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Thursday 23 Nov 2017

‘क्या यहां से चला गया कोई’

सूर्यबाला

बी-504, रुनवाल सेंटर, गोवंडी स्टेशन रोड,

देवनार, चेंबूर, मुंबई - 88

मो. 9930968670

शाम  टी.वी. पर खबरें आ रही हैं। अचानक स्क्रीन पर नीचे एक पंक्ति सरकती चली जाती है -‘वरिष्ठ साहित्यकार भीष्म साहनी नहीं रहे।’... स्तब्ध, अवाक, आंखें बार-बार उन भागते शब्दों का बेचैनी से पीछा करती हैं। अंग्रेजी में भी उन्हीं शब्दों का अनुवाद। अगली सुबह तक सब कहीं एक ही समाचार और बीच-बीच में टीवी पर झलकता वही संजीदा, बेपनाह आत्मीयता से भरपूर चेहरा।

पूरे दिन जब भी किसी का फोन आया, बातें हुईं, अनायास मुंह से निकला, आज मन बहुत उदास है। लेकिन आश्चर्य, मेरी उदासी का सबब पूछे बिना, सुननेवाला कह पड़ता है -‘भीष्मजी के लिए न!... अभी-अभी फलां से यही बात हो रही थी।’

शायद इधर बहुत दिनों बाद किसी के लिए आंखें इस तरह पूरे दिन, जब-तब गीली हो आई। मन-मन में एक बहुत अबोली, बूंद-बूंद श्रद्धांजलि अर्पित होती रही।

चार-छह दिनों पहले कैसेट में बेगम अख्तर की गाई गजल बजी थी -‘दिल की दुनिया उजाड़ सी क्यूं है... क्या यहां से चला गया कोई’... इस वक्त वह गजल लगातार अपने चारों तरफ  प्रतिध्वनित होती महसूस हो रही है।

बी.ए. में पढ़ती थी तो वृंदावन लाल वर्मा की ‘विराटा की पद्मिनी’ की एक पंक्ति मुझे बड़ी अच्छी लगी थी, आज तक विस्मृत नहीं हो पाई - उडि़ गए फुलवा, रह गयी बास.... वैसे ही सुवास का वलय, चलते-फिरते, उठते-बैठते अपने चारों और महसूस हो रहा है।

अचानक ही दिल्ली जाना हुआ था। कुल दो चार दिनों की मुहलत। घरबारी अस्तव्यस्तताओं का घटाटोप... लेकिन मन ‘तमस’ और ‘पाली’ के लेखक भीष्म साहनी के फोन का नंबर खटकाने को आतुर था। संकोच भी, बहुत न कभी की देखा-देखी, न प्रत्यक्ष परिचय या पहचान। तो क्या... घुमा देती हूं फोन। घुमाया। मिल गया नंबर। मिल गए भीष्म जी। बताया कि मैं सूर्यबाला बोल रही हूं। क्षमा भी मांगी कि बगैर किसी पूर्व सूचना या काम विशेष के, ऐसे ही आपसे मिलने, आना चाहती हूं...

तत्क्षण भरपूर अपनेपन से बोले - ‘जरूर आइये, शीला भी बहुत मिलना चाहती हैं आप से। बताइये, कब आ रही हैं?’

हर शब्द से मिली राहत के बावजूद मन में संकोच गहराया था -‘मेरे पास तो आज का ही एक दिन है... आपको कोई और जरूरी काम हो तो’- स्नेहपूर्वक मुझे आश्वस्त करते हुए बोले थे-

‘इस वक्त सबसे जरूरी काम यही... आप बिल्कुल आइये।’

पहुंची तो, जैसे पहले से ही खोल कर रखा घर का दरवाजा... हुलसती शीला जी और पीछे खड़े संकोची भीष्म जी। सहज, आत्मीय मुस्कानें.... अपरिचित? कहां? कितनी बार तो मिले हैं... सीधे आपसे न सही आपकी रचनाओं के माध्यम से... ऐसा ही मेरे लिए शीला जी ने कहा, ऐसा ही मैंने भीष्म जी के लिये सोचा। बरसों बरस की पहचान।... बैठी तो बैठी ही रह गयी, ढाई-तीन घंटे। कहीं कोई ऊहापोह नहीं, भरपूर इत्मीनान और हल्केपन का अहसास। अपने प्रकाशक, प्रभात प्रकाशन के श्यामसुंदर जी को समय दिया था। काफी देर से पहुंची तो बोले - ‘इतने पूरे समय भीष्म जी के ही पास रहीं?.... जरूर कोई बड़ा काम रहा होगा’....

