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Saturday 18 Nov 2017

प्रेमचन्द की परम्परा और भीष्म साहनी की साहित्य-दृष्टि

डॉ. राम विनय शर्मा

हिन्दी विभाग, महाराज सिंह कॉलेज, सहारनपुर-247001 (उ0प्र0),  मो. 09411038585

9 -10 अप्रैल, 1936 को प्रेमचन्द की अध्यक्षता में जिस प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्षता हुई थी, भीष्म साहनी ने सन् 1972 से 1986 तक उसके राष्ट्रीय महासचिव का दायित्व निभाया था। राजनीति की दीक्षा उन्हें राष्ट्रीय आन्दोलन में ही मिल गयी थी। बाद में चलकर उनकी राजनीतिक चेतना में बदलाव आया और वे वामपंथी राजनीति से जुड़ गये। अगर बीसवीं सदी की चौथी दहाई की घटनाओं पर दृष्टिपात करें, तो उसे हम विश्व इतिहास का एक विशेष कालखण्ड कह सकते हैं जिसमें पूँजीवाद का वैश्विक संकट, तीस के दशक की आर्थिक मन्दी, साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष, फासीवादी शक्तियों का उभार तथा अँगरेजी राज के विरुद्ध सतत संघर्ष की प्रक्रियाएँ लगातार बढ़ती जा रही थीं। अभिव्यक्ति का संकट भी गहराता जा रहा था। ऐसे ऐतिहासिक उथल-पुथल से भरे समय ने लेखकों को एक साथ एक मंच पर आने के लिए बाध्य किया था। यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी लगता है कि कोई भी लेखक संघ लेखक का उत्पादन अथवा निर्माण नहीं कर सकता। इसके बरअक्स उसकी भूमिका यह होती है कि वह लेखकों को जागरूक एवं सक्रिय करे। प्रगतिशील लेखक संघ ने उस समय लेखकों में आत्म सम्मान का भाव पैदा किया और उनका ध्यान लोक भाषाओं की ओर खींचा। उसने नवीन साहित्यिक अभिरुचि का विकास किया एवं सौन्दर्य के नये प्रतिमान गढ़े, साथ ही पतनशील प्रवृत्तियों का जमकर विरोध किया। इस प्रगतिशील आन्दोलन के साथ भीष्म साहनी का बहुत निकट सम्बन्ध रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि वे पहले आन्दोलनकर्ता बने, बाद में लेखक। उन्हें एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में सम्मान के साथ याद किया जाता है। राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन, किसान-मजदूर आन्दोलन तथा जनतांत्रिक सांस्कृतिक आन्दोलनों से उनका गहरा जुड़ाव रहा। ऐसे में भीष्म साहनी की रचनात्मक दृष्टि प्रगतिशील आन्दोलन को समझने का उपयुक्त उपकरण हो सकती है। ‘‘वे धीमी गति से, मद्धिम आवाज में बोलते थे, संक्षेप में अपनी बात कह जाते थे, लेकिन अध्ययन और अनुभव के दुर्लभ सामंजस्य से वे ऐसी बातें बोलते थे कि उन्हें सुनने और उन पर विचार करने को विवश होना पड़ता था। यह विवशता इतनी स्वाभाविक थी कि मन प्रसन्न हो जाता था।’’(खगेन्द्र ठाकुर: आलोचना, अप्रैल-सितम्बर 2004, पृ.229) भीष्म साहनी के बारे में निर्विवाद रूप से यह भी कहा जाता है कि उनके व्यवहार में बड़प्पन का दर्प और अधिकार जमाने का भाव नहीं था। एक तरह से वे अजातशत्रु लेखक थे।

