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Friday 24 Nov 2017

‘बसन्ती’ में स्लम जीवन का यथार्थ

सरिता कुमारी

हिन्दी विभाग

बलरामपुर कॉलेज, पुरूलिया, प. बंगाल  

मो. 9932403397

भीष्म साहनी हिन्दी साहित्य के एक ऐसे रचनाकार है, जिनकी लेखनी में अशिक्षा, वैध तथा अवैध प्रेम, यौन कुंठा, नारी की स्थिति, सांप्रदायिकता, आज़ादी का स्वरूप, उसकी वास्तविकता, मूल्यों के प्रति बदली हुई दृष्टि, आधुनिकता का संघर्ष, मानवीय मूल्यों की जरूरत, शोषक-शोषित समाज व्यवस्था में बदलाव की जरूरत, जन शोषण का विरोध आदि का बड़े ही यथार्थ रूप में चित्रण हुआ है। वस्तुत: एक समर्थ लेखक की तरह उन्होंने अपने देश और काल में घटित हो रही परिस्थितियों को बड़े ही संवेदनशील रूप में चित्रित किया हैं। इसी संदर्भ में उनके उपन्यास ‘बसन्ती’ की चर्चा करें तो हम देखेंगे कि इस उपन्यास में सामाजिक और आर्थिक अन्तर्विरोध, अनमेल विवाह, दहेज-समस्या, जांति-पांति, ऊँच-नीच की भावना, निर्धनता, मध्यवर्गीय पाखंड और सत्ता वर्ग की भावशून्यता, हृदयहीनता मुख्य रूप से सामने आयी है। साथ ही लेखक ने सरकारी तंत्र के छल छद्म के बीच संघर्ष कर रहे निम्नवर्गीय समाज के लोगों का चित्रण किया है।

      ‘बसन्ती’ उपन्यास में निम्नवर्गीय समुदाय के लोगों का वे प्रभावी चित्रण करते हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो गाँवों में सूखा, अकाल और भुखमरी भरी जिन्दगी को छोडक़र शहरों में चले आए हैं। उपन्यास में ‘दिल्ली’ महानगर को केन्द्र में रखा गया है। इस महानगर में नये-नये आवासीय सेक्टर और नई कालोनियाँ बनाने वाले मजदूरों की झुग्गी, झोपडिय़ाँ, बस्तियाँ रोज टूटती हंै। उपन्यासकार ‘दिल्ली’ के ‘रमेश नगर’ की बस्तियों में बसने वाले लोगों का चित्रण करते हैं। इन लोगों में कुछ लोग राजस्थानी, अहीर, नाई, धोबी और पंजाबी जाति के हैं। जिनकी अपनी बिरादरी है, पंचायत है और शादी-ब्याह भी यही करने लगे हैं। अपनी आजीविका चलाने के लिए पुरूष राजमिस्त्री, नाई, चाय-पानवाले का काम और स्त्रियां लोगों के घरों में चौका-बर्तन का काम करने लगे हैं।