सचमुच उस दिन एक बड़ा काम हुआ था। एक लेखक को कैसे जीना और रहना चाहिये, कितने निस्पृह मामूलीपन से, यह जाना था। जैसे कुहासे छंटे हों और आकाश को एक निर्मल, स्वच्छ विस्तार मिला हो। वह सादगी, वह शालीन आत्मीयता, मन में मेंहदी सी रचती चली गई थी। आत्मा धुली, पुंछी, सुथरी सी महसूस हुई थी। बड़े लेखक तो मिल भी जाते हैं, नहीं मिलता तो बड़ा आदमी।

छद्म, बौद्धिक शिखरवार्ताओं और कुतर्कों से परहेज था उन्हें। अपने अनुभवों और लेखन से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण बातें भी इतने संकोच से बताते कि सुनने वाले को भूले से भी उनके ‘बड़ेपन’ का आभास न हो पाये। पूरी कोशिश रहती कि सामने बैठे व्यक्ति को उसकी लघुता का अहसास न होने दिया जाय। बचपन दुहराते तो बच्चे हो जाते। मां, बलराज जी, अनुशासनप्रिय पिता की सख्ती, दीवारों पर टंगे, छपे छपाये नैतिक नियम -‘सत्यंवद, धर्मम् चर’ ‘सादापन जीवन, सजावट मृत्यु है’, शर्मीली मुस्कुराहट के साथ बताया - ‘सादापन का अर्थ था, घुटा हुआ सिर, उस पर नाचती चुटिया, बड़े भाई के उतरे कपड़े’...

छुटपन के विरोधी अहसासों की बातों का जिक्र भी मुस्कराते हुए ही - पांचेक वर्ष का रहा होऊंगा, तभी अक्षरबोध भी नहीं हुआ था और अष्टाध्यायी के सूत्र कंठस्थ करने पड़ते थे -‘अदेगुण:’, ‘इकोगुण वृदि:’ इनके मतलब आज तक नहीं मालूम’ ... और हंस पड़े थे भीष्म जी।

मैंने आज तक किसी ‘बड़े’ लेखक क्या छोटे लेखक को भी उनकी सी निश्छल, पारदर्शी हंसी हंसते नहीं पाया। जितना कुछ कहते, उससे बहुत ज्यादा मिल जाया करता। शब्दों के साथ जुड़ी पारदर्शिता, आंखों में स्फटिक सी झलमलाती। मामूलीपन की यह सादगी बेजोड़ थी।

हमेशा अपने लिखे, अपनी उपलब्धियों की बात से कतराते रहने वाले, शरमीलेपन की हद तक संकोची। उनकी लिखी पहली कहानी की बात पूछी तो -‘किसी दुखिया नारी की थी... बड़े बेसिर-पैर की कहानी रही होगी। आज भी याद करता हूं तो झेंप-सी महसूस होती है।’ 

मैंने ‘तमस’ की ओर बात घुमाई - अपने समय का दस्तावेज, हर भाषा, हर साहित्य में नहीं हुआ करता ऐसा उपन्यास। जवाब में भरपूर संकोच से सिर्फ  इतना कहा जाता है -‘तमस’ तो लिखना ही था मुझे, इतना कुछ देखा गुजरा था। लेकिन जहां तक यश की बात है, उसका श्रेय फिल्मानेवाले को है, फिल्म किसने बनाई, यश किसे मिला।’

‘पाली’, ‘अमृतसर आ गया है’, ‘चीफ की दावत’, ‘वांङचू’ जैसी कहानियां, ‘झरोखे’, ‘तमस’, ‘मय्यादास की माड़ी’ जैसे उपन्यासों, जीवनी और कई नाटकों के यशस्वी लेखक की विनम्रता और संकोच की हद ही हुई न। उनकी किसी भी रचना, पुस्तक की प्रशंसा करो, बचकर निकलने की ही कोशिश या फिर बेहद संकोच भरा स्वीकार। न वह संकोच बनावटी होता, न विनम्रता। पत्रों में भी अपने खिलाफ  लिखने से बाज नहीं आते। ‘कुंतो’ पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया भेजी तो जवाब आता है -‘आपकी प्रतिक्रिया में स्नेह और सद्भावना अधिक और आलोचना कम नजर आई। इसने भी गहरे दिल को छुआ, पर काश, आप त्रुटियों की ओर ध्यान दिला पातीं! आपकी दृष्टि तथा विचारों का मैं ऊंचा मूल्य आंकता हूं। मुझे निश्चय ही अपने काम को देखने-परखने में आपके दो-टूक विचारों से सहायता मिलती।’