भीष्म साहनी को प्रेमचन्द की परम्परा का लेखक कहा जाता है। यहाँ यह समझने की ज़रूरत है कि आखिऱ प्रेमचन्द की परम्परा है क्या और उसका सम्बन्ध भीष्म साहनी के साथ किस स्तर पर जुड़ता है? दरअसल जब हम प्रेमचन्द की परम्परा की बात करते हैं तो उसका मतलब होता है रचना में सामन्तवाद, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, जातिवाद, भेदभाव, साम्प्रदायिकता, शोषण एवं दमन का प्रतिरोध और वृहत्तर मानवता के पक्ष में लेखकीय सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति। दरअसल ‘‘प्रेमचन्द अपने समाज, अपने गरीब और पराधीन देश की स्थितियों को बदलने के लिए लिख रहे थे। उनका साहित्य उस युग के इतिहास में एक साहित्यिक हस्तक्षेप की तरह था।’’(अब्दुल बिस्मिल्लाह: वागर्थ, जून 2014, पृ. 47) हालांकि प्रेमचन्द के साहित्य में ग्रामीण समाज के, तो भीष्म साहनी के साहित्य में शहरी समाज के यथार्थ को अभिव्यक्ति मिली है, दोनों की भाषा अलग है; फिर भी दोनों के सरोकारों में बुनियादी तौर कोई फर्क नजऱ नहीं आता। सरोकारों की यही अभिन्नता भीष्म साहनी को प्रेमचन्द की परम्परा से जोड़ती है। प्रेमचन्द का साहित्य अगर आज भी हमारे लिए प्रासंगिक बना हुआ है तो इसका प्रमुख कारण उनके व्यापक मानवीय सरोकार ही हैं। जब तक समाज में गरीबी, भूख, शोषण, अन्याय, विषमता, धर्मान्धता एवं जाति के नाम पर भेदभाव बना रहेगा, तब तक प्रेमचन्द की प्रासंगिकता में कोई कमी नहीं आने पाएगी। कथाकार पंकज बिष्ट का कहना है कि ‘‘आजादी के बाद तक प्रेमचन्द की वह परम्परा कायम थी जिसमें हमारे समाज में अल्पसंख्यक की उपस्थिति को हिन्दी में उन लेखकों ने रेखांकित करने का लगातार प्रयास किया था जो स्वयं अल्पसंख्यक नहीं थे। यशपाल और भीष्म साहनी इसके उदाहरण हैं।’’(पंकज बिष्ट: वागर्थ, जून 2014, पृ.27) सिर्फ  अल्पसंख्यक पात्रों का चित्रण कर देना अथवा ग्रामीण परिवेश में किसान जीवन की छवियाँ निर्मित कर देना प्रेमचन्द की परम्परा का पर्याय नहीं है। असल बात उस रचना-दृष्टि की है जिसे प्रेमचन्द ने अपने साहित्य का आधार बनाया है। यह बात सही है कि प्रेमचन्द के बाद कथा साहित्य में अल्पसंख्यक पात्रों की उपस्थिति लगातार कम होती गयी, फिर भी यह कहना अनुचित न होगा कि प्रेमचन्द की परम्परा बहुआयामी है और समकालीन रचनाधर्मिता उसके प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं है। भीष्म साहनी के साहित्य पर विचार करें तो उनके लेखन में सोद्देश्यता अथवा गहरे सामाजिक सरोकारों का समावेश और उसके प्रति सजगता स्पष्ट दिखायी देती है। कहने का अर्थ यह है कि भीष्म साहनी के लेखन में हमें एक ऐसी व्यापक दृष्टि की झलक मिलती है जिसमें मनुष्य और उसके समाज को प्रगतिशील, मानवीय, सुसंस्कृत, संवेदनशील एवं सुन्दर बनाने का सपना पल रहा होता है। बात सिफऱ् सपनों तक ही सिमट कर नहीं रहती, वह आकांक्षा में बदलती हुई छटपटाहट तक जाती है; अर्थात् भीष्म साहनी भारतीय साहित्य के एक ऐसे रचनाकार हैं जिसमें मनुष्य और समाज को सुन्दर देखने की बेचैनी महसूस की जा सकती है। इसे जानने-समझने के लिए उनके साहित्य में बिखरे उन पात्रों, घटनाओं एवं प्रसंगों पर दृष्टिपात करना होगा जिन्हें उन्होंने बहुत जतन से गढ़ा है। ‘तमस’ का हरनाम सिंह और जरनैल सिंह, ‘बसन्ती’ की बसन्ती, ‘मय्यादास की माड़ी’ की रुक्मणी और लेखराज, ‘चीफ़  की दावत’ की बूढ़ी माँ, ‘हानूश’ का हानूश, ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ नाटक के कबीर, ‘माधवी’ की माधवी जैसे पात्र हों अथवा ‘तमस’ में इत्रफरोश की