      इस उपन्यास में भीष्म साहनी ने पूँजीवादी के पोषक सरकारी तंत्र और निम्नवर्गीय जनों के जीवन को अपनी कथा का आधार बनाकर सरकारी तंत्र के छद्म को उभारा है। सरकारी तंत्र की सहायता से जहाँ एक ओर महानगरों में नई-नई बस्तियाँ खड़ी की जाती हैं। वही दूसरी ओर शहर के किसी छोर पर बसी निम्नवर्गीय सर्वहारा लोगों की बस्तियाँ हैं, जिन्हें उजाडऩे के लिए सरकार हमेशा तत्पर है। शहरों की ऐसी अवस्था है कि पक्की इमारतें बनते ही निम्नवर्ग के लोगों की बस्तियाँ उजाड़ दी जाती है -‘पर जब रमेश नगर बना, और तैयार हो गया, तो राज-मजदूरों के झोपड़े ज्यों के त्यों बने रहे। कारण, ये झोपड़े बस्ती से सटकर नहीं बनाए गए थे। इन्हें बस्ती से थोड़ा हटकर बड़ी सडक़ के किनारे एक वीरान टीले पर बनाया गया था, जो दो तिरछी सडक़ों के बीच अलग-अलग सा खड़ा था।’ ये बस्ती फिर भी नहीं बच पाती है। हाकिमों के हुक्म से, पुलिस की मदद से, उन्हें तोड़ दिया जाता है। पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमिक किस तरह एक वस्तु में बदल जाता है। मजदूर अधिक मजदूरी के प्रलोभन में, बेरोजगारी के कारण, अपनी ही झुग्गी-झोपडिय़ों को तोडऩे में लग जाते हैं। इस पर उपन्यासकार टिप्पणी करते हुए लिखते हैं - ‘पुलिस के बड़े अधिकारी जानते थे कि इतनी बड़ी बस्ती एक दिन में नहीं गिराई जा सकती। पर जितनी जल्दी हो सके, शुरू के तीस-चालीस घरों को तोड़ डालना जरूरी था, ताकि बस्ती रहने के लिए नकारा हो जाए और लोग यहाँ से निकल जाएँ, बस्ती खाली कर दें। इसलिए उन्होंने बीस-बीस रूपए मजूरी देने का प्रलोभन देकर उसी बस्ती के कुछेक राज-मजदूरों को पकड़ लिया था। बहुत से लोगों ने तो इन्कार कर दिया था लेकिन मेहरू-जैसे कुछ बेरोजगार लालच में आ गए थे।’ इसके साथ ही भीष्म साहनी सरकारी तंत्र की लालफीताशाही और अफसरशाही के शोषक चरित्र का वर्णन उपन्यास के पात्र ‘हीरा’ के माध्यम से करते हैं - ‘बात तो तब बिगड़ी जब बड़े साहब ने हमें छोटे अफसर के सुपुर्द कर दिया, कि इनसे बात करो, यह तुम्हें सब बात समझा देंगे। बस, तभी बात बिगड़ी। सच पूछो तो जब यह छोटा अफसर अंदर घुसा तो अंदर से आवाज आई-हीरा, मामला बिगड़ गया है। मालिक ने जैसे गाय की रस्सी अपने हाथों से कसाई के हाथ में दे दी हो। ़ ़ ़छोटे अफसर ने हमें बोलने ही नहीं दिया-हमें अपने दफ्तर में ले गया और फैसला सुना दिया-तुम्हें निकलना होगा, बस्ती खड़ी नहीं रह सकती। पूछो रामपरकाश से। इसने कुछ कहने को मुँह खोला कि वह अफसर कडक़कर बोला, सरकार ने जो फैसला करना था, कर दिया। अब बहस करने की कोई जरूरत नहीं।’ ऐसे वर्ग के लोगों के हृदय में सहजता, संवेदना और विनम्रता नहीं होती है। वर्गीय क्रूरता उनकी स्वाभाविकता होती है। आम लोगों जैसी कष्टों को सहने की शक्ति उनमें नहीं होती है। वह जो भी निर्णय सुनाते हंै वह सब शासन के पक्ष में होता है। आम लोगों के पक्ष में उन्हें मानवीय शिष्टाचार से काम करना नहीं आता। आज आधुनिक युग में जहां समाज में नए मूल्यों की स्थापना हो रही है। वहीं हमारे समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है जो प्राचीन जड़ मान्यताओं और मूल्यों से मुक्त नहीं हो पा रहा है। ऊँच-नीच, जाँति-पाँति के आधार पर हमारा समाज उच्च वर्ग और निम्नवर्ग में बंट चुका है। इन वर्गों में जांत-पांत तथा धर्म के आधार पर मनुष्यों में भेदभाव की भावना स्पष्टत: नजर आती है। उपन्यास में यह भेद चौधरी के रूप में चित्रित हुआ है - ‘बरसों से इस बस्ती के छोर पर रहने के बावजूद उसे अभी भी बाहर का, छोटी जात का आदमी ही माना जाता था। चौधरी अहीर था जबकि ये लोग राजस्थानी थे। फिर वह नौवा, और ये राज-मजदूर, राज-मिस्त्री।’

