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Saturday 18 Nov 2017

भीष्म साहनी: युग और समाज

डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी

2-ए, उत्तरपल्ली, सोदपुर, कोलकाता-700110

मो. 09433675671

भीष्म साहनी का साहित्य लेखन केवल हथियार स्वरूप नहीं है वह अन्वेष्ण के पथ पर चलता है। साहित्य की भूमिका के संबंध में एक साक्षात्कार में आपने कहा था कि साहित्य अपनी सामाजिक भूमिका निभाता है। लेखक के लिए जीवन ही सर्वोपरि है और मनुष्य भी अकेला नहीं है, वह भी मानव समाज का अंग है। मनुष्य को उसके समाज के परिप्रेक्ष्य में देखना उसे अधिक स्पष्टता और पूर्णता से देखना है। इस तरह लेखक जीवन की परतों को हमारे सामने खोलता है, एक नजरिया देता है, समाज के भीतर सक्रिय शक्तियों की भूमिका समझने में मदद देता है। हमें सजग और सचेत करता है।

आपके माधवी नाटक के माध्यम से स्त्री की अस्मिता, मूल्य व शील का अन्वेषण हुआ है, तो पाली कहानी में धर्म के मठाधीशों के अहं व अलगाववादी दृष्टि की परख। आपका लेखन सामाजिक समस्याओं से सीधे जुड़ता है और इस जुड़ाव में समाधान का दिशा संधान निहित है। समाज को नियंत्रित करनेवाली शक्तियों के अनैतिक प्रभाव को आपने हानूश नाटक के माध्यम से पहचाना है। तमस में उपन्यासकार का निर्भीक व मौलिक चरित्र पाठक को गहराई तक स्पर्श करता है। हम जानते हैं कि इस संसार में सदियों से दो प्रकार की लड़ाइयां लड़ी गईं हैं, एक तलवार की, दूसरी कलम की। तलवार की लड़ाई में बादशाहों और शूरवीरों ने अपना नाम इतिहास में दर्ज किया है जबकि कलम की लड़ाई में दार्शनिकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों का दबदबा बरकरार रहा। भीष्म साहनी ने जब भी लिखा तब उनके आस-पास का समाज उनकी कलम में आंदोलित होता रहा।

माधवी में आपने एक मिथकीय सत्ता का ग्लोरिफिकेशन किया है। राजकन्या माधवी के चरित्र में पारंपारिकता के साथ-साथ आधुनिकता का भी यथेष्ट पुट मिलता है। समीक्षक रमेश दवे लिखते हैं- ‘मिथक मात्र पुराकथाओं के संदर्भ न होकर, मनुष्य के अस्तित्व की गरिमामय प्रार्थनाएं हैं, दैवीय प्रतीक से कहीं ज्यादा जिजीविषा से आप्त संकल्प की अभिव्यक्ति है। ’ माधवी नाटक में नारी के बुनियादी अस्तित्वगत प्रश्नों को भीष्म साहनी ने चुनौतियों के कठघरे में डाल दिया है। नारी को भोग्या वस्तु के रूप में व्यवहृत करने वाला वह पौराणिक युग वर्तमान समय की पृष्ठभूमि मात्र है। नाटक इस क्रूर सच को परिलक्षित-प्रतिबिंबित करता है कि युगों के पर्दे गिरते गए पर संसार में नारी को मनुष्य मात्र का दर्जा भी हासिल नहीं हुआ। लांछन, अपमान व शोषण की प्रतिकूल परिस्थितियों ने तमाम प्रसंगों में माधवी की संवेदना-भूमि को क्षत-विक्षत किया है। ‘वाजश्रवा के बहाने’ में पौराणिक मिथक को आधार बनाने वाले कवि श्रेष्ठ कुंवर नारायणजी के मतानुसार पौराणिक अतीत केवल हमारी स्मृति का हिस्सा नहीं है, वह बहुत कुछ आज भी हमारी मानसिकता में प्रतीक रूप से जीवित और सक्रिय है। माधवी का चरित्र दमित, पीडि़त और उपेक्षित होने पर भी इतना सशक्त व सक्रिय रूप में उभरा है कि वह पाठक व दर्शक पर लंबे समय तक अपना प्रभाव छोडऩे में सक्षम है। दरअसल माधवी हाशिए पर धकेली गई नारी चरित्र का विद्रोही रूप है। पर यह विद्रोह सकारात्मक रूप ग्रहण करता है तभी तो वह बिना किसी को क्षति पहुंचाए अपने जीवन की स्वाधीनता की खोज में निकल पड़ती है। वह समाज से बदला नहीं लेती पर समाज के बदलते चरित्र के हाथों भविष्य में शोषित होने से इंकार कर देती है। भारतीय जीवन व सभ्यता में ऐसी संभावनाओं के उदाहरण विरले हैं पर भीष्मजी अंधेरी गलियों में चिराग रोशन करने में विश्वास रखते हैं। लंबे समय तक भीष्म साहनी की रचनाओं के साथ चलने पर लगता है कि वे हमें जीना सिखाती है।

