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Tuesday 21 Nov 2017

प्रगतिशील लेखक संघ एवं जननाट्य संघ के मंच पर भीष्म जी

 

डॉ. व्रजकुमार पांडेय

समता कालोनी, हाजीपुर, वैशाली

मो. 9934982306

भारत में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का इतिहास लम्बी यात्रा का परिणाम है। इसमें विभिन्न वर्गों का सम्मिलित होना इस संघर्ष के चरित्र की एक अपनी अलग विशेषता रही है। देश में किसानों-मजदूरों की समस्याएँ अंग्रेजी राज में घनीभूत हो रही थीं। उन पर दोहरी मार पड़ रही थी। शोषणों के शिकार किसानों और मजदूरों ने अपने हक-हकूक की हिफाजत के लिए किसान सभा और ट्रेड यूनियनें बनाईं। भारत में कम्युनिस्टों ने आजादी की लड़ाई को किसानों और मजदूरों की लड़ाई से जोड़ दिया और इस कारण आजादी की लड़ाई का फलक बहुत व्यापक हो गया। भारतीय मुक्ति संग्राम के दौरान भारतीय राजनीति को एक इंसान मिला था जिसकी चिन्ता आजादी हासिल करने की लड़ाई में समाज के सभी तबकों को शामिल कराने के साथ आजादी के बाद उनके मुक्ति मार्ग की खोज करना भी था। आजादी मिलने के पूर्व का अन्तिम दशक अर्थात् 1936 से 1947 तक के कालखंड में वह व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव था जिसे लोग कामरेड पी.सी.जोशी-पूरनचंद जोशी के नाम से जानते हैं। इस महान व्यक्ति ने किसानों-मजदूरों को आजादी की लड़ाई में भागीदारी सुनिश्चित कराने के साथ देश के कोने-कोने से बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों और रंगकर्मियों को खोजा था और कविता, संगीत, नाटक, साहित्य, लोकगीत, लोकनृत्य और रंगकर्म के विविध रूपों को जो लोकजीवन में प्रचलित था-उसको साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में इस्तेमाल करने योग्य बनाने के लिए अभियान चलाया था। उनका यह दृढ़ मत था कि संगीत, कविता, नाटक आदि मानव की विविध भावनाओं को अभिव्यक्त ही नहीं करते, बल्कि वे उन स्वस्थ भावनाओं को साकार करने में इंसान की आदिकाल से मदद कर रहे है। का. जोशी ने साहित्य और संस्कृति के उद्देश्यों को साकार करने के लिए जिस सांगठनिक अवधारणा की परिकल्पना की थी उसी का मूर्तरूप प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जननाट्य संघ है। का. जोशी की ही प्रेरणा का फल था कि साहित्य, संस्कृति और रंगकर्म की करीब-करीब सभी महान हस्तियां एक मंच पर इक_ा हुई थीं। उन्होंने ही कला को प्रगतिशील तथा जनजीवन से जोडऩेवाली दिशा देने के लिए प्रेरित किया था। जोशी द्वारा स्थापित ‘इप्टा’ के मंच पर उसी काल में बलराज साहनी और भीष्म साहनी का उदय हुआ था। अपनी जीवनी ‘आज का अतीत’ में भीष्म साहनी लिखते हैं: ‘‘और जब नाटक सुन्दरबाई हॉल में खेला गया तो मुझे भी उसमें एक छोटा-सा पार्ट मिल गया। यहीं पर मैंने पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी पी.