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Monday 20 Nov 2017

भीष्म साहनी होने के मायने

डॉ. सेवाराम त्रिपाठी

रजनीगंधा-6

शिल्पी उपवन, श्रीयुत नगर

रीवा (म.प्र.) - 486002

मो. 09425185272

भीष्म साहनी को स्मरण करना केवल एक बड़े लेखक को स्मरण करना भर नहीं है। एक भरी-पूरी मनुष्यता को स्मरण करना भी है। प्रगतिशील लेखक संघ के एक निस्पृह संगठनकत्र्ता को इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) के एक समर्पित कार्यकर्ता को स्मरण करना है। भीष्मजी को स्मरण करना उनके युग,युगीन संघर्षों को भी स्मरण करना है। 1915 से लेकर 2003 तक का समय भारतीय इतिहास में उत्साह, उमंग, निराशा, हताशा, आज़ादी और जनतंत्र का समय है तो दूसरी ओर भारतीय प्रजातंत्र के उतार चढ़ाव का भी समय है। भीष्म जी मुझे बतियाते हुए, चलते फिरते हुए, अभिनय करते हुए रंगमंच की बारीकियों पर संवाद करते हुए, साम्प्रदायिकता के घिनौने और वीभत्स रूपों की चर्चा करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। मुझे भीष्मजी मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा पर विश्वास करते हुए दिखाई पड़ते हैं।

                ‘आज के जमाने में सबसे अधिक चर्चा जनता, जनसाधारण की रही है। और आज के जमाने में सबसे अधिक उत्पीडऩ भी जनसाधारण का ही हुआ है। जनता की चर्चा सुनते हुए कान फटे जाते हैं। पर मुझे तो लगता है कि जब से यह चर्चा आरंभ हुई है, जनसाधारण का उत्पीडऩ बढ़ा है। उसके  अधिकारों की चर्चा बढ़ चढक़र होती है। उसे युग निर्माता तक कहा जाता है।’ (हिंसा की संस्कृति भीष्म साहनी के अंतिम समय के अधूरे लेख का हिस्सा)

                भीष्म साहनी बेहद सीधे, सहज और ठेठ देशी आदमी के रूप में पहचाने जाते रहे हैं। सादगी, सरलता और आत्मीयता उनका एक अत्यन्त आवश्यक और दुर्लभ गुण था। 1977 में उनसे मेरी पहली भेंट हुई थी दिल्ली के काफी हाउस में। जब मैं उनसे मिला तो मन में एक हिचक थी लेकिन पहली ही मुलाकात में वे मुझे बेहद अपने से लगे थे अत्यन्त आत्मीय और मनुष्यता से ओत-प्रोत। उस समय मेरे साथ थे आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी और युवा साथी श्याम कश्यप। हम लोग घंटे भर गपशप करते रहे। ऐसा लगा जैसे मेरी भीष्म जी से बहुत पुरानी जान पहचान है। प्राय: उनको हर जानने पहचानने वाला उनकी सादगी की चर्चा जरूर करता है। बकौल कृष्णा सोबती ‘नोक पलक तराशी हुई। चन्द मिनटों में हम यह भूल ही गये कि भीष्म वह चेहरा है जो हम आप में से किसी का बेटा हो सकता है, किसी का भाई, किसी का भतीजा और किसी का दोस्त। कहने का मतलब यह है कि आप किसी भी कबीले में भीष्म जैसे बरखुरदार को मजबूती से बंधा देख सकते हैं। भीष्म जो है वह सामने है। जितनी आँख और सब्र आपके पास है उतना ही सहजपन आप भीष्म के इर्दगिर्द देख सकते हैं या पा सकते हैं। भीष्म के पास कोई हाशिया नहीं है। कोई परदा नहीं है। वह सादगी पसंद सहज मिज़ाज इनसान है। भीष्म का पूरा व्यक्तित्व दायें बायें विस्तार का नहीं उसकी शख्सियत गहराई में बड़ी सादगी से अंटी है। ’(हम हशमत)