हत्या, कुएँ में गिरकर स़्ित्रयों की सामूहिक आत्महत्या, इक़बाल सिंह के मुंह में हड्डी ठंूसने, छत पर भाग रही लडक़ी के साथ सामूहिक बलात्कार करने, ‘अमृतसर आ गया है’ में पठान को धक्का देकर रेल के डिब्बे से बाहर फेंकने, ‘हानूश’ में हानूश की आँखें निकाले जाने का आदेश, ‘माधवी’ में पिता द्वारा माधवी को दान दिये जाने जैसे प्रसंग भीष्म साहनी की गहरी संवेदनशीलता, व्यापक दृष्टि एवं छटपटाहट का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

भीष्म साहनी का साहित्य हाशिये के लोगों की पीड़ा, शोषण, यातना और जीवन-संघर्ष से भरा हुआ है। इन हाशिये के लोगों में मजदूर, घरेलू नौकर-नौकरानियां और छोटे-छोटे काम करके जीवन-यापन करने वाले विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन उपेक्षित पात्रों को अपनी रचनाओं में सम्मानजनक स्थान देकर भीष्म साहनी ने अपनी रचना-दृष्टि का परिचय दे दिया है। उनका उपन्यास ‘बसन्ती’ शहरी मजदूरों के बार-बार बसने-उजडऩे तथा यातनाएँ सहते जाने की विवशता को जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है, उसके आधार पर उनकी सर्जनात्मक दृष्टि का मूल्यांकन किया जा सकता है। उनकी रचनाओं में चित्रित हाशिये के लोगों के जीवन की अनेक विडम्बनात्मक स्थितियाँ राजनीति एवं समाज के विद््रूप को प्रभावशाली ढंग से सामने रख देती हैं। भीष्म साहनी के साहित्य में हाशिये के लोगों की पीड़ा की अभिव्यक्ति का उनकी विचारधारा से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वंचित समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले उनके पात्र अगर शोषण एवं यातना का शिकार होते हैं तो उन्हें व्यक्तिगत अथवा सामूहिक स्तर पर प्रतिरोध करते हुए भी देखा जा सकता है। कहने का मतलब यह है कि उनके पात्र अपनी पीड़ा को चुपचाप सहन नहीं करते, बोलते हैं; स्थितियों से समझौता नहीं करते, बल्कि उनसे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं और इस प्रक्रिया में उनका एक ठोस व्यक्तित्व निखरकर पाठक के सामने मूर्त हो जाता है। भीष्म साहनी के पात्रों की विशेषता यह है कि वे गुमनामी का शिकार होना पसन्द नहीं करते। वे जहाँ जिस भी स्थिति में रहते हैं, अपनी मौजूदगी का एहसास कराते रहते हैं। इस दृष्टि से उनका उपन्यास ‘बसन्ती’ उल्लेखनीय है। ‘साग मीट’ कहानी के जग्गा को भी भुलाया नहीं जा सकता। सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से उनके ऐसे पात्रों में विविधता भी मिलती है, किन्तु समग्रता में देखें तो इन पात्रों के बीच कोई भारी अन्तराल नहीं दिखायी देता। हाशिये के लोगों के प्रति भीष्म साहनी की सकारात्मक दृष्टि का एक कारण उनकी वैचारिक अवस्थिति में निहित है। दूसरे, रचनाकार की मानसिक बुनावट और सामाजिक व्यवहार भी निम्नवर्गीय पात्रों को देखने-समझने-रचने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भीष्म साहनी के व्यक्तित्व में जो सहजता पायी जाती रही है वह भी पात्रों की निर्मिति में सहायक बनी है। व्यंग्य एवं विडम्बना का उन्होंने पर्याप्त उपयोग किया है। यही नहीं, उनके साहित्य में करुणा जैसे उदात्त एवं अपरिहार्य मानवीय मूल्य की सघन उपस्थिति मिलती है। इससे उनका साहित्य