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Tuesday 21 Nov 2017

मुआवजे की प्रासंगिकता

डॉ. वंदना शर्मा

03, अधिकार भवन

शर्मा कंपाउंड, ओल्ड नगरदास रोड, अँधेरी (पूर्व),मुंबई-400069

मो. 9323961047

भीष्म साहनी गहरे मानवीय सरोकारों और संवेदनाओं के रचनाकार हैं। उनका समूचा रचनाकर्म मनुष्यता में आस्था की परिभाषा है। भीष्म साहनी के कुल छह नाटक हैं। वैसे तो हर नाटक में समय, समाज और परिवेश का द्वंद्व मुखरित है लेकिन मैं यहाँ वर्तमानकालीन संदर्भों में मुआवजे की विवेचना करना चाहती हूँ क्योंकि मुआवजे कई अर्थों में अन्य नाटकों से भिन्न है। मुआवजे मात्र एक नाटक नहीं, प्रहसन नहीं, एक सामाजिक विडम्बना है जिसमें संदेह का लाभ किसी को नहीं, इस विडम्बना में सब शामिल हैं। दंगा और मुआवजा इन दो पाटों के बीच हर कोई पिस रहा है या पीसा जा रहा है। उस पर मुगालता ये कि दोहन हमारा नहीं, हम परिस्थितियों का दोहन कर रहे हैं। नाटक व्यंग्यपूर्ण शैली में लिखा गया है, जिसमें हास्य लाउड नहीं है, व्यंग्य को उभारने के लिए मात्र पूरक है।  इसे हम आजाद भारत के राजनैतिक परिदृश्य पर कटाक्ष कह लें अथवा सामाजिक समस्याओं और विसंगतियों के कारणों की ओर संकेत, दोनों ही स्थितियों में मुआवजे एक आईना है जिसमें समसामायिक राजनीति और समाज के बिम्ब-प्रतिबिम्ब  भाव है।

 कथा इतनी सी है- सांप्रदायिक दंगा भडक़ने की संभावना है और नेता, पुलिस, सेठ, फैक्ट्री मालिक, व्यवस्था, गुंडा-ताकतें और सामान्य नागरिक उससे निपटने की तैयारी में भिन्न-भिन्न योजनाओं को अमली जामा पहनाने में तत्पर हैं। कथ्य में विडम्बना आरंभ से ही आकार ले लेती हैं, दंगा प्रायोजित है इसलिए तैयारियाँ भी पूर्व नियोजित हैं। मनुष्य निर्मित समस्याओं की प्रायोजित पूर्व तैयारी है ताकि दंगों से फैलने वाले तनाव और अव्यवस्था का भरपूर लाभ उठाया जा सके। प्रहसन बार-बार परसाईं की कहानी भोलाराम का जीव की याद दिलाता है। वहाँ व्यंग्य का पुट अधिक है, लेकिन यहाँ यथार्थ सीधे उपस्थित है। दंगों का आयोजन अति यथार्थ में रूपांतरित होता है। अति यथार्थ की इस व्यंजना में परिस्थितियाँ जटिल नहीं है संश्लिष्ट हैं, चेहरे गड्ड मड्ड हैं, समाज का हर तबका दंगे जैसे महत आयोजन के लिए तत्पर है। दंगों के आयोजन में परफेक्शन देखने लायक है। एक त्रुटिहीन आयोजन, कमिश्नर की हिदायतें- जख्मियों को ऊपरवाली मंजिल पर, बड़े कमरे में रखा जायेगा। तीनों स्कूलों के हॉल कमरे फ़ौरन खाली करवा लिए जाएं। एक-एक बड़े कमरे में सौ-सौ जख्मी रखे जाएंगे। बरामदों में एक ही लम्बी लाइन में निचली मंजि़ल पर कार्यालय होगा। एक-एक कैम्प में पांच-पांच नर्सें तीन-तीन कम्पाउन्डर। इलाज का सारा प्रबंध सोमवार तक पूरा हो जाए। हाँ अगर हालात इसी तरह बिगड़ते गये तो सोमवार तक दंगा हो जाना चाहिए (पृष्ठ 11)