                भीष्म जी बेहद विनम्र हैं लेकिन उनकी विनम्रता में सादगी और सहजता में एक किस्म की दृढ़ता भी है इस दृढ़ता में उनकी तुलना महाकवि तुलसीदास से की जा सकती है। और इसी दृढ़ता से भीष्म साहनी जैसे प्रतिबद्ध, संवेदनशील, विचारवान, ऊर्जावान और कला पारखी लेखक से हमारा साक्षात्कार होता है। भीष्म जी के लेखन में आक्रामकता नहीं होती। अपनी बातें वे अत्यन्त सहजता से कहते चले जाते हैं और सच मानिए पाठक उसमें रमता है, रस लेता है, सोचता विचारता है और एक मंजि़ल तक पहुंचता है। उनका लेखन प्रतिरोध का जीता जागता उदाहरण है लेकिन इस प्रतिरोध में उखाड़ पछाड़ के लिये कोई जगह नहीं है। बहुत शांत स्वर है लेकिन दृढ़ता पर्याप्त है।

                भीष्मजी अवधेश प्रताप सिंह विश्विद्यालय, रीवा के एक कार्यक्रम में आये। यह मार्च का महीना था। मेरी इच्छा थी कि वे मेरे घर आयें। 13 मार्च को मेरे छोटे बेटे अभिषेक का जन्मदिन है। मैंने उनसे आग्रह किया और वे मेरे घर आये यह बात 1990 की है। साथ में उनकी पत्नी शीलाजी भी थीं। छोटा सा कार्यक्रम था, जिसमें बैरिस्टर गुलशेर अहमद, प्रो. कमला प्रसाद, विजय अग्रवाल, जयराम शुक्ल, भगवती प्रसाद शुक्ल और पचासों लोग शामिल हुए। वह मेरे बेटे का एक यादगार जन्मदिन था। दूसरे दिन हम लोग चचाई प्रपात देखने गये। आने वाले दो दिनों तक गहमा-गहमी रही। उनके व्यवहार की सहजता की चर्चा सब जगह थी, सभी ओर उनकी धूम थी। इस दौर के भीष्म जी के तीन चार फोटोग्राफ्स भी मेरे पास हैं। भीष्म जी में जो आकर्षण था उसका जिक्र अरुण कमल जी ने इस प्रकार किया है। ‘भीष्मजी का बात व्यवहार उनका मिलनसार स्वभाव सब कुछ आकर्षक था। उनके बोलने का तरीका, एक पाँव आगे बढ़ा चौवों पर बल डाले थोड़ा झूमते और ललाट पर एक लट गोल खेलती, तराशी हुई भाषा और आँखों में गहरी करुणा। भीष्मजी का लेखन भी तो ऐसा ही है। धोखा देने वाली सादगी जो भाषा के गहन संस्कार का फल है और गहरी करुणा।’

                भीष्म जी की रचनाशीलता छोटी नहीं है। उपन्यास, कहानियां, नाटक, आत्मकथा और अन्य। उनके उपन्यास हैं-कुन्तो, तमस, बसंती कडिय़ाँ, झरोखे, मय्यादास की माड़ी, नीलू नीलिमा नीलोफर। कहानी संग्रह-निशाचर, पाली, डायन, शोभायात्रा, वांङचू, पटरियां, भटकती राख, पहला पाठ, प्रतिनिधि कहानियां। नाटक-कबिरा खड़ा बजार में, हानूश, माधवी, मुआवजे और आत्मकथा आज के अतीत।

