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Wednesday 22 Nov 2017

‘तमस’ और वे दिन ... ( भीष्म साहनी से प्रो. आलोक भल्ला की बातचीत के चुनिंदा अंश)

प्रो. आलोक भल्ला

16/12 द्वितीय तल, कालकाजी नई दिल्ली- 110019

अनुवाद : पंकज सिंह

28/604 ईस्टएंड अपार्टमेंट्स, मयूर विहार फेस -1  एक्सटेंशन, दिल्ली-96

मो. 9810731911

आपने 1971 में ‘तमस’ पर काम करना शुरू किया। इसका प्रकाशन 1973 में जाकर हुआ। आपको विभाजन की उन घटनाओं के बारे में लिखने में इतना ज़्यादा समय क्यों लगा?

लिखते हुए कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो तत्काल स्मृति से निकलकर आप पर आघात करते हैं, हालांकि यह मुमकिन है कि जब आप उन अनुभवों से गुजऱे हों तो वे आपको बहुत अर्थपूर्ण या महत्वपूर्ण न लगें। लेकिन, जाने कैसे, बाद में जब आप लिखते होते हैं तो वे आँखों में आकर छा जाते हैं। अगर क़लम रोककर आप चीज़ों को इत्मीनान से याद करने की कोशिश करते हैं तो बहुत सारी छोटी-छोटी चीज़ें भी ज़ेहन में उभरने लगती हैं। आप अपने अनुभवों का उपयोग करते हैं और इस कारण बहुत सारी चीज़ें छूट जाती हैं। ‘तमस’ को लिख लेने के बाद मुझे कुछ चीजेंंयाद आयी जो प्रासंगिक थी और जिन्हें मैंने याद करना चाहा था ... वे अर्थपूर्ण थी और बाद में मुझे खय़ाल आया कि इनका तो इस्तेमाल किया जा सकता था लेकिन फिर ...

क्या आपको अपने बचपन के दिनों की याद है? उन दिनों रावलपिण्डी में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच किस तरह के ताल्लुक़ात थे?

 मैं आपको बताना चाहूंगा ... हालांकि मैं 1947 में होनेवाली घटनाओं के विषय में लिख रहा था, पर यहां-वहां मैंने अपने बचपन में देखी गयी कई चीज़ों का उपयोग उपन्यास के कुछ दृश्यों के वातावरण निर्माण के लिए किया। उदाहरण के तौर पर, मैं दस-ग्यारह साल का रहा होऊंगा जब पहली बार रावलपिण्डी में साम्प्रदायिक दंगा हुआ था।

वह 1926 की घटना है। ‘तमस’ में आप उसका जि़क्र करते हैं।

 हां, और वही समय था जब मैंने आधे आकाश को लपटों से रोशन पाया। अनाज मण्डी में आग लगा दी गयी थी। लपटेंंऊँची उठ रही थीं। उससे पहले मैंने वैसी किसी चीज़ का अनुभव नहीं किया था। मैंने ऐसी दीप्ति कभी नहीं देखी थी। जब मैंने नीचे की तरफ  देखा, क्षितिज की ओर, तो पाया, लपटें ऊँची हो रही थीं। मैं डर गया। लेकिन जहाँ तक आकाश और उसकी दीप्ति की बात है, वे बहुत मनोहारी भी थे। मैंने उस आग की याद का उपयोग किया, क्योंकि 1947 में दंगों के भडक़ने के बाद समूची अनाज मण्डी में आग नहीं लगायी गयी थी। उपन्यास में यह एक मामूली सा विवरण था, लेकिन यह विवरण आया था मेरे बचपन की याद से निकलकर। ‘तमस’ मैंने इसलिए लिखा कि जब मैं भिवंडी गया तो अचानक मुझे रावलपिण्डी के दंगों की याद आयी। ऐसा संयोग हुआ था कि मैं भिवंडी के दंगों का साक्षी बना। ... मैं अपने उपन्यास में ख़ुद भी मौजूद हूं, उन दृश्यों में जहां काँग्रेस की गतिविधियों का जि़क्र है। मैं प्रभात फेरी वग़ैरह में हिस्सा लिया करता था।

आप सचमुच उनमेंं हिस्सा लेते थे?

हां, हां। सच तो यह है कि पत्थर फेेंकने की घटना पहली बार हुई तो मैं वहीं था ... अपने उपन्यास में मैंने इसका जि़क्र किया है ... आपको बताऊँ कि काँग्रेस के तामीरी प्रोग्राम के तहत हम कई बस्तियोंंमे जाकर गंदे नालों की सफ़ाई किया करते थे। मैं अपने काँग्रेस के साथियों के साथ जाया करता था। हम मुस्लिम बहुल इलाक़ों में भी जाया करते थे और उन इलाक़ों में हमारा ख़ूब गर्मजोशी से स्वागत हुआ करता था।

अच्छा!

हाँ, बेहद गर्मजोशी से वे हमारा स्वागत करते थे।

यह किस साल की बात होगी?

विभाजन से ठीक पहले।

और फिर भी आप लोगों का स्वागत होता था!

हाँ, हाँ अभी दंगे नहींभडक़े थे। लेकिन ... जब हम सफ़ाई और झाड़ू-बुहारू कर रहे थे तो पहले जो लोग हमारा स्वागत करते थे उन्हीं लोगों ने हमसे कहा कि हम वहाँ से चले जाएं।

उपन्यास में यह वर्णन आया है।

हां, तनाव शुरू होने लगा था। लोग हम पर पत्थर फेेंकते थे। हम वहाँ से हट जाते थे। हमें वे गलियां चुननी पड़ती थे जहाँ हिन्दू बहुल आबादी हो ताकि हम पर हमला न हो (हँसी)।

लेकिन आपके तो मुस्लिम साथी भी थे। क्या वे आपके साथ हिन्दू गलियों से गुजऱते थे?

