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Thursday 23 Nov 2017

सांप्रदायिक सद्भाव के सिपाही : भीष्म साहनी

डॉ.संजीव कुमार दुबे

हिंदी भाषा एवं साहित्य केंद्र, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर

भीष्म साहनी को बचपन के पारिवारिक माहौल में लेखन परंपरा और समाजोन्मुख दृष्टि मिली। अपनी साहित्यिक अभिरुचि के विकास में भीष्म साहनी ने पिता, फुफेरी बहनों, बड़े भाई, कुछ करीबी रिश्तेदारों के साथ अंग्रेजी के अध्यापक जसवंत राय के योगदान को बड़े मन से स्वीकार किया है। यह जानना बेहद दिलचस्प है कि आर्यसमाजी माहौल में बचपन, कांग्रेस में काम करते हुए युवावस्था तथा देश विभाजन के बाद विस्थापित हो भारत आए भीष्म साहनी का शेष जीवन माक्र्स के दर्शन को आचरण और लेखन में जीते हुए बीता। अपने लेखन की समाजोन्मुखता का श्रेय वे अपने पिता को देते थे, जो कट्टर आर्यसमाजी थे और समाज सुधार में गहरी दिलचस्पी रखते थे। यह पारिवारिक माहौल और आर्यसमाजी संस्कारों का ही प्रभाव रहा कि भीष्म साहनी ने अबला नारी के जीवन संघर्ष और उसके साथ समाज के सलूक पर अपनी पहली कहानी लिखी जो उनके कॉलेज की पत्रिका में प्रकाशित हुई। भारतीय नवजागरण में आर्यसमाज की भूमिका का मूल्यांकन भीष्म साहनी ने बेहद सधी और संतुलित दृष्टि से किया है। हिंदू समाज में आर्य समाज की सक्रियता और सामाजिक सुधारों के लिए किये गए प्रयासों को वे महत्त्वपूर्ण मानते थे। अपने लेखन की समाजोन्मुखता का श्रेय भी वे आर्य समाज को देते थे, परंतु आर्य समाज की कट्टरपंथी सोच और मान्यताओं को वे पूरी स्पष्टता के साथ नकारते भी थे। आर्य समाजी चरित्र और गतिविधियों पर केंद्रित भीष्म साहनी की अनेक कहानियां इस बात का प्रमाण हैं। 1957 में प्रकाशित भीष्म साहनी के दूसरे कहानी संग्रह ‘पहला पाठ’ में संकलित ‘पहला पाठ’, ‘कांटे की चुभन’, ‘एष धर्म:सनातन:’, ‘पाप-पुण्य’ शीर्षक कहानियों में जहां हिंदू समाज में जाति-पांति के भेदभाव पर कड़ा प्रहार है, वहीं विधर्मियों के प्रति आर्य-समाजी मान्यताओं पर तीखा व्यंग्य किया गया है। भीष्म साहनी एक साक्षात्कार में अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि ‘उनके आर्य समाजी पिता का दृष्टिकोण उदारवादी अधिक और कट्टरपंथी कम था। बावजूद इसके यह सच भी वे स्वीकार करते हैं कि बचपन में पिता उन्हें गली-मोहल्ले के मुसलमान बच्चों के साथ नहीं खेलने देते थे।’ बालपन में आर्यसमाजी पिता के ‘अनुशासन’ की छाया को ‘पहला पाठ’ शीर्षक कहानी में बखूबी पहचाना जा सकता है। प्रस्तुत कहानी में भीष्म साहनी ब्रह्मचारी देवदत्त को आठ-नौ वर्ष की उम्र में गुरुकुल में मिली हिंदुत्व प्रेम की पहली शिक्षा का तीखा मखौल उड़ाते हैं, कट्टरपंथी सोच पर तीव्र प्रहार करते हैं। गुरुकुल के संचालक वानप्रस्थी जी बड़े भावुक कंठ से अछूतों की दीन-हीन दशा का वर्णन करते हुए अछूतोद्धार पर व्याख्यान देते हैं। ब्राह्मणवादियों के पाखंड तथा अछूतों के साथ किये जाने वाले निर्मम व्यवहार के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक करने की चेष्टा करनेवाले वानप्रस्थी जी ब्रह्मचारी देवदत्त को जोरदार तमाचे से हिन्दुत्त्व प्रेम की पहली शिक्षा देते हैं। ब्रह्मचारी देवदत्त का अपराध सिर्फ इतना है कि वानप्रस्थी जी की अछूतों को गले लगाने की शिक्षा के असर के चलते वह एक मुसलमान बालक को अछूत और अपना भाई समझ कर गले लगा लेता है।

