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Tuesday 21 Nov 2017

समय से संवाद करती ‘चीफ की दावत’

डॉ. श्यामबाबू शर्मा

नेहू, शिलांग, मेघालय

मो. 9863531572

भीष्म साहनी हिन्दी कथा की प्रगतिशील परंपरा के शक्तिशाली हस्ताक्षर हैं। तथाकथित आधुनिक मध्य वर्ग इनकी रचनाओं के केन्द्र में है। उनका व्यक्तित्व उनके जीवन के साथ जुडक़र एक संपूर्ण छवि उभारता है। ये दोनों आयाम परस्पर अनुरुप हैं, पूरक हैं। स्वयं भीष्म साहनी जी के शब्दों में साहित्य  के क्षेत्र में भी मेरे अनुभव वैसे ही स्पष्ट और सीधे-सादे रहे हैं जैसे जीवन में। मैं समझता हूं अपने से अलग साहित्य नाम की कोई चीज भी नहीं होती, जैसा मैं हूं, वैसी ही मैं रचनाएं भी रच पाऊंगा। मेरे संस्कार अनुभव, मेरा व्यक्तित्व, मेरी दृष्टि सभी मिल कर रचना की सृष्टि करते हैं। इनमें से एक भी  झूठ हो तो सारी रचना झूठी पड़ जाती है। (सारिका, अप्रैल 1973, पृ.-33)

वर्गगत उतार-चढ़ाव, आर्थिक जटिलताओं के साथ-साथ चरित्रों की कुण्ठित मन: स्थिति, अंतर्विरोध और तिक्त अनुभवों की अभिव्यक्ति का दस्तावेज ‘कहानी’ के 1956 के विशेषांक में ‘चीफ  की दावत’ कहानी के रुप में पाठकों के समक्ष आता है। आधुनिकता और परंपरा का द्वंद्व इस कहानी में सहज ही  देखा जा सकता है। एक ओर नए-नए आधुनिक बने बाबू शामनाथ और उसकी पत्नी है, वहीं दूसरी ओर फालतू सामान की हैसियत में तब्दील मां है। मध्यवर्गीय जीवन का एक विचित्र अंतर्विरोध है कि वह परंपराओं को छोड़ नहीं पाता और आधुनिक बनने की ओर ललचाई नजरों से निहारता है, बहुत सूक्ष्मतापूर्वक उद्घाटित करने का प्रयास इस कहानी में किया गया है।

                खोखली मर्यादाओं, बाह्याडम्बरों और स्वार्थपरक शिष्टाचार के प्रति कहानी में व्यंग्य का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। बड़े-बूढ़ों के प्रति अतिसंवेदनशीलता, ममता, दया, करुणा के लोप से जीवन का वास्तविक अर्थ ही अर्थहीन होता जा रहा है। ‘अर्थ’ को जीवन का शगल मानने वाले श्रवण कुमार शामनाथ की उस मानसिकता का अर्थ व्याख्यायित किया गया है जिसमें पुत्र मां को पहले तो अर्थहीन समझकर आड़ में सेट करना चाहता है परंतु जब बॉस उसकी मां का अर्थ समझाता है तो शामनाथ माँ का अर्थ प्रासंगिक बनाकर तरक्की को सार्थक बनाना चाहता है। नि:संदेह वह अभी तक माँ  के अर्थ को नहीं समझ पाया था। उसे तो माँ प्रमोशन की सीढ़ी मात्र लगती है। उसे इससे आगे पीछे की सुध नहीं है। भीष्म जी की पैनी दृष्टि एक मार्मिक चित्र खींचती है -‘‘शामनाथ झूमते हुए आगे बढ़ आये और मां को आलिंगन में भर लिया। - ओ मम्मी! तुमने तो आाज रंग ला दिया!... साहब तुमसे इतना खुश हुआ कि क्या कहूं। ओ मम्मी! मम्मी!’’ (एक दुनिया समानांतर, राजेन्द्र यादव, पृ-229) कहानी की केन्द्र बिन्दु शामनाथ की ‘समस्या’ तरक्की की नहीं बल्कि तरक्की में आने वाली ‘समस्या’ मां की समस्या है। उसकी यह चिंता कि प्रदर्शन के अयोग्य माँ को प्रदर्शन की वस्तु कैसे बनाया जाय। माँ के साथ उसकी बातचीत बड़ी अर्थ गर्भित है। ‘‘और माँ हम लोग पहले बैठक में बैठेंगे। इतनी देर तुम वहां बरामदे में बैठना। फिर जब हम वहां आ जाएं तो तुम गुसलखाने के रास्ते बैठक में चली जाना। मां अवाक् होकर बेटे का चेहरा देखने लगी। फिर धीरे से बोलीं अच्छा बेटा’’(एक दुनिया समानांतर, राजेन्द्र यादव, पृ-224)