      सम्पूर्ण उपन्यास में भीष्म साहनी  ‘बसन्ती’ चरित्र को केन्द्र में रखकर निम्नवर्गीय समाज की कामकाजी औरत की दयनीय अवस्था का वर्णन करते है। साथ ही परम्परा से चली आ रही सामन्ती मूल्यों में जकड़ी हुई नारी में बन्धनों से मुक्ति की विद्रोहात्मक भावना और उनमें नई प्रस्फुटित होने वाली नारी मुक्ति के स्वर को दिखलाया है। ‘बसन्ती’ चौदह वर्ष की एक लडक़ी है, जिसका जीवन गरीबी से शुरू होता है। जो मेहनत-मजदूरी करने के लिए महानगर में आए ग्रामीण परिवार की कठिनाइयों के साथ-साथ बड़ी होती है; और निरन्तर ‘बड़ी’ होती जाती है। बसन्ती इस बस्ती की नई पौध है। भीष्म साहनी स्पष्ट करते हुए लिखते है - दो-दो पीढिय़ाँ बस्ती में उम्र लांघने लगीं। ऐसे छोकरे-छोकरियाँ, जिन्होंने राजस्थान की धरती को कभी देखा नहीं था, बस्ती और बस्ती के बाहर रमेश नगर की सडक़ों पर घूमती-दौड़ती फिरतीं। लड़कियां बिंदी-लिपस्टिक लगातीं, फोटो खिंचवाती और शहर में टेलीविजन आ जाने पर शाम को किसी-न-किसी घर की खिडक़ी में झाँक-झाँककर टेलीविजन देखतीं। उनकी बस्ती में रेडियो और ट्रांजिस्टरों पर फिल्मी गाने गूँजते। नई पौध को दिल्ली की हवा लगने लगी थी। यह नई पीढ़ी परम्परागत चले आ रहे सामन्ती मूल्यों के बंधन से मुक्ति पाकर ताजी हवा में जीना चाहती है। बसन्ती किसी पर आश्रित नहीं है, क्योंकि वह लोगों के घरों में चौका-बर्तन करके स्वयं को पालने वाली औरत है। वह पुरातन सामन्ती, पूँजीवादी मूल्यों और संस्कारों का पूरे साहस के साथ विरोध करती है। वह पुरूष और स्त्री के रिश्तों, परिवार तथा सामुदायिक जीवन में हो रहे शोषण का विरोध करते हुए पूरे समाज की व्यवस्था को चुनौती देती है। वह अपने परिवार, परिवेश और परम्परागत नैतिकता से विद्रोह करती है। यह विद्रोह उसे दैहिक और मानसिक शोषण तक ले जाता है, पर उसकी निजता को कोई हादसा तोड़ नहीं पाता। प्रेमिका और ‘पत्नी’ के रूप में कठिन-से-कठिन हालात को ‘तो क्या बीबी जी’ कहकर उड़ाने और खिलखिलाने में ही जैसे बसन्ती की सार्थकता है। दूसरे शब्दों में वह  जिजीविषा की मिसाल है।

      आर्थिक अभाव के कारण निम्नवर्ग के लोग अपनी बेटियों को भी बेचने पर मजबूर हो जाते है। समाज का यह सबसे घिनौना रूप है कि बेटियों के विवाह के लिए दहेज देने पड़ते है। दहेज के अभाव में ही बसन्ती का बाप चौधरी अपनी बेटियों को बूढ़ों के हाथ बेचने को मजबूर है क्योंकि युवकों से शादी करने पर उसे पैसे देने पड़ेंगे। वहीं बूढ़ों से विवाह करने पर पैसे मिलते है। समाज की इस विडम्बना को भीष्म साहनी ने बसन्ती के इस कथन से स्पष्ट किया है - हमारा बापू बेटियाँ बेचता है? ़ ़ ़सच, बीबी जी, मेरी बड़ी बहिन का ब्याह भी गाँव में किसी बूढ़े के साथ कर दिया। उससे आठ सौ रूपए लिए। चौधरी अपनी चौदह वर्ष की बेटी बसन्ती के ब्याह के लिए बूढ़े लंगड़े दर्जी बुलाकी से सौदा कर चुका है - बारह सौ होंगे। चाहे तो आज ही ब्याह कर ले। ़ ़ ़बारह सौ क्यों? किस बात के बारह सौ? आठ सौ पर तैने जबान की थी। जबान दे चुका हूँ, इसीलिए कह रहा हूँ। चौदह बरस की भी नहीं है छोरी, अब चौदहवें में पैर रखा है। और तेरे जैसे के हाथ में दे रहा हूँ। नहीं तो दस आदमी रोज इसके लिए पूछते हैं। अब मंजूर हो तो बोल दे। यहाँ डॉ. महेश आलोक टिप्पणी करते हुए लिखते हैं - पूँजीवाद के विकास और विस्तार के कारण सर्वहारा निम्नवर्ग आर्थिक विपन्नता और शोषण के कारण अपनी बेटियों को, बूढ़ों के साथ शादी-ब्याह के नाम पर बेचने के लिए विवश हो रहे हैं। इसका कारण है-पूँजीवादी संस्कृति और जीवन के आवश्यक साधनों का अभाव।