अतियथार्थ की अन्य मार्मिक व्यंजनाएँ- दरवेश की पोशाक में सुधरे का गाना-बजाना और दुकानदार के साथ संवाद- भट्टी जलेगी। खूब भुनाई होगी।

 तैयारियाँ जोरों पर है, होली मचेगी।

कपड़े की दुकानें खुली रहे कफऩों के लिए, किरासिन की दुकान खुली रहे आग लगाने के लिए, लकडिय़ों के टाल खुले रहें अगले जहान पहुँचाने के लिए (पृष्ठ 25)

 आदमी मारा जाए, उसकी गर्म-गर्म लाश हाकिमों के पास लेकर जाओ, पैसे झट से वसूल कर लो, मुख्य बात यह है, लाश आपके पास होनी चाहिए (पृष्ठ 52)

कमिश्नर का उत्साह-  अब ज्यों ही दंगे शुरू होंगे, हम एक-एक मरने वाले का नाम कम्प्यूटर में भरते जायेंगे। मैं अगली बार तुम्हें वह मशीन भी दिखाऊँगा। बटन दबाओ तो झट से मरनेवाले का नाम सामने आ जाएगा। नाम, उम्र, पता, कैसे मरा, हिन्दू या मुसलमान, सब बातें दर्ज होंगी। कमाल है या नहीं? फिर से ताली बजाओ (पृष्ठ 82)

अब जब भी दंगा होगा, खड़ाक से मशीन चालू हो जाएगी। हर लाश की छाती पर नाम, पिता का नाम नंबर, सब लिखा होगा और सरकारी मोहर लगी होगी। अगर तुम्हारा कोई चच्चा, ताऊ, फूफा, मौसा या कोई भी रिश्तेदार मारा जाए, बस लाश पहचानो और मुआवजा ले लो (पृष्ठ संख्या 82)

 अतियथार्थ दिखने वाली ये कठोर  व्यंजनाएँ  नाटक  के अंत तक  यथार्थ  में बदल  जाती हैं। जो  आज  के  यथार्थ के सामने कहीं से अतिरंजित, असंभव अथवा अकल्पनीय नहीं लगती और यही विडम्बना  है।  इसलिए  अतियथार्थ के  कथ्य और शिल्प में लिखा ये नाटक प्रहसन अथवा नाट्य विधा से निकलकर, सामाजिक  विडम्बना  का फॉर्म  धारण कर लेता है। मंत्री के बयान पूर्व लिखित हैं, विरासत में मिले हैं। लेखक हैं सक्सेना साहब। तीन अवसरों के लिए तीन बयान। एक दंगों के असर फैलने पर, जो कि जज्बाती तकरीर के तौर पर पेश होगा, दूसरा दंगा  भडक़ने पर, यह महत्वपूर्ण बयान है क्योंकि इसमें मुआवजे का विशेष तौर पर उल्लेख होगा। हर मरनेवाले के पीछे दस हजार, हर जख्मी को तीन सौ रुपये। तीसरा बयान जनतंत्रात्मक मूल्यों, मान्यताओं और ऊँचे भारतीय आदर्शों के बारे में होगा।