इतनी सहजता और निश्छलता से कोई वरिष्ठ रचनाकार अपने से अ_ाईस वर्ष छोटी लेखिका के सामने उसकी प्रशंसा तथा अपनी सीमाओं का इजहार कर सकता है आज की तारीख में? .... सिर्फ  प्रशंसा नहीं, एक प्रच्छन्न सीख भी, समीक्षा और मूल्यांकन के समय शुद्ध विवेकी, तटस्थ और निष्पक्ष दृष्टि से काम लो, वरिष्ठता और कनिष्ठता भूल जाओ... लेकिन आज की वस्तुस्थिति क्या यह नहीं है कि साफ  नीयत से की गई, समझाई गई चूकों से भी बड़े-छोटे रचनाकार ‘तैश’ खा जाते हैं। आत्म-स्वीकृति और आत्मालोचन की बात तो बहुत दूर है। यह सच्चा सा दर्पण बस भीष्मजी के पास था। शायद ऐसी हस्तियां सांचों में नहीं ढलतीं। खुद अपने सांचे गढ़ती और तोड़ देती हैं।

दिल्ली अब अपनी लगने लगी थी। कभी कभार दो-चार दिन को जाओ तो वहां मन्नू जी, विष्णु (प्रभाकर) जी, शीला जी और भीष्म जी होंगे, सोचकर अच्छा लगता। दूसरी बार दिसंबर में पहुंची थी दिल्ली, तो मन फिर हो आया। बेटे से पूछा तो बोला, सुबह ऑफिस पहुंचने से पहले जाते वक्त ही ले चल सकता हूं। ...बहुत दूर है।...’ इतनी कडक़ड़ाती ठंड में, मन अंदर से फटकारता है, उनकी उम्र का तो ख्याल करो। सिर्फ इसलिए किसी के घर धमक पडऩा कि बेटा सुबह ही ऑफिस पहुंचने से पहले रास्ते में तुम्हें छोड़ सकता है। लेकिन फोन शीला जी के हाथ लग जाता है -‘अरे तो क्या हुआ... हम दोनों सुबह की सैर से जल्दी लौट आयेंगे। आप बस आ जाइये। नाश्ता भी हमारे साथ ही कीजिएगा... जो हम करते हैं बस वही....

जानबूझ कर यथासंभव देर से पहुंची थी लेकिन वे दोनों सैर से जल्दी लौट कर मेरा इंतजार कर रहे थे। कड़ी ठंड से बचाव वाले कश्मीरी कुर्ते-सलवार पर कस कर लपेटी शॉल में शीला जी और मोटे पुलोवर में भीष्म जी। कुनमुनी धूप में खुली, खिली, मुस्कुराहटों की ऊष्मा। हम बाहर खुले में कुर्सियां खींच कर बैठ लिये। शीला जी ने चाव भरी उत्फुल्लता से, बीच की छोटी सी मेज पर, टोस्ट मक्खन, फल और खजूर रख दिये। अंदर कुछ लेने जातीं, तो सफेद रेशमी बालों की लंबी सी चोटी पीठ पर लहराती होती। बोलती ही जातीं, बोलती ही लौटतीं। सिलसिला टूटता नहीं। न बातों का न छलकती हंसी का। बतकहियों की रंगीन चादर सी बुनती जातीं। बीच-बीच में भीष्म जी महीन बूटे से टांकते।

हर बार उनके पास से वापस आने के बाद, घंटों उन्हीं पर लिखते रहना चाहा था लेकिन समय और स्वास्थ्य ने मुहलत नहीं दी। कई-कई पृष्ठ आधे-अधूरे, तितर-बितर होते रहे... साल-दर-साल गुजरते रहे... और अचानक एक दिन उनका खत मिलता है -‘सूर्यबाला जी आपको एक दु:खद सूचना देनी है, शीला नहीं रही। लगभग महीने भर पहले उसकी तबीयत सहसा बिगड़ गई, वह सुस्त पडऩे लगी। दो सप्ताह अस्पताल में रही, फिर एक दिन प्रात: चुपचाप ही जैसे सब छोड़ कर चली गई। मैं इस स्थिति में नहीं था कि आपको यथासमय सूचित कर पाता।... उसे मैं जिंदगी में कुछ दे तो नहीं पाया पर उससे जो मिला वह मेरे लिये अमूल्य था। उसके चले जाने से, लगता है, किसी वीराने में पहुंच गया हूं। हमारा बहुत लंबा साथ रहा।’