दरअसल, एक मुस्लिम व्यक्ति ने ही उस इलाक़े की गलियों की सफ़ाई के लिए हमें बुलावा दिया था। मुझे यह नहीं मालूम कि कहीं वह काँग्रेस के अंदर घुसा हुआ सीआईडी का आदमी तो नहीं था (हँसी)। उसका नाम शेर ख़ान था। तो इस तरह उपन्यास का एक हिस्सा आत्मकथात्मक है लेकिन इसके केन्द्रीय अनुभव मेरे निजी अनुभव नहीं हैं। उपन्यास के केन्द्र में ज़्यादा व्यापक कि़स्म के अनुभव हैं।

मैं आपसे रावलपिण्डी में गुजऱे आपके बचपन के बारे में जानना चाहता हूँ। ... क्या लोगों के बीच ऐसे तनाव थे जिनका हल नामुमकिन रहा हो?

यह कुछ योंंहै। हम लोग एक मुस्लिम बहुल इलाके में रहते थे। मेरे पिता व्यवसायी थे। उनके ज़्यादातर ग्राहक मुस्लिम थे। मेरे पिता एक फ्रांसीसी निर्माता के लिए सुनहरे धागे, झालरों, गोटा और जऱी वगैरह के ऑर्डर लिया करते थे। मेरे पिता बीस साल तक पेशावर में रहे थे और वही उन्होंने अपनी इस एजेन्सी का कारोबार विकसित किया था। जब वे रावलपिण्डी चले आये तो उनके ग्राहक जिनमेंं ज़्यादातर मुस्लिम पठान व्यापारी थे, उनके पास आकर ऑर्डर दे जाते थे। उन व्यापारियों के साथ उनका व्यवहार बहुत सौजन्यपूर्ण होता था। लेकिन वे व्यापारी कभी हमारे घर खाना नहीं खाते थे।

क्या ज़्यादातर हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों मेंंऐसा ही होता था?

 हाँ, अगर वे हमारे घर खाना खाते या चाय वग़ैरह पीते थे तो मेरी माँ इस्तेमाल में आये उन बर्तनों मेंं कोयले के दहकते अंगारे डालकर उनकी सफ़ाई करती थी।

आपके स्कूल में मुस्लिम बच्चे थे?

 हां, थे तो ज़रूर लेकिन नाम मात्र के। किसी आर्य समाजी स्कूल मेंं आम तौर पर उन्हें लिया नहीं जाता था। फिर भी हमारे स्कूल में कुछ थे और उनमें से कुछ तो बहुत तेज़ लडक़े थे।

क्या आपके पास संप्रदायोंं के साझे वाले बचपन की यादें नहीं हैं?

 है  तो, लेकिन बहुत छुटपन के दिनों का नहीं। बाद के दिनोंंमें, बहुत कऱीबी पैदा हुई। उदाहरण के लिए अल्ताफ़  हुसैन मेरा बहुत ही प्यारा दोस्त था। लगभग हर रोज़ हम साथ-साथ बाहर जाया करते। जब मैं पढऩे के लिए लाहौर गया तो मेरे बहुत से कऱीबी मुस्लिम दोस्त बने। मुझे हॉकी खेलना बहुत प्रिय था। और हॉकी टीमों में ज़्यादातर मुस्लिम खिलाड़ी होते थे। हमारी उनसे ख़ूब आत्मीयता थी।

आप क्या अपने रावलपिण्डी वाले अतीत को नास्टैल्जिया के साथ याद करते हैं?

 अब जब मैं मुडक़र देखता हूँ तो, हाँ। मैं नहीं समझता कि वहां समुदायों के बीच किसी तरह का सहअस्तित्व था। मेरे माता-पिता और मेरे मुस्लिम दोस्तों के माता-पिता खुद को बहुत पृथक अस्तित्वों की तरह देखते थे। हमारे घरों के भीतर ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ वाली बातें ऐसी थीं कि उनसे भिन्नताओं का अहसास बनने लगता था। लेकिन जब हम बच्चे थे तो इन भिन्नताओं से हमें शायद ही कोई मतलब रहा हो।

लेकिन आपके माता-पिता की पीढ़ी के लोगों में शत्रुता का भाव था क्या?

शत्रुता का भाव नहीं ... लेकिन आपको बताना चाहूंगा कि आर्य समाज भयानक रूप से मुसलमानों का विरोधी था। आर्य समाज की सभाओं या सालाना जलसों मेंं भाषण करने के लिए अक्सर बाहर से वक्ता आया करते थे और उनके भाषणों मेंं मुसलमानों के खि़लाफ़  स्पष्ट पूर्वाग्रह होते थे।

आप सन 1925 तक की अवधि की बात कर रहे हैं।

हां, लेकिन फिर भी मेरा यही मानना है कि साम्प्रदायिक समस्या बीसवीं सदी के आरम्भिक पंद्रह या बीस वर्षों मेंविकसित हुई। जिस प्रकार के तनाव हमने 1920 के दशक में रावलपिण्डी में देखे वे पहले के उन ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों से बहुत भिन्न थे जो मुस्लिम शासकों या राजपूत शासकोंके बीच होते थे।

आर्य समाज या उसकी नयी साम्प्रदायिक चेतना भी क्या असामान्य किस्म का विपथगमन कहे जा सकते हैं?