सी. जोशी को देखा। इप्टा की मूल अवधारणा में पी. सी. जोशी की ही प्रेरणा रही थी। सामाजिक स्थिति के प्रति सचेत करने की दिशा में, कला और साहित्य बड़ी प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं, मुख्यत: इसी लक्ष्य को लेकर ‘इप्टा’ की स्थापना हुई थी। ‘‘पी. सी. जोशी बड़े मिलनसार स्नेही स्वभाव के व्यक्ति थे; उनमें एक प्रकार का खुलापन, अपनापन था, जिससे व्यक्ति उनके साथ बड़ी जल्दी हिल- मिल जाता था। मेरे साथ बड़े प्यार से मिले।’’ ‘‘किसी भी कालखंड में पाया जानेवाला माहौल, हमारी सांस्कृतिक गतिविधि और साहित्य सृजन को भी प्रभावित करता है। प्रभावित नहीं करता; दिशा भी देता है। ‘इप्टा’ ऐसे ही तूफानी कालखंड की उपज थी।’’‘‘एक ओर देशव्यापी स्वतंत्रता संग्राम के बलबले थे, दूसरी ओर समाज के भीतर पाए जानेवाले अन्तर्विरोधों के तनाव, उन अन्तर्विरोधों को दूर करने, प्रतिगामी शक्तियों से जूझने का दृढ़ संकल्प, एक नये प्रकार की जागरूकता, ‘इप्टा’ की सरगर्मियां ऐसी ही भावना से प्रेरित थीं। यह उनके ध्येय के अनुरूप ही था। वह सीधा जनसाधारण के बीच जनसाधारण को सम्बोधन करने के लिए पहुंच गया था। इस तरह वह उस विशाल जनआन्दोलन से जुड़ता था जो उस समय चल रहा था।’’ ‘देश के बंटवारे से कुछ समय पहले, मैं फिर मुम्बई गया था। तब मैं पहले से भी ज्यादा उत्साह के साथ ‘इप्टा’ के कार्यक्रमों में भाग लेता था। इप्टा के लोग आज भी बड़ी श्रद्धा से याद करते हैं; इसलिए कि वह देशव्यापी भावनाओं, आकांक्षाओं को वाणी देता था, जनता ही उसके केन्द्र में थी; वह बड़ी प्रेरणाप्रद भाषा में उन आकांक्षाओं-उद्गारों को व्यक्त करता था। कला के स्तर पर वह न केवल लोककला की परम्पराओं से जुड़ता था, उन्हें अपनाता था, बल्कि उस पर काल को वर्तमान और भविष्य की अपेक्षाओं के अनुरूप ढालता भी था, भविष्योन्मुखी बनाता था; नए-नए प्रयोग करता था। जनसाधारण के दिल की बात करता था और उनके दिल तक पहुंचाता था। उनकी कलाकृतियों में नए-नए प्रयोग हो रहे थे, उनमें एक विशेष रचनात्मक ओजस्विता पाई जाती थी।’’ ‘‘इप्टा में कुछ भी व्यावसायिक नहीं था। बस, जनता तक अपने उद्गारों को पहुंचाना ही उसका ध्येय था।’’ ‘‘इप्टा कोई नाटक खेलने वाली व्यावसायिक संस्था नहीं थी वह एक लहर थी, एक देशव्यापी सांस्कृतिक आन्दोलन था।’’ इसी में वह आगे लिखते हैं: ‘‘1947 के जाड़ों में अहमदाबाद में ‘इप्टा’ का अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ।...इप्टा ने अद्भुत मंच जुटाया था, देश की समृद्ध संस्कृति को एकसूत्र में पिरोने की दृष्टि से, एक नई जागरूक दृष्टि से प्रेरित। रचनात्मक ओजस्विता लिए हुए।’’ उसी पृष्ठ पर भीष्म जी आगे कहते हैं, पारस्परिक सद्भाव के आधार पर एक देशव्यापी, राष्ट्रीय स्तर पर संगठन उभर रहा था - सभी भाषाओं के प्रति समान रूप से आदर-भाव, कोई बड़ा और छोटा नहीं था, सभी एक-दूसरे की मदद करते, एक-दूसरे से सीखते, अनुभवों का आदान-प्रदान होता, परम्परागत  लोकशैलियाँ अपनाते, उन्हें नये साँचे में ढालते। उदात्त सामाजिक दृष्टि जिसमें जात-पाँत, साम्प्रदायिकता आदि के लिए कोई स्थान नहीं था, देशभर के संवेदनशील कलाकार उसके साथ जुड़ते जा रहे थे।’’ ‘इप्टा’ 1943 में स्थापित हुआ था लेकिन दो साल के बाद ही वह देश के क्षितिज पर छा गया। 1945 में स्वयं पी सी जोशी ने अपनी इस नवजात संस्था की गतिविधियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा: मैंने मुम्बई और कोलकाता के जननाट्य संघ के जन-संगीत और जन-नृत्यों को देखकर मध्यवर्ग के हर विचार के लोगों को खुश होते देखा है। देश के इस सांस्कृतिक नवजागरण की सभी प्रशंसा करते हैं। किन्तु यह बहुत कम लोग जानते हैं कि इस सांस्कृतिक नवजागरण की लहर किसान आन्दोलन के गर्भ से उठी है।’’

भीष्म साहनी आर्य समाज, कांग्रेस पार्टी, इप्टा होते हुए कम्युनिस्ट पार्टी में पहले पहुँच गए थे-प्रगतिशील लेखक संघ में बाद में आए। मई 1975 में गया में आयोजित प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन में वे महासचिव निर्वाचित हुए थे और अप्रैल 1986  तक इस पद पर बने रहे। दूसरे विश्वयुद्ध की आग, फासीवाद की युद्धवादी तथा साम्राज्यवादी नीतियों ने लगाई तथा करोड़ों लोगों को इस महायुद्ध में जान गंवानी पड़ी। दुनिया के तमाम स्वतंत्रता प्रेमी लेखकों ने कलम और हथियार उठा लिए तथा फासीवाद से लडऩे के लिए कमर कस ली। 1935 में ‘‘संस्कृति की रक्षा के लिए विश्व लेखक अधिवेशन’’ के रूप में एक व्यापक प्रयास पेरिस में हुआ। इस अधिवेशन के कुछ ही दिनों बाद फासीवादी शक्तियों के सहयोग से जनरल फ्रैंकों ने स्पेन में जनतंत्र की हत्या कर दी। इसका विरोध दुनिया के तमाम जनतांत्रिक और कम्युनिस्ट शक्तियों ने किया। अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर घट रही घटनाओं का प्रभाव भारतीय लेखकों पर भी पड़ा। पेरिस अधिवेशन में सज्जाद जहीर ने भाग लिया था और लंदन में उन्होंने मुल्कराज आनन्द के साथ मिलकर प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणा पत्र तैयार किया था। सज्जाद जहीर और उनके सहयोगियों के प्रयास से ही भारत में लेखकों को संगठित करने के प्रयास हो रहे थे। प्रेमचन्द इसमें से पहले से लगे थे। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति के दबाव और वामपंथी एवं कम्युनिस्ट विचारों के प्रभाव का परिणाम था कि प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ। यहाँ यह स्वीकार करना कतई गलत नहीं होगा कि प्रलेस के गठन में लेखकों की पहल के साथ कम्युनिस्ट पार्टी का भरपूर सहयोग था। अनगिनत कुर्बानियों, लाखों लोगों की जेल यातनाओं और हजारों के बलिदान का परिणाम हमारी आजादी थी।  कम्युनिस्ट पार्टी ने आजादी का स्वागत किया। उस समय पार्टी  के महासचिव का. जोशी थे। उन्होंने कहा - देश को आजादी मिली है। देश एक कदम आगे आया है। सरकार को सहयोग देना चाहिए।’ जोशी की इस सोच का या कहें उनकी राजनीतिक लाइन का पार्टी में विरोध हुआ। विरोधियों ने आजादी को झूठी आजादी कहा। नारा लगा - देश की जनता भूखी है - यह आजादी झूठी है। बी. टी. रणदिवे कम्युनिस्ट पार्टी के नए महासचिव, नीतिकार, सशस्त्र क्रान्ति के पैरोकार और भाग्य विधाता बने। जनता की जनवादी राजसत्ता की स्थापना के लिए संघर्ष से अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की गई तथा संघर्ष के विभिन्न कानूनी और गैरकानूनी रूपों को मिलाने और जनता के सशस्त्र संघर्ष को क्रान्ति के मुख्य रास्ते के बतौर मान्यता देने की बात कही गई। कम्युनिस्ट पार्टी की इस लाइन को जन संगठनों पर भी लागू किया गया। इप्टा, प्रलेस और अन्य बौद्धिक जनसंगठनों पर भी यह लाइन आरोपित हुई। कहाँ दस वर्षों तक कम्युनिस्ट पार्टी लेखकों और कलाकारों के बीच वाहवाही लूट रही थी - वहां अब इप्टा और प्रलेस को पार्टी के हुक्म पर चलने के लिए बाध्य होना पड़ रहा था। कम्युनिस्ट पार्टियां मुख्यत: जनसंगठनों के माध्यमों से काम करती हैं, इसी के माध्यम से जनता को अपने पक्ष से गोलबंद करती हैं। यह नई पार्टी लाइन गैर कम्युनिस्टों को जनसंगठनों से अलग होने के लिए विवश कर रही थी अथवा जनसंगठनों में बने रहने के लिए पार्टी लाइन पर चलना जरूरी हो गया था। इस भंवरजाल में प्रलेस और इप्टा का बहुत नुकसान हुआ।

                संकीर्णतावाद की बी. टी. रणदिवे लाइन का इप्टा और कॉलेज के यूनियन में काम कर रहे भीष्म जी पर क्या और कैसे प्रभाव पड़ रहा था इसके उदाहरण वे स्वयं थे। वे ‘आज के अतीत’ में लिखते हैं: ‘‘आजादी के बाद इप्टा की नीति और कार्यक्रमों में बहुत बड़ा परिवर्तन आने लगा था जिसने, मेरी दृष्टि के अनुसार इप्टा की कमर तोड़ दी। अभी तक इप्टा विशाल सांस्कृतिक जनान्दोलन का रूप लिए हुए था, राष्ट्रव्यापी महत्वकांक्षाओं को वाणी देता था। पर अब, राजनीतिक स्तर पर वह कम्युनिस्ट पार्टी की नई नीति का वाहक बनने लगा था। इस नई नीति के अनुसार, नेहरू सरकार की नीतियां जनविरोधी समझी जा रही थीं, इसलिए इप्टा के कार्यक्रमों में नेहरू सरकार की कटु आलोचना की जाने लगी थी बल्कि उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाने लगी थी।’’

                ‘‘अब इप्टा में ऐसे कलाकार भी थे जो नेहरू सरकार की कटु आलोचना का समर्थन नहीं करते थे। इनमें से कुछेक तो इप्टा के संस्थापकों में से थे जैसे ख्वाजा अहमद अब्बास। ऐसे कार्यकत्र्ताओं के हाशिये पर डाला जाने लगा था। ’’‘‘कुछ भी कहो, सांस्कृतिक क्षेत्र राजनीतिक क्षेत्र नहीं होता, वह हर आए दिन बदलनेवाली राजनीति का वाहक नहीं बन सकता। इप्टा हमारी बहुमुखी जनतंत्रात्मक राष्ट्रीय चेतना का वाहक था, उसे व्यक्त करता था, उसका यह स्वरूप बराबर बने रहना चाहिए था। नेहरू सरकार की नीतियों की आलोचना भले ही की जाती, पर उसे इप्टा के कार्यक्रमों का एकमात्र मुद्दा बना देना बहुत बड़ी भूल थी। इससे इप्टा के कार्यक्रमों में तंगनजरी आने लगी।’’ भीष्म जी इप्टा की नीतियों के बारे में आगे इसी तरह की बातों को दुहराते है और कहते हैं-‘‘इप्टा एक व्यापक जनतंत्रात्मक मंच था, उसकी दृष्टि  भविष्योन्मुखी, प्रगतिशील थी। इप्टा का खुला मंच बने रहना नितान्त आवश्यक था, व्यापक बहुआयामी। आपने उसे जरूरत से ज्यादा राजनीतिक रंग दे दिया। इतना ही नहीं उसकी सदस्यता आपने राजनीतिक समर्थकों तक सीमित कर दी। इससे एक व्यापक सांस्कृतिक आन्दोलन, जो प्रबल लहर की तरह उठा था, देखते ही देखते क्षीण पड़ गया।’’ बी. टी. आर. काल में भीष्मजी को कॉलेज में नौकरी करने के दरम्यान आध्यापकों की यूनियनों में भी काम करने का मौका मिला। इस दौरान उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों एवं निर्देर्शों से रू-ब-रू होने का मौका भी मिला। वे लिखते हैं: अम्बाला पहुँचने पर, मैं पहली बार किसी पक्की नौकरी में काम करने लगा था - बंधी-बंधाई मासिक आय वाली नौकरी। और तभी नौकरीपेशा कॉलेज के अध्यापकों के जीवनयापन की वास्तविक स्थिति की जानकारी भी मिलने लगी। ‘‘हमारे कॉलेज के अध्यापकों ने यूनियन बनाई और अम्बाला के अन्य कॉलेजों से भी आग्रह किया कि वे भी अपने-अपने कॉलेज में यूनियनें बनाएं। धीरे-धीरे इस प्रकार की पहलकदमी पंजाब के हर शहर में की जाने लगी। और मैं इस काम में सक्रिय हो गया।’’ भीष्म जी लिखते हैं कि बाद में प्रदेश स्तर पर कॉलेज टीचर्स यूनियन बनी जिसके वे जनरल सेक्रेटरी चुने गए। टीचर्स यूनियन को अंग्रेजी दैनिक ‘ट्रिब्यून’ विशेषकर उसके उपसम्पादक श्री सूद बड़ी मदद करते थे। इसी बीच यूनिवर्सिटी सीनेट का चुनाव होने को हुआ। सूद साहब चुनाव लडऩा चाहते थे और चाहते थे कि अध्यापकों की यूनियन उन्हें अपना उम्मीदवार बनाए। भीष्म जी लिखते है कि सूद साहब का सुझाव सही था। यूनियन को इससे लाभ ही लाभ था। यह सब चल ही रहा था कि भीष्म जी की बाएं बाजू की हड्डी टूट गई और वे इलाज के लिए शिमला चले गए। जब ठीक-ठाक वहां से होकर लौटे तो कॉलेज ने उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। इसी के साथ पार्टी की ओर से हुक्मनामा मिला कि चुनावों में अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें चुनाव लडऩा है। यह फैसला पार्टी ने बिना स्थिति को समझे, बिना शिक्षकों से विचार-विमर्श किए किया था। इस संदर्भ में भीष्म जी का एक वाक्य ही उस समय की पार्टी और पार्टी लाइन को समझने के लिए काफी है। ‘‘उन दिनों हुक्मनामे आकाशवाणी की तरह आते थे।’  जो हाल इप्टा का था उससे बदतर हाल प्रलेस का था। यह संगठन दो फाड़ों में विभक्त हो गया। एक ओर पार्टी लाइन पर चलने वाले कट्टरपंथी लेखक थे तो दूसरी ओर उदार दृष्टि रखनेवाले थे। रामविलास शर्मा पार्टी लाइन के प्रवक्ता थे और प्रलेस के महासचिव भी थे। इस संगठन में लेखकों की दोनों धाराओं के बीच संयुक्त मोर्चा के सवाल पर घनघोर बहस चली लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका। जिस