चाई और सपने के बीच झूल रही थी। तभी नन्हें शाहिद को लगने लगा था जैसे उर्स आ गया है। और सभी लोग दीये जलाने की तैयारी में लग गए हैं।
तभी बाहर से भी आवाकों आने लगी थीं। मां ठीक कहती थी सारा शहर नरसी भगत और शाह आलम की दरगाह की ओर जाने लगता है। शाहिद को भी लगा जैसे लोगों के $कदम उन स्थलों की ओर तेकाी से बढ़ रहे हैं। और सभी दीये जलाने जा रहे हैं। मेले का-सा दिन आ पहुंचा है। और उसे लगा जैसे खिडक़ी के बाहर रोशनी फैलने लगी है।
खिडक़ी के पीछे सचमुच रोशनी की लौ दिखाई पडऩे लगी थी। शाहिद उठकर बैठ गया था। उर्स शुरू हो गया था है। लोग दरगाह पर दीये जलाने लगे हैं।
तभी कोठरी में दुबककर बैठे लोगों में से किसी ने हल्के से कोठरी का बंद दरवाकाा थोड़ा सा खोल दिया इस बात का अंदाज लगा पाने के लिए कि रोशनी कहां से आ रही है। जिस पर नन्हें शाहिद की आंखें चौंधिया गई थीं और यह सोचकर कि दीया जलाने का वक़्त निकलता जा रहा है वह खाट पर से उठकर भागता हुआ दरवाजे की ओर चल पड़ा। मां मुझे बुला क्यों नहीं रही है? मां, मैं भी दीया जलाऊंगा, मां कहां है? मां मुझे छोडक़र पहले ही दीया जलाने बाहर चली गई है।
और वह अधखुले दरवाको में से बाहर निकल गया था। पर उसी व$क्त बाहर से आने वाली आवाकों ऊंची उठने लगी थीं, और टूटी-फूटी कोठरियों की इस बस्ती की ओर ललकारती हुई बढ़ती आ रही थीं, जबकि नन्हा शाहिद उर्स में दीया जलाने जा रहा था। 

(वीरो से साभार)