हां। हमारे सामाजिक जीवन या हमारी संस्कृति की यह कोई स्थायी विशेषता नहीं थी। मेरी तो यही राय है। मंटो पर लिखे अपने निबंध में आपने यह बात रखी है। आपने 1919 की घटनाओं को 1947 से जोड़ा है और कहा है कि मंटो का ऐसा मोहभंग हुआ था कि वे सोचने लगे थे कि ख़ून का प्यासा होना हमारे रक्त-संस्कार में बसता है।

हां। आप ठीक कहते हैं। मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं।

देखिये, यह इस बात पर निर्भर है कि शासन किसका है। अगर औरंगज़ेब तनावों का निर्माण करना चाहता था तो उसे तनाव रचने में सफलता मिली। अकबर की इच्छा थी कि एक उदार कि़स्म का माहौल बने। सामंती जमाने में शासक पर बहुत कुछ निर्भर था। हमारे समय में अधिकारियों का वर्ग, ब्रिटिश हुकूमत, तनाव रचना चाहते थे और कामयाब हुए।

अब जबकि आप ब्रिटिश हुकूमत की बात ले आये हैं तो बताऊं कि जब मैंने इंतज़ार हुसैन से बात की तो उन्होंने भी, बिल्कुल आपकी ही तरह 1890 के दशक से पहले तक एक मिली-जुली संस्कृति के इतिहास का नक़्शा खींचा था। वास्तव में, ऐसा लगता है कि हर कोई 1890 के दशक के आस-पास ही साम्प्रदायिक तनाव की शुरुआत को चिन्हित करता है। हमें पता है कि पहले-पहल उसी दशक में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे।

 हां।

अगर आप मुडक़र देखें या जब इंतज़ार हुसैन मुडक़र देखते हैं, वे इस संस्कृति के इतिहास की पुनर्रचना में भी लगे हैं, तो वे राजाओं को लेकर बहुत बात नहीं करते बल्कि रोज़मर्रा की आम गैऱ-राजनीतिक जि़न्दगी की बात करते हैं जिसके उदाहरण एक छोर पर निज़ामुद्दीन औलिया थे तो दूसरे छोर पर कबीर और मीरा बाई।

हां। मेरा मानना है कि मध्यकाल में उदारवादी विचारों की एक बहुत शक्तिशाली लहर थी। ख़ासकर चौदहवीं सदी में दिल्ली ज्ञान और संस्कृति का केन्द्र बन गयी थी। यह चेतना भी थी कि ज़्यादातर लोग जो मुस्लिम हुए थे, आरम्भ में तो दरअसल हिन्दू ही थे। ऐसी कोई वजह थी ही नहीं कि लोग अच्छे पड़ोसियोंं की तरह जीना न सीख पाएं। इसलिए मैं समझता हूं कि साम्प्रदायिक शत्रुता का विकास ब्रिटिश काल में ही हुआ। ब्रिटिश इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फर्क है। उनके लिए यह चीज़ उपयोगी थी क्योंकि उनकी अपनी संख्या कम थी। यहां आकर उन्होंने तमाम तरह के उपायों से अपना साम्राज्य स्थापित किया था। इस देश की संस्कृति में उनकी बहुत दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए, मेरी राय में, वे लोग उस साम्प्रदायिक तनाव के लिए जि़म्मेदार थे जो विकसित हुआ। शोचनीय यह है कि हमने अपने अनुभवों से कुछ भी नहींसीखा है। आज भी हम उन्हीं की छोड़ी गयी विरासत को ढोते जा रहे हैं।

आपने 1933 में गवर्नंमेंट कॉलेज, लाहौर में दाखि़ला लिया था। एक विद्यार्थी की हैसियत से आपने वहाँ कभी यह महसूस किया कि मुसलमान और हिन्दू विद्यार्थियों के बीच अलगाव का भाव हो?

जहां तक विद्यार्थियों का सवाल था मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच कोई सचेत किस्म का भेदभाव नहीं था। अगर अधिकारियों के द्वारा कोई भेद-भाव किया जाता हो तो वह चीज़ कभी उजागर नहीं की जाती थी। कॉलेज के अधिकारी काँग्रेस को इस बात की इजाज़त नहीं देते थे कि वह कॉलेज में कोई आन्दोलनकारी कार्यक्रम चलाये। मुझे याद आता है कि जब मैं कॉलेज के छठे वर्ष में था तो फस्र्ट ईयर का एक लडक़ा गाँधी टोपी पहनकर कॉलेज आ गया था और घंटे भर मेें उसे निकाल दिया गया। 

एम ए करने के बाद आप कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गये थे। आप काँग्रेस में क्यों गये? बाद में आपकी विचाराधारात्मक स्थिति में परिवर्तन भी आया।

वह एक लम्बी कहानी है। मैंने अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया। जब मैं गवर्नंमेंट कॉलेज, लाहौर में था तो रंगमंच मुझे बहुत प्रिय हो चला था और मैं नाटकों में अभिनय भी करने लगा था। एम ए करने के बाद मैं रावलपिण्डी लौट गया था ताकि पिता का हाथ बटाऊँ। वहाँ के एक कॉलेज में मैं मानद अध्यापक भी हो गया। वहाँ मैं कुछ कक्षाएँ लेता था, क्योंकि कॉलेज के प्रिंसिपल ने कहा था कि मेरे लिए कॉलेज में नाटकों का मंचन करना आसान हो जायेगा, अगर मैं वहाँ पढ़ा रहा होऊँगा। उस कॉलेज में होने के दौर में ही मैंने काँग्रेस के प्रति अपने भीतर आकर्षण महसूस करना शुरू किया। सक्रिय मैं नहींहुआ, लेकिन उसकी राजनीतिक माँगों से पूरे माहौल में ऐसी गर्मी आ गयी थी कि मुझे खिंचाव महसूस हुआ। 1939 में एम ए करने के बाद मैं गाँधी जी से भी मिल चुका था। 1937-38 तक मेरे भाई ने, जो मेरे पिता के साथ व्यापार में भी कुछ समय से लगे थे, फैसला कर लिया था कि वे पिताजी को छोडक़र शान्ति निकेतन जाएंगे और हिन्दी पढ़ाएंगे। शान्ति निकेतन से वे गाँधीजी के सेवाग्राम आश्रम, वर्धा चले गये। मैं उनके पास वहाँ लगभग तीन हफ़्ते के लिए जाकर रहा था। तब मुझे गांधीजी के क्रिया-कलाप को देखने का अवसर मिला था। उसके बाद 1938 मैं काँग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में शामिल होने भी गया। मेरे पिता भी जो बंबई की यात्रा पर आये थे, मेरे साथ गये। राजनीतिक रूप से हरिपुरा अधिवेशन बहुत महत्वपूर्ण था। सारा माहौल उपनिवेशवाद-विरोधी भावनाओं से उद्वेलित था। रावलपिण्डी लौटकर भी कांग्रेस के प्रति मेरा आकर्षण जारी रहा।

जब आप काँग्रेस में सक्रिय हुए तो आपके मुस्लिम दोस्तों की कैसी प्रतिक्रिया थी? उदाहरण के लिए, क्या आपने अल्ताफ़  हुसैन से अपनी राजनीति के बारे में बात की थी? आपने उनकी चर्चा करते हुए कहा कि वे आपके सबसे अच्छे दोस्तों में थे।

हां, बिल्कुल। हमारी बातचीत बंद हो गयी (हँसी)। अल्ताफ़ हुसैन मुस्लिम लीगी हो गया था। लेकिन बाद के दिनों में देश के बँटवारे के आस-पास।

लेकिन 1938 में?