 बयानों के इस प्रसंग में भीष्म साहनी लेखक और पत्रकार की सुनिश्चित भूमिका का तटस्थ और व्यंग्यात्मक लहजे में पर्दाफाश करते हैं। सक्सेना और मिनिस्टर का लंबा संवाद इस भूमिका को परत दर परत उघाड़ता है।  बयान लेखक  सक्सेना का वैशिष्ट्य है कि वह पक्ष-प्रतिपक्ष दोनों के लिए बयान लिखता है। इससे तर्कसंगतता बनी रहती है जिसके एवज में उसे चेक मिलते रहते हैं। भाषा की राजनीति और राजनीति की भाषा दोनों का अद्भुत उद्घाटन लेखक ने इस प्रसंग में किया है। मंत्री की गरिमा, लीडर की पोजीशन भाषण के संदर्भ-प्रसंग, पक्ष की तकरीर विपक्ष की टीका टिप्पणी और आलोचना सब एक साथ साधे हैं। तुर्रा यह है कि हर बार लिखने का कष्ट भी नहीं। थोड़े से आँकड़ों और शब्दों के हेरफेर से काम चल जाता है। सचमुच राजनीति का चरित्र वही है। नये नाम, चोगे और चेहरे बदलकर प्रगट होती रहती है। चेहरा एक मुखौटे अनेक, भाषा विचारधारा और राजनीति की यह असलियत अभी 2014 के दिल्ली और आम चुनावों में आपको नहीं दिखी? एक ही राजनीति के दो धड़े, दोनों ही ईमानदारी की गीतानुमा कसम खाते, टी वी चैनलों को बेचते और स्वयं बिकते रहे। राजनीति एक नया व्यवसाय बिना लागत लगाये नाम, पैसा, पद , रुतबा सब कुछ हासिल बिना किसी योग्यता की दरकार के। इसलिए एक घोड़े का मरना सांप्रदायिक दंगों का कारण बन सकता है। बस घोड़ा किसका है मालूम होना चाहिए अथवा घोड़े को मारा किसने, हिन्दू अथवा मुसलमान ने? उभर रहा है आज का राजनैतिक परिदृश्य। दिल्ली में एक राजनैतिक पार्टी का जलसा और पीछे पृष्ठभूमि में पेड़ से लटकी किसान की लाश। अभी तो तय होना बाकी ही है कि वह हादसा था, हकीकत या प्रायोजित उपक्रम? एक पत्रकार से नेता बने आम आदमी के खास प्रतिनिधि ने अपने आँसुओं से टीवी चैनल के स्क्रीन और सोशल मीडिया की दीवारें ऐसी भिगोई थी पूरी की पूरी सच्चाई कहाँ बह गयी पता ही नहीं। मीडिया में हाशिए पर सरककर खबर और मौत दोनों इतने बेमानी हो गए कि जिसकी शबेरात चर्चा थी उसका नामोंनिशा मिट गया।

 हिन्दू-मुसलमान, पत्रकार, लेखक, नीति, दंगा, मंत्री, संतरी, अर्दली, हुकूमत, सरकारी मुलाजिम, जुलूस, असेम्बली, गुंडा, मीटिंग, खिदमत, बेटी, पत्नी, जनप्रतिनिधि, रिश्वत, क़त्ल, लाश, जख्म और मुआवजा के अर्थ अभिधा में नहीं पढ़े जा सकते। वे न जाने कितने प्रतीकार्थों, निहितार्थों और फलितार्थों के संवाहक बन गए हैं। हर शब्द का एक भिन्न-अर्थ है, जो जिसके लिए पूरक हो। इसीलिए दंगों की पृष्ठभूमि में करीम बक्श (मुस्लिम) और सेठजी (हिन्दू) झुग्गी-झोपड़ी की जमीन खाली करवाने के लिए संगठित हो रहे हैं।

  मिनिस्टर के बयानों में हेर-फेर तफ़्सीली, गलती हो जाने से बात बिगड़ गयी। अपनी मदद से सत्ता चलानेवाले के दांव  को जग्गा ने गुंडई और चतुराई से बदल दिया। सत्ता का तख्त पलट कर स्वयं सत्ता की डोर थाम ली और लूटे हुए मुआवजे को बाँटकर बन गया एक नया विचार, एक नई सत्ता और एक  नई राजनीतिक पार्टी। अवसरवादियों ने कानों में गहरे सुन रख था समय चंूकि पुनि का पछताने, तो बिना विलम्ब के जग्गा उफऱ् चौधरी जगन्नाथ का हाथ थाम लिया जो व्यवस्था गुंडों के सहारे अपना उल्लू सीधा कर रही थी गुंडों ने स्वयं अपनी व्यवस्था बना ली उसे लोकतंत्र की चादर पहना दी। सत्ता पलट जिसमें न कोई शत्रु न कोई पक्ष-प्रतिपक्ष। सेठ जग्गा, गुमाश्ता सबकी भागीदारी। जग्गा बड़े अप्रत्याशित रूप से  राजनीतिक परिदृश्य में प्रवेश करता है जिसका एक ही मकसद असेम्बली पहुँचना है। क्या इसी का नाम है लोकतंत्र? हर प्रदेश में चुनाव के टिकट बँटवारे में उम्मीदवारों की फेरहिस्तों में क्या हम इन सम्मानित असामाजिक तत्वों के नाम आसानी से नहीं पढ़ सकते? जिनके परिणामों पर नोटा का असर भी नहीं पड़ता। मशीनों को आप कितना भी पारदर्शी बना लें, चलती तो वे जमीनी हकीकत के इशारों पर ही हंै। दंगों की बिसात पर राजनैतिक सल्तनतें बनती है जो गुंडा तत्वों की सांठ-गाँठ से चलती है। इसी का नाम सरकार है। जिसमें सब अधिकारी हैं.. अधिकारी कमिश्नर, अधिकारी कांस्टेबल, अधिकारी क्लर्क, अधिकारी चपरासी।