पुत्र और बहू की फूहड़ता और टुच्चापन बड़े वीभत्स रुप में तब दिखाई पड़ता है जब वह घर को डेकोरेट करने के लिए माँ को उचित स्थान पर सेट करने को व्यग्र होता है। संपन्नता प्रदर्शन हेतु मां को सफेद सलवार-कमीज और चूडिय़ां पहनने का निर्देश दिया जाता है जो क्षुद्र सोच का परिचायक है। ‘चूडिय़ां कहां से लाऊं बेटा , तुम तो जानते हो, सब जेवर तुम्हारी पढ़ाई में बिक गए’ यह वाक्य शामनाथ को तीर की तरह लगा। जितना दिया था, उससे दुगना ले लेना’’(एक दुनिया समानांतर, राजेन्द्र यादव, पृ-225)

भौतिकता की आंधी में पुत्र माँ को ‘लाइबेल्टी’ समझने लगा है। मरती, छीजती संवेदना को पुनर्जागृत करने का प्रयास करते भीष्म जी संवेदना का घनीभूत छायांकन करते हैं और पाठक को सोचने पर विवश कर देते हैं कि अर्थ युग में संस्कार और जीवन मूल्यों का अर्थ कितना समझा जा सका है। तथाकथित विकसित, आधुनिक सभ्य समाज का जो यांत्रिक युग चल रहा है उसमें सब कुछ इमेडिएट प्राप्त करना ध्येय बनता जा रहा है। अर्थ को ही जीवन का अर्थ समझने वाला सुपुत्र माँ को गुसलखाने से भी एक पायदान नीचे का दर्जा देने से नहीं हिचकता। अंतस को छील देती पंक्तियां माँ के अर्थ को अर्थवान बनाती हैं-

क्या साहब तेरी तरक्की कर देगा? क्या उसने कुछ कहा है?-कहा नहीं मगर देखती नहीं, कितना खुश गया है। कहता था जब तेरी मां फुलकारी बनाना शुरु करेगी, तो मैं देखने आऊंगा कि कैसे बनाती हैं। जो साहब खुश हो गया तो मुझे इससे बड़ी नौकरी मिल सकती है, मैं बड़ा अफसर बन सकता हूं!

माँ के चेहरे का रंग बदलने लगा, धीरे-धीरे उनका झुर्रियों भरा मुंह खिलने लगा, आंखोंं में हल्की-हल्की चमक आने लगी।

-तो तेरी तरक्की होगी बेटा?

-तरक्की यूं ही हो जायेगी? साहब को खुश रखूंगा, तो कुछ करेगा, वरना उसकी खिदमत करने वाले और थोड़े हैं?

तो मैं बना दंूगी बेटा, जैसा बन पड़ेगा, बना दूंगी।

पंूजीवादी आधुनिकता बोध और यथार्थवादी विचारधारा के अंतर्विरोध यहां खुलते हैं। शामनाथ द्वारा दी गई दावत में पुरुष और महिलाएं बेहिचक शराब पीते हैं। यहां तथाकथित अभिजात्य समाज की मर्यादाएं और सदाचार को तार-तार कर दिया जाता है। मां को उपहास का केन्द्र बनाते हुए भी शामनाथ को लाज नहीं आती जब वह माँ को आदेश देता है-‘‘ माँ हाथ मिलाओ!’’ बात यहीं नहीं समाप्त होती। पराकाष्ठा का चरम बिन्दु-‘‘ हौ डूडू’’ और बरामदा तालियों से गूंज उठा । साहब तालियां पीटना बंद ही न करते थे। शामनाथ की खीझ प्रसन्नता और गर्व में बदल उठी। माँ ने पार्टी में नया रंग भर दिया था।’’(एक दुनिया समानांतर, राजेन्द्र यादव, पृ-228) माँ की विवशता शामनाथ के लिए प्रसन्नता और गर्व का कारण थी।

आधुनिक दिखने की होड़ वाली तथाकथित सभ्य, सुसंस्कृत-मैनर्ड पीढ़ी में पुरानी-एंटीक चीजों का प्रेम चीफ  की फरमाइश पर ध्वनित होता है जब वह माँ से पुराने गीत और फुलकारी का आग्रह करता है। दावत की गुडनाइट के पश्चात् माँ  की जिस दशा का वर्णन भीष्म जी ने किया है वह अर्थयुग का ऐसा अर्थ है जो घुटन भरे वातावरण को चित्रित करता है-