1938 में कोई तनाव न था।

अल्ताफ़  हुसैन ने आपसे बातचीत क्यों बंद कर दी?

वास्तव में हम एक दूसरे से विमुख होते गये थे। मैं अत्यंत उत्साही कांग्रेस कार्यकत्र्ता हो गया और उसकी सहानुभूति मुस्लिम लीग के प्रति हो गयी थी। सो हम अलग हो गये। बाद में, 1947 के बाद हमारी ख़तो-किताबत होती रही और हमने टेलीफोन पर एक दूसरे से बातचीत भी की।

 इन लोगों ने जिनकी रोज़-ब-रोज़ की जि़न्दगी विभिन्न कि़स्म की अंतक्रियाओं से बनी थी, अचानक ऐसा क्यों तय कर लिया कि हिन्दू और मुसलमान के तौर पर उनकी पहचान, पहले की तुलना में अब ज़्यादा महत्वपूर्ण थी? किस चरण में पहुुंचकर वे एक दूसरे के प्रति असहिष्णु हो गये?

इस बिन्दु पर पहुंचकर मेरे लिए इस बात पर बल देना महत्वपूर्ण है कि यद्यपि बंटवारे की राजनीतिक माँग ने लोगोंं के बीच अलगाव पैदा किया था पर उस अलगाव का बोध अस्थायी था। वे लोग जो राजनीति से प्रेरित नहींहैं वे बड़ी मुश्किल से संप्रदायवादी होते हैं। अब भी जब कभी मैं अल्ताफ़ हुसैन को याद करता हूं तो मैं भावुक हो उठता हूं। वह बेहद प्यार से भरा इंसान था। मुझे लिखे अंतिम पत्र में उसने कहा था, मेरे मरने से पहले हमारी मुलाक़ात ज़रूर होनी चाहिए। (लंबी ख़ामोशी)। उसने एक शाम मुझे फ़ोन करके अपने बेटे की शादी में शामिल होने के लिए निमंत्रित किया। उसने भारत में रहनेवाले अपने दो-तीन और भी निकट के मित्रों को बुलाया था। हमने एक दूसरे से बातचीत की और अल्ताफ हुसैन के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला किया। दुर्भाग्य से, निमंत्रण पत्र इतनी देर से आया कि हमारे लिए वीज़ा पा सकना नामुमकिन था। नतीजतन हम नहीं जा सके। कुछ समय बाद, जब मेरी बेटी रावलपिण्डी गयी, वह उससे मिली। मेरी बेटी ने उसका फोटो लेना चाहा लेकिन उसने मना कर दिया। मैं नहीं चाहता कि भीषम मुझे बूढ़े इंसान के रूप में देखे। अपने आखिऱी दिनों के एक ख़त में उसने लिखा था, मेरी गहरी ख्व़ाहिश है कि मैं अपने पुराने दोस्तों से मिलूँ। मुझे बड़ी शिद्दत से यह ख्वाहिश भी होती है कि मैं मक्का जाऊं। ये मेरी गहरी ख्वाहिश है...। अब, यहाँ साम्प्रदायिकता की कोई अभिव्यक्ति नहीं है। है तो बस दोस्ती का एक सच्चा इज़हार।

उस तरह के इंसान ने, जो आपका प्रिय मित्र था और जिसे आप इतने प्यार से याद करते हैं, देश के बँटवारे की माँग का समर्थन क्यों किया होगा?

राजनीतिक धरातल पर उसे समझा जा सकता है। ... हमने इस बारे में बात नहींकी, लेकिन मेरा अंदाज़ा है कि मुसलमानों को अहसास था कि भारत मुख्य रूप से एक हिन्दू देश है और उनके भविष्य के लिए ठीक यह होगा कि उनका अपना एक अलग मुल्क हो। जिन्ना की माँग की भी मुख्य अंतर्वस्तु यही थी।

आपने बताया कि आप उन दिनों गाँधीजी से मिले थे। क्या वे आपके लिए आपके आदर्श व्यक्तियों में थे?

हां। दरअसल वे बेहद खुले कि़स्म के इन्सान थे। कोई भी सुबह की सैर पर उनके साथ जा सकता था और उनसे बात कर सकता था। मेरे भाई ने, जो वर्धा में उनके साथ थे, मुझे उनसे मिलवाया था। गाँधीजी ने बलराज से पूछा था, क्या यह भी यहाँ काम करेगा? मेरे भाई ने जवाब दिया, नहीं, यहाँ यह सिफऱ्  घूमने के लिए आया है। यह सुनकर गाँधीजी हंस पड़े थे। वे ख़ुशमिज़ाज कि़स्म के आदमी थे जो हमेशा हँसने और बात करने को तैयार रहते थे ... ख़ैर, वर्धा प्रवास के दौरान मैंने उन्हें तथा अन्य नेताओं के विचारों को सुनते हुए समय बिताया। मैं गाँधीजी के साथ बातचीत भी करना चाहता था इसलिए एक दफ़ा उनके साथ टहलते हुए मैंने कहा, ‘गाँधीजी, कोहट के भयानक दंगों के बाद आप एक बार 1926-27 में कभी रावलपिण्डी आये थे ... लौटते हुए आप वहाँ रुके थे। आपको याद है? उनका दिमाग़ हरकत में आ गया। मुझे हैरत हुई कि उन्हें तब रावलपिण्डी में बिताये दो दिनों की कितनी स्पष्ट याद थी। उन्हेंं याद था कि वे कहां रुके थे। उन्होंंने किन्हीं मिस्टर जान के स्वास्थ्य के बारे में पूछा जो मुसलमान बैरिस्टर थे और तब उनके मेज़बान थे। ठीक तभी गाँधीजी के सचिव महादेव देसाई, जो हमारे पीछे-पीछे चल रहे थे, बातचीत में शरीक़ हो लिये और बताने लगे कि किस तरह उन लोगोंं ने कोहट से कार में यात्रा की थी वगैऱह। फिर जल्द ही मैं किनारे कर दिया गया।

क्या आपने कभी जिन्ना को देखा था?

