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Tuesday 21 Nov 2017

भीष्म होने का अर्थ

राजेंद्र शर्मा

515 विट्ठल भाई पटेल हाउस रफी मार्ग, नई दिल्ली- 110001

यह भीष्म साहनी की जन्म शताब्दी का साल है। इस मौके पर भीष्मजी को याद करते ही एक दुविधा सामने आ खड़ी होती है। दुविधा यह है कि उन्हें हम किस रूप में याद करें। यहां हम उनकी सक्रियता के विभिन्न क्षेत्रों की चर्चा नहीं कर रहे हैं। प्राय:सभी जानते हैं कि हिंदी में प्रेमचंद के बाद की कथा पीढिय़ों के और खासतौर पर नयी कहानी पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में होते हुए भी, भीष्म साहनी सिर्फ  कथाकार ही नहीं थे। वह संभवत: अपनी पीढ़ी के उतने ही महत्वपूर्ण नाटककार भी थे। पर भीष्म साहनी सिर्फ  कथा और नाटक लेखक ही नहीं थे। वह वर्षों तक इप्टा से घनिष्ठ रूप से जुड़े भी रहे थे और उन्होंने नाटकों में अभिनय भी किया था और खुद नाटकों का निर्देशन भी किया था। और मोहन जोशी हाजिर हो से लेकर तमस तथा मिस्टर एंड मिसेज अय्यर तक के उनके यादगार सिने अभिनय को कौन भूल सकता है। लेकिन, भीष्म साहनी सिर्फ अपनी धुन में मगन रचनाकार ही नहीं थे। वह रचनाकार के रूप में अपने सपनों को यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिए व्याकुल उतने ही निष्ठावान, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। आजादी की लड़ाई के दौर में ही कांग्रेस से शुरूआत कर कम्युनिस्ट पार्टी तक पहुंचे और समाजवाद के लक्ष्य में अपनी आस्था पर अंतिम समय तक कायम रहे भीष्म साहनी ने आम राजनीतिक-सामाजिक काम से आगे बढकऱ, शिक्षकों की ट्रेड यूनियन के नेतृत्व से लेकर, अनेक वर्षों तक प्रगतिशील लेखक संघ के नेतृत्व तक की, सांगठनिक जिम्मेदारियां भी उठायी थीं। एक शब्द में कहें तो वह एक मुकम्मल रचनाकार थे या कहना चाहिए कि अपनी जनता के आवयविक (ऑर्गनिक) बुद्घिजीवी।