समाज और आम आदमी यहाँ न शोषित है न अभिशप्त। उसकी जरूरतें हैं और उन्हें पूरा करने के लिए उसने थोड़ी चतुराई, थोड़ा सयानापन जुटा लिया है। उसकी जरूरतें तुच्छ हैं, मकान खाली कराना है, पत्नी को नौकरी दिलाना है, बेटी ब्याहना है, घर खर्च चलाना है, दंगों के जुलूस में जनप्रतिनिधि बनकर कमिश्नर से हाथ मिलाना है, छुटभैया नेता बनना है। सो कोऊ नृप होय हमें का हानि? मिनिस्टर जग्गा हो या कोई और  क्या फर्क पड़ता है।

इस नाटक में समाज नाम का ये  फैक्टर बिल्कुल नये रूप में हैं।  अपने असली और नंगे रूप में जहाँ बुराइयों का सारा ठीकरा दूसरों के सिर फोडक़र वह निरीह प्राणी होने का भ्रम अधिक देर नहीं रख सकता। 

व्यवस्था और समाज के स्वार्थ केंद्रित रिश्तों ने दुराचार और बेईमानी को नये सत्ता तंत्र का आधार स्तम्भ बना दिया हैं। घोर संवेदनहीन होते चले जा रहे समाज की ओर नाटक इंगित करता है जहाँ स्वयं समाज का ईमान है, बेईमानी। लेखक सत्ता में बल का केन्द्रीकरण नहीं देख रहा है वह तो समस्या में गहरे जाकर उस मानसिकता की ओर संकेत करता है जहाँ समाज मूर्त रूप में केन्दीकृत हो गया है, स्वार्थ  में।

 दंगो में सबकी साझेदारी  है। ये समय टीवी पर रामायण धारावाहिक के प्रसारण का है। समस्त समाज टीवी के आगे नतमस्तक, सडक़ें सुनसान, समाज मूच्र्छावस्था में। होश में आते ही अपनी दुनिया में लौट जाता हैं। जहाँ संबंधों का गणित, पैसा है। व्यावहारिकता का अर्थ स्वार्थ सिद्धि और ताकत का अर्थ सत्ता जो पूंजी और भ्रष्टाचार की रेत-मिट्टी से बनी है। आदर्श  मनोरंजन का विषय और जीवन जीने का आधार। यथार्थ और मनुष्य की पहचान उसका मजहब।

समाज को तात्कालिक लाभ चाहिए मसलन दंगों ने हीरे की जान ले ली लेकिन मुआवजे ने उसकी बेटी का भविष्य बना दिया। एक मनुष्य के विनाश से दूसरे का विकास। दंगा एक  अवसर है, सुविधा है, भलाई का मौका है। मुआवजा  प्राप्ति  है और उनके लिए गर्म-गर्म लाशों की दरकार है। जिनके लिए ताज़े-ताज़े क़त्ल चाहिए। सब मनुष्यता के सौदागर हैं।