महीने भर बाद भी खत लिखते हुए जैसे वे शीलाजी के अंतिम क्षणों को देख रहे थे। वह साथ मैंने देखा था। बहुतों ने देखा होगा। हमेशा अपने तानों उलाहनों के साथ भीष्म जी के चारों ओर मंडराती रहने वाली शीलाजी - ‘सूर्यबाला जी! जानती हैं ‘भीष्म’ ने कितने-कितने साल होम किये मास्को में... मैं हमेशा कहा करती थी, भीष्म कुछ तो चेतो... इनसे पूछिए, इन्होंने कभी मेरा कहना माना? ...दूसरे कामों के पीछे अपना बहुत हर्ज किया इन्होंने सूर्यबाला जी... कहीं जिंदगी ऐसे चलती है। इन्हें दबाते जाओ, बेगार लेते जाओ, उफ नहीं करेंगे ये। मैं कुछ कहती हूं तो सुनते नहीं... आप बताइये, इतना सीधा भी क्या होना कि... और अचानक रूक जाती हैं - आपको लग रहा होगा कि आईं तो आप भीष्म से मिलने और बोलती मैं जा रही हूं।’ 

‘नासमझ’  भीष्म शर्मीले किशोर से मुस्कुराते रहते... जैसे फूल बटोर रहे हों। हां फूल... बहुत बटोरे उन्होंने। हर पीढ़ी के छोटे और बड़े रचनाकारों के आदर और प्यार के फूल... ‘नासमझ’ और लापरवाह वे सिर्फ अपने लिये थे। दूसरों का काम हमेशा पहली प्राथमिकता पर।

भीष्म जी को पता होता, मुझे भी, ये उलाहने उनके आपसी रिश्तों की जान हैं। साझेदारी है, गुस्से की, अभिमान की। शीलाजी का कोई वाक्य ‘भीष्म’ के बिना पूरा होता ही नहीं था। जी भर कर खींझती थीं। उन्हें तानों, उलाहनों से बेधती नहीं, नवाजतीं थीं जैसे... क्योंकि उन सबके केन्द्र में ‘भीष्म’ होते थे। रचनाकार भीष्म के सीधेपन और सादगी की प्रच्छन्न प्रशस्ति। उन्हें और ज्यादा प्रतिष्ठा और ज्यादा यश मिले, इसकी एक सात्विक आकुलता। ... बेपनाह शिकायतों के बीच, बेपनाह प्यार छलछलाता होता था। सम्बन्धों की पारस्परिकता और सघनता से भरीपूरी एक खुली-खुली सी जिंदगी। इस सादगी से भरपूरी खूबसूरती के सामने, आदमीयत सर झुकाती थी, सदके जाती थी- कि देखो, इस बेमुरौव्वत समय में भी कितनी पारदर्शी निर्मलता के साथ जिया जाता है।  उस ईस्ट पटेल नगर वाले घर की, शीलाजी के बिना मैं कल्पना नहीं कर पाई थी। इस कमरे से उस कमरे, इस मेज से उस दराज, जीने के ऊपर से नीचे तक, मुझे लेकर चढ़तीं-उतरतीं शीलाजी... सूर्यबालाजी! आपने भीष्म के बचपन की स्मृतियोंवाला उपन्यास पढ़ा है? और मुझे याद करने की कोशिश करते देख, ‘ठहरिए, मैं निकालकर देती हूं आपको। एकाध कॉपी होगी जरूर। आइए ऊपर, आपको अपनी पेंटिंग्स दिखाती हूं।’ इस कमरे से उस कमरे तक कागजों, कैनवस पर फैला रंगों का अनूठा संसार...। किशोरी-सी चपल उत्साह से भरी शीलाजी। पीठ पर वही कोसा सिल्क की लच्छियों-सी-लंबी चोटी। सत्तर की उम्र में सत्रह-सा चाव, भीष्मजी की जिंदगी को रंगों और रौनक से भरा-पूरा रखने का। मीठे गुरूर से भरी बच्चों की बातें, यादें....। उन यादों में अब शीलाजी की भी यादें ईस्ट पटेलनगर वाले घर के साथ जुड़ गईं थीं। उस वीराने में कब तक रह पाते भीष्मजी! इसलिए बेटे के पास आ गए थे।

