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Tuesday 21 Nov 2017

भीष्मजी : कुछ यादें

परीक्षित साहनी

पिरोजा कोर्ट, थर्ड फ्लोर

 रुइया रोड, गांधी ग्राम

जुहू , मुंबई- 400043

वे मेरे पिता के छोटे भाई थे (दो साल छोटे), इस नाते मेरे चाचा हुए। लेकिन कई मायनों में भीष्मजी से मैं मेरे पिता से भी ज्यादा करीब था। मेरे पिता बलराज साहनी द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभिक वर्षों में इंग्लैंड चले गए थे, मैं तब कुछ महीनों का था। मेरे दादा-दादी ने मुझे साथ ले जाने की अनुमति उन्हें नहींदी, क्योंकि जर्मनी और ग्रेट ब्रिटेन के बीच लड़ाई थी और मेरे माता-पिता कब लौटेंगे, यह निश्चित नहींथा।  ब्रिटिश बेड़ों पर यू-बोट्स के हमले हो रहे थे और कई ब्रिटिश जहाज अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही डूब गए थे।

तो इस तरह मेरा बचपन भीष्म जी के साथ ही बीता। जब मेरे माता-पिता इंग्लैंड से लौट आए और फिल्मों में बतौर अभिनेता काम करना प्रारंभ किया, तब भी मुझे भीष्मजी के पास ही रखना उचित समझा गया। क्योंकि वे नहींचाहते थे कि शो बिजनेस की चमकती दुनिया की पथरीली सच्चाइयों से मेरा वास्ता पड़े।

उन दिनों मेरे माता-पिता संघर्ष कर रहे थे, जीवन कठिनाइयों में बीत रहा था। उधर भारत-पाक का बंटवारा हुआ और पूरे परिवार को विस्थापित होना पड़ा। सभी अलग-अलग कस्बों-शहरों में बिखर गए। हमारे पास जो कुछ भी था, सब पाकिस्तान में छूट गया। परिवार पूंजीहीन हो गया।

मेरी स्कूल की पढ़ाई शिमला में हुई, फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर। कालेज की पढ़ाई के लिए भी मैं दिल्ली में भीष्मजी के पास ही रहा और जब वे अनुवादक के रूप में सोवियत संघ गए तो मैंने भी उच्चशिक्षा के लिए वहींआवेदन किया और उनके साथ चला गया।

हां, छुट्टियों में मैं बंबई आता था और अपने माता-पिता के पास रुकता था, तब मेरे व पिता के बीच दोस्ती और प्यार का एक नजदीकी रिश्ता कायम हुआ। लेकिन भीष्मजी के साथ मेरा रिश्ता अलग ही था, वह इसलिए क्योंकि मैं बचपन से ही उनके साथ रहा। उन्होंने और उनकी पत्नी, शीलाजी ने ही सचमुच मेरा लालन-पालन किया है।

डैड और भीष्मजी, दोनों भाई,एक दूसरे से काफी अलग थे, स्वभाव से भी, चेहरे-मोहरे से भी। डैड लंबी कद-काठी के, ऊंचे पूरे, गोरे, हंसमुख, मनमोहक व्यक्तित्व के स्वामी थे।  भीष्मजी अपेक्षाकृत छोटे कद के, सांवले, अंर्तमुखी व्यक्तित्व वाले थे। बाहर से देखने में उनमें कोई समानता नजर नहींआती थी। बल्कि वे दोनों भाई जैसे लगते ही नहींथे। वे दोनों विचारों से माक्र्सवादी थे। श्रमिकों, किसानों, कामगार वर्ग के लिए डैड के मन में बहुत प्यार व ममता थी। अपना जीवन उन्होंने उनकी सेवा में लगा दिया। यही बात भीष्मजी पर भी लागू होती है।

भीष्मजी बेहद तेज़ नजर वाले इंसान थे। अगर ध्यान से देखें तो उनकी नजऱें बाज़ जैसी थीं। मैंने इतनी तीखी आंखों वाला दूसरा इंसान नहींदेखा। अगर वे किसी को देखते थे तो ऐसा लगता था मानो इंसान की आत्मा की गहराइयों में उतर कर देख रहे हैं। वे खोजी, भेदक नजऱें थीं। टालस्टाय भी ऐसी ही खोजी, भेदक दृष्टि वाले व्यक्ति थे। मेरे पिता भी इसी तरह के इंसान थे। भीष्मजी जिन लोगों से मिलते, उनके चारित्रिक लक्षणों, मंशाओं की पड़ताल करते, जबकि डैड उनके व्यवहार, तौर-तरीकों, बाहरी स्वभाव को देखते। उनके शारीरिक हाव-भाव, चाल-ढाल, मुद्राएं, जिस तरह वे बोलते हैं, चलते हैं, आदि। वस्तुत: दोनों तेज नजऱ इंसान थे। एक अपने लेखन के लिए सामग्री जुटाने के लिए चरित्रों की पड़ताल करता था, दूसरा अपने किरदारों को निभाने के लिए मुद्राओं, बोलने के तरीकों और हाव-भाव को देखा करता था।

