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Saturday 18 Nov 2017

इतिहास के खण्डित पत्रों की पहचान (भीष्म साहनी का उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’)

तरसेम गुजराल

444 ए, राजा गार्डन, जालंधर-144021

मो. 09463632855

भीष्म साहनी हिन्दी साहित्य जगत के गिने-चुने समर्थ कथाकारों में से एक हैं। एक ऐसे कथाकार जो प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक होने अथवा जीवन संघर्ष से जांबाज होकर निकलने के दावे नहीं करते अपितु साहित्य जगत में प्रगतिशील विचारधारा का आह्वान सबल तरीके से और विधा के सूत्रों में बंधकर करते हैं।

‘मय्यादास की माड़ी’ उपन्यास उस कालखंड की कथा है, जब पंजाब की धरती से सिख अमलदारी के खंभे उखड़ रहे थे और ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपनी हुकूमत को विस्तार दे रहा था। यह वह समय है जब परम्परागत विश्वासों और आस्थाओं को धक्का पहुंच रहा है। औद्योगिक क्रांति का उभार धीरे-धीरे भारत के उनींदे आकाश पर फैल रहा है और लोग हैरत के साथ अपने हाथों से कुछ छूटता हुआ और सामने के चित्रपट पर कुछ बदलता हुआ देख रहे हैं। ‘मय्यादास की माड़ी’ सामन्तवाद की ढपोरशंखिया शान के बनने बिगडऩे की कहानी है। पूंजी के विस्तार और छल की कहानी है। देश भक्ति के ठाठे मारते जज्बे और पीठ में घोपें छुरे की कहानी है। औरत के दर्द, गहरे अंधकार और जागने की सुगबुगाहट की कहानी है। नये तकनीक की पताका और धड़धड़ाती मशीन की कहानी है। पीढिय़ों की जड़ता और बदलाव की कहानी है।

‘मय्यादास की माड़ी’ उपन्यास का आरंभ मय्यादास की माड़ी के मौजूदा मालिक दीवान धनपतराय के व्यक्तित्व की गिरह खुलने के साथ होता है। उसकी जीवन शैली सामंतवाद का तलछट मात्र है। मानवीय समझ के विकास से पैदा हुआ विवेक, धीरज, सत्य का अन्वेषण, अपनी माटी के लगाव, देशभक्ति और उत्तरदायित्व की अनुभूति जैसे गुणों की उसे बिल्कुल जरूरत नहीं। ये या ऐसे अन्य गुण मय्यादास को मुबारक। मय्यादास जो कि अपनी माड़ी के सम्मान का प्रतीक माना जाता है, सिक्ख अमलदारी के प्रति अपनी निष्ठा की वजह से बर्बाद हो जाते हैं, उससे बिल्कुल भिन्न प्रकृति के इंसान हैं।

दीवान धनपत बड़प्पन के लिए, हैसियत के लिए, प्रदर्शन के लिए और लोगों में अपनी चर्चा के लिए अजीब-अजीब हरकतें करता है। कस्बे में वह सनकी स्वभाव के लिए जाना जाता है इसीलिए उसका नाम भी ‘सनकी दीवान’ हो गया है। उसने अपना पहरावा और चाल-ढाल भी अलग सी बनाई हुई है। दीवानों के पूरे कुनबे में वह सदा पीले रंग का अंगरखा पहनता रहा, सिर पर केसरी पगड़ी सजाए रहता। अंग्रेजों की व्यवस्था के आरंभ के साथ अंगरखा पहनने का दिखावा करता चला गया था और केसरी पगड़ी सिर्फ ब्याह-शादी के दिनों सर पर बांधी जाती है। पीला अंगरखा पहनकर, आंखों में सुरमे की लकीर खींच, कानों में बालियां लटकाकर छोटे से मरियल टट्टू पर सवार लेकर गलियों में घूमता है या आराम कुर्सी पर दोनों टांगे चढ़ाए बैठकर गुडग़ुड़ी के कश लेता है।