भीष्म साहनी हिंदी के उन कथाकारों में से एक हैं, जिन्होंने विभाजन को अपनी आंखों देखा, कानों सुना और साक्षात् भोगा था। भीष्म साहनी ने सांप्रदायिकता की समस्या का बखूबी सामना अपनी कलम से किया है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक विद्वेष की भावना के कारण और परिणाम को लेकर वे बहुत स्पष्ट हैं। सांप्रदायिक सौहार्द्र और वैमनस्य दोनों की बानगी उनकी कहानियों में मिलती है। भीष्म जी की कहानियां विभाजन के दौर की त्रासद स्थिति का संवेद्य चित्र प्रस्तुत करती हैं। विभाजन की पृष्ठभूमि पर हिंदी में अनेक कहानियां और उपन्यास लिखे गए हैं। इनमें से कुछ रचनाएं तो उसी दौर के आस-पास लिखी गई हैं, जिनमें स्वाभाविक तौर पर तात्कालिक मनोवेग और पक्षधरता का आभास मिल जाता है। विभाजन पर आधारित भीष्म की कहानियां विभाजन घटित होने के एक-डेढ़ दशक बाद लिखी गई हैं। यही कारण है कि लेखक ने तत्कालीन परिस्थितियों को लेखकीय तटस्थता और ईमानदारी से पुन:सृजित किया है। भीष्मजी की विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियों में तत्कालीन स्थितियों में इंसान के हैवान में बदल जाने की मानसिकता तथा हैवानियत के नंगे दौर में भी इंसानियत की लौ जलाए पात्रों की सृष्टि हुई है। ‘अमृतसर आ गया’ भीष्म जी की चर्चित कहानी है, जिसमें पाकिस्तान के इलाके से भारत आ रही ट्रेन में बैठे कुछ हिंदू-मुसलमान यात्रियों के आपसी व्यवहार, हँसी-मज़ाक, रेल के डिब्बे में घुसने की कोशिश कर रहे लोगों के प्रति डिब्बे में बैठे लोगों के व्यवहार तथा खुद के सुरक्षित दायरे के भीतर रहते हुए दूसरे पर हावी होने की मानसिकता को उभारा गया है। ट्रेन में यात्रा कर रहे तीन पठान एक दुबले-पतले व्यक्ति का बार-बार मजाक उड़ाते हैं, परन्तु वह उनका विरोध नहीं करता। यह दुबला बाबू हिंदू है और ट्रेन पाकिस्तान के मुस्लिम बहुल इलाके से गुजर रही है। अत: चुप रह कर बर्दाश्त कर लेने में ही वह अपनी भलाई समझता है। परन्तु जैसे ही ट्रेन हरवंशपुरा पार करके अमृतसर पहुँचती है, इस दुबले-पतले आदमी में गजब का जोश, फुर्ती और शक्ति का संचार हो जाता है। वह लंबे-चौड़े कद-काठी के पठानों पर गालियों की बौछार करने लगता है। स्टेशन पर उतरकर जब थोड़ी देर बाद वह ट्रेन में लौटता है तो उसके हाथ में लोहे की छड़ होती है। इरादा साफ़ है। इस बीच पठान मौका पाकर उस डिब्बे से खिसक कर उन डिब्बों की तलाश में बढ़ जाते हैं जिनमें मुसलमानों की संख्या ज्यादा है। लेखक लिखता है कि ‘जो विभाजन पहले प्रत्येक डिब्बे के भीतर होता जा रहा था, अब सारी गाड़ी के स्तर पर होने लगा था।’ इस कहानी में लेखक ने दिखलाया है कि हिंदू हो या मुसलमान, दोनों अपने-अपने इलाकों में दूसरे के साथ ज्यादती करते हैं। एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे एक ही वर्ग के ये लोग अपनों के साथ बदसलूकी और बर्बरता से बाज़ नहीं आते। इसके साथ ही लेखक ने यात्रियों की इस प्रवृत्ति पर भी व्यंग्य किया है कि ट्रेन के भीतर जगह पा चुके यात्री अगले स्टेशनों पर चढऩे वाले यात्रियों को अपनी सुविधा में खलल के रूप में देखते हैं और बहुत ही निर्मम, अमानवीय व्यवहार करते हैं। जब ट्रेन पाकिस्तान के इलाके में किसी स्टेशन पर रुकती है तो एक हिंदू परिवार शहर में दंगा फैल जाने के कारण अपने माल असबाब के साथ ट्रेन में घुसना चाहता है परन्तु ट्रेन में बैठे यात्री उसके घुसने का विरोध करते हैं। इसी बीच डिब्बे में यात्रा कर रहा पठान उनका सामान बाहर फेंक देता है। ठीक ऐसा ही व्यवहार दुबला-पतला बाबू एक बूढ़े मुसलमान दंपत्ति से करता है जब वे भारत की सीमा में किसी स्टेशन से ट्रेन में चढऩे की कोशिश करते हैं। ट्रेन के दरवाजे का हैंडल पकड़ पायदान पर लटक चुके बूढ़े मुसलमान के सिर पर बाबू लोहे की छड़ से प्रहार करता है। परिणामत: वह डिब्बे से नीचे गिर जाता है और उसका सफऱ वहीं समाप्त हो जाता है। अपने सन्देश में यह कहानी बड़ी स्पष्टता से यह जाहिर कर देती है कि हिंदू या मुसलमान दोनों में से कोई भी न तो सहिष्णु, उदार, करूणामय है और न ही क्रूर, कट्टर और निर्मम। स्थितियों के बदलते ही दोनों की फितरत बदल जाती है।

