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Tuesday 21 Nov 2017

भीष्म साहनी: एक दृष्टि

डॉ. संध्या प्रेम

हिन्दी विभाग, के.बी. महिला महाविद्यालय, हजारीबाग

मो. 9431978232

‘तमस’ जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक भीष्म साहनी ‘नई कहानी’ दौर के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियों एवं उपन्यासों में न केवल विभाजन की त्रासदी झेल रहे भारतीय जीवन की अभिव्यक्ति है वरन् मध्यवर्गीय भारतीय जीवन की छोटी-छोटी त्रासदियों/कठिनाइयों/दुविधाओं के अंधेरे के बीच से जीवन की धूल-धूसरित सच्चाइयों को उजागर किया गया है। भीष्म साहनी की कहानियां बिना किसी ताम-झाम के जीवन के यथार्थ को इतनी गहराई से उजागर करती हैं कि सहसा वे हमें अपने बीच के लगने लगते हैं। इनकी कहानियों में हमें काल्पनिक पात्र कम ही नजर आते हैं। उनके पात्र अपने समय, समाज, इतिहास और जीवन-जगत की जद्दोजहद से निकलकर अथवा उसमें जूझते-भिड़ते, लड़ते-हराते नजर आते हैं। दिमागी कसरत के लिए कहानियाँ लिखना उन्हें कतई पसंद नहीं था। वह कहानी के अच्छे या बुरे होने से कहीं ज्यादा तरजीह उसकी सार्थकता या निर्रथकता के प्रश्न को देते थे। उन्होंने अपने साक्षात्कार में हिंदी पाठकों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था- हिन्दीभाषी क्षेत्र में गंभीर साहित्य पढऩे वालों की संख्या प्राय: कम होती है। पर यहां पढ़े-लिखे साहित्यिक रूचि रखने वाले लोग भी साहित्यिक कृतियों को कम पढ़ते हैं। हिंदी क्षेत्र की विचित्र बात यह है कि लेखक के नाम से बहुत लोग परिचित होंगे पर उसकी एक पंक्ति को भी उन्होंने नहीं पढ़ा होगा। कुछ पाठक तो ऐसे जरूर होंगे जिन्हें हिन्दी साहित्य में रस नहीं मिलता। वे यदि अंग्रेजी जानते हैं तो, अंग्रेजी उपन्यास पढऩा ज्यादा पसंद करेंगे, हिन्दी उपन्यास कम। हिन्दी का अध्यापक वर्ग निश्चय ही बहुत कम पढ़ता है। पाठ्य पुस्तकों के बार उसे अन्य लेखकों की रचनाएं पढऩे में विशेष रूचि नहीं। - आजकल, फरवरी 1994, पृ.सं. 20

                                हिंदी कहानी में भीष्म साहनी को यदि कहानी का भीष्म पितामह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजकमल समूह और श्री राम सेंटर फॉर परफार्मिंग आट्र्स के संयुक्त प्रयास द्वारा 13 अप्रैल, 2002 को श्रीराम सेंटर, मंडी हाउस, सफदर हाशमी मार्ग में ‘लेखक पाठक संवाद’ शृंखला की शुरूआत की गई थी। इस शृंखला की पहली कड़ी के रूप में प्रसिद्ध कथाकार एवं नाटककार श्री भीष्म साहनी के समस्त रचना-संसार को पाठकों के बीच प्रदर्शित किया गया तथा उनका पाठकों व लेखकों से सीधा संवाद हुआ। इस कार्यक्रम में भीष्म साहनी की रचनाओं पर बातचीत के साथ-साथ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को स्वयं लेखक द्वारा तथा उनके समकालीन लेखक मित्रों-निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव, कृष्ण बलदेव वैद, कृष्णा सोबती, कमलेश्वर द्वारा उद्घाटित किया गया। एक पाठक भरत कुमार द्वारा पूछने पर- गुजरात के दंगे पर यदि लिखना हो तो वो कैसे लिखेंगे?’ भीष्म जी ने कहा कि, ‘पहले दंगे भडक़ते थे तो थम जाते थे। रिश्ते फिर सामान्य होने लगते थे। मगर ये जो जख्म अब लगने लगे हैं वे जल्दी नहीं भरते। देश में ऐसा बवंडर-सा उठा है जहाँ घृणा-ही-घृणा है।’ राजनीति में धर्म के समावेश संबंधी प्रश्न का उत्तर देते हुए भीष्म साहनी ने कहा कि मैं धर्म विरोधी नहीं हूँ। संत-महात्मा, धर्म के सब पथ-प्रदर्शक है। मगर धर्म जब संस्थागत हो जाता है और निजी स्वार्थों से जुड़ जाता है तो वह मुझे आतंकित करने लगता है।’ - युद्धरत आम-आदमी, जुलाई-सितंबर 2002, पृष्ठ 62