उसका यह पहरावा और चालढाल की इस तरतीब का मतलब है ‘यह आदमी अंदर से तृप्त है, मनचाहा व्यवहार कर सकता है, उसे किसी की परवाह नहीं।’ दीवान धनपत के पुत्र की शादी के वक्त भोजन करते हुए एक बाराती ने दूल्हे से शरारत में कहा कि वह दूल्हा है और उसे कोई पूछ ही नहीं रहा। यतीमों की तरह वहां बैठा है। अभी वो आदमी पापड़ बांटने आया था उसने उसकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा। अब उसको प्रमाणित करना था कि वह दूल्हा है, दूल्हा जो खास होता है। तैश में आकर उसने कहा- पापड़। बारात का यह मंजर है कि दूल्हा खड़ा होकर चिल्ला रहा है- पापड़-पापड़। लडक़ी वालों की ओर से खूब पापड़ बांट दिए जाने पर शरारत में बाराती चिल्लाने लगे- मठा। तनाव और खींचातानी में सारी की सारी पंगत बिना भोजन ठीक से किए उठ गई।

लडक़ी के पिता मंसाराम क्षुब्ध थे परन्तु लडक़ी वाले ठहरे। वक्त की नजाकत समझते हुए हाथ जोडक़र कहा- हमसे खता हो गई है। इस मामले को यहीं खत्म कर दें। लोग महसूस करते हैं कि अगर बाराती बाराती होने के गरुर में बदतमीजी पर उतर आएंगे तो लडक़ी वालों की इज्जत का क्या बचेगा और यह भी कि दीवान पैसों की धौंस दिखा रहे हैं। मुरब्बे मिल जाने की वजह से हवा में है। सो लडक़ी वालों ने कह दिया कि अब आगे से दीवानों के यहां लडक़ी नहीं देगा।

दीवान डोली लेकर घर नहीं गए थे। बीच राह टीले पर रुके थे। जब पुरोहित और लडक़ी के मामा दहेज की बाकी चीजें पहुंचाने आए उन्हें बता दिया गया कि वे दुल्हन की डोली वापिस ले जाएं।  लोग हतप्रभ थे। वहां ऐसा कभी हुआ नहीं था कि फेरे के बाद कोई दुल्हन को ले जाने से इंकार कर दे। अब बड़े दीवान ने समझौते की शर्त यह रखी कि उनकी सद्य विवाहित बेटी उनके घर में तभी पांव रखेगी जब उनके घर बिरादरी की एक और लडक़ी उनके एक किसी लडक़े के साथ उसी दिन ही ब्याह कर जाएगी।

दीवान अपमान का बदला लेना चाहते हैं। बदले का मतलब है ज्यादा अपमान करो। कठोर सजा दो। ऐसी कि अगले की बोलती बंद हो जावे। दूल्हे का बड़ा भाई था कल्ला, मिरगी का मरीज। दिमाग से कमजोर। दीवानों ने नई ब्याहता की डोली लौटा दी। अल्हड़ लडक़ी ज्यादा कुछ नहीं जानती- डोली लौट आने पर पूछती है- ‘‘मैं घर लौट आई हूं क्या?’ गरीब हरनारायण की विधवा बेटी वीरांवाली की बारह तेरह साल की रुक्मिणी सलीब पर चढ़ा दी गई। मिरगी का मरीज कल्ला इस ऐतिहासिक घटनाक्रम में दूल्हा बनाकर ब्याह दिया गया।