भीष्म साहनी की कहानी ‘निमित्त’ में भी विभाजन के दौरान मार-काट की भयावह स्थितियों के संकेत मिलते हैं। चाय पीने के दौरान एक बुजुर्ग बार-बार यह दुहराते हैं कि मठरी पर जिसका नाम लिखा होगा वह उसे जरूर खाएगा। यानी जो होना होगा वह होकर रहेगा। कोई न कोई निमित्त अवश्य बनेगा। बार-बार उनके यह कहने से तंग आकर चाय पीने बैठे हुए लोग जब उनसे पूछते हैं तो वह अपनी नौकरी के दिनों की एक कथा बताते हैं, जिसमें उन्होंने मार-काट छिड़ जाने के दौरान बरसों से नौकरी कर रहे एक मुसलमान इमामदीन को कंपनी की गाड़ी से सुरक्षित स्थान पर जाने दिया था। ृआसपास के लोगों को एक मुसलमान के कंपनी की गाड़ी से बचकर निकल भागने की भनक लगती है तो वे मैनेजर साहब के पास विरोध करने आते हैं। मैनेजर साहब कंपनी की दूसरी गाड़ी उन लोगों को यह कहते हुए दे देते हैं, ‘लो भाई इससे ज्यादा मैं क्या कर सकता हूं। एक मोटर वह ले गया है, दूसरी तुम ले जाओ। अगर उसे बचना है तो बच जाएगा, अगर उसका खून तुम्हारे हाथों होना लिखा है तो वह होकर ही रहेगा।’’ दूसरी मोटर से पीछा करने वाले लोग जब पहली मोटर के पास पहुँचते हैं तो उन्हें पता चलता है कि उस गाड़ी के ड्राइवर ने ही इमामदीन का काम तमाम कर दिया था। परन्तु वास्तविकता यह थी कि उस मोटर के हिंदू ड्राइवर ने वक्त की नजाकत को भांपकर इमामदीन को सीट के नीचे छिपा था और उसके माल-असबाब को आग के हवाले कर दंगाइयों को यह दिखाने में सफल रहा कि इसी आग में उसने इमामदीन को भी मौत के घाट उतार दिया है। इस कहानी में तत्कालीन जनभावना, बदले की प्रवृत्ति, इंसानियत के रिश्ते को बड़ी गहराई के साथ उकेरा गया है। कहानी का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष वह विचार है जो किसी को भी किसी चीज के लिए जिम्मेदार व जवाबदेह नहीं ठहराता। प्रस्तुत कहानी में जहाँ मैनेजर का वर्ग चरित्र उभर कर सामने जाता है वहीं सांप्रदायिक खून-खराबे को अंजाम देनेवाले निम्नवर्ग के लोगों की खीझ, विफलता और बदहाली, एक टीस की तरह उभर आती है। ‘पाली’ भीष्म जी की एक और मार्मिक कहानी है जिसमें पाकिस्तान के इलाके से प्राण रक्षा के लिए भागते मनोहरलाल, कौशल्या, गोद की बेटी और चार साल के पुत्र पाली को लिए शरणार्थियों की लारी में सवार हो भारत पहुँच जाना चाहते हैं। इलाके में मार-काट छिड़ चुकी है। चारों ओर भयानक अफरा-तफरी का माहौल है। इसी बीच लारी में माल असबाब के साथ परिवार को चढ़ाते हुए मनोहरलाल को महसूस होता है कि बेटे पाली का हाथ उनसे छूट गया है। जब वे उसे खोजने लगते हैं तो लारी में बैठे अन्य लोग लारी को जल्दी से आगे बढ़ाने के लिए चीख पुकार मचाने लगते हैं। अंतत: मनोहरलाल यह मानकर लारी में बैठ जाते हैं कि शायद बेटा किसी दूसरी लारी में चढ़ गया हो, पर वे इतने खुशनसीब नहीं थे। उधर गाड़ी जब आगे बढ़ती है तो उस पर एक बार फिर हमला होता है, जिसकी चपेट में आने से कौशल्या अपनी गोद की बेटी भी खो देती है। इस तरह मनोहरलाल-कौशल्या का आँगन सूना हो जाता है। मनोहरलाल और कौशल्या जैसे विपत्ति के मारे लाखों लोग विभाजन की एक सच्चाई थे। उधर चार साल का पाली एक चीनी मिट्टी के बर्तन बेचने वाले गरीब शकूर अहमद के हाथ लगता है जिसकी नि:संतान बीवी उसे अपना बच्चा मान लेती है। फिर मौलवी के दबाव और हस्तक्षेप से उस लडक़े के सुन्नत आदि का कर्मकांड करके उसे मुसलमान बनाया जाता है। लगभग चार साल तक पाली मुसलमान दंपत्ति के साथ उनका बेटा बनकर रहता है और इस्लामी