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Wednesday 22 Nov 2017

कबिरा खड़ा बाज़ार के बनने की कथा

शेष नारायण सिंह

506, आईएनएस बिल्डिंग

नई दिल्ली-110001

मो. 9911225283

एम के रैना देश के नामी रंगकर्मी हैं। भीष्म साहनी के नाटक कबिरा खड़ा बाज़ार में से उन्होंने बहुत नाम कमाया लेकिन इस नाटक को आम आदमी की चर्चा के दायरे में लाने में भी एम के रैना का बहुत योगदान है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि भीष्म साहनी के इस नाटक को कबिरा खड़ा बाज़ार में नाम एम के रैना ने ही दिया। भीष्म जी ने तो कोई और ही नाम दिया था। इस तरह से पिछले तीस साल से जो नाटक देखा जा रहा है उसमें भीष्म जी के साथ साथ एम के रैना की भाषा भी है, संगीत भी और शिल्प भी। क्योंकि भीष्म जी ने तो एक साहित्यिक नाटक लिखा था उसको मंच का नाटक एम के ने बनाया और इस नाटक को हिंदी नाटक के इतिहास में एक ऐसा मुकाम देने में योगदान किया जहां बहुत कम साहित्यिक कृतियाँ पहुंची हैं। साक्षात्कार के लिए एम के रैना से मिलते ही पहला सवाल यही पूछा-

कबिरा खड़ा बाज़ार में का मंचन ही क्यों किया?

ड्रामा स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरी मध्यप्रदेश की यात्राएँ बहुत होती थीं। बहुत काम किया मध्यप्रदेश में। हर यात्रा में कुमार गंधर्व के पास ज़रूर जाते थे। कुमार जी का जो कबीर के पदों में दखल है, उनकी जो प्रतिबद्धता थी, जिस प्यार से वे कबीर को गाते थे वह जादू भरा होता था। 1978 में ऐसी ही एक मुलाक़ात के बाद मेरे दोस्त सत्येन्द्र कुमार ने कहा कि कबीर पर कुछ करना है। दिल्ली आकर पता चला कि नाटकों के सर्किल में भीष्म साहनी का नाटक घूम रहा है। गिरीश कर्नाड और राजिंदर नाथ जैसे बड़े लोगों ने यह नाटक वापस कर दिया था। यह वह समय है जब हानूश का मंचन हो चुका था। हानूश ने दिल्ली के नाटक संसार में बहुत ऊंचा मुकाम हासिल कर लिया था। हम बहुत जूनियर थे इसलिए हमारी हिम्मत थी नहीं कि हम भीष्म जी से बात करते। लेकिन इस बीच एक उम्मीद जगी। हमारा दोस्त वेद धींगरा हिन्दू कालेज का  छात्र था और वह भीष्म जी को जानता था। उसने भीष्म जी से बात की और हमको हस्तलिखित पांडुलिपि लाकर दे दी। नाटक को पढऩे के बाद हमने देखा कि उसमें राजनीतिक ह्यूमनिज्म तो बिलकुल साफ़ था। उन दिनों देश में जनता पार्टी का राज था। कांग्रेस भी साफ्ट हिंदुत्व की राजनीति अपना रही थी और जनता पार्टी में राजनीतिक पार्टियों की दोहरी सदस्यता का मुद्दा गर्माया हुआ था। नाटक में इस सन्दर्भ से बात को बेहतरीन तरीके से विकसित किया गया था। लेकिन उसमें कहीं संगीत नहीं था। अब संगीत के बिना तो नाटक किया नहीं जा सकता था। लेकिन यह बात भीष्म जी से कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। मैंने तय किया कि बात तो करनी पड़ेगी। उनको खाने पर बुलाया। कश्मीरी खाना बनाया। उनकी पत्नी शीला जी भी आयीं। मेरे पास कबीर के पदों की दो रिकार्डिंग थी। बनारस के एक नाविक ने इकतारे पर गाया था। कभी कुमार गंधर्व जी ने मुझे भेंट किया था। संगीत सुनकर भीष्म जी को मज़ा आ रहा था। फिर मैंने हिम्मत जुटाई और कहा कि आपने अपने नाटक में संगीत नहीं रखा। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि मुझे संगीत नहीं आता इसलिए जब मैंने कहा कि संगीत डाले बिना तो नाटक नहीं हो पायेगा क्योंकि कबीर को उनके पदों, सबद, साखी और रमैनी के कारण ही जनमानस में लोग जानते हैं तो उन्होंने कहा कि आप संगीत डाल लो जहां ज़रूरी हो। उनकी इस मंजूरी के बाद एक बड़ा किला फतह हो चुका था।

उसके बाद नाटक के मंचन के लिए क्या किया?

उसके बाद चार महीने तक कबीर पर पढ़ाई की। हजारी प्रसाद द्विवेदी की किताब पढ़ी। उनसे मुलाक़ात भी की। पद तो बहुत हैं लेकिन नाटक में कौन से पद को पिरोना है, यह एक कठिन काम था। इसके पहले मैं खडिय़ा का घेरा (चाक सर्किल) कर चुका था। उसमें बहुत अच्छी तरह से सूफी संगीत का इस्तेमाल किया था। उसमें आक्रोश, प्रेम और अन्य भावनाओं को बहुत ही अच्छी तरह से प्रस्तुत किया गया था। इसी को ध्यान में रख कर कबीर के बीस पद चुने गए।

तब तो बात  बिलकुल आसान हो

गयी होगी?