माधवी नाटक का पहला प्रदर्शन ‘प्रयोग’ संस्था द्वारा प्रगति मैदान के मंजर मंच पर 29, 30 जून तथा 1 जुलाई 1984 को एम के रैना के निर्देशन में हुआ जिसमें महाभारत में वर्णित महाराज ययाति, उनकी पुत्री माधवी, ऋषिकुमार गालव और ऋषि विश्वामित्र के प्रसंग को नाट्य रूप में प्रस्तुत किया गया। इस पौराणिक कथा के अनुसार ऋषिकुमार गालव ने बारह विद्याओं में पारंगत होने के पश्चात अपने गुरु से पूछा कि वे गुरु -दक्षिणा में क्या लेना चाहते है? विश्वामित्र ने कहा कि तुम बारह विद्याओं में पारंगत हो गए हो यही मेरी गुरु दक्षिणा है। परंतु वह अपने गुरु महाराज से हठपूर्वक आग्रह करता रहा कि वह गुरु दक्षिणा देकर ही रहेगा। इस पर गुरुवर ने क्रुद्ध होकर कहा कि मेरी गुरु दक्षिणा आठ सौ अश्वमेधी अश्व होंगे। इन घोड़ों के जुगाड़ के लिए गालव संपूर्ण आर्यावर्त में अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध राजा ययाति के पास गया। ययाति अपना संपूर्ण राजपाट दान में देकर अपनी पुत्री माधवी के साथ आश्रमवासी हो गए थे। गालव ने जब ययाति से आठ सौ अश्वमेधी अश्वों का दान मांगा तो वे बड़े असमंजस में पड़ गए क्योंकि वे स्वयं वनवासी हो गए थे। परंतु अपने नाम के साथ दानवीरता के दंभ के रक्षार्थ राजा ययाति ने अपनी पुत्री माधवी को गालव के साथ उन राजाओं की रानी बनने के लिए भेज दिया जिन्हें चक्रवर्ती पुत्र की कामना थी और जो इसके बदले में अश्वमेधी घोड़े दे सकते थे। कारण यह था कि राजज्योतिषियों द्वारा जांचे गए लक्षणों के अनुसार माधवी के गर्भ से उत्पन्न होनेवाला बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा और माधवी को चिर कौमार्य का व्रत प्राप्त है। इस प्रकार दानवीर का टैग सदा के लिए अपने नाम के साथ जोडऩे की अदम्य लालसा के वशीभूत होकर राजा ययाति अपनी एकमात्र पुत्री की आहुति दे देते हैं। आगे चलकर गालव माधवी को अयोध्या नरेश हर्यश्च, काशी के रसिक राजा दिवोदास के पास ले जाते हैं और अंत में माधवी स्वयं गालव के गुरु विश्वामित्र के पास चली जाती है। इन पुरुषों को माधवी से चक्रवर्ती राजपुत्र प्राप्त होते हैं और बदले में गालव की आठ सौ अश्वमेधी घोड़ों की मांग पूरी होती है।