प्रार्थना, रीति-रिवाज आदि से वह बखूबी परिचित हो जाता है। मनोहरलाल अपने बिछड़े बेटे को खोजते-खोजते लगभग चार साल बाद शकूर के घर पहुँचते हैं और अंतत: उन्हें अपना बेटा पाने में सफलता मिलती है। इस कहानी में अपनी संतान को गंवा चुके माता-पिता के दर्द को बखूबी उभारा गया है। साथ ही एक हिंदू के बच्चे को मुसलमान दंपत्ति द्वारा अपना लेना जताता है कि धर्म और संप्रदाय का बंटवारा कितना कृत्रिम और ऊपरी किस्म का है। इंसान भले ही हिंदू या मुसलमान हो जाए पर उसके दिल में इंसानी भावनाएँ हमेशा जिन्दा रहती हैं। इस कहानी में बड़े असरदार तरीके से धर्म के झंडाबरदारों की असहिष्णुता, कट्टरता को दर्शाया गया है। मौलवी तब तक उस बच्चे की सूरत से नफरत करता है जब तक की उसकी सुन्नत नहीं कर दी जाती। दूसरी ओर बच्चा जब मनोहरलाल के साथ जा रहा होता है, तो समाजसेविका उसकी टोपी उतारकर चलती जीप के बाहर फेंक देती है। लगभग चार साल तक मुसलमान परिवार में रहने के कारण पाली पांचों वक्त की नमाज का पाबंद हो चुका है। जब वह मनोहरलाल के घर आये हुए मुसलमानों के बीच नमाज पढऩे के लिए बैठ जाता है तो कट्टरपंथी मानसिकता वाले कुछ लोग पाली को नमाज पढऩे से रोकने की कोशिश भी करते हैं। पिता मनोहरलाल उस मुसलमान दंपत्ति का एहसान जनम-जनम तक याद रखना चाहते हैं। उधर पाली को खो चुके जैनब और शकूर अपने सूने आंगन में बैठकर तरह-तरह के कयास लगा रहे थे और एक बार बेटे से मिल आने के मंसूबे बांध रहे थे, पर धर्म के ठेकेदार उधर कलमा पढ़वाने के लिए व्यग्र थे तो इधर चौधरी ऊँची आवाज में फटकार रहा था ‘बुलाओ पंडित को और नाई को। अभी बच्चे का मुंडन करवाओ और चुटिया रखवाओ। इनकी ऐसी की तैसी। बच्चे को मुसलमान बनाकर भेजा है।’ पाली की ठीक उलट स्थिति में सलीमा की मार्मिक कथा वीरो कहानी में व्यक्त हुई है। विभाजन के समय नन्ही बच्ची वीरो का हाथ अपने माता-पिता के हाथ से छूट जाता है और वह पाकिस्तान में रह जाती है सलीमा बन कर। विभाजन के तीस बरस बाद भी, एक भरी-पूरी गृहस्थी की मालकिन होकर भी, उसका दिल अपने बिछड़े परिवार से मिलने के लिए कलपता रहता है। हर साल पास के गुरूद्वारे में मत्था टेकने आनेवाले भारतीय सिक्खों के छैने-करताल सुनकर उसका दिल कैसा तो हो आता है। हर बैशाखी उसे उम्मीद रहती है कि कहीं इस टोले में बचपन का बिछड़ा भाई न आया हो। ‘सलीमा को फिर से छलावे का-सा भास होने लगा। आज की ही बात रही हो तो कोई कहे, ऐसा तो उसके साथ हर साल होता रहा है। और आगे भी होता रहेगा, और वह इसी तरह रोती-बिलखती दुनिया छोड़ जाएगी, अपने बेचैन, छटपटाते दिल को ढाढ़स बंधाते हुए।’’  प्रस्तुत कहानी जहाँ स्त्री की नियति को रेखांकित करती है वहीं युवा पीढ़ी के प्रति यह विश्वास पुख्ता करती है कि झूठी दीवारें उनकी राह नहीं रोक सकतीं। कहानी में नाटकीय रूप से सलीमा का भाई भी मिलता है और उसका पूरा परिवार भारत की यात्रा पर भी आता है। निश्चित रूप से कहानी यहां कमजोर हो जाती है पर लेखक के भी अपने भोले विश्वास होते हैं। और यदि लेखक स्वयं उन हालातों का शिकार रहा हो तो बात उतनी अटपटी नहीं रह जाती। कुल मिलाकर ये कहानियां एक परिवार पर टूटे विभाजन के कहर और इंसानियत के रिश्ते को बड़ी संवेदनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत करती हैं। भीष्मजी ने विभाजन के बाद नई जगह पर बसने की जद्दोजहद और सामंजस्य बिठाने की शरणार्थियों की कोशिशों को आवाजें शीर्षक कहानी में गहरी कलात्मक संवेदना से उकेरा है।