संगठन ने अपने विचार और कार्यकलाप से देश में साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में नई दिशा देने की पहल की थी - वामपंथी संकीर्णता की लाइन ने इसे बिखरा दिया। लेखक और पाठक समुदाय का प्रलेस से अलगाव हो गया। और प्रलेस का यह अलगाव केवल लेखकों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि जनता से भी इनका सम्बन्ध सूत्र टूट गया। उसको फिर से खड़ा होने में समय लगा। इससे साहित्य का नुकसान तो हुआ ही देश का भी नुकसान हुआ।  ‘आज के अतीत’ में विचारधारा और साहित्य के रिश्ते को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं - विचारधारा यदि मानव मूल्यों से जुड़ती है तो उसमें विश्वास रखनेवाला लेखक अपनी स्वतंत्रता खो नहीं बैठता। विचारधारा उसके लिए सतत प्रेरणा स्रोत होती है, उसे दृष्टि देती है, उसकी संवदेना में ओजस्विता भरती है। साहित्य में विचारधारा की भूमिका गौण नहीं है, महत्वपूर्ण है। विचारधारा के वर्चस्व से इनकार का सवाल ही कहां है। विचारधारा ने मुक्तिबोध की कविता को प्रखरता दी है। ब्रेख्त के नाटकों को अपार ओजस्विता दी है। यहां विचारधारा की वैसी ही भूमिका रही है जैसी कबीर की वाणी में-जो आज भी लाखों-लाख भारतवासियों के होठों पर है। भीष्म जी लिखते हैं- प्रलेस की भूमिका एक सामाजिक-सांस्कृतिक लहर के रूप में रही, संगठन बन जाने के बाद भी उसने संस्था का रूप नहीं लिया। उसका स्वरूप एक लहर जैसा ही है, बंधी-बंधाई संस्था का नहीं है। यह भारत की सभी भाषाओं का साझा मंच था, धर्मनिरपेक्ष जनतंत्रात्मक की दृष्टि से प्रेरित और वामपंथी विचारधारा से गहरे प्रभावित जो एक ओर देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ता था तो दूसरी ओर विश्वव्यापी स्तर पर उठने वाली घटना चक्र के प्रति सचेत था। भीष्म जी ने प्रलेस को पदलोलुपता और स्वार्थहित से मुक्त संस्था माना है। उनको इसमें जैसा प्रेरणाप्रद और मैत्रीपूर्ण माहौल दिखा वैसा माहौल अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने इसमें साथीपन का जो रिश्ता पाया, उसका उनकी नजरों में कोई जवाब नहीं। वे लिखते हैं: ‘‘बरसों बीत चुके हैं पर आज भी उन दिनों को याद करना अच्छा लगता।’’

प्रलेस के क्रिटिक जिस बात पर सबसे अधिक हमला करते हैं-वह है प्रलेस का कम्युनिस्ट पार्टी का निर्देश या हुक्म पर चलना। भीष्म जी लिखते हैं - ‘एक और बात को लेकर भी बड़ी गलतफहमी पाई जाती है कि प्रलेस की बागडोर कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में है। बागडोर तो जरूर थी, इस लिहाज से कि सांस्कृतिक क्षेत्र में वह पार्टी की समझ और नीति का वाहक मानी जाती थी। पर इसका यह मतलब नहीं कि इससे पहले पार्टी हस्तक्षेप करती रहती थी या लेखकों से जवाब तलबी करती रहती थी। श्री एच. के. व्यास पार्टी की ओर से प्रलेस के पथ-प्रदर्शक थे। गया सम्मेलन उन्हीं के निर्देशन में सम्पन्न हुआ था। और संगठन बनाने का काम कोई कम्युनिस्ट पार्टी से सीखे। चूंकि किसान, रेलवे कर्मचारी और ट्रेड यूनियन के अनेक संगठन तो हर दिन अपनी मांगों के लिए लड़ते हैं, हड़ताल करते हैं, जबकि लेखक तो अपने कमरे में एकान्त बैठा कहानियाँ-कविताएँ लिखता है। इसलिए पार्टी की नजर में ‘मोर्चा’ बांधता है तो केवल सम्मेलन के अवसर पर और वह भी दो-एक साल में एक बार फिर भी, संगठन तो संगठन है।’’