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Tuesday 21 Nov 2017

‘मय्यादास की माड़ी’ का कथाकार

डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी

बी-5, एफ-2, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-15, फोन- 011-22581418

भीष्म साहनी देखने और सुनने में बहुत सीधे-सादे और कभी-कभी तो सपाट भी लगते थे। मैंने कुछ बुद्धिजीवियों के मुंह से यह तक सुना है कि वो बहुत तीव्र बुद्धि के आदमी नहीं थे। लेकिन वही सामान्य बुद्धि है,जो उनको बड़ा रचनाकार बनाती है। उनका जीवन सामान्य व्यक्ति का नहीं था। वो घटना संकुल था। वो केवल लेखक या विचारक का जीवन नहीं, अपने विचारों को सक्रिय रूप देने वाले व्यक्ति का जीवन है।

भीष्म साहनी बहुत पढ़ाकू थे। 1954 में काशी गए थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास रहकर शोध-कार्य करने। मैं उन दिनों विद्यार्थी था। एक दिन उन्होंने मेरे पास ‘लस्ट फार लाइफ’ किताब देखी। बड़ी मशहूर किताब है। इरविन स्टोन की, वॉन गॉग के जीवन पर। वो किताब गंभीर पढ़ाई के लिए  नहीं थी मेरे पास। खरीदी तो मैं नहीं जानता था कि कितनी महत्वपूर्ण पुस्तक है। अपनी किशोर सुलभ उत्सुकता में मैंने उसमें लस्ट शब्द पढ़ा और समझा कि उसमें कुछ इधर-उधर की बातें होंगी। उन्होंने किताब देख करके कहा ये जरूर पढऩा। मैं दो-तीन बार उनके पास गया और मैंने कहा कि मैंने पढऩी अभी शुरू नहीं की है। तीसरी बार या चौथी बार उन्होंने मुझे बहुत डांटा और कहा कि तुम बिना पढ़े मुझसे मिलने मत आना। इस तरह विवश होकर तो किताब मैंने पढऩी शुरू की। मेरा ख्याल है कि दो या तीन दिन बैठकी में मैं वो पूरी किताब पढ़ गया। इतनी अच्छी लगी। उसको पढऩे से मुझे बहुत लाभ हुआ। पता नहीं कितनी चीकाों का। मैंने उसका अनुवाद करने को सोचा। फिर जगत शंखधर ने कहा कि तुम इस चक्कर में मत पड़ो। तुम प्रेमचंद वगैरह पर काम करो। वॉन गॉग पर नहीं कर पाओगे।

बहुत दिनों के बाद एक बार भीष्म जी के साथ मुझे यात्रा करने का अवसर मिला। जबलपुर तक। विवेचना की गोष्ठी में। उस बार कुछ ऐसा हुआ कि हम लोगों को फस्र्ट क्लास में रिजर्वेशन नहीं मिला। हम लोग सेकेंड स्लीपर में गए। और वो सब तो अलग बात है कि वे हमारा भी होलडाल बांध देते थे। इससे पहले कि मैं बांधू वो ही बांधकर तैयार कर देते थे। उस बार यात्रा में उन्होंने मुझसे करीब चार-पांच घंटे तक मार्खेज के उपन्यास ‘वन हन्ड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड’ पर बात की। बड़ी तफ्सील से। बार-बार कहते थे कि तुम ये किताब पढऩा कारूर। पढऩे का आग्रह इस तरह करते थे मानो तुम ये किताब पढ़ लोगे तो उन्हें कोई बड़ा लाभ होगा। जिस आग्रह से लोग, कर्ज देने वाले, अपना पैसा मांगते हैं। सूद सहित। इस आग्रह से वो कहते थे कि ये किताब जरूर पढऩा, कारूर पढऩा। इस किताब का बहुत असर ‘मय्यादास की माड़ी’ पर है। और सिर्फ इसी किताब का नहीं, बहुत पुस्तकों का है। इसीलिए शुरू में मैंने ये निवेदन किया कि ये बहुत पढ़ाकू थे। मुझे ये किताब ‘तमस’ से ज्य़ादा अच्छी लगी।

भीष्म जी से उनके साहित्य पर बात करो तो किसी उल्लास या उत्सुकता से या दत्तचित्त होकर सुन रहे हों, ऐसा नहीं लगता था। लेकिन जब इस किताब की तारीफ उनसे की तो वे बहुत खुश हुए। वो धीरे से मुझसे बोले कि इस किताब पर मार्खेका की किताब का असर है। वो सा$फ-सा$फ दिखलाई भी पड़ता है।