माधवी की चारित्रिक विडंबना और उसके मन के दर्द को कौन समझ सकता था? अपने दुधमुंहे शिशुओं को छोडक़र वह आगे बढ़ती जाती है। उसका सौदा संपूर्ण नारी अस्मिता का सौदा बना। नाटककार ने पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ यही उकेरा है कि युगों के पर्दे गिरते गए पर विश्व रूपी रंगमंच में नारी का अस्तित्व मात्र वस्तु के रूप में बना रहा। एक हाड़-मांस की भोग्या वस्तु। वर्तमान बाज़ारवादी युग में भी विज्ञापन जगत में मोटरकार से लेकर शेविंग क्रीम, पुरुषों के अंडरवियर से लेकर घर के पर्दों तक की बिक्री के लिए नारी-चाम का वाहियात इस्तेमाल होता है। तथाकथित भद्रसमाज घर की चारदीवारी में बैठकर टेलीविजऩ या समाचार पत्रों में इस अश्लीलता का उपभोग करता है। माधवी नाटक ने युगों से चली आ रही शोषण की इस परंपरा पर कसकर तमाचा मारा है। नारी का उपयोग और उपभोग शायद पालतू जानवरों से भी बदतर तरीके से किया गया है। माधवी नाटक में आत्र्तनाद करती हुई कहती है - ‘‘एक कत्र्तव्य मेरे पिता का, एक कत्र्तव्य मुनिकुमार गालव का, दोनों के कत्र्तव्य मेरे माध्यम से पूरे हो रहे हैं। फिर भी मैं दुर्बल हूं, कत्र्तव्यपरायण वहीं हैं। पिता ने मुझे सौंपकर अपना कर्तव्य निभा दिया, और मुनिकुमार ने घोड़े बटोरकर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। एक दानवीर बन गया, दूसरा आदर्श शिष्य, और माधवी?’’

‘‘इस दुर्बल नारी का यों भी कोई अस्तित्व नहीं है, न उस लम्पट राजा के लिए, न अयोध्या नगरी के लिए, न मेरे पिता के लिए, और शायद तुम्हारे लिए भी नहीं, गालव।’’

अपने बड़े भाई बलराज साहनी पर केंद्रित संस्मरण में पिरोए गए विभिन्न प्रसंगों में आपने एक कलाकार के जीवन के उतार-चढ़ाव को भारतीय जीवन के विस्तृत कैनवास पर अंकित किया है। कलात्मक अभिव्यक्ति व एकाग्रता, पारिवारिक हादसों की संघर्षमय रस्साकशी, व्यक्तिगत जीवन के आदर्श व व्यावहारिक पक्ष एक कलाकार की भाव-भूमि की सर्जना करते हैं। भीष्म जी के साहित्य जगत में एक ओर बलराज साहनी का वास्तविक चरित्र उभरा है तो दूसरी ओर हानूश का काल्पनिक चरित्र भी निर्मित हुआ है। एक चरित्र कला जगत में अपने संघर्ष को झेलता है तो दूसरा नवोन्वेषी विचारधारा का जन्मदाता होते हुए भी शासन-तंत्र के हाथों बुरी तरह से शोषित है। दोनों ही चरित्र मानव-मुक्ति का आह्वान करते हैं। लेखक ने हानूश नाटक में मानवीय अस्तित्व, अस्मिता व पहचान के प्रश्न को स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया है। शासन तंत्र का आधिपत्य अपनी राजसत्ता के मद में चूर होकर साधारण जन-जीवन को मात्र खिलौना मानता है। प्रजा का जीवन राजसत्ता की खुशी, प्रजा का संहार उसकी इच्छा। हानूश नाटक भारत में क्रमश: बढ़़ते हुए मेधा पलायन की सच्चाई की ओर इशारा करता है। ‘हानूश अपनी द्वंद्वात्मक चेतना, संगठित रूपबंध, गतिशीलता, तनाव की जटिलता, करुणा और छू देनेवाली मार्मिकता के कारण सार्थक प्रयास लगता है। ’