बसन्ती के रूप में भीष्म जी एक ऐसी स्त्री का वर्णन करते हैं, जो सामाजिक शोषण का विद्रोह करती है। वह श्यामा बीबी से कहती है कि मेरा बाप बेटियों को बेचता है। बसन्ती यह भी स्पष्ट कर देती है कि वह इस स्थिति को कभी स्वीकार नहीं करेगी। वह पूरे समाज को चुनौती देती हुई कहती है - करके तो देखे, बीबी जी, मैं उसे करने ही नहीं दूँगी। मैं फिर से चूहे मारनेवाली गोलियां खा लूंगी। बसन्ती स्वाधीन देश की एक ऐसी नारी है जिसकी निष्ठा और साहस को कोई नहीं तोड़ पाता है। अपनी अल्हड़ उम्र के कारण वह नहीं जानती है कि उसे किन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा? और अपने पसंद के युवक ‘दीनू’ के साथ एक अनिश्चित भविष्य की ओर कदम बढ़ाती है। पर हमारे समाज की यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि पुरूष चाहे उच्चवर्ग का हो या निम्नवर्ग का, उसके हृदय में स्त्री की भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता है। वह स्त्री का सिर्फ  मानसिक और शारीरिक शोषण करता है। बसन्ती के साथ भी यही होता है, वह जिस उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करके ‘दीनू’ के साथ आई थी। उसे टूटते अधिक समय नहीं लगता है। विवाह समाज का वह बंधन है, जो स्त्री और पुरूष को एक-दूसरे से बांधे रखता है। परन्तु अल्हड़ बसन्ती को यह भी नहीं पता कि विवाह कैसे करते हैं और वह फिल्मी अंदाज में दीनू से विवाह कर लेती है। उपन्यासकार के शब्दों में - यह अभिनय भी था, खिलवाड़ भी था, विवाह भी था, विवाह का स्वाँग भी था और भावी दांपत्य जीवन के लिए नारी हृदय की सहमी-सहमी-सी भावविह्वल प्रार्थना भी थी। लेकिन दीनू सिर्फ उसे शारीरिक सुख के लिए लाया था, जो पहले से ही विवाहित था। बार-बार बसन्ती के साथ जबरदस्ती करने पर वह दीनू का विरोध करती है तो वह उससे स्पष्ट शब्दों में कहता है कि - तुझे लाया किसलिए हूँ? तो यह है हमारे समाज के पुरूषों की सच्चाई। दीनू बसन्ती के साथ लागातार शारीरिक सम्पर्क बनाता है और अंत में उसे गर्भवती करके तीन सौ रूपये में ‘बरडू’ के हाथ बेच कर अपने गाँव चला जाता है। बसन्ती के सामने फिर से वही स्थिति आ खड़ी होती है, जिससे वह बचकर दीनू के साथ अपने बाप का घर छोडक़र चली आई थी। बड़ी से बड़ी और गहरी से गहरी चोट सह जाने की ताकत उसे अपने प्रकार का पात्र बनाती है। सब कुछ सह जाने की ताकत भी कहीं न कहीं विद्रोह का सुलगता पलीता छोड़ जाती है, जिसके कारण बसन्ती तनकर खड़ी हो जाती है और भरपूर चोट करती है। दीनू जब अपनी पत्नी के साथ शहर वापस आता है, तब बसन्ती अपने आपे से बाहर होती जाती है और वह कहती है -तू भी हरामी, वह भी हरामी। खबरदार जो मेरे बच्चे को हाथ लगाया। बड़ा आया बेचनेवाला। मेरे पेट में अपना बच्चा देकर मुझे बेचने चला था, हरामी, बेशर्म, बदजात! दीनू उसे पीटने की धमकी देता है तो वह गरजती है - मैं तेरी आँखे खींच लूँगीं। क्या है? लगा तो हाथ मुझे। दीनू एक धोखेबाज पति की भूमिका निभाता है। और अंत में फिर वह बसन्ती और उसके बच्चे को छोडक़र अपनी पत्नी और बच्चे को लेकर गाँव चला जाता है। तो यह है निम्नवर्गीय समाज की स्त्री की स्थिति, जिसे भीष्म साहनी ने बड़े ही सजीव रूप में प्रस्तुत किया है।

 उपन्यास के प्रारम्भ में ही बस्ती तोडऩे का भयावह दृश्य है। उपन्यास के अन्त में भी बस्ती उजाड़ दस्ते पटरी वालों की दुकानें लूटते, ठेले वालों के फल गिराते, खोमचे वालों के बर्तन फोड़ते दिखाई देते हैं। वे बसन्ती का तन्दूर भी तोड़ जाते हैं। निष्कर्षत: भीष्म साहनी का यह उपन्यास सामाजिक विसंगतियों, यौन विकृतियों, मानवीय मूल्यों, साम्प्रदायिक संघर्षों, सामन्ती मूल्य, महानगरी जीवन की विडम्बनाओं, सरकारी तंत्र के छद्म को बेनकाब करने वाला उपन्यास है। उपन्यासकार ने यथार्थवादी रूप से वर्णन करते हुए खोखली और दिखावटी जड़ताओं पर निर्मम प्रहार किया है। उन्होंने वर्ग संघर्ष, सामाजिक संघर्ष की चेतना को सामाजिक-आर्थिक विकास के परिप्रेक्ष्य में रखते हुए इस उपन्यास की रचना की है। और साथ ही झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लोगों के दयनीय स्थिति का वर्णन किया है।