भीष्म साहनी हमारे देश के उन ‘दुर्भाग्यशाली’ लोगों में थे जिन्होंने विभाजन का दंश झेला और 1984 का दिल दहला देनेवाला क़त्ल-ए-आम भी बर्दाश्त किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या की प्रतिक्रिया में उत्पन्न सांप्रदायिक तनाव, हिंसा, लूटमार का सशक्त और संवेदनशील चित्रण भीष्म साहनी ने ‘झुटपुटा’ कहानी में किया है। यह कहानी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में फैलते तनाव, सांप्रदायिक हिंसा की आहट की सूचना से आरंभ होती है। प्रोफेसर कन्हैयालाल दूध के इंतज़ार में बस्ती के अन्य लोगों के साथ खड़े हैं। दूध की गाडिय़ाँ चलाने वाले सरदारों ने अपनी जान के भय से गाडिय़ां चलाने से फिलहाल मना कर दिया है। दूध की लाइन में खड़े प्रोफ़ेसर के मस्तिष्क में बीते दिनों की घटनाएं कुलबुला रही हैं। लठैतों का समूह सडक़ पर मस्ती से झूमता, सिखों के घरों में आग लगा रहा है, दुकानों को लूटकर आग के हवाले कर रहा है। सामान्य लोग, यहां तक कि महिलाएं भी दुकानों की टूटी शटर के उस पार जा, अपनी पसंद का सामान चुनकर निकल रही हैं। प्रोफ़ेसर कन्हैयालाल इस पूरे परिदृश्य को देखकर अचंभित हैं। उनके मन में सवाल उठता है कि यह जो कुछ जिस रूप में हो रहा है क्या उसे दंगा कहा जा सकता है? ‘यह कोई दंगा तो न हुआ। दंगे में तो लोग दुश्मन को पहचानते हैं, एक दूसरे को ललकारते हैं, एक-दूसरे का पीछा करते हैं, पर यहाँ तो सडक़ खाली थी और दुकान को जो चाहे तोड़ जाए, जो चाहे जला जाए। दंगे ऐसे तो नहीं होते। लुटेरों में एक भी चेहरा पहचाना नहीं था, एक भी आदमी अपने मुहल्ले का नहीं था। क्या हम इसे दंगा कह सकते हैं या नहीं?’ सांप्रदायिक तनाव के माहौल में अफवाहों की बड़ी उत्तेजक भूमिका होती है। ‘झुटपुटा’ में भी लोगों के बीच तमाम तरह की अफवाहें फैल रही हैं। अफवाहें फैलाने वाले लोग कहीं बाहर से नहीं आये हैं। ‘कल रात वकील का बेटा कहने लगा कि सभी सिख गुरुद्वारे में इक_ा हो रहे हैं। असला जमा कर रहे हैं। रात को दो बजे नंगी तलवारें लेकर बाहर आ जाएंगे,’ मैंने कहा, ‘अरे साईं, मेरे सामने तो एक भी सिख घर से बाहर नहीं निकला। वे सब गुरुद्वारे में कैसे पहुँच गए? और इस वक्त असला कहाँ से लाएंगे? सभी सिख घरों के अन्दर बैठे हैं?’ इस कहानी में लेखक ने हिन्दू-सिख दंगे पर तीखा व्यंग्य किया है। कहानी का एक पात्र कहता है, ‘अभी नासमझ है ना, यही बात है।  हिन्दू-सिख में पहले कभी झगड़ा नहीं हुआ न, यही बात है, अभी दोनों कच्चे खिलाड़ी हैं।’ फिर हंसकर कहने लगा, ‘धीरे-धीरे सीख जाएँगे। हिन्दू-मुसलमान का दंगा होता है या नहीं? उसे तो हम खूब पहचानते हैं। उसे अच्छी तरह से सीख लिया है। पीछे से किसी के कदमों की आहट भी आ जाए तो पहचान लेते हैं कि हिन्दू आ रहा है या मुसलमान। क्यों साईं? पर ये तो अभी इस काम में नए हैं ना?’ सांप्रदायिक दंगे और मार-काट के माहौल में भी इंसानियत की जीवंत मिसालें इस कहानी के महत्त्व को बढ़ा देती हैं। दूध की लाइन में लगी लडक़ी सरदार अंकल के लिए दूध की डोलची लेकर खड़ी है। लंबे इंतज़ार के बाद दूध की गाड़ी आती है तो सरदार ड्राइवर को देखकर लोग चकित रह जाते हैं। ऐसे माहौल में जब सरदारों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा जा रहा हो, एक सरदार ड्राइवर का दूध की गाड़ी लेकर आने का जोखिम उठाना इंसानियत का एक बड़ा उदाहरण तब बन जाता है,जब वह मुस्कुरा कर कहता है, ‘बाबा, बच्चों ने दूध तो पीना है ना ! मैंने कहा, चल मना, देखा जाएगा, जो होगा। दूध तो पहुँचा आए।’

संदर्भ:

1.            केवल गोस्वामी को दिए एक साक्षात्कार में, भीष्म साहनी: व्यक्ति और रचना,(सं.) राजेश्वर सक्सेना, प्राताप ठाकुर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-30,35

2.            पटरियां, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण,पृष्ठ-30

3.            शोभायात्रा,   राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण,पृष्ठ-17 

4.            पाली, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण,पृष्ठ-33

5.            डायन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण,पृष्ठ-30

6.            पाली, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण,पृष्ठ-50

7.            वही, पृष्ठ-53

8.            वही, पृष्ठ-58

(छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन द्वारा आयोजित भीष्म साहनी जन्मशती समारोह में प्रस्तुत आलेख का संक्षिप्त अंश)