अरे नहीं, कबीर के पद तो उनकी अपनी बोली में  थे जबकि भीष्म साहनी की भाषा साहित्यिक हिंदी है। इस समस्या के हल के लिए हमने अनीस आजमी से बात की। आजकल वे उर्दू अकादमी के अधिकारी हैं। तय यह हुआ कि नाटक में दलितों और समाज के गरीब वर्ग के लोगों की वही भाषा होगी जो कबीर साहेब की भाषा है। जबकि पंडित हिंदी बोलेंगे और तुर्क उर्दू में बोलेंगे। भाषा का मामला इस तरह से सही किया गया।

संगीत की बात को कैसे सुलझाया?

संगीत के लिए कुमार जी से मिलने उनके घर गया। इंदौर। घर में उनसे पहली बार मुलाक़ात हो रही थी। घर में घुसते ही देखा कि दुनाली बंदूकें रखी हैं। मैंने पूछा कि महाराज इतने बड़े संगीतकार के घर में बंदूकें? तानपूरा कहाँ है? उन्होंने कहा कि अन्दर आइये तानपूरा भी मिल जाएगा  ।  कुमार जी से मैंने भीष्म जी के नाटक के लिए संगीत देने को कहा। वे तुरंत तैयार हो गए लेकिन दिल्ली वापस आने पर कुमार शानी ने कहा कि कुमार जी तो शास्त्रीय विधा के संगीतज्ञ हैं। जबकि कबीर के पद और उनका समय लोक संगीत की मांग करता है।  फिर मुसीबत सामने आ गयी। लेकिन इस बीच  आकाशवाणी के  पंचानन पाठक से भेंट हो गयी। मुझे वे बहुत मानते थे। उन्होंने इप्टा में भी काम किया था और कबीर और रहीम के पदों की लोक पद्धति के ज्ञाता थे। उनका कानपुर से भी सम्बन्ध था और इस तरह से कानपुर की मेरी पत्नी को अपनी बेटी मानकर उन्होंने काम शुरू किया। मेरी पत्नी डाक्टर हैं लेकिन संगीत की अच्छी जानकार हैं। बस  संगीत की रिकार्डिंग शुरू हो गयी। लेकिन असली परेशानी तो अभी बाकी थी त्रिवेणी कला संगम के ओपन एयर थियेटर में नाटक की रिहर्सल शुरू हुई। भीष्म जी रिहर्सल देखने सपरिवार आते थे। नाटक की  प्रस्तुति के एक दिन पहले जब ग्रैंड रिहर्सल से जब वापस गए तो खासे नाराज़ थे। उनकी बेटी  कल्पना का फोन आया कि यह शीला भाटिया जैसा प्रोडक्शन क्यों तैयार कर दिया। बहुत निराश  हुआ लेकिन भीष्म जी से मिला। उन्होंने तीन पेज में वे प्वाइंट लिख कर दे दिए जो ठीक किए जाने थे। मैंने उनसे निवेदन किया कि नाटक की अपनी संरचना होती है जो थोड़ी अलग होती है।

मुसीबतें ख़त्म नहीं हुईं थीं। ऐन नाटक के दिन सिकंदर लोदी का रोल करने वाले कलाकार की मां की हत्या हो गयी। उस दिन मंच पर जाकर घोषणा की कि आज मंचन नहीं होगा। अगले दिन मैंने खुद ही सिकंदर लोदी का रोल किया और नाटक को दिल्ली में सराहा गया। भीष्म जी रोज़ आते थे। पांच दिन तक शो चला। दिल्ली में डंका बज गया फिर तो सूरत, रामपुर कई जगह किया। इस नाटक  को तीस साल से खेला जा रहा है और जब भी प्रस्तुत होता है पहले से ज़्यादा लोकप्रिय हो जाता है। इस मंचन के बाद भीष्म साहनी के नाटक का प्रकाशन हुआ उन्होंने अपना वाला ही छापा। नाम भी वही मूल वाला ही रखा। इस तरह से इस नाटक के दो रूप उपलब्ध हैं एक साहित्यिक और दूसरा मंचीय।

कबिरा के बाद भी भीष्म साहनी का कोई नाटक किया?

हां, मुआवज़े। यह नाटक मूल रूप से पंजाबी में लिखा गया था। उनकी बेटी कल्पना साहनी के घर पर रीडिंग की  लेकिन पंजाबी का कोई अभिनेता नहीं मिला, तो भीष्म जी ने  हिंदी में मुआवज़े लिख दिया। मुआवज़े भी बहुत सफल रहा। बाद में तो हानूश भी किया। उसके बाद तो वे मुझको बहुत पसंद करने लगे। हालत यह थी कि भीष्म जी कुछ भी लिखते थे तो हमको बताते ज़रूर थे। मैंने माधवी और आलमगीर का भी मंचन किया। भीष्म जी के सभी नाटकों में उनकी राजनीतिक सूझ बूझ और समाज के प्रति दायित्व साफ़  नजऱ आता था। शायद इसलिए उनके बाद की कई पीढिय़ों में उनका सम्मान बना हुआ  है।