                भीष्मजी हिन्दी के प्रगतिशील और प्रतिबद्ध साहित्यकार थे। उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया है। वे सांस्कृतिक मोर्चे की अगुवाई भी करते रहे। अफ्रोएशियाई लेखक संघ और इप्टा के साथ जुडक़र अपनी संघर्षशील भूमिका को व्यापक स्तर पर निभाया। वे प्रगातिशील लेखक संघ में कार्य कर उसकी भूमिका को अग्रणी रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। वे अपने लेखन में सामाजिक यथार्थ को कभी ओझल नहीं होने देते। वे मानवीय मूल्यों की गहरी पहचान रखने वाले रचनाकार थे। वे आधुनिक भारतीय समाज की तमाम परतों को जीवन की पेचीदा स्थितियों को, परिवेश, पात्रों और वस्तुस्थितियों को बहुत गहरी दृष्टि से देखते, पहचानते हैं। उनकी रचनात्मकता में यथास्थितिवाद और जड़ताओं के खि़लाफ़ प्रतिरोध है। मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। चीफ  की दावत, अमृतसर आ गया है और वांङचू जैसी कहानियाँ उन्होंने लिखी हैं जो निश्चय ही उपन्यास जैसा प्रभाव छोड़ती हैं। उनकी कहानियाँ सरल, सहज और सपाट होने का अहसास कराती हैं। इन कहानियों में सामाजिक चेतना के प्रति निष्ठा है। इन कहानियों के पात्र जीवन की विडंबनाओं के अनोखे रूप हैं। 

                भीष्म जी के चिन्तन, मनन, सोच और लेखन में उनके व्यवहार में हर कहीं खुलापन है। किसी अतिरिक्त किस्म के बड़प्पन का बोझ नहीं। वे अपनी भावनाओं एवं विचार प्रणाली में भीष्म की ही तरह दृढ़ थे। वे गम्भीर से गम्भीर विचार भी अत्यन्त सहजता के साथ सम्प्रेषित करने में सक्षम और समर्थ थे। भीष्म जी के मैंने बीसियों बार व्याख्यान सुने हैं, उनका अंदाज बतकही का ही होता था। वे श्रोताओं को अपने सम्मोहन में बांध लेते थे। म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय अधिवेशन गुना में उनको सुनने के लिए बहुत बड़ी तादाद में लोग आये। भीष्म जी ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता और फिरकापरस्ती की स्थिति की असलियत को उजागर करते हुए भारत की सामासिक और साझी संस्कृति का महत्वपूर्ण नज़रिया पेश किया। उन्होंने कहा-‘भाषा आदमी को आदमी से जोडऩे के लिये है अलग करने के लिए नहीं। यदि मैं किसी विशेष भाषा को पढ़ता हूँ तो वहाँ के लोगों और वहाँ की संस्कृति से जुड़ जाता हूँ। चूंकि हमने विरासत में साझी संस्कृति को पाया है इसलिये हमें उस पर सभी का साझा अधिकार मानना चाहिये। भारत ऐसा पहला देश है जहां भाषाओं को इतने लम्बे समय तक दंगों और अलगाव का मुद्दा बनाया जा रहा है।’ अयोध्या की बात उठाते हुए उन्होंने कहा कि ‘ऐसी क्या बात है कि जो खुदा और राम 500 वर्षों से एक साथ रह रहे थे उन्हें एक ही वर्ष में अलग किया जा रहा है।’

भीष्म जी के लेखन में उनकी गैरसाम्प्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष दृष्टि हमेशा सक्रिय रही है। साम्प्रदायिकता के निरन्तर बढऩे का असली कारण है राजसत्ता के द्वारा धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना में की गई ग़लतियां। धर्म निरपेक्षता का इस्तेमाल सभी धर्मों को प्रश्रय देने में रहा है। भीष्म साहनी साम्प्रदायिकता के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक स्रोतों और कारणों को बखूबी समझते थे। भीष्म जी की रचनाओं में हर तरह के पात्र हैं उनकी समस्याएं और उनके संघर्ष भी हैं। उन्होंने अपने पात्रों के परिवेश को गहरी संवेदना और आत्मीयता से उठाया है, और उनकी चारित्रिक खूबियों और खामियों का विश्लेषण, मूल्यांकन किया है। विषयवस्तु के अन्तर्तत्वों की सूक्ष्मता के साथ पड़ताल की है। उनकी पारदर्शी दृष्टि हमारी आंखें खोलने में समर्थ है। भीष्म जी ने साम्प्रदायिक दंगे अपनी आंखों से देखे हैं। अपने आसपास देखे हैं। वे उसकी क्रूरता और मारक क्षमता और विभीषिका की नस-नस पहचानते हैं। ‘तमस’ की शुरुआती पंक्तियाँ भारत-पाक विभाजन की त्रासदी और हिन्दू मुसलमानों के बीच के सौहाद्र्र टूटने की भयावह गाथा है। ‘आले में रखे दीये ने फिर से झपकी ली। ऊपर दीवार में छत के पास से दो ईंटें निकली हुई थीं। जब-जब वहां से हवा का झोंका आता दीये की बत्ती झपक जाती और कोठरी की दीवारों पर साये से डोल जाते। थोड़ी देर बाद बत्ती अपने आप सीधी हो जाती और उसमें से उठने वाली धुँएं की लकीर आले को चाटती हुई फिर से ऊपर की ओर सीधे रुख जाने लगती। नत्थू की साँस धौंकनी की तरह चल रही थी और उसे लगा जैसे उसके साँस के ही कारण दीये की बत्ती झपकने लगी है।’