कबिरा खड़ा बाज़ार में नाटक का पहला प्रदर्शन अप्रैल 1981 में हुआ जिसमें भीष्म साहनी ने कबीर के सत्रह पदों को धुरी बनाकर आज की विविध राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक स्थितियों का खुलासा किया। हिंदू-मुस्लिम संप्रदायों का आपसी कलह, शासक वर्ग का अमानवीय अनाचार, छुआछूत की विडंबना को नाटककार ने इसमें टटोला है। प्रसिद्ध नाट्यालोचक दशरथ ओझा के अनुसार इस नाटक पर ब्रेख्त का प्रभाव स्पष्ट जान पड़ता है।

मानवीय रिश्तों को करीब से समझाने वाले कहानीकार भीष्म साहनी ने बार-बार अपनी कहानियों में मानव मन के तारों को झंकृत किया है। चाचा मंगलसैन कहानी में गली-कूचे में बसनेवाले मुहल्लों में अपनापे की भीनी खुशबू महकती है। एक वृद्ध रिश्तेदार को शहरी परिवेश में आधुनिकता के रंग में रंगे परिवारों में स्थान नहीं मिलता। इस प्रकार के रिश्तेदार बोझ और परेशानी का सबब बनते हैं जिन्हें घर से खदेडऩे की अमानुषिक चेष्टा जब-तब सिर उठाती है। यही मर्म आपकी प्रसिद्ध कहानी चीफ  की दावत में भी ध्वनित होता है। वृद्धा मां के खर्राटे, उसकी बातें व वेशभूषा आज के माडर्न अंग्रेज़ी तौर-तरीके से सजे-धजे पुत्र को अपमानजनक लगती है। वह मां को एक कमरे से दूसरे कमरे में खदेडऩे पर उतारु हो जाता है। वहीं जब उसका अफसर मां के हाथों से फुलकारी बनाने की गुज़ारिश करता है, उनके टप्पे के बोल सुनकर चहक उठता है तब ऑफिस में तरक्की का लोभ पुत्र को मां से इन चीज़ों के लिए चिरौरी करवाता है।

भीष्म जी की कहानियां दिल्ली-पंजाब के आम जीवन की धडक़न को सुनाती है। बस्ती के नल पर होने वाले झगड़े, छतों पर से कूदकर भागनेवाले मजनूं, बसों में पसीने से तर यात्रियों की झड़पें, ट्रेन में लंबा सफर तय करनेवाले मुसाफिरों की बहसें, हंसी-ठहाके उनकी कहानियों में पाठकों के आकर्षण का विषय है। ये आम बातें कैसे आम जीवन व्यतीत करने भारतीय के दिल के करीब आकर ठहर जाती है, यही तो कलमकार की अंतर्दृष्टि का परिचय है। गली के कूड़े और रद्दी कागज़ बटोरनेवाली केसरो और उसकी बेटी की जद्दोजहद हमें देश के निम्नतम तबके की तकलीफ  पर दो पल के लिए सोचने पर विवश कर देती है। ‘‘यों तो उठाने के लिए सब चलता है, खाली डिब्बे, बोतलें, चिथड़े, उड़ते कागज़, पर केसरो अपना झोला अक्सर रद्दी कागज़ों से भरती है, क्योंकि आठ आने किलो पर, कागज जैसा भी हो बिक जाता है। खाली डिब्बों और बोतलों और चिथड़ों की बात दूसरी है, वे मिलते ही कितने हैं।