                पर मेरी दुविधा दूसरी है। इसका संबंध इस सच्चाई से है कि हिंदी साहित्य और उसमें भी कथा साहित्य के पाठक की हैसियत से स्कूल के दिनों में कब चीफ की दावत के भीष्म साहनी से परिचय हुआ यह तो याद नहीं है, पर भीष्मजी से मेरा प्रत्यक्ष परिचय सहमत के माध्यम से ही हुआ था। जाने-माने वामपंथी रंगकर्मी, सफदर हाश्मी की हत्या के खिलाफ  सर्जक-बौद्घिक हलकों में उठी विक्षोभ की जबर्दस्त लहर में भीष्मजी शामिल ही नहीं थे बल्कि उसके शीर्ष पर थे। एक माक्र्सवादी कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने इस हत्या के प्रवृत्तिगत अर्थों को ही नहीं समझा था, इन प्रवृत्तियों का मुकाबला करने के लिए, इस विक्षोभ को एक सतत सक्रिय संगठित प्रयास में ढालने की जरूरत को भी पहचाना था। अचरज नहीं कि इसी दिशा में कदम के तौर पर जब सहमत (सफदर हाश्मी मैमोरियट ट्रस्ट) का गठन हुआ, रचनाकारों की दुनिया में अपने ऊंचे कद के चलते, इस ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष के पद के लिए स्वाभाविक रूप से भीष्म साहनी का ही नाम आया और उन्होंने इस जिम्मेदारी को सहर्ष कबूल भी किया और आखिरी सांस तक निभाया भी। इसी सहमत की मार्फत मेरा भीष्मजी से परिचय हुआ। वैसे इसे परिचय कहते हुए भी मुझे संकोच हो रहा है। बचपन से आप जिस लेखक को पढ़ रहे हों, उसके साथ आमने-सामने होने पर भी संकोच के भारी पर्दे की मौजूदगी से बचना मुश्किल है। उसके ऊपर से भीष्मजी की मारक सादगी और मोहक सुंदरता। सब मिलकर एक ऐसा आभामंडल बनाते थे कि औपचारिक परिचय के बाद संकोच के पर्दे हटने के बजाए और मोटे हो जाते थे। अचरज नहीं कि सहमत के बीसियों आयोजनों में बोलते हुए भीष्मजी की तस्वीरें आज भी मेरी आंखों के सामने हैं। लेकिन, ऐसा कोई निजी प्रसंग, कोई घटना याद नहीं पड़ती है, जो सुनाने लायक हो। लेकिन, यह मुझे बखूबी याद है कि सहमत के गठन के फौरन बाद, जब उसकी गतिविधियों तथा काम की मुख्य दिशा पर खुली चर्चा हो रही थी, भीष्मजी ने एक लिखित नोट के जरिए, सहमत के लिए सांप्रदायिकताविरोधी परिप्रेक्ष्य की जरूरत को पूरा बल देकर रेखांकित किया था। हालांकि, इस नोट को उस समय ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया गया था बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि तत्काल उसके पूरे अर्थ को शायद समझा भी नहीं जा सका था। फिर भी इतना तय है कि सहमत को शुरूआत से ही सबसे बढकऱ एक सांप्रदायिकताविरोधी सांस्कृतिक हस्तक्षेप का रूप देने में, भीष्मजी का काफी हाथ था।

                