पठनीय ही नहीं, सघन संवेदी बन गया है। भीष्म साहनी के लेखन की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता है परिवेश का प्रामाणिक एवं सहज चित्रण। उनके सृजन संस्कार में पंजाब के विविध रंग समाहित हैं। पंजाब उनके संस्कार का अटूट हिस्सा है और वह भीष्म साहनी को उदारता एवं विनम्रता जैसे गुण प्रदान करता है। उनकी साहित्य-दृष्टि का निर्माण देश-प्रेम, भारतीय संस्कृति, आर्य समाज, गाँधीवाद और माक्र्सवाद के मेल से हुआ है। उनके जीवन, विचार एवं आचरण में माक्र्सवादी दर्शन घुल-मिलकर समावेशी बन गया है।  

 कहने की आवश्यकता नहीं कि भीष्म साहनी विभाजन की त्रासदी के निकट साक्षी रहे हैं। यह त्रासदी उनके लेखन में केन्द्रीय कथ्य के रूप में व्यवहृत हुई है। उनके लेखन में विभाजन की त्रासदी के बहुविध प्रसंग मिलते हैं। इन प्रसंगों के चित्रण में विश्वसनीयता है। उनका उपन्यास ‘तमस’ विभाजन की त्रासदी की रचनात्मक प्रस्तुति है। साम्प्रदायिक हिंसा के वातावरण में भी मानवता की रक्षा का लघुतम प्रयास इस उपन्यास की उल्लेखनीय उपलब्धि है। इस रचना में आशा की ऐसी किरण दिखायी देती है जो वर्तमान त्रासदी से निकालकर भविष्य के बारे में भरोसा दिलाती है। इस उपन्यास में कुछ ऐसे ‘मार्मिक प्रसंग’ हैं जो आँखों के सामने तैरने लगते हैं। उन्हें आसानी से नहीं भुलाया जा सकता। अपनी बूढ़ी माँ को पीठ पर लादे गर्भवती पत्नी के साथ भागता नत्थू, रणवीर को शूरवीर बनाने हेतु दिया जाने वाला प्रशिक्षण,  शाहनवाज के अकारण प्रहार से मृत्यु की ओर सन्तरण करता मिल्खी, उन्मादग्रस्त भीड़ से घिरे इक़बाल सिंह की विवशता, कट्टर लीगी के घर में शरण लिए हरनाम सिंह का हाथ में लस्सी का कटोरा थामे फफक कर रो पडऩा, मर्यादा बचाने के लिए सिख स्त्रियों का कुएं में कूदकर सामूहिक आत्महत्या करना और मरी हुई लडक़ी के साथ युवकों के एक समूह द्वारा बलात्कार का प्रयास आदि ‘तमस’ के ऐसे प्रसंग हैं जो पाठक की संवेदना को न सिफऱ्  झकझोरते हैं, बल्कि लम्बे समय तक परेशान करते रहते हैं। करुणा भीष्म साहनी की रचनाशीलता का अनिवार्य तत्व है। उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए बार-बार ऐसा लगता है कि वे अत्यन्त विषम, जटिल एवं त्रासद परिस्थितियों में भी आशा का एक दीप जलाये रखते हैं और इन्हीं परिस्थितियों के बीच से मानवता तथा उसकी गरिमा को बचाने का कोई न कोई मार्ग अवश्य ढूँढ़ लेते हैं। शब्दों, स्थितियों, घटनाओं एवं पात्रों की अनुभूतियों के बीच बिखरी करुणा की एक-एक बूँद को बटोरकर वे उसे ऐसा ठोस रूप देते हैं कि पाठक रचना की समाप्ति पर अर्थ के एक नये बोध से भर उठता है।

बीसवीं सदी में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन के दौरान साम्प्रदायिक राजनीति का जो सिलसिला शुरू हुआ था और जिसकी परिणति देश-विभाजन, विस्थापन और हिंसा में हुई थी, उसके लिए भीष्म साहनी ने अँगरेजों की कूटनीति को उत्तरदायी ठहराया है। दूसरे शब्दों में कहें तो अँगरेजों की कूटनीति ने विभाजन को सम्भव बनाने में निर्णायक भूमिका निभायी थी। इसके साथ यह जोडऩा भी ज़रूरी है कि जो साम्प्रदायिक एवं अलगाववादी शक्तियां अंगरेजों की कूटनीति को सफल बनाने में सहयोग कर रही थीं और जिन्हें