‘‘एक बार लेखकों का संगठन बन जाए तो पार्टी के संचालक का काम एक तरह से खत्म हो जाता है; कम-से-कम अगले सम्मेलन तक के लिए तो जरूर ही। ऐसा मेरा अनुभव है। गया से लौटकर आए और मैंने पदाधिकारी के काम की बागडोर सम्हाली तो अपना दायित्व निभाते हुए अपने काम की रिपोर्ट व्यासजी तक पहुँचाना जरूरी समझा। शुरू-शुरू में तो व्यास जी, टेलीफोन का चोंगा उठाते मेरी बात सुनते और बड़े धैर्य से अपने सुझाव देते। पर कुछ अरसा बाद मैंने पाया कि टेलीफोन करने पर व्यास जी अक्सर बाथरूम में बैठे होते हैं। और यह सिलसिला धीरे-धीरे स्थायी रूप लेने लगा।’’ ‘‘....अब सोचता हूं कि मेरा टेलीफोन करना ही धृष्टता थी। मुझे समझ जाना चाहिए था कि मेरा संगठन हड़ताल करनेवाला संगठन नहीं है। न ही आए दिन किसी से मोर्चा लेने वाला कि उनके अनुभव से लाभ उठाता। इस तरह पार्टी के नेतृत्व अथवा हस्तक्षेप की नौबत कभी नहीं आई।’’

                ऊपर के अंश कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ के संबंधों को समझने के लिए काफी हैं।  भीष्म जी लिखते हैं: कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति की दृष्टि निश्चय ही सामाजिक  स्तर पर अधिक स्पष्ट और सटीक होती है। वह साम्प्रदायिक नहीं होता है, जातिभेद में विश्वास नहीं रखता, न रंगभेद में। कम्युनिस्ट विचारधारा में विश्वास करनेवाले लोग, स्वार्थहित को प्राथमिकता नहीं देते। धनलोलुप नहीं होते। आमतौर पर कम्युनिस्ट कार्यकत्र्ता बड़ी सादा और संयम की जिन्दगी गुजारते हैं। ऐसा मैंने देखा।’’   भीष्म साहनी एक महान देशभक्त, ईमानदार इंसान, महान लेखक और सामाजिक सरोकारों में अटूट आस्था रखनेवाले अद्भुत व्यक्ति थे। उनकी इसी संरचना ने उन्हें कम्युनिस्ट बनाया था। वे लिखते हैं: ‘‘समाज में जीनेवाला हर प्राणी, अपने परिवेश से जरूर जुड़ता है; कभी गहरे में तो कभी केवल जेहनी स्तर पर। मैं अपने को, समाज से कटकर, मात्र एक निद्र्वन्द्व व्यक्ति के रूप में नहीं देख सकता। पर जहाँ जुड़ता हूँ, वहां यह भावना भी गहरे में उद्वेलित करती है कि हमारा देश उन्नति करे, हमारे देशवासी उन्मुक्त, सुखी जीवन व्यतीत कर पाएं, हमारा देश पिछड़ा हुआ, और देशों का मुंह जोहने वाला देश न रहे, सच्चे अर्थों में एक सुखी समृद्ध देश बने। इसी सूत्र को वे अपनी कहानियों में, अपने उपन्यासों में, नाटकों में, इप्टा में और प्रगतिशील लेखक संघ में उतारने का प्रयास करते रहे, कभी विश्राम नहीं किया, आजीवन इस सूत्र को साकार करने में लगे रहे।