भीष्म साहनी उपन्यास की मूलकथा के बीच लोककथा अथवा लोक रीति का कथा का प्रभाव गहरा करने के लिए उपयोग करते हैं। टीले पर रूकी बारात के बीच मनचले लोगों द्वारा डंबे मारने की रीत का अच्छा उपयोग हुआ है। डंबा मारने वाले केवल खेल और समय काटने के लिए मनोरंजन जैसा लुत्फ (जस्ट फन) उठाने के लिए खेल रहे हैं। परन्तु इससे उपन्यास की कथा के उस खास मुकाम की निदर्यता, क्रूरता रेखांकित हो रही है। दूल्हा डंबे को तान का घंूसा मारता है। बालमुकंद दूल्हे की पीठ थपथपाते हुए कहता है- तेरे में सचमुच बड़ा दम है। घरवाली को काबू से रखेगा। पुरुष की बहादुरी से स्त्री को नियंत्रण में रखने का                                  सबब सामंती है। उपन्यासकार ने लेखराज के चरित्र का निर्माण, मातृभूमि के प्रति उसके पवित्र जज्बे, जंग और अपने मुनाफे अथवा स्वार्थ के लिए कौम की पीठ में छुरा घोंपने के क्रम को कथा के प्रवाह और सूत्रता के बीच बड़े सधे हाथों से रखा है। जब मीरासी का भाई जलाल धारीदार कुर्ता और तुर्रेदार पगड़ी पहनकर मुनादी करता है कि खल्क खुदा दा, हुक्म बादशाह दा, हर खास-ओ-आम को मतला किया जाता है कि फिरंगी के लश्कर सल्तनत-ए-खालसा की तरफ बढ़ आ रहे हैं। कल शाम को शीशमहल में भरती शुरू हो जाएगी, तो जंग संबंधी अफवाहें पूरे कस्बे में फैल गई। दीवान मय्यादास ने लाहौर दरबार की जरूरत को दिलोजान से समझते हुए अपना खजाना सिख अमलदारी के हक में खाली कर दिया। रायजादा मोहनलाल ने बीस हजार की थैली थे। लेखराज अपने दोस्त के साथ शीशमहल जाकर फिरंगियों के विरुद्ध लडऩे वाली फौज में अपना नाम लिखवा आया।

लेखराज चुपचुपीता सा लडक़ा, कम बोलने वाला, भावुक हृदय वाला लडक़ा, आज्ञाकारी होने के नाते मय्यादास का पैड़ी पर काम करने वाला सामाजिक, राजनैतिक बदलाव की खबरों से चौंक जाता है। जंग की कोई मुकम्मल तस्वीर उसके सामने न थी, यौवन सुलभ भावुकता थी, जिससे अब वह पीछे नहीं हटना चाहता था। दादी से सुनी आत्मबलिदान की कहानियां इस जुनून को बदलने नहीं दे रही थी। मां का बिलखना, चिल्लाना उसका फैसला न बदल सका। दोस्ती की लाज रखता मनोहर साथ चल दिया।

जंग की पहली खूंखार नकार भावुक आदमी का कितना कुछ हर लेती है, यह उन दोनों में से कोई नहीं जानता था। जंग की कहानियां और वास्तविक जंग में उतना ही फर्क होता है, जितना शब्द ‘तलवार’ और सामने लहराती खून की प्यासी नंगी तलवार में। कड़े प्रशिक्षण के बाद दोनों युवकों को एक ही टुकड़ी में कभी एक छावनी से दूसरी छावनी तक भागना पड़ा तो मनोहर की बोलती बंद हो गई। लेखराज के लिए सलामती की मन्नत मांगने वाली मोरां दूर पीछे रह गई थी। जंग का चेहरा तब और भी बदसूरत हो जाता है जब दुश्मन पर बिजली की चमक की तरह टूट पडऩे वाले सैनिकों के हौसले बुलंद हों परन्तु दिशा-निर्देश देने वालों के हाथ अशरफियों, वजीफों और पेंशनों से बांध दिए जाएं।