डैड बहिर्मुखी, सबसे घुल-मिल जाने वाले, हंसने-हंसाने वाले व्यक्ति थे। उनके पास चुटकुलों की भरमार होती। वे बातूनी, मिलनसार, दोस्ताना व्यवहार वाले थे, जबकि भीष्मजी इसके एकदम विपरीत थे। वे अंतर्मुखी थे, धीमी आवाज़ में, कम बोलने वाले, बातचीत के दौरान लंबे अंतराल लेते थे। सीधे मुद्दे की बात करते थे और जब बात की जाए, तब ही बोलते थे। अक्सर ऐसा होता था कि वे बातचीत में लगे लोगों को चुपचाप सुनते थे, और उनके हर शब्द को ग्रहण करते थे, अपनी कहानियों के लिए कच्चे माल की तरह। उन दिलचस्प किरदारों के लिए जिन्हें वे अपने लेखन के जरिए आकार देना चाहते थे।

लेकिन एक खासियत दोनों भाइयों में समान थी, जो उन्हें अपने पिता श्री हरबंसलाल साहनी से मिली थी, वह थी- अदम्य इच्छाशक्ति। अद्भुत जिजीविषा और जीवन के प्रति कभी न खत्म होने वाली आशा। अपने उद्देश्यों के लिए उनमें जबरदस्त लगन और समर्पण था, जो आम इंसानों में मुश्किल से मिलता है। अगर वे एक बार किसी काम को करने के लिए तैयार होते या किसी लक्ष्य को पाने की ठान लेते तो प्राणपण से उसे हासिल करने में जुट जाते और तब तक चैन नहींलेते, जब तक वह उन्हें मिल न जाए।

भीष्मजी को काम करते देखना, एक अलग ही अनुभव था। वे अलौकिक प्रयासों से काम करने की क्षमता रखते थे। उनकी दिनचर्या बड़ी संयत थी। वे सुबह पांच बजे उठकर लंबी सैर को जाते, लौटकर अपने लिखने की मेज पर सात बजे तक बैठ जाते और फिर दोपहर तक वहां से हिलते नहींथे। इधर-उधर बिखरे पन्नों पर झुके हुए वे लगातार, बिना थके लिखते थे। प्रेमचंद कहा करते थे- काम, काम, काम, मुझे सिर्फ काम करने में मजा आता है। यह जुमला भीष्मजी के जीवन पर भी खरा उतरता है। चाहे दीवाली हो या दशहरा, या नया साल, कोई भी मौका भीष्मजी को लिखने के समय में उनकी मेज से  हटा नहींसकता था। लिखने की भाषा क्या हो, इस पर पिता और भीष्मजी में गहरे मतभेद थे। गुरुदेव टैगोर ने (शांति निकेतन के दिनों में) पिता को सलाह दी थी कि हर किसी को अपनी मातृभाषा में लिखना चाहिए। इसलिए पिता ने यह सुनिश्चित किया था कि वे पंजाबी में ही लिखेंगे। भीष्मजी हिंदी में लिखकर बड़ी भूल कर रहे हंै, ऐसा उनका मानना था।  मुझे याद है इस बात पर उन दोनों के बीच तीखी बहसें हो जाया करती थीं। कई बार आवाज़ें ऊंची हो जाती और गुस्से से बात होती, लेकिन अपनी पसंद की भाषा में लिखने के निर्णय से दोनों ही नहींडिगे। और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण का नतीजा है कि दोनों ही अपनी-अपनी भाषाओं में परिपूर्ण लेखक बने।

मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक किया और फिर यूरोप प्रवास के दौरान पश्चिम के साहित्य से मेरा परिचय हुआ। पश्चिम के साहित्य ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया। एक ओर टालस्टाय, दोस्तोवस्की और चेखव की लेखनी ने मुझे आकर्षित किया, दूसरी ओर फ्रेंच लेखक रूसो, वाल्टेयर, डिडोरोट, जर्मनी व इंग्लैंड के कवि, नाटककारों से मैं प्रभावित हुआ। मुझे लगता था कि विश्व साहित्य का सार यही है। तब तक मैंने पंजाबी या हिन्दी साहित्य को जरा भी नहींपढ़ा था। मैं यह मानता था कि हर बात की तरह यूरोपियन साहित्य में भी हमसे आगे हैं। लेकिन मैं गलत था। यूरोप के लंबे प्रवास के बाद जब मैं वापस लौटा और फिल्म इंडस्ट्री में काम शुरु किया तो मैंने निश्चयपूर्वक भारतीय साहित्य का अध्ययन किया। सच पूछिए तो मैं यही मानता था कि यह दोयम दर्जे का साहित्य है। अपने पिता और भीष्मजी को भी मैं नौसिखिया लेखक मानता था, जिनमें अधिक क्षमता नहींहै।

पहले मैंने उर्दू सीखी और उर्दू शायरों को पढ़ा (मियां मीर से लेकर आधुनिक शायरों जैसे साहिर लुधियानवी और जां निसार अख्तर तक कई शायरों को)। उनकी काव्य क्षमता से मैं चमत्कृत रह गया। इसके बाद मैंने पंजाबी सीखी और पंजाबी साहित्य पढ़ा। बुल्ले शाह, अमृता प्रीतम और अपने पिता की किताबों का गहरा असर मुझ पर पड़ा। आज मेरे पिता की कई किताबों  को पंजाब विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। मुझे यह स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस होती है कि मैं हिन्दी साहित्य को ज्यादा महत्व का नहींसमझता था, जब तक मैंने प्रेमचंद को नहींपढ़ा। उनकी लेखनी से मैं नतमस्तक हो गया। लेकिन जिस लेखक ने मुझे भीतर तक उद्वेलित किया है, वे हैं भीष्मजी। उनका कार्य विश्व स्तरीय है और उनकी छोटी-छोटी कहानियां दुनिया की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में शुमार होती हैं। उनकी सभी किताबों को मैंने उत्सुकतापूर्वक पढ़ा। हर रचना सूक्ष्मदर्शिता, श्रेष्ठ, मुहावरेदार भाषा से संपन्न है। वे सच्चे अर्थों में यथार्थवादी थे (जैसे पिता अभिनय की दुनिया में थे)।

भीष्मजी की कलात्मकता की अद्वितीय गहराई और सुंदरता मुझे तब और महसूस हुई, जब मैंने उनके नाटक हानूश के मुख्य पात्र की भूमिका निभाई। अब तक मैंने जितने भी किरदार निभाए हैं, उनमें यह सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण, कठिन लेकिन संतुष्टिदायक भूमिका थी। किसी नाटक को पढऩा एक बात है और नाटककार ने जो किरदार लिखा है, उसे निभाना दूसरी बात है। इसके लिए संवादों को बारीकी से पढऩा होता है, जो लिखा है उसे ही नहीं, उसके पीछे जो लिखा है, उसे भी समझना होता है। किरदार किन संवेगों से संचालित है, उसके भीतरी-बाहरी द्वंद्व क्या हैं और लेखक उसके जरिए क्या कहना चाहता है, यह सब समझना पड़ता है। जब हानूश की भूमिका की मैं रिहर्सल कर रहा था, तब एक लेखक के तौर पर भीष्मजी की पूरी प्रतिभा मेरे सामने उजागर हुई। मेरे खयाल से उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना उनका प्रसिद्ध उपन्यास मय्यादास की माड़ी है, जो सिख युद्ध पर आधारित है। यह मुझे टालस्टाय के युद्ध और शांति की याद दिलाती है। इसमें एक पूरे युग को महाकाव्य की तरह पेश किया गया है। इस किताब को लिखने में उन्होंने कितना शोध किया होगा, यह विचार मन में उठता है। किसी भी कलाकार की पहचान या वह प्रतिभा जो उसे सामान्य लोगों से अलग बनाती है, वह है सहानुभूति, मानवता और समूची मानव जाति के लिए निस्वार्थ प्रेम। इस संवेदना ने ही वान गाग को महान कलाकार बनाया। इस संवेदना और प्यार के कारण ही चेखव और दोस्तोवस्की महान लेखक बन पाए। और इसी संवेदना, सहानुभूति ने भीष्मजी को भारतीय लेखकों में इतना ऊंचा बनाया। उनका कद समय के साथ बढ़ता जाएगा। उनके एक जानने वाले ने मुझे कहा था कि अपने साथियों के लिए उनमें जीसस क्राइस्ट की तरह विनम्रता, चिंता और करुणा है। वे ‘महापुरुष’ थे।