आज रात भर हवा सांय-सांय चल रही है। सारे रास्ते बेटी के दांत कटकटाते रहे हैं। चलते जाओ तो बदन गर्म हो जाता है, सांय-सांय करती अगर ऐसी हवा न होती तो बदन में ऐसी ठिठुरन नहीं होती, एक-एक झोंके में सौ-सौ नश्तर नहीं चुभते। मां की काठी तो पक्की हो चुकी है, सर्दी-गर्मी में मरीज की तरह चलती रहती है, मोहल्ले में जगह-जगह खड़े पेड़ों पर सूखे पत्ते गिरते रहे हैं, कहीं-कहीं पर, पेड़ों के नीचे सूखी टहनियां भी बिखरी पड़ी हैं। केसरो के मन में आया, भागकर जाए और बेटी को टहनियां चुनने को कहे, पर वह मुड़ी नहीं, सोच में पड़ गयी। सूखी टहनियों से क्या होगा, जल ही तो जायेंगी, जितनी देर में टहनियां बटोरेगी, उतनी देर में कागज़ बटोर लेने से दो पैसे तो हाथ लगेंगे, और फिर दुश्मन का क्या भरोसा, किसी ओर से कोई और चुड़ैल पहुंच जाए और रद्दी बटोरने लगे। गरीब से गरीब तबका जितना भी शोषित और लांछित क्यों न हो लेकिन जब वह एकता के सूत्र में बंध जाता है तब संभल के बाबू जैसी कहानियां जन्म लेती हैं। घरेलू नौकरों पर किए जाने वाले अकथनीय अत्याचार पर भीष्मजी की उक्त कहानी करारा जवाब देती है। इसी प्रकार मुर्ग मुसल्लम कहानी में जेल में कैद राजनीतिक बंदियों के लिए विशिष्ट स्वादिष्ट भोजन बनाने के निमित्त एक साधारण से निर्दोष रसोइये को पकडक़र जेल में डाल दिया जाता है। इस रसोइये का जीवन बर्बाद करने में प्रशासन को चुटकी भर समय लगा पर उसके त्रस्त जीवन का दर्द एक लेखक के हृदय के किवाड़़ों में दस्तक दे गया तभी तो वे लिखते हैं - ‘‘अब आगे सुनो, इधर इम्तियाज हुसैन सियासी कैदियों को मुर्ग-मुसल्लम खिला रहा था, उधर उसकी घरवाली गली-गली और सडक़-सडक़ उसे ढूंढती फिर रही थी। पहले उसका क्वार्टर छिन गया, फिर फाकों की नौबत आ गयी। पूरे एक साल तक तो जैसे-तैसे वह सडक़ों की खाक छानती, दरवाजे खटखटाती रही, फिर वह भी शहर की गलियों में से कहीं अलोप हो गयी। इम्तियाज हुसैन के एक बेटा भी था। मां के अलोप होने से पहले ही वह आवारा हो गया था और शहर छोडक़र किसी दूसरे शहर जा पहुंचा था।’’

हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक उन्माद ने बार-बार देश के रग-रेशे पर आघात किया है और वे आघात और जख्म भीष्म जी द्वारा निसृत रचनाओं में चीत्कार करते हैं। जहूर बख्श कहानी में सांप्रदायिक आंधी में ध्वस्त और तबाह हुए एक मुसलमान वृद्ध लेखक के दर्द को उकेरा गया है। तकलीफदेह बात यह है कि इस देश के एक वर्ग को मुस्लिम रचनाकारों द्वारा हिंदी में लेखन में भी सांप्रदायिकता की दुर्गंध आती है। भाषा किसी की बपौती नहीं होती। कोई जात, धर्म या संप्रदाय भाषा पर एकाधिकार साबित नहीं कर सकता। फिर भी सांप्रदायिकता का ज़ुल्म ढानेवाला अमानुष वर्ग भाषा को विभेद व विभाजन का विषय बनाता है। देश विभाजन से जुड़ी रक्ताक्त और मर्मांतक घटनाओं को कागज़ पर उकेरने के पीछे आपकी दिलचस्पी का कारण भारतीय समाज के विघटन, मानसिक दिशा व दशा को समझने-समझाने की चिंता थी।