सरदार लाल सिंह के नेतृत्व में उनकी सेना ने सतलज नदी को पार किया था। झाडिय़ों के पीछे मोर्चा बांध दिया गया। लेखराज भी इसी टुकड़़ी में था। फिरंगी की छावनी की तरफ एकटक देख रहा था। अचानक खालसा फौज को गोलाबारी का हुक्म मिलता है। तोप-गोले बरसाने लगती हैं। गोले बरसाने के बाद अचानक खामोश हो जाती है। सैनिकों के लिए यह स्थिति बड़ी बेचैन करने वाली लगती है। खामोशी जानलेवा होने लगती है क्योंकि इस तरह की लड़ाई में होता यह है कि गोलीबारी के बाद फौज को आगे बढऩा होता है ‘नगाड़ों की आवाज के साथ’। खालसा सैनिकों को चुप्पी नागवार लगती है। परन्तु चुप्पी टूटती नहीं। फिरंगी तोपें दनदना रही है और खालसा फौज की गोलाबारी भरपूर जवाब नहीं देती। और फिर जब तने हुए युद्धस्थल में यह आवाज सुनाई पड़े कि फौज के बड़े सालार युद्धस्थल पर नहीं है। पिछली रात की मुठभेड़ से पहले वह अपने मुकाम से गायब है तब सैनिकों की दशा क्या होगी?

यहां कथाकार की इतिहाससम्मत टिप्पणी अर्थपूर्ण है कि तथ्यों की जांच-पड़ताल के बाद फिरंगी इतिहासकार ने बीसियों बरस बाद लिखा कि जंग से दो दिन पहले सरदार ने अपने गुप्तचर शम्सुद्दीन के साथ, फिरंगी मेजर लॉरेंस को पूरा-पूरा ब्यौरे भेज दिया था। इस ब्यौरे में फौज की तैनाती, ताकत और कमजोर हिस्से, सब कुछ बता दिया गया था। इस खुफिया सूचना के पूरे दाम मिले। एलची शम्सुद्दीन को फिरंगी लाट से पांच हजार रुपए इनाम मिले। अढ़ाई हजार महीना की पेंशन।

शायद प्रियंवद ने कहीं कहा है कि भारत का इतिहास पराजित नायकों का इतिहास है। भारत का इतिहास लाक्षागृहों, जयचंदों और शम्सुद्दीनों का इतिहास भी है। इतिहास राजाओं, राजवंशों और राजगद्दियों की कहानियां  नुमायां तरीके से सुनाता है। साजिशों की वजह से राह भटके सिपाहियों की कहानियों के लिए वहां जगह बहुत कम होती है।  जिस सैनिक ने जीवन का पूरा जोश, हिम्मत और लक्ष्य एक संग्राम से बांध दिया है, पराजित होकर लौटने पर उसकी जो दशा होती है, वह व्यथा से भरी तो रहती है परन्तु भटकाव की राह खोल देती है। नक्सलवादी आंदोलन के टूटकर बिखरने पर लड़ाकू लोगों को भटकते देखा है। खालसा फौज की हार के साथ लेखराज भटक रहा है। जगदीशचंद्र के उपन्यास ‘टूंडा लाट’ और ‘लाट की वापसी’ का नायक कैप्टन सुनील कपूर जिस हाथ से वायलिन बजाने का सपना देखता था, जंग में वह गश खाकर अनबहे आंसुओं के साथ भटक रहा है। (बेशक सुनील कपूर पराजित सेना का नायक नहीं है परन्तु नौकरी खोकर उसका भटकाव युद्ध के जख्मी नायक का भटकाव है।)

लेखराज के दोस्त मनोहर की छाती में संगीन धंसी है। खून बह रहा है परन्तु वह फिर भी तलवार चला रहा है और भटकते लेखराज की नींद तब टूटी है जब वह मुचड़ा हुआ अंगरखा पहने धनपत से सुनता है ‘‘मैंने कहा था या नहीं? कि अमलदारी बदल जाएगी, कि मेरी जीत होगी...’’ कुटिल, मतलब परस्त, कायर लोग सच्चे बहादुरों, सच्चा लक्ष्य लेकर लडऩे वालों पर कटाक्ष कस रहे हैं।