‘‘मगर कोठरी में बैठने की देर थी कि आँखों से छल-छल आंसू बहने लगे। वह दुपट्टे से बार-बार उन्हें पोंछती, पर वे बार-बार उमड़ आते, जैसे बरसों का बांध तोडक़र उमड़ आए हों। माँ ने बहुतेरा दिल को समझाया, हाथ जोड़े, भगवान का नाम लिया, बेटे के चिरायु होने की प्रार्थना की, बार-बार आँखें बंद की, मगर आँसू बरसात के पानी की तरह जैसे थमने में ही नहीं आते थे।’’(एक दुनिया समानांतर, राजेन्द्र यादव, पृ-228)

अनुमान लगाया जा सकता है कि बूढ़ी माँ बेटे के घर में घुट-घुट कर जी रही थी। इस घुटन भरे वातावरण से मुक्ति पाने के लिए वह बेटे से हरिद्वार भेज देने का प्रस्ताव रखती है परंतु शामनाथ अपनी बदनामी के डर से स्वीकार नहीं करता। और तरक्की की लिप्सा तो है ही।

साहित्यकार निश्चय ही भविष्य का पाठ समझ लेने में माहिर होता है। भीष्म जी की पैनी नजर ने साठ के दशक में शामनाथ के माध्यम से जिस उडऩ छू युवा वर्ग की मानसिकता, मध्यवर्गीय पारिवारिक संबंधों का पोस्टमॉर्टम किया वह लगातार और बढ़ा है। हमारे समाज में शामनाथ की संख्या असंख्य है जिन्हें स्वयं की सुध नहीं है परंतु क्षुधा ऐसी की शांत होने का नाम नहीं लेती। सब कुछ पैसा, पद, पँूजी का वर्चस्व और प्रतिफल अतिस्याह, कुरूप, वीभत्स। शामनाथ तो शुरुआतकर्ता थे। आगे-आगे क्या होगा?

                हर कहीं पश्चिमीकरण का अंधानुकरण है। सबको घर की तलाश है पर घर कहीं नहीं दिखता। बिल्डिंगें जरुर बनती जा रही हैं। कहीं टू बीएचके है तो कहीं वन आर के। इसमें न अम्मा की भीतर की कोठरी है न बाबू जी का पूजा घर। और बात उन्नत और अति उन्नत होने की जा रही है। ‘चीफ  की दावत’ जटिल जीवन यथार्थ में अर्थ को अर्थवान सिद्ध करते मनुष्य की अस्मिता और अस्तित्व के साथ जुड़ी हैेेेे। कार्पोरेट जगत और उदारीकृत-उधारीय संस्कृति ने परिवार-समाज का अस्तित्व खतरे में डाल दिया है। जीवन इतना जटिल बनता जा रहा है कि मनुष्य होने के सामने प्रश्न चिन्ह लगता जा रहा है। नैतिकता, आदर्श, मूल्य, चरित्र आदि निरर्थक हो चुके हैं। इन अनगिनत परिवर्तित जीवन पद्धतियों और जीवन मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की जद्दोजहद में परंपराओं को न छोडऩा और आधुनिक सांचे में सेट होने की वैचारिकता-चिंतन में रस्साकशी जारी है। मूल्यों के पराभाव के ऋणात्मक निर्देशांक प्रथम अक्षांश में कैसे आएं इस गणित के गुणा-भाग की जरुरत है। परंतु युगीन परिदृश्य में प्रश्न है-

                ‘‘माँ का क्या होगा?’’

भीष्म जी ने मध्यवर्गीय यथार्थ के टुच्चेपन पर एक प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य अपनाया है। माँ के रुप में पुरानी किंतु स्वस्थ परंपरा त्याज्य नहीं वरन् वरेण्य बनकर प्रस्तुत हुई है। संक्रमण और मूल्य-दृष्टियों के संघर्ष के दौर में, अतिरेक और अनावश्यक उत्साह से बचकर, बहुत संतुलित और संयत ढंग से परंपरा में जो कुछ स्पृहणीय एवं रक्षणीय है उसे उपेक्षा, तिरस्कार और भत्र्सना से बचाने का अर्थ खोजती है ‘चीफ  की दावत’। ‘अर्थ’ को ही जीवन का अर्थ बताने वालों का अर्थ शामनाथ के प्रतिनिधि पात्र से ध्वनित किया गया है। कहानी का अंत करुण है पर माँ की ममता को गौरवान्वित कर जाता है।