विभाजन ने भीष्म जी के अंतस को बहुत भीतर तक झिंझोड़ा है तभी तो वे अपने साक्षात्कारों में कहते हैं कि अपना वतन, बहुत से प्रियजन, मित्र, संबंधी कालावगत हो चुके हैं। कभी-कभी अतीत बहुत दर्द देता है।  उनकी पाली कहानी विभाजन के दौरान सांप्रदायिक नृशंसता का जीता-जागता दस्तावेज है। विभाजन के बाद भी सीमा के दोनों ओर आज तक धार्मिक कट्टरवाद और क्रूरतम वैमनस्य के लिए जिम्मेदार नकाबपोश तत्वों का लेखक ने उक्त कहानी में पर्दाफाश किया है। एक तरफ  पाकिस्तान में जहां मौलवी के लिए बालक पाली को सुन्नत करवाकर, दीन का बच्चा बनाकर इल्ताफ बनाना ज़रूरी था वहीं दूसरी ओर सीमा के इस पार हिंदू चौधरी के लिए उसका मुंडन करवाकर, चुटिया लहराकर हिंदू का यशपाल बनाना उतना ही पुण्य का सिला बना। पाली का मानस धर्म के ठेकेदारों के फरमानों के समक्ष कुचला गया। वह तो एक निरीह बालक था, मां की ममता का भूखा। भीष्मजी इस कहानी के माध्यम से सीमा के दोनों ओर साम्प्रदायिकता व धार्मिक उन्माद को हवा देने वाले मठाधीशों से दो-दो हाथ करने पर उतारु हो चले हैं इसलिए उनकी यह कहानी अपने बेबाकपन में अनूठी बन पड़ी है। कौमी दंगों के वहशीपन और खून के प्यासे दंगाई गुंडों का सबसे खालिस चित्रण आपके तमस उपन्यास में मिलता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार व दिल्ली अकादमी के शलाका सम्मान से अभिमंडित उक्त उपन्यास दंगाइयों की दरिंदगी और मज़लूमों के आंसुओं व सिसकियों के दर्द से भीगा है। राजकुमार सैनी लिखते हैं - ‘‘इस उपन्यास की ताकत देश-व्यापी गृह-दाह में ईंधन जुटानेवाली प्रतिगामी शक्तियों के आलम को बेनकाब कर देनेवाली, उस व्यंग्यात्मक शैली में निहित है, जो भाषा की व्यंजनात्मक शक्ति का भरपूर इस्तेमाल करती हुई फिरकापरस्ती, कट्टरधार्मिकता, धर्मांधता आदि की मन:स्थितियों के सामाजिक संदर्भों को पर्त-दर-पर्त उघाड़ती चलती है।’’  इस उपन्यास को कलमबद्ध करने की पृष्ठभूमि में अपने मानस के संदर्भ में स्वयं लेखक कहते हैं कि सांप्रदायिकता की समस्या बंटवारे के साथ खत्म नहीं हो गई। वह मनोवृत्ति, वह रवैया आज भी हमारे समाज में रह-रहकर अपना भयंकर रूप दिखाते हैं। आदमी जो कुछ लिखता है, वह कहीं न कहीं तो उसके अपने काल से जुड़ता है, उसके अपने काल के लिए संगत होता है।

एक तरफ सांप्रदायिकता के नृशंस प्रहारों ने जहां देशवासियों को एक-दूसरे के खून का प्यासा बनाया वहीं ऐसे अमानुषिक वातावरण में भी कुछ लोगों में बसने वाले मानव ने अपने मानवीय चरित्र को विचलित नहीं होने दिया। लेखक दंगों के जुनून में होश गंवाये वहशी-दरिंदों की भीड़ में ऐसे साधारण से मनुष्य को पहचानना नहीं भूलते जिनके लिए मानव धर्म ही एकमात्र धर्म है। जिन्होंने धर्म के नाम पर खेली जाने वाले खून की होली का पुरज़ोर विरोध किया है। आपकी सरदारनी कहानी की बेबाक सरदारनी पाठकों में सच, साहस और मानवीय मूल्यों को अब भी जीवित रखने की ईमानदार कोशिश है।