लेकिन अपने अकेलेपन को कभी गतिशीलता का अवरोध नहीं बनने दिया। दूसरों का साथ देने के लिए हमेशा तैयार। काफी पहले साहित्य अकादमी के विशेषांक ‘उत्तरा’ में मेरी कहानी ‘गृह-प्रवेश’ का अंग्रेजी अनुवाद छपा था। वह प्रति खो गई थी और अंक की प्रकाशन तिथि, वर्ष कुछ भी याद नहीं था। पहले, के. सच्चिदानंदजी को लिखा, फिर एक पोस्टकार्ड भीष्मजी को भी डाल दिया। कुल दो सप्ताह के अंदर ‘उत्तरा’ का वह अंक डाक से मेरे पास पहुंच गया था। मुझे मालूम है किस तरह उन्होंने वर्षों पुराना तिथि, वर्षहीन वह अंक निकलवाकर भिजवाया होगा मेरे पास, लेकिन अपनी मुश्किलों की कभी बात ही नहीं। हमेशा दूसरों की मुश्किलों को ही आसान करने की कोशिश।

शीलाजी के जाने के बाद, अगले तीन वर्षों में जब भी कहीं उनकी कोई रचना पढ़ी, हर जगह शीलाजी की हलकी सी झलक। स्वाभाविक भी था। ‘वागर्थ’ में ‘चीलें’ पढक़र पत्र लिखा था तो जवाब आया -‘व्याकुल मन से लिखी कहानी थी। लगता है, कहानी के नाते कमजोर बन पाई है।’ सबसे ज्यादा निर्मम अपने लिए ही होते देखा उनको। मन कितना भी आकुल व्याकुल हो, रचना कर्म को लेकर आत्मानुशासन की डंडी वैसी ही कठोर किसी गलतफहमी की गुंजाइश नहीं रखते थे। लिखने का मन बन रहा है तो ही लिखेंगे। धैर्यपूर्वक मनोयोग से। भागते समय को लेकर किसी तरह की आपाधापी नहीं। शब्द धीरे-धीरे फूल की तरह खिलेंगे। कहीं पंखुरियों को कोई खींच कर खिलाता है!

एक बुजुर्ग लेखक मधु शर्माजी की पुस्तक की भूमिका लिखनी थी। भीष्म जी को ससंकोच ही पत्र लिखकर पूछा। लौटती डाक से उत्तर आ गया -‘उनसे कहिये, दिक्कत की कोई बात नहीं, मैं विविध भारती के समय से जानता हूं उन्हें... पुस्तक मेरे पास भेज दें... मैं लिख लूंगा...’

इस समय में होकर भी इस समय के नहीं थे भीष्मजी। कभी समय को कोसते नहीं सुना उन्हें। समय की बात चलती तो इस समय को भी तो हमीं ने बनाया है। जैसे हम, वैसा समय। क्यों न समय को बेहतर बनाने की कोशिश की जाये! इसलिए सत्व और तत्व ही चुने। अच्छाइयां ढूंढते, चुनौतियों पर बातें करते। नए लेखकों की खूबियों और सेंसिविटी को बखानते।

लोग कहते हैं, आदमी के जाने के बाद उसकी ज्यादा याद आती है। लेकिन भीष्मजी जब थे तब भी प्राय: नेकनीयती खुद्दारी शाइस्तगी और संजीदगी, की बातें चलतीं तो वे सामने मुसकराते खड़े होते।

जाना सबको है आगे-पीछे। कोई बड़ी बात नहीं। बड़ी बात है आज के समय में, किसी एक जानेवाले के लिए इतने लोगों का उदास हो जाना! समय की सूखती संवेदना, संकरी होती चौहद्दियों और साहित्य के बाजार की बदहवास रफ्तार के बीच बिना जरा भी विचलित हुए, निद्र्वन्द्व विचर लेना अपने फकीरी बाने में।

उनके पास होना, बहुत सारे द्वन्द्वों और बेचैनियों का समाधान होता। एक उजास से भरता। अपने आप के प्रति आश्वस्त करता। एक बार मुझे लिखा था- ‘हमें परेशान करने वाले नकारात्मक तत्व बहुत हैं पर इनके बावजूद कलम चलती रहे, हम जीवन के स्पंदन को महसूस करते और कागज पर उतारते रहें, यही बहुत है।’ शायद इसीलिए उनका याद आते रहना बहुत जरूरी है... ‘लेखक’ से ज्यादा अपने अंदर के आदमी को बचाये रखने के लिये।