राजसत्त पर अधिकार चाहिए था, वास्तव में उत्तरदायी तो वे थीं। स्पष्ट शब्दों में कहें तो भारत-विभाजन भावी सत्ता संरचना को लेकर अभिजात वर्ग की आपसी लड़ाई का परिणाम था। अंगरेजों ने उस मौके का भरपूर फायदा उठाया। अंगरेजों ने मुसलमान शासकों से सत्ता छीनी थी। सम्भवत: इसलिए मुस्लिम अभिजात अंगरेजों के जाने के बाद राजसत्ता पर अपना अधिकार चाहता था, लेकिन उसे यह भी लगता था कि अगर भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हुई तो उस स्थिति में उनका वर्चस्व स्थापित नहीं हो सकता। इस बात को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम भद्र वर्ग ने अपने लिए एक अलग राज्य की स्थापना को आवश्यक समझा और उसे सम्भव बनाया। हालाँकि भीष्म साहनी किसी समुदाय को कम अथवा ज्यादा साम्प्रदायिक चित्रित कर कोई वर्गीकरण नहीं करते, फिर भी राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान मुस्लिम लीग के नेतृत्व में मुसलमानों की आक्रामकता के पीछे यह एक ठोस कारण था।

 भीष्म साहनी की रचनाएँ समाज और उसकी सभ्यता की गहरी पड़ताल करती हैं तथा उसके आवरण को हटाकर वास्तविकता को सबके सामने खोलकर रख देती हैं। उन्होंने मध्यवर्ग के जीवन को अनेक कोणों से परखा है, उसकी विविध छवियों को चित्रित किया है। मध्यवर्ग की चतुराई, दिखावा, पाखण्ड, स्वार्थपरता एवं अवसरवादिता पर उन्होंने करारी चोट की है। इसके बरअक्स भीष्म साहनी ने अपने पात्रों में पायी जाने वाली मानवता को उभारने में भी विशेष रुचि दिखायी है। ऐसा करके उन्होंने लगातार स्वार्थी, संकीर्ण एवं हिंसक होते जा रहे समाज को संवेदनशील बनाने का रचनात्मक प्रयास किया है। सभ्यता और समाज में जो कुछ भी मनुष्यविरोधी है, भीष्म साहनी ने उसे इस तरह प्रस्तुत किया है कि पढऩे वाले को उससे घृणा हो जाय। संस्कृति एवं समाज में प्रभावी प्रतिक्रियावादी तत्वों एवं विचारों का निषेध करते हुए भीष्म साहनी ने अपने साहित्य में ऐसे मूल्यों की प्रतिष्ठा पर जोर दिया है जो शाश्वत होते हुए प्रगतिशील, समाजोपयोगी एवं प्रासंगिक हों। भीष्म साहनी के साहित्य में धर्म और मानवता के पारस्परिक सम्बन्धों का जो चित्रण मिलता है उसे देखकर कहा जा सकता है कि माक्र्सवादी लेखक होते हुए भी वे मानव जीवन एवं समाज के लिए धर्म की आवश्यकता को पूरी तरह से नकारते नहीं हैं। अगर धर्म मनुष्य को संवेदनशील, करुण एवं उदार बनाने में सहायक हो तो उसे अनावश्यक कैसे कहा जा सकता है ? संकीर्णता और असहिष्णुता चाहे धर्म की हो अथवा विचार की, अस्वीकार्य होती है। जो भी व्यक्ति, संगठन अथवा समूह धर्म या विचार की संकीर्णता को बढ़ावा देते हैं, भीष्म साहनी के साहित्य में ऐसों की पहचान करते हुए उन्हें खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है। ‘तमस’ उपन्यास में उन्होंने हरनाम सिंह के चरित्र को जिस तरह से गढ़ा है, उसे देखकर भीष्म साहनी के ‘धार्मिक व्यक्ति’ का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। सहिष्णुता, संयम, संवेदनशीलता एवं धैर्य को धारण करने वाला हरनाम सिंह भीष्म साहनी के साहित्य का एक अविस्मरणीय पात्र बन गया है। उसकी आँखों के सामने उसका घर जला दिया जाता है, उन्मादियों की एक भीड़ उसके बेटे को