भीष्म साहनी के उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ में नया शिल्प-प्रयोग भी है। यह उपन्यास उस समय लिखा गया जब ये बात बहुत जोरों पर थी कि इतिहास का अन्त हो गया है। देश में संकल्प लिया गया था निरक्षरता का अन्त करने का, साम्प्रदायिकता का अन्त करने का, आर्थिक पराधीनता का अन्त करने का, वर्णाश्रम व्यवस्था, जाति-पांति के भेदभाव का अन्त करने का। उस देश में इतिहास का अन्त कर दिया जाए या यह कहा जाए कि इतिहास का अन्त हो गया है, उस देश में विचारधारा के अंत की बात कर दी जाए, इस तरह की सोच के परिणाम बहुत भयंकर है। इसलिए भयंकर हैं कि अगर इतिहास का अन्त हो जाए तो हम इतिहास नया नहीं बना पाएंगे। वो अपरिवर्तित रहेगा। और अगर हम इतिहास नहीं बनाएंगे तो इसका मतलब यह हुआ कि जो हमारी आर्थिक पराधीनता है, वर्णव्यवस्था का अभिशाप है, जो नारी पराधीनता है, जो बेरोकागारी है,महंगाई है, औरतों को जलाना है, वो सब जस-का-तस बना रहेगा। मगर कोई स्थिति जस-की-तस कभी रहेगी नहीं। अगर हम ये सोच लें कि हमें इतिहास नहीं बनाना है तो हम अधिक पराधीन होंगे। हम जाति-पांति में और ज्य़ादा पड़ेंगे। हमारे यहां महंगाई और ज्य़ादा बढ़ेगी। आज जो कुछ घटित हो रहा है उससे यह बात पुष्ट होती है। उसके दुष्परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं।

इस बीच हिन्दी में इतिहास को ध्यान में रखकर अनेक उपन्यास लिखे गए हैं। ये शुभ है लेकिन ‘मय्यादास की माड़ी’ इतिहास के अंत और इतिहास के प्रारंभ के द्वन्द्व-बिन्दु पर रचा गया है। उन्नीसवीं सदी के पंजाब को जिस ढंग से देखा गया है, जैसा उसे वर्णित किया गया है वो ऐतिहासिक पुनराविष्कार है। दूसरी बात ये है कि आज इतिहास की जो अवधारणा है या यों कहें कि जो समाज वैज्ञानिक दृष्टि है इतिहास को देखने की, उस दृष्टि से इतिहास को पहली बार इस उपन्यास में देखा गया है। उस दृष्टि से ही गहरा संबंध है उस शिल्प का जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है। इस उपन्यास को ध्यान से पढऩे पर अगर आप समझ लेते हैं कि भीष्म साहनी ने उन्नीसवीं शताब्दी के भारत के एक क्षेत्र के इतिहास में पुनराविष्कार किया है, तब आप ठीक अर्थ में ‘मय्यादास की माड़ी’ ही नहीं मार्खेका को भी समझ लेंगे।

भीष्म साहनी की सबसे बड़ी शक्ति है कि वे वर्णन करते समय या चित्र खींचते समय लगभग तटस्थ और निष्पक्ष दर्शक की भांति चित्र खींचते जाते हैं। किसी पात्र की किसी चेष्टा से या किसी स्थिति से लेखक के ऊपर कोई असर नहीं पड़ रहा है। आत्म-लोप की यह क्षमता उन्हें सच के नकादीक पहुंचाती है। अचूक और विश्वसनीय ढंग से मनोविकारों को करुणा में बदल देती है। अपने पात्रों में वे अपने-आप को पूरी तरह ढाल लेते हैं।