                                भीष्म साहनी प्रगतिशील और परिवर्तनकामी विचार वाले निहायत ही संघर्षशील और जिंदगी के प्रति अटूट आस्था और विश्वास वाले कथाकार थे। हमारे यहाँ जब-जब सांप्रदायिकता एकता और सर्वधर्म समभाव की बात की जाती है तो उसके पीछे निश्चित रूप से सबसे घृणित राजनीति की कुटिल चाल छुपी होती है। यहां एकता के लिबास में युद्ध और धर्म के लबादों में दंगों का दानव अक्सर छुपा होता है। धर्म, राजनीति और अपराध के त्रिगुट से बनी वत्र्तमान सत्ता नफरत और हिंसा का पर्याय बन चुकी है। भीष्म साहनी की ‘तमस’ एवं अन्य रचनाओं में परत-दर-परत इसे देखा जा सकता है।

वत्र्तमान व्यवस्था ने आदमी को जिस दर्जे से तोड़ा है, बिखेरा है और पतन की गहराइयों में ऊब-डूब करने को मजबूर किया है उसमें वह अपना खुद का भी सामना करने से कतराने लगा है। भीष्म साहनी ने इसे अच्छी तरह देखा एवं आत्मसात किया था, जो उनकी रचनाओं में व्यक्त होता है। आज पूरे देश को जिस तरह से धार्मिक उन्माद और सांप्रदायिकता की आग में झोंका जा रहा है और लाशों के ढेर पर बैठकर जिस तरह से कुछेक वर्गों द्वारा राजनैतिक त्योहार मनाए जाते हैं, इसे हम उनकी रचनाओं में बड़ी बारीकी से समझ सकते हैं। कुछ इसी तरह के सत्य को बाद के दशकों में प्रकाशित प्रकाश कांत के उपन्यास ‘अधूरे सूर्यों के सत्य’ में भी देखा जा सकता है। विभूति नारायण राय के उपन्यास ‘शहर में कफ्र्यू’ में भी इसे देखा जा सकता है। ‘तमस’ उपन्यास पर बने टीवी सीरियल ने लगभग एक वर्ष तक लोगों को बाँध कर रखा था। भारत-पाकिस्तान के विभाजन से उत्पन्न विभीषिका का इसमें यथार्थपूर्ण चित्रण किया गया है। विभाजन से टूटते परिवार, छूटता परिवेश और दर-दर की ठोकरें खाने को विवश स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़ों की जीवन त्रासदी का अंकन भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में किया है। इनके कहानी एवं उपन्यास में वर्गगत भेदभाव, आर्थिक जटिलताओं के साथ-साथ चरित्रों की कुण्ठित मन:स्थिति अंतर्विरोध और जीवन के कटु अनुभवों की अभिव्यक्ति हुई है। भीष्म साहनी अपने ‘कडिय़ा’ उपन्यास में स्त्री और पुरुष के संबंधों की पड़ताल करते हैं। कडिय़ाँ उपन्यास की प्रमिला के लिए गृहस्थी दूसरी प्राथमिकता है और पति तीसरी। वहीं उनके अफसर पति महेन्द्र की पहली प्राथमिकता नौकरी और दूसरी प्राथमिकता स्त्री का शरीर है - एक कामुक प्रेम है। महेन्द्र दूसरी औरत सुषमा के चलते प्रमिला को छोड़ देता है। मेल-मिलाप की दुबारा कोशिश में प्रमिला फिर गर्भवती होती है और बेटे के बिछोह तथा घर टूटने के चलते पागल हो जाती है। दूसरे बच्चे के जन्म के बाद पागलपन से उबर कर आत्मविश्वास की राह पर चल पड़ती है-पति से अलग। प्रमिला सुषमा से सुंदर है पर महेन्द्र की काम-भावना को गृहस्थी के आगे कम प्राथमिकता देती है, जिसके चलते महेन्द्र दूसरी औरत सुषमा की ओर आकृष्ट होता है, जो उसी की ऑफिस में काम करती है तथा अविवाहित है। वह प्रमिला से सब-कुछ सच बता देता है, यहीं से गड़बड़ी शुरू हो जाती है। महेन्द्र को उसका दोस्त ‘नाटा’ उसे ऐसा कहने से रोकता है पर महेन्द्र खुद को अच्छा कहलाने के लिए प्रमिला को सुषमा के संबंध में बता देता है। प्रमिला मानसिक रूप से इस सच को स्वीकार नहीं कर पाती और अंतत: अपने मायके चली जाती है। वहीं ‘नाटा’ जब चाहे किसी स्त्री को निहारता रहता है और इस संबंध में यथार्थवादी दृष्टिकोण रखता है। वह कई स्त्रियों से मन बहलाता है पर अपनी पत्नी को इन सब बातों से अनजान रख कर उसे खुश रखने का प्रयास करता है। ‘तेरा दिमाग खराब है नाटे, तुझे चारों ओर औरत ही औरत नजर आती है।