‘‘अमलदारी बदल जाने का अर्थ होता है कि कल जो दुश्मन थे। वे दोस्त बन जाते हैं, कल तक जो भगोड़े थे, वे सिपहसालार बन जाते हैं। जो काला था वह उजला लगने लगता है, और सैनिक? सैनिक नहीं बदलता। वह केवल लड़ता है, मरता है, जान हथेली पर रखकर जंग के मैदान में उतरता है, अपने जौहर दिखाता है, क्योंकि वह अपने सालार के हुक्म पर मर मिटने की कसम खाए होता है।’’ (पृ. 136, 137)

उपन्यासकार कथा कहते कहते बुनियादी बदलाव की कथा कहते हैं। अमलदारी के जाने के साथ दीवान मय्यादास की माड़ी पर साये फैल गए। उनका दिवाला पिट गया था।  पराजय के साथ उनकी सारी दौलत बह गई। वक्त के तूफान ने उन्हें बूढ़ा और अशक्त कर दिया। लोग कहने लगे कि अपने अकड़ में सारा रुपया-पैसा खालसा दरबार को दे आए। यह नहीं जानते थे कि फिरंगी का सितारा बुलंदी पर है। फिरंगी सरकार का नया कानून बना कि काश्तकार अपनी जमीन गिरवी रखकर कर्ज ले सकता है, साहूकार चल निकला।  काश्तकार का अनाज का दाम कम लग रहा है पर किफायती माल महंगे दामों में बिक रहा है। मुरब्बे बंटते हैं तो धनपत जैसे विदूषक दीवान को तीन गांव मिल जाते हैं। लोग लपककर सनदें ले आए परन्तु मय्यादास अपनी नमक हलाली की हद से बाहर नहीं आ पाए। बदलाव रियासत और सियासत तक ही सीमित नहीं है उनींदे कस्बे के इतिहास को चिंघाड़ती हुई रेलगाड़ी पार कर रही है। लोगों को समझ नहीं आ रहा कि इसे फिरंगी की दरियादिली समझें या कोई चाल?... ‘‘गोल चपटा गूंगा-बहरा दैत, सीधा बिना देखे आगे बढ़ता जा रहा था।’’ दीवान मय्यादास जो कभी नहीं झुके, हार कर फिरंगी गार्ड को फर्शी सलाम कर इंसाफ मांग रहे हैं। यही उनका अंत है। प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों से निकल गया। अंग्रेजी सरकार सीधे चला रही थी। लोग नहीं जानते थे कि रेलगाड़ी उनके लिए है या भारत से कच्चा माल ढोने के लिए। मुर्शिदाबाद के बुनकरों के अंगूठे काट दिए गए थे ताकि मैनचेस्टर के माल के लिए खुली मंडी मिल सके।  व्यापार और केवल व्यापार जिसका किसी नैतिकता से कोई रिश्ता नहीं होता। आज फिर विश्व बैंक,डब्ल्यूटीओ आदि की मार्फत तीसरी दुनिया के मुल्कों में धन लगाने की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तैयारी इससे कहीं चालाक और ज्यादा स्वार्थी है।

उपन्यास में इसके बीच निराशा तारी नहीं होती। भारत एक दिन अपना भाग्य बदल पाएगा। इसके संकेत मिलने लगते हैं। यहां वानप्रस्थी जैसे लोग हैं, जो शिक्षा के प्रसार-प्रचार और खासकर भारत की महिलाओं में शिक्षा की ज्योति प्रकाशित करने के काम में लगे हैं। रुक्मिणी जैसी महिलाएं हैं जो तमाम बाधाओं को पार कर वानप्रस्थी के स्कूल में पढऩे के लिए पहुंच जाती हैं। उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ बदलते समय की हर पदचाप को पहचानने और रचनात्मक स्तर पर कथा में सफलता के साथ ढालने में पूरी तरह सफल कथाकृति है।