‘मय्यादास की माड़ी’ में शुरू में ही बहुत मनोरंजक बहुत कुटिल, लेकिन असहाय लगने वाला एक जटिल चरित्र आता है। पुरोहित। बाभन चरित्र। और उस पात्र के प्रवेश से ही जादुई यथार्थवाद के शिल्प का भी पदार्पण होता है और सामन्ती व्यवस्था में पुरोहित की भूमिका का चित्र खींचता जाता है। माड़ी पर दीवान धनपतराय आराम कुर्सी पर दोनों टांगें ऊपर चढ़ाए बैठे हैं और हाथ में गुडग़ुड़ी उठाए हल्के-हल्के कश ले रहे हैं। चबूतरे के सामने गली में बिरादरी का बूढ़ा पुरोहित दीवान जी की हां में हां मिलाता हुआ। ‘सत वचन, सत वचन महाराज’ कहे जा रहा है। वो प्राय: हर आदमी से यही कहता ‘सत वचन, महाराज, राम भली करेंगे, सत वचन महाराज राम भली करेंगे।’ दीवान धनपत के सामने ये पुरोहित बैठा है। थोड़ी देर में वहां से एक अधेड़ उम्र का आदमी हाथ में पीतल का लोटा उठाए गुजरता है। उस आदमी को गुकारते हुए देखकर पुरोहित दीवान से कहता है- ‘मुनिराम का वक्त आ गया है गरीब नेवाज’ फिर आगे कहता है, ‘उसका धागा इतना ही लम्बा था, बस। महाराज उसका वक्त आ गया है।’ और थोड़ी देर में सचमुच ही मनिराम मर जाता है। अब पाठक के लिए यह एक जादू जैसी बात है, महान आश्चर्य में डाल देने वाली है, कि- वह चापलूस काइयां बुड्ढा ये कैसे जान जाता है कि वो मरने वाला है। होता है ये कि मनिराम ने माथे पर नहाकर चंदन लगाया था। वो एक घंटे तक सूखा नहीं था। यानी शरीर में उसके ताप ही नहीं रह गया था। जब तक वो लोटा पकड़े था, तब तक लोटे का ताप उसके शरीर में प्रवेश कर रहा था। लोटा उसने रखा, और शरीर में कोई ताप नहीं रह गया और वो मर गया।

और अब आप ये देखते हैं कि वह छोटी-सी घटना जादू का असर पैदा करती है। यह जादुई जादू नहीं है। ‘जादुई यथार्थ’ का मतलब हुआ कि वो जादू जैसा है? जादू नहीं है वो। जादुई यथार्थ है। यथार्थ को ही प्रकट करता है। स्थितियों को, भौतिक नियमों को, न जानने के कारण हम उसे अंधविश्वास या जादू या पारलौकिक या अलौकिक समझते हैं। जो सामान्य जनता है, जो निरक्षर या अंधविश्वासी जनता है जो किसी घटना को किसी ढंग से देखती है। उस ढंग के बयान में जादुई यथार्थवाद का शिल्प है।

इस उपन्यास में जो $गलत-से-$गलत काम हैं, नीचे-से-नीच काम है, वो या तो दीवान धनपत करता है या ये पुरोहित करता है। दीवान का जो बड़ा लडक़ा है कल्ला, उससे एक बारह-तेरह साल की लडक़ी की शादी कराने का पूरा षड्यंत्र ये पुरोहित करता है। इस पुरोहित के चलने का, उठने का, बैठने का, उसका जीवन, आंखों के सामने ला खड़ा करने का काम भीष्म साहनी ने जितने कुशल ढंग से किया वो अद्भुत है। वो उनकी क्षमता का परिचायक है। पूरे उपन्यास में ये पुरोहित कहीं भी न गुस्से में आता है, न विक्षुब्ध होता है, न किसी पर नाराज होता है। ठेठ $कस्बे का खुशामदी, चापलूस मंगता ब्राह्मण है।

इसी तरह से दूसरे पात्र। जो पात्र सफल हैं और अपनी मनचाही कर लेते हैं सब-के-सब मनोविकारों से शून्य हैं। माड़ी का मालिक दीवान धनपत है। अपने चरित्र और मनोविकारों को छिपाने में बिल्कुल पुरोहित जैसा ही दिखता है। उसको भी आप चाहे जितना अपमानित कर लें, वो अपमानित नहीं होता, किसी की परवाह ही नहीं करता। किसी के सामने अपनी पगड़ी रख देने में उसे झिझक नहीं। किसी की खुशामद करने के लिए अपना काम बनाने के लिए। वो किसी मूल्य की चिंता नहीं करता। रामचंद्र शुक्ल का कथन है कि लोभियो। तुम धन्य हो, तुम्हें धिक्कार है। दीवान धनपत एक छोटे से टट्टू पर चलता है। एक बड़ी भारी पगड़ी बांधता है और जिस तरीके से पुरोहित का लडक़े मकाा$क उड़ाते हैं, उसी तरीके से पूरा $कस्बा मकााक मजाक उड़ाता है। लेकिन वो कभी विक्षुब्ध नहीं होता उसका उद्दे्श्य है, माड़ी पर अधिकार जमाना। उसको अपनी निगाह में रखता है। और ठीक उस समय जब खालसा $फौज हार रही होती है जाकर अंग्रेजों से मिल जाता है। और जब अंग्रेज $काबिज हो जाते हैं भारत के उस हिस्से पर, तो अंग्रेज, उसको जागीर ब़ख्श देते हैं। और जागीर पाकर एकदम से वो बदल जाता है।