तमस में जिस तरह के यथार्थ का चित्रण हुआ है वह जटिल और भयावह है। वह साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को खारिज करता है। तमस में ऐसे-ऐसे दारुण प्रसंग हैं। जिसमें बच्चों को गोद लिये नारियां कुएं में छलांग लगा देती हैं। चीलें, कौए और गिद्धों का मंडराना, लाशों का फूलना, गलियों का सुनसान पड़ जाना। भीष्म जी ने विस्तार से इसका वर्णन किया है। भीष्म जी ने लिखा है दिन के उजाले  में शहर अधमरा सा पड़ा था, मानों उसे सांप सूंघ गया हो।...सत्रह दूकानें जल कर राख हो चुकीं थीं। सम्भवत: इसीलिये वे उसके स्वरूप का यथार्थ चित्रण कर पाये हैं। उनका कहना है कि साम्प्रदायिकता की समस्या बंटवारे के साथ खत्म नहीं हो गई। वह एक मनोवृत्ति है। वह रवैया आज भी हमारे समाज में रह-रहकर अपना भयावह रूप दिखाता हैं। दंगों का प्रभाव भयावह रूप से सभी जगह पड़ता है। कितने लोग मारे जाते हैं। स्त्रियों की इज़्ज़त लूटी जाती है। घर जलाये जाते हैं। सम्पति का नुकसान होता है। इसी के साथ सद्भाव, मेलजोल और सहिष्णुता और भाईचारे को अविश्वास में तब्दील कर दिया जाता है। कितनों के परिवार अनाथ हो जाते हैं। सम्भवत: इसके रिकार्ड किसी के पास नहीं हैं।

हिन्दू और मुसलमानों के बीच होने वाले साम्प्रदायिक दंगे और संघर्ष को यथार्थ के धरातल पर, विकृतियों, विसंगतियों क्रूरताओं का परीक्षण और निरीक्षण करने वाले लेखकों में भीष्म जी का महत्वपूर्ण स्थान है। ‘तमस’ हिन्दी का इकलौता उपन्यास है जो आज़ादी के पहले के हिन्दुओं, मुसलमानों के मनोविज्ञान को समझने में हमारी सहायता करता है। ‘तमस’ साम्राज्यवादियों की मंशा को उजागर करता है। ‘तमस’ में ऐसे कई जलते हुए सवाल हैं जो हमसे उत्तर चाहते हैं। साम्प्रदायिकता कैसे पनपी है इसका चित्रण ‘तमस’ में खूबसूरती के साथ हुआ है। ‘तमस’ की मुख्य समस्या साम्प्रदायिकता है। तमस भीष्मजी की प्रश्नाकुलताओं और बेचैनियों को आईना है। भीष्मजी साम्प्रदायिकता के घिनौने स्वरूप को अत्यन्त सामथ्र्य के साथ पेश करते हैं। ‘तमस’ के पात्र अविस्मरणीय हैं। जाहिर है कि ‘तमस’ एक बेहतर जीवन का संकल्प है। तमस अर्थात एक विशेष प्रकार का अंधकार। जो हमारी विकास प्रक्रिया को रोकता है। उसके बरक्स वह हमारी जीवनी शक्ति को प्रकट करता है। वह हमारे अंदर की ताक़त को बढ़ावा देता है। परमानंद श्रीवास्तव ने तमस को अंधेरे बर्बर समय में विभाजन की त्रासदी कहा था। वह हमारे समय की बेचैनियों का दस्तावेज भी है।