याद रहे कि यह वह दौर था जब राम मंदिर के नाम पर उग्र बहुसंख्यक सांप्रदायिक गोलबंदी के नगाड़े बजने शुरू हो चुके थे। तमस के टेलीविजन प्रसारण पर उठी समर्थन और विरोध की लहरें, सांप्रदायिक गोलबंदी के खतरे की गंभीरता का सबूत पेश कर चुकी थीं। ऐसे में भीष्मजी को यह पहचानने में जरा भी देर नहीं लगी कि संस्कृति की दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती, सांप्रदायिकता की चुनौती है। अन्य सभी चुनौतियां, इसी के माध्यम से अभिव्यक्ति पा रही होंगी। पर भीष्मजी ही क्यों? इस सवाल का जवाब उनके जीवनानुभव में ही मिलेगा। आखिर, यह वही भीष्म साहनी थे जिन्हें भिवंडी के सत्तर के दशक के आरंभ के दंगे, देश के विभाजन के समय के दंगों और सांप्रदायिक विभीषिका पर लौटा ले गए थे। इसका नतीजा तमस जैसी कृति के रूप में सामने आया। फिर भी हो सकता है कि तमस की गिनती हिंदी के सबसे महत्वपूर्ण उपन्यासों में न हो। यह भी हो सकता है कि यह भीष्म साहनी का भी सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास न हो। इसके बावजूद, तमस ने खासतौर पर हिंदी की जिस $खला को भरा है, उसे नहीं भूलना चाहिए। यह एक कड़वी सचाई है कि हिंदी में विभाजन जैसी भयावह त्रासदी पर, संभवत: उसके मूल सांप्रदायिक चरित्र के चलते, बहुत ही कम लिखा गया है। वास्तव में विभाजन की त्रासदी के भुक्तभोगी, पंजाबी तथा मुसलमान लेखकों को छोडकऱ, शेष हिंदी लेखकों द्वारा तो करीब-करीब कुछ भी नहीं लिखा गया है। बहरहाल, एक भुक्तभोगी के नाते, भीष्म साहनी ने सिर्फ तमस उपन्यास और अमृतसर आ गया जैसी कहानियां ही नहीं लिखीं (इन कहानियों का संकलन वीरो भीष्म साहनी के शताब्दी वर्ष में ही सहमत ने प्रकाशित किया है) बल्कि एक विचारक तथा कार्यकर्ता के रूप में इसकी चेतना का निर्माण करने के लिए भी निरंतर प्रयास किया कि सांप्रदायिकता का खतरा कितना बड़ा है और इसका मुकाबला करना कितना जरूरी है। इसी एहसास से भीष्म साहनी ने तमस के फिल्मांतरण के लिए गोविंद निहलानी के साथ पूरी लगन से काम किया, ताकि सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी पुकार को दूर तक पहुंचा सकें। बेशक, यह भी संयोग ही नहीं है कि भीष्मजी की संभवत: अंतिम प्रकाशित कहानी, मैं भी दिया जलाऊंगा, मां गुजरात के 2002 के अल्पसंख्यकविरोधी नरसंहार पर है, जिस पर भीष्म साहनी ने कई तीखी तथा मार्मिक टिप्पणियां भी लिखी थीं। इसी सिलसिले में एक और चीज का भीष्मजी का बलपूर्वक रेखांकन हमें अलग से याद आता है। जरूरी नहीं है कि भीष्मजी यह रेखांकित करने वाले पहले ही हिंदी लेखक हों, फिर भी उनका इस सच्चाई का रेखांकन बहुत पुरअसर था कि उनकी पीढ़ी के बचपन तक, अलग-अलग संप्रदाय के लोगों की जैसी साझा रहनी (लिविंग) थी, उसका उत्तरोत्तर नष्ट किया जाना एक ऐसी सांस्कृतिक क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। यह दूसरी बात है कि इस नकारात्मक विकास के बावजूद, भीष्मजी का भारतीयों की परस्पर मेल-जोल तथा बहुलता की सहज संस्कृति पर गहरा विश्वास था और वह यह रेखांकित करना नहीं भूलते थे कि दंगे तभी भडक़ते हैं, जब उन्हें योजनाबद्घ ढंग से भडक़ाया जाता है। वर्ना अब भी, हमारी बुनियादी लोकतांत्रिक राजनीति, इसके बहुलतावादी चरित्र, समुदायों के बीच सद्भावना और उनकी साथ-साथ शांति से जीने की इच्छा को इतना दूषित नहीं किया जा सका है कि वह विद्वेष तथा अंधघृणा में बदल जाए। (साझा संस्कृति के पक्ष में)