घेरकर अमानवीय तरीके से मुसलमान बनाती है; फिर भी मुसलमानों के विरुद्ध घृणा का कोई भाव उसके भीतर पैदा नहीं होता। कंधे पर टंगी बन्दूक भी प्रतिशोध के लिए उसे उकसा नहीं पाती। भीष्म साहनी की दृष्टि में मानवता की रक्षा का विचार एवं तदनुरूप आचरण ही धर्म की उपयोगिता अथवा आवश्यकता को सुनिश्चित कर सकता है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह धर्म के नाम पर किया जाने वाला पाखण्ड है जिसका राजनीति एवं अर्थ तंत्र से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है और जो अपने चरित्र में मानवताविरोधी होता है। यही कारण है कि अपने नाटक ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ पालकी पर सवार महन्त जी को भीष्म साहनी धार्मिक व्यक्ति नहीं मानते। ऐसे लोग धर्म का आचरण नहीं, व्यापार करते हैं। भीष्म साहनी ऐसे कथित धार्मिकों पर व्यंग्य करते हैं, उनके वास्तविक चरित्र को उद्घाटित करते हैं जिससे कम से कम उनके साहित्य का पाठक तो सावधान हो सके।

भीष्म साहनी साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता में आस्था रखने वाले लेखक हैं। पहले राष्ट्रीय आन्दोलन और बाद में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहने के कारण उनका अनुभव संसार विस्तृत एवं वैविध्यपूर्ण तो है, लेकिन उसमें वृहत्तर ग्रामीण समाज का यथार्थ समाहित नहीं है। ग्रामीण समाज उनके अनुभव जगत का हिस्सा कभी रहा ही नहीं। भीष्म साहनी ने इसे ईमानदारी से स्वीकार भी किया है। वे मूलत: शहरी जीवन के लेखक हैं। इसलिए उनकी रचनाओं में नगरीय जीवन एवं समाज के व्यापक यथार्थ की सघन उपस्थिति को देखा जा सकता है। राष्ट्रीय आन्दोलन से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिवर्तन एवं विकास का साक्षी रहे भीष्म साहनी ने अपने लेखन के लिए जिन कथानकों का चयन किया है, उनमें उनका अनुभव बोलता हुआ सुनायी पड़ता है। उनकी भाषा, शैली और कहन इतने सहज एवं परिचित लगते हैं कि उन्हें समझने में सामान्य पाठक को कोई कठिनाई नहीं होती। वे मनुष्य की गरिमा को विशेष महत्व देने वाले लेखक हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में वंचित, उपेक्षित एवं शोषित पात्रों को न सिफऱ् रचा है, बल्कि उनके साथ भरपूर संवेदनशीलता भी दिखायी  हैं। आर्थिक प्रगति एवं विकास में वे वंचित समुदाय की भागीदारी को आवश्यक मानते हैं। ऐसा हुए बिना समानता एवं न्याय का संकल्प अधूरा रह जाएगा। भीष्म साहनी की समूची रचनाशीलता से गुजऱते हुए ऐसा लगता है कि वे परिवार एवं समाज से व्यक्ति को जोड़े रखने तथा इन सबके बीच सौहाद्र्र बनाए रखने का निरन्तर प्रयास कर रहे हों। उनकी रचनाओं में एक तरह के अनुशासन का आग्रह दिखायी देता है। वे अराजकता विरोधी लेखक हैं। असहमति एवं प्रतिरोध में भी वे संयम की माँग करते हैं। जब जीवन के सभी क्षेत्रों में तनाव, दुराव, टूट-फूट और अराजकता बढ़ती ही जा रही हो, ऐसे में भीष्म साहनी का साहित्य हमारे लिए सच्चाई जानने का माध्यम ही नहीं, प्रेरणा का स्रोत ही नहीं; पथ-प्रदर्शक के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है। इस तरह का साहित्य अपनी मूल्य-चेतना के कारण प्रत्येक देश-काल में प्रासंगिक बना रहता है।