भीष्मजी ने जो लिखा जो सोचा-विचारा उसे निर्भीकता से कहा। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘हमारे देश का सेक्युलर आधार कमज़ोर है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में इसका स्वरूप कुछ उभरा था, किन्तु स्वतंत्रता के बाद इसे मजबूत बनाने के बजाय इसकी उपेक्षा की गई और यह धीरे-धीरे शिथिल और कमजोर होता गया। इसको मजबूत बनाया जाना नितांत आवश्यक है। यह न रहा तो देश का भविष्य अंधकारमय होगा।’(परिकथा-जुलाई अगस्त 2006-पृष्ठ 15)

साम्प्रदायिक दंगों के सन्दर्भ में भीष्म जी की मान्यता है। ‘इतना साफ  है कि दंगे करवाये जाते हैं और यह भी साफ है कि उनमें बेगुनाह लोग मरते हैं। खाते-पीते लोग अक्सर बच निकलते हैं और यह भी सच है कि दंगों से कभी कोई समस्या हल नहीं होती और यह भी मुझे सच लगता है कि दंगों को बुरा मानने वाले, धर्मनिरपेक्षता में आस्था रखने वाले लोग भी अक्सर वक्त पडऩे पर डांवाडोल हो जाते हैं। धर्म के नाम पर भडक़ाया हुआ आदमी जुनूनी बन जाता है। तब सारी मानवीयता और सद्भावना धरी की धरी रह जाती है। आज स्थिति इसीलिये संकटपूर्ण हो उठी कि भडक़ावा बढ़ रहा है और इस भडक़ावे के जोर पर विसर्जनवादी शक्तियां बराबर इन स्थितियों को बढ़ चढक़र उठाती जा रही है। ये विसर्जनवादी तत्व, धर्मावलम्बी हों ऐसा कदापि नहीं है, इसमें गुण्डे भी हैं, सत्ता हथियाने की ललक रखने वाले लोग भी हैं, पेशेवर हत्यारे भी हैं, केवल ये धर्म की आड़ में काम कर रहे हैं।’ हमारे देश में धर्म की आड़ में अनेक कारोबार हो रहे हैं। उनकी कार्यवाहियां भी व्यापक स्तर पर चल रही है। जाहिर है कि संकीर्णताओं का एक मनोविज्ञान होता है। परम्परा परस्त बहुसंख्यक लोगों की तानाशाही खुलकर खेल खेलती है।