हाँ, एक बार। मैंने कभी उन्हें बोलते हुए नहीं सुना था हालांकि उनके विचारों को मैं पढ़ता रहता था। एक दफ़ा मैं फ्ऱंटियर मेल से यात्रा कर रहा था। जब एक स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो मैंने देखा कि मेरे आगे वाले कम्पार्टमेंंट के नज़दीक कुछ लोग जमा हैं। मैंने खिडक़ी से बाहर झाँककर देखा तो पाया कि अपने कम्पार्टमेंंट के दरवाजे के पास खड़े होकर जिन्ना लोगों को संबोधित कर रहे है।

जिन्ना के प्रति आपका क्या रवैया था?

मैं उन्हें पसंद नहीं करता था। लेकिन वैसा होता है। उस समय मैं काँग्रेस पार्टी और राष्ट्रीय आन्दोलन में उनके योगदान को नहीं जानता था। बाद में मुझे पता चला कि वे समझौते के बारे में अनुकूल राय रखते थे। लेकिन बंटवारे से ठीक पहले हर पक्ष का रवैया काफ़ी सख्त हो चुका था। गाँधी और जिन्ना के बीच बंबई में ख़ूब लम्बी-लम्बी मुलाक़ातें हुईं और हर कोई उम्मीद कर रहा था कि उन मुलाक़ातों से कुछ सकारात्मक परिणाम निकलेगा। लेकिन वैसा नहींहुआ।

बँटवारे का विरोध करने वाले मुसलमानों की बुराई की जाती थी।

हाँ, काँग्रेसी मुसलमानों को अक्सर गालियाँ दी जाती थी। मुझे याद है कि जब मैंने अपने साथ काम करनेवाले एक काँग्रेसी मुस्लिम साथी को अपने एक मुस्लिम पड़ोसी से मिलवाया तो उसने मेरी तरफ  मुडक़र मुझसे कहा, ‘मैं किसी भी काँग्रेसी मुसलमान से नहीं मिलना चाहता, वह हिन्दुओं का कुत्ता होता है।’ ‘तमस’ में मैंने ऐसी चीज़ों का वर्णन किया है।

आपने आखिऱी तौर पर रावलपिण्डी कब छोड़ी?

13 अगस्त 1947 को।

बँटवारे से पहले के आखिऱी हफ़्तों में रावलपिण्डी कैसी थी? आप इतने लंबे समय तक वहाँ रुके क्यों रहे।

मेरे पिता ने भी रावलपिण्डी छोडऩे से इन्कार किया था।

क्यों?

क्योंकि उनका मानना था कि सरकारेंं भले बदल जाएं, आबादियां नहीं बदलती। उनका कहना था, ‘मेरा घर यहाँ है, मेरी जायदाद है। मैं तो यहीं रहता रहूँगा।’ सो वे रहते रहे। मैं रावलपिण्डी छोडक़र अगस्त में आ गया था। मेरे पिता वहाँ नवंबर तक रहे। जब चीज़ें उनके लिए बेहद मुश्किल हो उठी तब जाकर, और वह भी संयोगवश ही उन्होंने रावलपिण्डी छोड़ी। नवंबर तक शहर में बिल्कुल थोड़े से हिन्दू बच गये थे। उन सबको एक गली में बसा दिया गया था ताकि उनकी हिफ़ाज़त हो सके, लेकिन मेरे पिता ने अपना घर छोडऩे से इन्कार कर दिया। वे जहाँ थे वहींरहते रहे। अपने पड़ोसियों के साथ हमारे अच्छे सम्बन्ध थे। वे सब मुसलमान थे। मेरे एक चाचा की ट्रांसपोर्ट कम्पनी थी। रावलपिण्डी और कश्मीर के बीच उनके ट्रक और कारेंं चला करती थीं। पंजाब के यूनियनिस्ट मुख्यमंत्री सिकन्दर हयात ख़ान के छोटे भाई बरकत हयात ख़ान कश्मीर जा रहे थे। मेरे चाचा ने पिता ही को कहलवा भेजा, ‘यह एक मौका है। कार में एक सीट है। मैं कश्मीर पहुंचने में आपकी मदद कर सकता हूं।’ उन्होंने मेरे पिता को एक तुर्की टोपी भी भेजी थी। मेरे पिता ने रवाना होते वक़्त उसे पहन लिया था ... उस वक़्त के क़साईपन को याद करेंं जो हर कहीं जारी थी।

आप क्यों छोड़ आये थे?

मैं स्वाधीनता दिवस का समारोह देखना चाहता था। मैंने अपने पिताजी से कहा था, मैं एक हफ़्ते में लौट आऊँगा।

आप आश्वस्त थे कि दिल्ली पहुँच लेंगे और हफ़्ते भर में रावलपिण्डी लौट जाएंगे?