और फिर आता तो उसी टट्टू पर सवार होकर के, लेकिन तब उसकी पगड़ी और बड़ी हो जाती है। उसकी बोलचाल का ढंग बदल जाता है। उसकी आवाका बदल जाती है। उसकी चाल बदल जाती है। जो दब्बा था। जो सबसे डरता था। जो अपने मान-अपमान से परे था, एकदम से रोबीला बन जाता है। दबंग बन जाता है। और क्रूर, अत्याचारी और पहले दर्को का स्वार्थी तो वो पहले से ही था।

उपन्यास में, एक और बात है। समाज को या मामूली लोगों को हम लोग बहुत बड़ी मूल्यवत्ता से जोड़ते हैं। हम लोग ये समझते हैं कि ज्य़ादातर लोग अच्छे-बुरे में $फर्क कर लेते हैं। भीष्म साहनी के इस उपन्यास में जो लोग हैं, वे किसी घटना पर दोनों तरह से बात करते हैं। ज्य़ादातर लोग ऐसे होते हैं जो विजयी हो गया है जो सफल हो गया है, उसकी तर$फदारी करते हैं। अगर आप ये मान करके चलें कि नहीं, जनता तो सब कुछ देखती है, ऐसा कुछ नहीं है। दीवान धनपत स्वार्थी और क्रूर है। लेकिन वो कहते हैं, वो अड़ा तो  रहा, भई देखो उसने इतने पैसे तो उसे दे दिये। भई बड़ा बुद्धिमान आदमी है। बड़ा चालाक आदमी है।

खालसा की $फौज हार जाती है। अंग्रेज आ जाते हैं, जुल्म करते हैं। लेकिन सामान्य लोग जो बातचीत करते हैं, कहते हैं कि अंग्रेजों का इकबाल है। उनके आगे कौन ठहर सकता है। और ऐसे बहुत गीत बनते हैं, जिनमें अंग्रेजों की बड़ी तारीफ की जाती है। अंग्रेज बहादुर ने रेल की गाड़ी  चलाई। जो सफल है उसकी जय-जयकार होने लगती है।

बेशक कुछ अलग किस्म के भी पात्र हैं। लेखराज है। या भागसुिद्ध है। मामूली पात्र। किसी विचारधारा से प्रेरित नहीं। किसी से प्रेरणा पाई नहीं। उसी रुढिग़्रस्त समाज के ही घटक हैं। हमारे समाज में परम्परा से, जैसे अवसरवादिता पल रही हैं। वैसे ही मानवीयता, त्याग और बलिदान की भावना भी पल रही है। भागसुद्धि विधवा है। असहाय है। लेकिन वो जब देखती है कि गड़बड़ हो रही है तो तन के खड़ी हो जाती है। और उसका कोई कुछ बिगाड़ ही नहीं सकता। वो पहले से ही इतनी असहाय है। विवश है। इसके पास कुछ है नहीं। वो बिल्कुल सर्वहारा के समान है। उसका कोई कुछ छीन ही नहीं सकता है। $कस्बे के लोग इतना मान रखते हैं कि बुड्ढी को मारना नहीं चाहिए। वो जो कुछ मन में आता है बक देती है। इतिहास की ये एक अजीब स्थिति है। अवसरवादियों पर भी परम्परा का एक ऐसा प्रभाव होता है कि वे बुराई से बच जाते हैं। भीष्म साहनी के यहां इतिहास का शुभाशुभ कुछ नहीं है। मंगल-अमंगल कुछ नहीं। जो बुरा है, चाहे जितना सफल उसका भी अंत है। दीवान धनपत बेहद काइयां हो लेकिन काल के साथ, समय के साथ उसकी कुटिलता, उसकी जो स्वार्थपरता है वो उसकी संतान में भी आ रही है। उसकी संतान, उसी के विरुद्ध आकर के खड़ी होती है। उसे अपमानित करती है। तिरस्कृत करती है। तो ये जो काल है, वो अपने-आप में, एक ऐसी शक्ति है, जो सि$र्फ कमजोर के लिए ही त्रास देने वाली नहीं है। वो जो बुरे हैं या अमानवीय हैं, उसके लिए भी सन्त्रासकारी है। जो कमजोर और ता$कतवर हैं, दोनों ही उसके सामने, लगभग असहाय हैं। काल के सामने-आए हैं जो जाएंगे राजा रंक फकीर।