                बेशक, एक रचनाकार के रूप में भीष्म साहनी का मानसिक परिसर बहुत बड़ा तथा वैविध्यपूर्ण है। वह  सांप्रदायिकता तक ही सीमित तो हर्गिज नहीं है। यह बात उनके लेखकीय जीवन के अंतिम दो दशकों के संबंध में भी उतनी ही सच है, जितनी इससे पहले के चार दशकों के बारे में। यह इसके बावजूद था कि ये दो दशक, सांप्रदायिकता की चुनौती के बहुत गंभीर रूप लेकर सामने आने के दशक थे। तमस के बाद बसंती , मय्यादास की माड़ी, कुंतो तथा नीलू, नीलिमा, नीलोफर उपन्यासों का प्रकाशन या अंतिम कहानी संग्रह के रूप में डायन का प्रकाशन, इसका सबसे बड़ा सबूत है। फिर भी सच्चाई यही है कि भीष्मजी सांप्रदायिकता की चुनौती को, महज एक सवाल या एक विषय के रूप में नहीं देखते थे बल्कि बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुजातीय समाज के भारतीय समाज के स्वभाव की रक्षा करने और उसमें जनतंत्र का विस्तार करने के बुनियादी सांस्कृतिक काम के, प्रकटत: राजनीतिक पक्ष की तरह देखते हैं। भारतीय समाज के गंगा-जमुनी स्वभाव की रक्षा करना तथा उसका जनतांत्रिक विस्तार, उनके हिसाब से किसी भी सार्थक सांस्कृतिक/ रचनात्मक प्रयास की मुख्य दिशा होनी चाहिए। भीष्म साहनी का इतना ही पक्का विश्वास एक ऐसे बेहतर मानव समाज के निर्माण के लक्ष्य में था, जहां सबके लिए बराबर के अवसर हों और किसी के पांव में आर्थिक या सामाजिक हैसियत की या किसी अन्य पहचान की ऐसी बेडिय़ां न हों जो उसकी संभावनाओं को कुचलती हों। बेशक, भीष्म साहनी ने दूसरे विश्व युद्घ के फौरन बाद का वह दौर भी देखा था जब समाजवादी क्रांति दरवाजे पर खड़ी लगती थी और सोवियत संघ के पराभव के बाद का दौर भी देखा था, जब बहुतों को समाजवाद का अपना सपना ही झूठा लगने लगा था। लेकिन, भीष्म साहनी एक बेहतर समाज की अपनी कामना से पल भर के लिए भी डिगे नहीं। $कैफी आज़मी के हवाले से भीष्म साहनी ने एक मौके पर लिखा था, जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो वापपंथी साहित्यकारों ने, क्या यह सोचकर खिन्नता महसूस की थी कि जिस व्यवस्था के वे गुण गाते रहे, वह दुनिया के तख्त पर मौजूद ही नहीं रहेगी। ऐसा नहीं होता, कदापि नहीं होता। वे जुड़ते थे तो उस व्यवस्था की अवधारणा के साथ, जो एक न्यायसंगत, समानता पर आधारित, शोषणमुक्त व्यवस्था की संभावना का आश्वासन देती थी। सोवियत व्यवस्था उस अवधारणा को चरितार्थ करने का प्रयास थी। उसके विघटन से न्यायसंगत समाज की अवधारणा का विघटन नहीं हुआ। इस अवधारणा पर सोवियत शिविर के विघटन के बाद भी भीष्म साहनी वैसे ही कायम रहे, जैसे विभाजन की विभीषिका देखने के बाद भी, मिली-जुली संस्कृति में अपने विश्वास पर आजीवन कायम रहे। इन सबके चलते भी, नयी कहानी पीढ़ी की भीड़ में भीष्म साहनी काफी अलग-अलग से नजर आते हैं। नये-नये विकसित होते मध्य वर्ग के मानसिक परिसर की आलोचनात्मक जांच-पड़ताल के अपने साझे के बावजूद भीष्म-अमरकांत-मार्कण्डेय-शेखर जोशी आदि की उपधारा, नयी कहानी पीढ़ी की मुख्यधारा से अलग ही अपने रास्ते पर चलती नजर आती है। इनकी नजर सिर्फ मध्य वर्ग से बाहर ही नहीं जाती है बल्कि इनके पास मध्य वर्ग को, उसके बाहर से देखने की एक दृष्टि भी है, जो उन्हें एक बेहतर समाज की अपनी निष्ठा से मिली है, जबकि इस कथा पीढ़ी की मुख्यधारा, अपनी तमाम मुद्राओं के बावजूद (जिसमें हिकारत की अकहानीवादी मुद्रा भी शमिल है), मध्य वर्ग को उसके भीतर से ही देखती है।

यह दूसरी बात है कि अज्ञेय तथा निर्मल वर्मा जैसे विशेष रूप प्रतिभाशाली रचनाकार, छद्म दार्शनिकीकरण की मुद्रा की ओट में इस खोट को दूसरों से ज्यादा सफलता से छुपा लेते हैं। इस भीड़ में और खासतौर पर नयी मुद्राओं के पुच्छल तारों की चकाचौंध के बीच, भीष्मजी शायद कभी सबसे चमकदार तारे की तरह नहीं चमके। पर वह हमेशा अपनी चमक के साथ डटेे रहे, ध्रुव तारे की तरह। जैसाकि एक और वैसे ही एकनिष्ठ बुद्घिजीवी तथा भीष्मजी के घनिष्ठ मित्र राधेश्याम दुबे ने उन्हें श्रद्घांजलि अर्पित करते हुए लिखा था, ( दुर्भाग्य से पिछले साल वह भी दुनिया ने विदा ले गए), भीष्मजी ने अपनी जगह धीरे-धीरे बनायी। लेकिन, यह जगह पुख्ता है।