हाँ, आपको बताता हूँ, क्यों। पहले लोगों का पलायन बहुत छोटे पैमाने पर हुआ। इक्का-दुक्का लोग अपना सामान लेकर रेलवे स्टेशन को जाते दिखते थे। ऐसे लोग हमारे घर के सामने से गुजऱते थे। पड़ोस में कुछ लोग डरकर आपस में बात करते थे ‘अगर यह जा रहा है तो हमारे साथ क्या होगा?’ लेकिन ज़्यादा लोग जाते हुए इन्सान पर हँसते थे, ‘यह क्यों भागा जा रहा है?’ वे कहते, ‘यहाँ कोई ख़तरा नहीं है।’ रावलपिण्डी में शुरू के दंगों के बाद चीजेंं व्यवस्थित हो गयी थीं। वहाँ एक तरह की ख़ामोशी थी। शहर में दंगे सिफऱ्  पाँच दिन चले। बाद में भी, जब मुस्लिम शरणार्थी भारत से पहुंचने लगे, सामान्य जि़न्दगी और काम-काज बदस्तूर चलते रहे। कुछ लोगों ने शहर ज़रूर छोड़ा था लेकिन बहुतों का खय़ाल था कि ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। एक दिन, फिर से दंगे भडक़ने के कुछ दिन बाद जेबी कृपलानी रावलपिण्डी आये। मैं उन दिनों काँग्रेस कमिटी में काम कर रहा था। मैं कमिटी के अन्य सदस्यों के साथ उनसे मिला। उन दिनों कृपलानी की नेहरू तथा अन्य लोगों के साथ अनबन थी। एक नौजवान ने कृपलानी से पूछा, ‘जनाब, हमें बताएं कि हम यहाँ रहें या चले जाएं?’ कृपलानी ने कोई साफ़  जवाब नहीं दिया। और जब उस नौजवान ने अपना सवाल दुहराया, कृपलानी ने उसे झिडक़ते हुए कहा, ‘तुम्हारे मुँह पर तो अभी माँ का दूध नहीं सूखा है और तुम ऐसी बातें कर रहे हो!’ इसकी वजह यह थी कि काँग्रेस का कोई नेता यह नहीं कहना चाहता था, ‘अपने शहरों को छोडक़र चले जाओ।’ इसके साथ ही कृपलानी को यह पता था कि हालात बुरे हैं और हम वहाँ बने नहीं रह सकते थे।

मुझे याद नहीं आता कि मैंने ऐसा कोई विवरण कहीं पढ़ा हो जिसमें पाकिस्तान के किसी मुस्लिम लीगी समर्थक ने कहा हो कि वहाँ पीढिय़ों से रहते आये हिन्दुओं को कहीं और जाकर बसने की ज़रूरत नहीं है। वैसे हिन्दू महासभा के लोगों पर भी यही बात लागू होती है।

लोगों का पलायन गाँवों से शुरू हुआ था जहाँ कि आबादी मुख्य रूप से मुसलमानों की थी। सिक्ख और हिन्दू वहाँ बहुत थोड़ी संख्या में थे। या तो वे व्यापारी थे या छोटे-मोटे दूकानदार।

‘तमस’ के हरनाम सिंह की तरह।

हाँ। इसी तरह के लोग थे जिन्होंने शुरू में पलायन किया क्योंकि वे डरे हुए थे। उन्होंने शरणार्थी शिविरों में पनाह ली।

आपने जि़क्र किया कि आपके मुस्लिम पड़ोसियों ने आप लोगों की हिफ़ाज़त की और आपका परिवार सुरक्षित महसूस करता रहा। बँटवारे को लेकर जो कथा साहित्य है उसमें इस तरह के अनुभव दर्ज किये गये हैं। ज़्यादातर संदर्भ इस बात को पुष्ट करते हैं कि ख़तरा हमेशा बाहर की तरफ़  से आया। उन लोगों की ओर से जो पास-पड़ोस के नहींथे। क्या यह सच है? क्या आपस में एक दूसरे को जानने वाले लोगों ने हमले नहीं किये थे?

हाँ। ऐसा नहीं था कि जिन लोगों ने हमें सुरक्षा दी थी वे ग़ैर-साम्प्रदायिक थे। वे भयानक रूप से साम्प्रदायिक हो सकते थे। लेकिन हमारे साथ नहीं। वे हमारी रक्षा करते रहे क्योंकि जब पड़ोसियों का सवाल आता था तो एक और ही मूल्य-व्यवस्था प्रबल हो उठती थी। लेकिन वही लोग दूसरे इलाक़ों में जाकर हत्याएँ कर सकते थे।

मुझे यह चीज़ उलझन में डालती है कि ऐसे किसी इन्सान के संग किस तरह का व्यवहार करेंगे जिसके साथ आप बड़े हुए हों, जिसे जाना हो और जो साम्प्रदायिक हत्यारा बन गया हो? आपने ‘तमस’ में ऐसे लोगों का वर्णन किया है।

अगर आपको याद हो तो उपन्यास में ऐसे बुज़ुर्ग लोग हैं जो बरसों से हरनाम सिंह के साथ जीते आये हैं और उसके साथ एक ख़ास किस्म के प्यार का रिश्ता बना चुके हैं। वही लोग उसे बचाते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि उतने पुराने रिश्ते पर आँच आये। लेकिन जो नौजवान हैं वे संकीर्ण और साम्प्रदायिक हैं और अपने पिता के दोस्तों के लिए उनके मन में कोई सहानुभूति नहीं है। हरनाम सिंह को उसके बुज़़ुर्ग दोस्त नहीं बल्कि साम्प्रदायिक हो चुके नौजवान भागने पर मजबूर करते हैं। बुज़ुर्ग लोग भले एक दूसरे के प्रति ऊष्मा से भरे न रहे हों और एक दूसरे को सिफऱ्  बर्दाश्त करते रहे हों, लेकिन उनके दिल में पड़ोस के सम्बन्धों का मूल्य था।

 क्या आपके पिता पड़ोसीपन की इसी भावना के कारण रुक गये थे?