भीष्म जी की दृष्टि पारदर्शी है इसलिये वे वस्तुगत यथार्थ को बखूबी पकड़ पाते हैं। उन्होंने कई जगह इस बात के संकेत दिये हैं कि जिस लेखक का पेट भरा होगा उसका लेखन दमदार नहीं हो पायेगा। भीष्म जी लेखक के लिये ज़रूरी मानते हैं कि वह सामान्य आदमी का एक हिस्सा हो। उसकी समस्याओं को जानता पहचानता हो, उनसे गहरा जुड़ा हो। वे प्रेमचन्द की परम्परा के जागरुक रचनाकार हैं। प्रेमचंद जी ने ग्रामीण जीवन को अपने लेखन के केन्द्र में रखा तो भीष्म जी शहरी जीवन के मध्यमवर्ग की स्थितियों को भलीभांति पहचानते थे। हालांकि उनके लेखन में सामान्य जनजीवन की ऊष्मा और ताप बराबर देखा और अनुभव किया जा सकता है। भीष्म जी साम्राज्यवादी शक्तियों, पूंजीवादी षड्यंत्रों और सामंतवादी प्रवृत्तियों के कुशल चितेरे हैं। वे मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा के समर्थ रचनाकार हैं। उन्होंने लिखा ‘समाज में जीने वाला हर प्राणी, अपने परिवेश से ज़रूर जुड़ता है, कभी गहरे में तो कभी केवल जेहनी स्तर पर। मैं अपने को अपने समाज से कटकर मात्र एक निद्र्वंद्व व्यक्ति के रूप में नहीं देख सकता पर जहाँ जुड़ता हूँ, वहाँ यह भावना भी गहरे में उद्वेलित करती है कि हमारा देश उन्नति करे, हमारे देशवासी उन्मुक्त सुखी जीवन व्यतीत कर पायें। हमारा देश पिछड़ा हुआ है और देशों का मुँह जोहने वाला देश न रहे, सच्चे अर्थों में एक सुखी समृद्व देश बने।’ (आज के अतीत पृ. 286-287) भीष्म साहनी के नाटकों हानूश, कबिरा खड़ा बाजार में, माधवी, मुआवजे, रंग दे बसंती चोला और आलमगीर में सामाजिक पारिस्थितिकी और सामाजिक बदलावों और दबावों को चिन्हित किया है। हानूश की रिहर्सल और मंचन के दौरान वह अपने आनंद का बखान इस तरह करते हैं। ‘नाटक की दुनिया बड़ी आकर्षक और निराली दुनिया है। जिस तरह धीरे-धीरे एक नाटक रूप लेता है और रूप लेने पर एक नये संसार की जैसे सृष्टि हो जाती है, यह अनुभव बड़ा ही सुखद और रोमांचकारी है। अभिनेताओं के लिये अपने आसपास की कारोबारी दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं होता, उनके लिये अस्तित्व होता है नाटक की दुनिया का, जो महीने दो महीने से अस्तित्व में आयेगी और आँख झपकते ही फिर टूट-फूट जायेगी। बरसों बाद भी वह दुनिया मुझे बड़ी हृदयग्राही लगी और मन चाहा कि सब काम छोडक़र फिर नाटक लिखँू।’

                भीष्म जी ने अपने समय की चुनौतियों से समस्याओं से लगातार संघर्ष किया है। उनकी रचनायें कठिन समय में भी मनुष्यता के बचे रहने का आश्वासन देती हैं। भीष्म जी की भाषा अपनी भाषा है, वह जनता की भाषा है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी क्रूरताओं, असामान्य परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती। भीष्म जी हमारे समय के अत्यन्त प्रासंगिक और सदाबहार नौजवान रचनाकार के रूप में चर्चित रहे हैं। भीष्म जी जि़न्दगी की सच्ची और साफ  तस्वीर पेश करते हैं। उनमें अनुभूति की सहजता भी है और सरलता भी । हिन्दी रचना संसार में भीष्म जी की मौजूदगी और उनका कृतित्व हमारे लिये अत्यन्त सार्थक और मूल्यवान है।

भीष्म जी रचनाकार के साथ-साथ विशिष्ट रंगकर्मी भी हैं। उन्होंने अपने रंगकर्म के द्वारा मानवीय त्रासदी की समस्याओं को जीवन्त किया है और हमें सोचने के लिये बाध्य भी किया है। वे रचनाकारों के साथ-साथ रंगकर्मियों के प्रेरणास्रोत भी हैं। उनका समग्र लेखन हमारी जातीय एवं सामाजिक संस्कृति की शक्ति है। मोहन जोशी हाजिर हो एवं तमस सीरियल में किये गये उनके अभिनय बेजोड़ रहे हैं। वे राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के अनेक वर्षों तक महासचिव भी रहे हैं। वे अपनी रचनाओं में हमेशा नौजवान रहेंगे। हर पीढ़ी के लोग उनसे बेहद जुड़े रहे हैं। उनसे अपनापा रखते रहे हैं, उन्हें अपना पथ प्रदर्शक भी मानते रहे हैं। भीष्म जी में घमण्ड और गुमान कभी नहीं रहा।