उपन्यास में इतिहास की इस यात्रा में एक विकलांग पात्र भी है। असहाय हैं, लेकिन देशभक्त है। वह मानसिक रूप से अपरिपक्व है। ऐसे पात्रों का हिन्दी साहित्य में शायद ही किसी और ने इतना अच्छा चित्रण किया हो।

उस उपन्यास में कम-से-कम तीन पात्र अविस्मरणीय हैं। एक तो, कल्ला जो दीवान धनपत का अविकसित मस्तिष्क वाला पुत्र है। दूसरा, जिस लडक़ी से उसकी शादी होती है और तीसरा पात्र है लेखराज। ये पात्र बहुत देर के लिए नहीं आते उपन्यास में। बहुत कम आते हैं। लेकिन अपने कम से कम में ही ये जैसे पूरे उपन्यास या इतिहास की अमानवीयता को तोड़ देते हैं।

इस उपन्यास का सबसे ईमानदार वीरनायकोचित अगर कोई चरित्र है तो लेखराज है जो आजीवन अपनी भावनाओं के अनुसार काम करता है। अपनी उदात्त भावनाओं के अनुसार संघर्ष करता है। वो अपनी दादी-मां से गुरु की कहानी सुनता है। गुरु गोविन्द सिंह की। किस तरह से पंजपियारे आये सुनकर के उद्वेलित और रोमांचित होता है। कहानी के आधार पर एक कल्पनालोक रचता है। उसमें वह स्वयं को स्थापित करता है। उसी कल्पनालोक का वासी हो जाता है। वही कल्पनालोक उसका यथार्थ हो जाता है। सांसारिक जीवन उसके लिए बेमानी हो जाता है।

भीष्म साहनी की कथा कितनी बड़ी और कितनी सार्थक फैंटेसी बुनती है। पूरी कहानी हमारे समय को कितना समझाती है। बात यहीं तक नहीं है। मैयादास थे, जिनके नाम की माड़ी थी। उसके संस्थापक थे। उन्होंने रेल को अस्वीकार कर दिया था। उस पर नहीं चढ़ते थे। राजा अमीरचन्द्र के सबसे बड़े समर्थक थे। दीवान धनपत को गाड़ी से निकलवाकर बाहर कर दिया था। रेल के ड्राइवर की हुजूर-हुजूर कहकर खुशामद करते हैं। समझ लेते हैं कि अंग्रेजों की खुशामद करके ही जीवित रह सकते हैं। सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। कोई और चारा नहीं है। वो दीवान धनपत को देखते हैं कि सारे नैतिक मूल्यों को, सारे मानव संबंधों को, सारी मर्यादा को तिलांजलि देकर आदमी कितना सम्मान पा सकता है। तो अगर सम्मान पाने का यही रास्ता है कि अपने सम्मान को अंग्रेजों के जूतों के नीचे रखा जाए तो हम नीचे कर लें। लेकिन जब वो करने जाते हैं तो विडम्बना देखिए कि उनका और अपमान होता है। जो भी अंग्रेज हो, चाहे ड्राइवर हो, चाहे जो कुछ हो, उसे बड़ा अफसर मानने लगते हैं। जनता के बीच रही-सही प्रतिष्ठा भी समाप्त हो जाती है। खालसा $फौज के हार जाने के बाद नई अमलदारी वजूद में आती है। नई अमलदारी इस उपन्यास में अंग्रेकाी शासन का प्रतीक शब्द है।