मय्यादास की माड़ी उपन्यास में पंजाब के सामाजिक जीवन को वर्णित करते हुए भीष्मजी ने जमीनी सच को खंगाला हैै। इस संदर्भ में आलोचक पुष्पलाल सिंह लिखते हैं- ‘सामाजिक परिवर्तनों के मूल में निहित प्रबल तत्व, बाहर से पडऩे वाले दबाव, मूल्य और आदर्शों का बदलाव और इन सबके बीच जीवन का काया-कल्प किस रूप में होता है - ये सब प्रश्न, चिंता और सरोकार हैं जिनसे भीष्म साहनी का रचनाकार अपने नए उपन्यास ‘मय्यादास की माड़ी’ में जूझता हुआ पंजाब का एक युग का, स्वतंत्रता से पहले के प्राय: सौ बरस का, एक मुकम्मल समाज-इतिहास प्रस्तुत करता है, इस विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और रोचकता के साथ कि इससे भीष्म के उपन्यासकार का कद बहुत बड़ा हो जाता है।’

आपका कडिय़ां उपन्यास पति-पत्नी के चरमराते रिश्ते की रचना है। कृति में महेंद्र अपनी पत्नी प्रमिला से अधिकाधिक शारीरिक सुख की कामना रखता है जिसकी पूर्ति न होने पर परस्त्रियों के प्रति आकर्षित होता है। दूसरी ओर प्रमिला के लिए पुत्र की परवरिश व गृहस्थी का रख-रखाव ही जीवन का प्रथम और अंतिम ध्येय बन गया है। वह पति की सेवा करना जानती है पर पति को मोहना नहीं। दोनों की मानसिक दूरी इतनी बढ़ जाती है कि एक छत के नीचे रहनेे में नाकायाब होकर महेंद्र अपनी पत्नी को घर से निकाल बाहर करता है। बेटे पप्पू को होस्टल भेज देता है जहां वह मानसिक दबाव का शिकार होता है। प्रमिला के पिता नारंग साहब अपनी शादी-शुदा बेटी का बोझ उठाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए बार-बार उससे पति-गृह लौटने का आग्रह करते हैं। आम भारतीय पिता की हिचकिचाहट को व्यक्त करने में उपन्यासकार ने पूरी सच्चाई बरती है। एक तरफ  पति का अपमानित कर घर से निकाल बाहर करना, दूसरी तरफ  प्राणों से प्रिय बेटे पप्पू की जुदाई का सदमा, सामाजिक लांछन और पिता की उपेक्षा प्रमिला का मानसिक संतुलन बिगाड़ देते हैैं। पर कृति के अंत तक पहुंचते हुए लेखक ने प्रमिला को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भरता के मार्ग में बढ़ती हुई दिखाकर नारी के आर्थिक स्वावलंबन की वकालत की है। इस संदर्भ में उषा मंत्री लिखती हैं - ‘कडिय़ां की विशेषता परिवार की कडिय़ों को तोडऩे में नहीं है। वस्तुत: यह परिवार की कडिय़ों के टूट जाने के बाद प्रताडि़त पत्नी के आंतरिक व्यक्तित्व की कडिय़ों के नवगठन का उपन्यास है।’

अत: भीष्म साहनी के लेखन में वृहद सामाजिक सरोकारों से कहीं भी संबंध-विच्छेद के आसार नहीं दिखते। वे संगठित समाज की अवधारणा को सामने लाना चाहते थे। गौरतलब है कि वैचारिक संघर्ष को झेलनेवाले लेखक के अंतस को आपने अपने भीतर से महसूस किया है। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि विभेद को धराशायी करना चाहती है।