‘मुझे नहीं, तुझे नजर आती है। हम तो अपनी कमजोरी मान लेते हैं और हलके-फुलके घूमते हैं। तू मानता नहीं और वह दिन-रात तेरे मन पर सवार रहती है। तू औरत से प्रेम तो करना चाहता है, पर अपनी भलमनसाहत बनाए हुए। क्यों ठीक कहा, या गलत? तेरे दिल में हमसे भी ज्यादा ललक है, पर तू सबके सामने सज्जन बने रहना चाहता है।’

‘तुझे जो भी करना हो, छिपकर करना। मत भूल, भोले बादशाह कि तू कायर है, और कायरों को सब काम कायरों की तरह ही करना चाहिए। मतलब कि तू शरीफ आदमी है और शरीफ आदमियों को सब काम छिपकर करने चाहिए।’ इस तरह इस उपन्यास में भीष्म साहनी ने मध्यवर्गीय पुरुष समाज की मानसिकता की पोल खोल कर रख दी है। वो छिपकर चाहे जो कर लें, समाज के सामने ‘शरीफ ’ कहलाना चाहते हैं। भीष्म साहनी की कहानियों एवं उपन्यासों का एक निश्चित उद्देश्य होता है और यह है, मनुष्य का विषमता के विरोध में किए जा रहे संघर्ष का यथातथ्य वर्णन करना। भीष्म साहनी में विशेष रूप से यथार्थ के प्रति आग्रह दिखाई देता है, जिसके पीछे आदर्श की स्थापना का आग्रह है। नगरों-महानगरों के लोग पारिवारिक मूल्यों की खिल्ली उड़ाते नजर आते हैं। ऐसे में वे भूल जाते हैं कि जीवन कितना खोखला होता जा रहा है। अपने लोगों के प्रति असंवेदनशील होने से, ममता, दया, करूणा, सहानुभूति जैसे जीवन के मूलभूत तत्त्व लुप्त होते जा रहे हैं। ‘कडिय़ाँ’ उपन्यास में मध्यवर्गीय पारिवारिक विघटन की थाह ली गई है। व्यंग्य के पुट द्वारा कहानी मार्मिक बन गई है। आधुनिक दिखने की चाह में मध्यवर्गीय व्यक्ति कुंठित मानसिकता का शिकार हो, कई जिंदगियाँ तबाह कर देता है। इस दृष्टि से ‘कडिय़ाँ’ उपन्यास ‘स्त्री जीवन’ की मार्मिक कथा बन जाती है। उपन्यास में कई ऐसे प्रसंग आए हैं जिससे पता चलता है कि महेन्द्र प्रमिला से कैसी अपेक्षा रखता है परन्तु प्रमिला इस सबसे अनजान बनी रहती है। उसके लिए कपड़े धोना, बर्तन मांजना एवं घर की साफ-सफाई का ख्याल रखना ही उसके सुखी दाम्पत्य जीवन के उसूल हैं, जो उसके लिए भारी पड़ता है। वह एक पक्षीय रहती है। अपने ऊपर ध्यान देना एवं पति के लिए समय निकालना उसके दिनचर्या में नहीं है। इसी भूल की वह शिकार होती है।

भीष्म साहनी ‘प्रमिला’ के माध्यम से आम भारतीय पत्नी के चरित्र को उजागर करते हैं साथ ही पुरुष की खोखली आदर्शवादिता की कलई खोलकर रख देते हैं। निस्संदेह भीष्म साहनी एक ऐसे कथाकार हैं जो बाद के महिला लेखन की जमीन तैयार करते नजर आते हैं।