लेखक पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए भाषण लिखता है। दुकानदार हिन्दू-मुसलमान दोनों को हथियार बेचता है। क्योंकि उनका ईमान धंधा है, और मकसद मुनाफा।  कुल मिलाकर दंगों के इस हमाम में सब नंगे हैं, मिनिस्टर, सक्सेना, सेठ, दुकानदार, संतरी, कमिश्नर, गुमाश्ता, जग्गा, दीनू मंगलू, शांति, पूरा समाज।

बिना किसी पौराणिक पात्रों, घटनाओं अथवा मिथकों के  जीवन के यथार्थ के साथ सीधी मुठभेड़  है मुआवजे नाटक। आदर्शवाद की काल्पनिक आस्थाओं से मुक्त है। यह रचना यथार्थ की कँटीली बाड़ के बीच उगी है।  भीष्म साहनी आस्थाओं के दिवा कुसुम नहीं खिलाते। घोर असंवेदहीन समय की खुरदुरी जमीन का स्पर्श कराते हैं पाठकों को। इन सबके बीच सुथरा अवश्य उपस्थित  है जो परिस्थितियों  की घालमेल में एक ठोस पारदर्शी दृष्टि बिंदु बनकर  असलियत सामने रखता चलता है। इक्कीसवीं सदी के समाज में बकरा और कसाई के शब्द-युग्म में समय और समाज के द्वंद्व को दिखाता है, जो आज और अधिक प्रासंगिक  है। सुथरा पुराना रहकर बलि का बकरा बनना नहीं चाहता वह नये ज़माने का कसाई बनना चाहता है। इक्कीसवीं  सदी में पुराने ज़माने की मान्यताएं आउट डेटेड हैं और उनके साथ कोई इंसान बनकर कैसे रह सकता है?  यहाँ सफलता दूसरों की छाती पर पैर रखकर पानी पड़ती हैं। पैसे इस नये ज़माने की ताकत है, और हेरा फेरी हुनर। इक्कीसवीं सदी में पदार्पण का प्रवेश मंत्र है। धड़ाधड़ लाश और छन छन पैसे। सुथरा के संवादों को लेखकीय टिप्पणी के रूप में अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। कमिश्नर, व्यवस्था अब  जग्गा उर्फ  जगन्नाथ चौधरी की सुरक्षा में तैनात है। उनकी अपनी  ड्यूटी प्रायोजित है कुछ खुद के हक़ में कुछ व्यवस्था के हक़ में।

सुथरा के गाने के रूप में लेखकीय मंतव्य के साथ नाटक का पटाक्षेप होता है - मैं कोई झूठ बोलिया

मैं कोई कुफर तोलिया

कोय ना, भाई कोय ना भाई कोय ना

अतियथार्थ यथार्थ को उद्घाटित कर देता है, आज का यथार्थ, किसानों को मुआवजा, भूकम्प पीडि़तों को मुआवजा, ट्रेन हादसे में मारे गये लोगों के परिजनों को  मुआवजा.. क्या उन तक पहुँचता है जो सही हक़दार हैं? निन्यानवे प्रतिशत तो नहीं। वरना गोधरा, मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक ताकतें सम्मानित नहीं हो रही होती। अब तो हर छोटा बड़ा चुनाव ही सांप्रदायिक दंगे की आशंका का चेहरा लिए खड़ा है। जिसका एलान होते ही इतिहास से कब्रें उखड़-उखडक़र बोलने लगती है। राजनीति दर्शन से विचारधारा बनी, फिर पार्टी, वोट बैंक और अब कॉर्पोरेट हाउसों की दलाल।

भाईवाली, ताजा गर्म लाशें, चाकू-छुरा, बंदूके, जग्गा (गुंडे), रजिस्टर में दर्ज जख्मियों और मृतकों की संख्या, नाम, मीडिया की वीभत्स  क्लिपिंग्स, झूठी नियत के साथ उच्चारित सच कुल मिलाकर आज की राजनीति का परिदृश्य खड़ा नहीं कर रहा है ? जिसे पढक़र समझकर आज के वस्तुमान जगत में प्रत्यक्ष देखकर विक्षोभ के साथ पाठक के मुख से एक ही ध्वनि निकलती है- वाह रे लोकतंत्र ।