हाँ। वे काफ़ी सुरक्षित महसूस करते थे। हमारा एक पड़ोसी एक बूढ़ा मुसलमान था जो सेना में सूबेदार के पद से रिटायर हुआ था। मैं उसके बेटे के साथ हॉकी खेलता था। हमारे प्रति दोनों का व्यवहार बहुत स्नेह भरा था। बाद के दिनों में मेरे भाई जब पाकिस्तान गये तो वे उस सूबेदार के बेटे से मिले थे। वे एक दूसरे से मिलकर बेहद ख़ुश हुए थे। जब मेरे भाई ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के विषय में किताब लिखी तो उसमें उसकी तस्वीर दी थी। यहां मैं यह भी बताना चाहूँगा कि रावलपिण्डी के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में रहनेवाले हिन्दू अपने रीति-रिवाज और कर्मकाण्डों के मामलों में उतने पाबन्द नहीं थे जितने देश के अन्य हिस्सों में रहनेवाले हिन्दू। पंजाब में हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच बहुत ज़्यादा अंतक्रिया थी। मेरे पिता ने सारी जि़न्दगी मुस्लिम व्यापारियों के साथ धंधा किया था। वे अपने आर्य समाजी विचारों को अपने व्यापार में दख़ल देने की इजाज़त नहीं देते थे (हँसी)।

इसका मतलब कि आपके पिता की पीढ़ी में विचारधाराओं और शिष्टाचार के बीच कभी टकराव नहीं होता था। लेकिन ऐसा समय आया जब सभ्यता की पुरानी संहिता नष्ट-भ्रष्ट हो गयी और बर्बरता सब पर हावी हो गयी।

जब आप अपनी बात कह रहे थे तो मैं अपनी कल्पना में इस बात की कोशिश कर रहा था कि अपने पिता को बर्बर होते हुए देखूँ। मैं कल्पना नहीं कर सकता कि वे मुझसे कहते, ‘जाओ और उस मुसलमान को गोली मार दो।’ यह मुमकिन है कि मध्यवर्ग के लोग पूर्वाग्रह पालते हों, पर जब हत्या करने की बात आती है तो वे अपनी संस्कृति और शिक्षा के कारण हिचकिचा जाते हैं। रावलपिण्डी में जो हत्याएँ हुईं वे नौजवानों की धर्मान्धता का नतीजा थी, लेकिन लूट-पाट और महिलाओं के साथ बदसलूकी करने वाले लोगों की संख्या थोड़ी सी थी।

‘तमस’ के शाहनवाज़ का चरित्र लें। वह सुसंस्कृत और संपन्न आदमी है। वह रघुनाथ का दोस्त है। फिर भी, एक बिन्दु पर पहुंचकर उत्तेजना में वह मिल्खी की हत्या कर देता है। वह निश्चय ही विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति का एक उदाहरण है जिसका शिक्षा या वर्ग से कुछ लेना-देना नहींहै। क्या यह सही नहीं है?

हाँ, मेरे खय़ाल से मनुष्य की प्रतिक्रिया बदलती रहती है, उसमें फर्क़ आते रहते हैं। दंगों के बाद वही शाहनवाज़ अमन आन्दोलन में ख़ूब सक्रिय हो जाता है। उस समय ऐसा जान पड़ता है कि वह एक भिन्न कि़स्म के संवेग से संचालित हो रहा हो। वह रघुनाथ और उसके परिवार को बचाता है, लेकिन वह गऱीब मिल्खी की हत्या भी करता है। वह मुस्लिम लीगी नहीं है। क्या वह ख़ुद को धोखा दे रहा था या फिर औरों को धोखा दे रहा था? मेरी समझ में वह इस बात का उदाहरण है कि मानव स्वभाव बहुत सुसंगत नहींहोता। वास्तविक जीवन में अलग अलग परिस्थितियों में मनुष्य काफ़ी भिन्न-भिन्न ढंग से आचरण करता है।

अगर हिंसा वर्ग-प्रेरित या किसी ख़ास धर्म का उत्पाद नहीं थी तो इसके लिए कौन सी चीज़ जि़म्मेदार थी?

मेरे विचार में बर्बरता मनुष्य के आचरण की कोई स्थायी चीज़ नहीं है। यह कई तरह की उन परिस्थितियों के मेल से पैदा होती है जो किसी न किसी तरह मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों को भडक़ा डालती है। किन्हीं ख़ास परिस्थितियों में लोग शिष्टता और अनुपात का सारा बोध गंवा देते हैं और क़साईपन पर आमादा हो जाते हैं। थोड़े समय के बाद बर्बरता वाले संवेग धीरे-धीरे शांत होकर विवेक को आने की राह देते हैं। लोगों को अपने किये पर पछतावा होने लगता है। अक्सर यह कहा जाता है कि पूरब के लोग उत्तेजित होनेवाले और रक्तपिपासु होते हैं। फिर भी हिटलर का योरोप इस दावे को दुर्बल कर देता है। हिटलर ने अपने अनुयायियों को कैसे यक़ीन दिलाया होगा कि यहूदी लोग शत्रु हैं और उनका विनाश ज़रूरी है? फिर भी, जर्मन लोग अत्यंत सभ्य हैं। इसलिए मैं नहीं समझता कि बर्बरता मानव व्यवहार की स्थायी वस्तु है। मनुष्यों को पशुओं जैसा आचरण करने के लिए भडक़ाया जाता है। बहुत सी ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जो मनुष्य को हत्या के लिए उकसाती हंै। मेरा यह विचार दृढ़ है कि मनुष्य स्वाभाविक तौर पर पाशविक नहीं होता।

क्या आप कहना चाहेंगे कि 1947 में अहिंसा की भाषा अपना प्रभाव खो चुकी थी?