नई अमलदारी 19वीं सदी की घटना के रूप में पाठकों के सामने नहीं आती। बल्कि आजकल जो हो रहा है उसके अनेक दृश्यों के रूप में आती है। उसी का नैरन्तर्य है। इसको और स्पष्ट करने के लिए किताब में एक प्रकरण है। इंडिया हाउस का। सदस्यों की बहस होती है। आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। अंग्रेज कहते हैं कि हम भारत का उद्धार कर रहे हैं। यह हमारा नैतिक कर्तव्य है। हम तो त्याग और बलिदान करने जा रहे हैं। हम तो उनको सभ्य और सुसंस्कृत बनाने जा रहे हैं। उनका लाभ पहुंचाने जा रहे हैं। हम जनतंत्र वहां लाने जा रहे हैं। इस तरह भारत में जनतंत्र लाया गया है। जैसे बुश इराक में जनतंत्र ले आया। और सवाल किए जाते हैं तो पता ये चलता है कि जो रेल-लाइन बिछाई जाएगी, उसके लिए यहीं के लोग पैसा देंगे। लेकिन दिखाया जाएगा कि जैसे भारत कर्ज ले रहा है। और बाद में उतारा जाएगा। पता लगता है कि पता नहीं कितने जुलाहों के अंगूठे काटे गए हैं, इस देश में अपने माल की खपत के लिए। पूरी तरह से आंकड़े इस तरह पेश किए जाते हैं, मानो हमारे देश को वो लाभ पहुंचा रहे हैं। लेकिन उनकी जो पूरी मंशा है, वो शोषण करना है। कितने क्रूर, कितने अमानवीय हैं वे, यह उनकी बहसबाजी, में मालूम होता है। एक व्यक्ति है उस सभा में जो बुद्धिजीवी है। अध्यापक है। उसके एक भी सवाल का जवाब ठीक से नहीं दिया जाता। वो ऐसे सवाल करता है कि उनका जो पूरा पाखंड है वो सा$फ हो जाता है। सबके सामने आ जाता है। हालांकि लोग उसे पगलेट कहते हैं, गद्दार कहते हैं। लेखक ने कितनी जानकारी हासिल की होगी। कितनी मेहनत की होगी। और उन तथ्यों के आधार पर उसने इस उपन्यास का कथानक रचा होगा।

जैसा कि मैंने शुरू में कहा था इसका शिल्प कहीं-कहीं मार्खेका के उपन्यास से मिलता-जुलता है। कहने का ढंग मिलता है। जैसे कोई कथा कहते-कहते बीच में छोड़ दी जाए। फिर बहुत दिनों के बाद वो कथा याद आएगी। लेकिन अजीब बात है कि जादुई यथार्थ का ये शिल्प हमारे मध्यकालीन रोमांचक आख्यानों से बहुत मिलता-जुलता है। इस पर ध्यान लोगों का कम गया है। मध्यकालीन रोमांचक आख्यानों के मर्मज्ञ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘चारुचन्द्रलेख’ को देखें। ‘चारुचन्द्रलेख’ में कई ऐसे वर्णन हैं। तंत्र-मंत्र के, नाथ-सिद्धों के, आकाश में उडऩे के। कितनी ही अजूबा-सी चीकों सामने आती हैं। बिल्कुल रोमांचक आख्यान के तरीके में लिखा उपन्यास है। लेकिन इस उपन्यास में कई ऐसे वर्णन हैं जो मार्खेज के वर्णनों से मिलते-जुलते हैं। ‘मय्यादास की माड़ी’ का घटनाक्रम इतिहास के मध्यकाल और आज के भारत की संधि है।

 जो मानव जीवन है, जिसकी एक ऐतिहासिक नियति है, जिसमें मनुष्य की जिजीविषा भी सक्रिय रहती है, वो कभी कमकाोर पड़ती है, कभी नहीं पड़ती है। उसकी एक निरन्तरता है। जिस तरीके से खालसा $फौज में सालार ने विश्वासघात किया, फिर हमारे स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं ने किया, जिस तरीके से पूंजीवाद साम्राज्यवाद ने अपनी जीवन-प्रक्रिया शुरू की वो प्रक्रिया आज भी दिखाई पड़ रही है। उपन्यास इस प्रक्रिया को दिखाता है। लेकिन इतिहास में अमानवीयता के प्रतिरोध की भी एक निरन्तरता है, उपन्यास इसे भी दर्का करता है। जैसे- खालसा $फौज ने प्रतिरोध किया $कस्बे में भागसुद्धि ने किया। रुक्मिणी और कल्ला ने किया। वानाप्रस्थी ने किया। विश्वासघात और उसके मानवीय प्रतिरोध की इस निरन्तरता को यह उपन्यास इतिहास में व्यक्त मानव जीवन के चित्रण के जरिए प्रस्तुत करता है, यह उसकी उपलब्धि है।  

(किताब गंगा स्नान करने चलोगे से साभार)