मैंने ‘तमस’ में बँटवारे की वजह को विश्लेषित करने की कोशिश नहीं की। मेरी दिलचस्पी सिफऱ्  उन घटनाओं के वर्णन में थी जिन्हें मैंने देखा था और जिनके विषय में सुना था। मैं वह सब दर्ज करने की कोशिश भी कर रहा था जो उस वक़्त लोग सोच रहे थे और महसूस कर रहे थे। लेकिन जो सब हुआ उसके बारे में अगर आप मेरी राय जानना चाहेंगे या कि यह कि वह सब क्यों हुआ तो शायद मैं आपको बता नहीं पाऊँगा। मैं एक मानववादी और लेखक की हैसियत से सिफऱ्  यह कहना चाहूँगा कि मैं कुछ मूल्यों और व्यवहार-प्रवृत्तियों को दिल से लगाकर रखता हूँ। जो हत्याएँ हुईं उनकी वजह से मुझे गहरा दुख पहुंचा। यह शर्मनाक था कि एक बड़ी आबादी इतनी ज़्यादा हिंसा में शरीक़ हुई।

आपने थोड़ी देर पहले कहा कि लोग अक्सर अपने किये पर पश्चाताप करते हैं। आपने सम्भवत: उन रिपोर्टों को देखा होगा कि जर्मनी के कुछ नेता इजराएल गये और वहाँ उन्होंने खेद भरे वक्तव्य दिये। ऐसा क्यों है कि भारतीय और पाकिस्तानी नेताओं ने 1947 की घटनाओंं के लिए इसी तरह की क्षमायाचना नहींकी? क्योंं हम लोगों ने, दो देशों की जनता के तौर पर, अतीत में हमने जो किया उसके लिए एक दूसरे से क्षमा नहीं माँगी? क्या आप नहीं सोचते कि ऐसा करने से हमें वर्तमान की ग़ुस्से और प्रतिशोधवाली राजनीति से बाहर निकलने की राह पाने में मदद मिलेगी?

सत्ता में बैठे लोगों का निहित स्वार्थ होता है कि वे उस सत्ता को बनाये रखेंं। लेकिन भारत और पाकिस्तान के आम नागरिकों ने अपने दिल की बात कही है।

बँटवारे के इतने साल बाद आपने ‘तमस’ क्यों लिखा?

यह कोई माप तोल कर लिया जानेवाला फै़सला नहीं था। ऐसा कभी नहीं होता है। बहुत साल बाद जब मैंने बंबई और भिवंडी में दंगे देखे तो मुझे पाकिस्तान मेंं गुजऱे दिन याद आये। मैं अपने पुराने अनुभवोंं के बारे में सोचने पर मजबूर हुआ। बँटवारे के बाद दंगों का अंत हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहींहुआ। मैंने लिखना शुरू किया। शायद मैं सिफऱ्  यादों में लौटना चाहता था और अपने अतीत को फिर से जीना चाहता था। लेकिन मेरे लिए किसी मानसिक द्वंद्व या विसंगति वाली स्थिति नहीं थी। मैं मुसलमानों के बीच जिया था। मुमकिन है, अगर मैं उनसे अलग-थलग किसी जगह पर जिया होता तो मेरे मन में उनके प्रति शत्रुता का भाव जागता। लेकिन मैं तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही जगहों पर उनके साथ जीता रहा। प्रगतिशील लेखकों के आन्दोलन में मुझे कई असाधारण मुसलमान दोस्तों के साथ काम करने का मौक़ा मिला, मसलन सज्जाद ज़हीर और फैज़ अहमद फैज़़। इसके अलावा उर्दू के लेखक प्रगतिशील आन्दोलन की अग्रिम पंक्ति में थे। मेरे मन में उनके लिए बेहद इज़्जत थी। वे बहुत प्रभावशाली लोग थे, ख़ासकर फैज़़, मनुष्य और रचनाकार दोनों ही रूपों में। मुझ पर साम्प्रदायिक प्रचार का कोई असर नहीं पड़ा।

क्या आपको पता है कि फैज़़ पाकिस्तान के उन बहुत थोड़े से लोगों में थे जो गाँधी की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए विमान से पाकिस्तान से दिल्ली आये थे? यह घटना बँटवारे को पैदा करनेवाले भाव-बोध से बहुत भिन्न कि़स्म की चेतना को बताती है।

हाँ। फैज़ ने एक बार मुझे बताया था कि अपनी एक दिल्ली यात्रा के दौरान उन्हें रात में एक बजे नेहरू का अनुरोध संदेश मिला कि वे उनसे मिले। जब वे नेहरू से मिले, जो उनकी रचनाओं के बहुत बड़े प्रशंसक थे, तो फैज़ ने नेहरू से कहा कि वे ऐसे नेता हैं जिसके पास परिवर्तन लाने का प्राधिकार है। बुद्धिजीवियों में बहुत थोड़े से ऐसे हिन्दू या मुस्लिम होंगे जिनमें धर्मान्धता हो। मैं आश्वस्त हँू कि भारत एक बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुजातीय समाज है। इस उदार चरित्र को बनाये रखना महत्वपूर्ण है। अगर इसमें गड़बड़ी हुई तो हम मुसीबत में पड़ जाएंगे।

क्या यह ग़ैर-बुद्धिजीवी स्तर पर भी सच नहीं है?

हाँ। अपने सांस्कृतिक जीवन में हम विभिन्न धर्मों और राज्यों के लोगों के साथ कंधा मिलाकर चलते हैं। उदाहरण के लिए हमारी फि़ल्मों या नाटकों में कोई साम्प्रदायिक विचार नहीं है। अयोध्या एक असामान्य घटनास्थिति थी। सब कुछ के बावजूद लोगों ने उसका विरोध किया और उसे ख़ारिज किया।

 यह एक अच्छी बात है। आपके उपन्यास में जो व्यक्ति बिना किसी लाग लपेट के जनता की बात करता है वह जरनैल है। क्या रावलपिण्डी में आप वैसे किसी इन्सान को जानते थे?

हाँ। मैं जानता था। मैं उसे प्यार करता था। हालांकि उसे सिरफिरा समझा जाता था मगर वह बेहद प्यारा इन्सान था। दरअसल जब ‘तमस’ पर फि़ल्म बनी तो मुझे पटना से एक पत्र मिला जिसमें सूचना थी कि वह शख्स जि़न्दा था। पत्र में इस पर रोष प्रकट किया गया था कि फि़ल्म में जरनैल मार डाला गया था। पत्र लेखक ने मुझे सूचना दी थी कि वह शख्स दंगों के बाद भी जि़न्दा बचा था और आखिऱकार पटियाला में बस गया था।