Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

सफर में धूप तो होगी ( भीष्म साहनी की कहानी ‘सलमा आपा’ के नाम)

मुशर्रफ  आलम ज़ौकी

क्वा. 304 ताज एनक्लेव, गीता कॉलोनी, दिल्ली-110031

मो. 9010532452

धूप खिली-खिली लग रही थी। बारिश के बाद की धूप यूं भी खिली-खिली लगती है। स्टेशन पर उतरने के बाद उसने अपने सफारी थैले को छूकर देखा। खिडक़ी से आने वाली बारिश की बूंदों ने उसे जरा सा गीला कर दिया था।

‘कोई बात नहीं।’ वह मुस्कराया। थैला कंधे पर लटकाया। स्टेशन पर उमड़ती हुई भीड़ पर एक निगाह डाली। खोमचे वाले, चाय वाले, कुली, एक दूसरे से टकरा कर गुजर जाने वाले मुसाफिर। उसे यह सब अच्छा लगता था। जिन्दगी कितनी गतिशील है। लोग एक दूसरे के लिए कितने पुरजोश और मोहब्बत से भरे हुए हैं। विश्वसनीय तौर पर इन्हें अपनों के पास या अपनों से मिलने की जल्दबाजी होगी। कोई किसी से मिलने आया होगा या कोई किसी से मिलने जा रहा होगा। और वही.... जल्दबाजी..... जल्दी-जल्दी में किसी से टकरा जाना.... और... कोई फार्मेल्टी नहीं... माफ  कर दीजिए, जैसी रस्में सब ताक़ पर रख दी गई हों.... इसलिए कि आन में कुछ भी हो सकता है। गाड़ी छूट सकती है और कोई परिचित निगाहों से ओझल हो सकता है।

वह मुस्कराया... मोहब्बत एक बेखुद कर देने वाली भावना है। और इस भावना का सम्मान सब पर फर्ज है। स्टेशन पर मुसाफिरों की फौज देख कर वह श्रद्धा के साथ मुस्कराया। और अगर कंधे से झूलता हुआ सफारी थैला उसे भारी नहीं लग रहा होता, तो वह चंद एक सेकंड रुक कर मुस्कुराती आंखों से, इस दृश्य से दोबारा लुत्फ  लेने की कोशिश करता। वही जल्दबाजी में अपनों से मुलाकात, उफ... समय भी कितना कम है और उसके अंदाजे के मुताबिक काम किस कदर ज्यादा।

स्टेशन से बाहर निकलने के बाद वह दोबारा मुस्कराया। बारिश अच्छी खासी हुई थी। कुछ जगह ऐसी भी थी जहां बारिश का काफी पानी लग गया था। बारिश की बूंदों ने पथरीली सडक़ की दरारों को स्पष्ट कर दिया था। उसे इत्मीनान हुआ... उफ ! नन्ही-नन्ही सी बूंदों में कितनी उर्जा है। यह बूंदें पत्थरों में भी शगाफ  कर सकती हैं। खुश्क होने पर यह दरारें या शगाफ  नजर नहीं आते मगर बारिश की बूंदों ने कमजोर पत्थरों को बेनकाब कर दिया था। वह यह सोच कर दोबारा मुस्कुराया। उफ , पानी की बूंदों में कितनी ताकत है। विश्वसनीय तौर पर मोहब्बत की ताकत इन बूंदों से कहीं ज्यादा है।

बाहर आकर उसने महसूस किया, धूप कुछ ज्यादा ही खिली-खिली लग रही थी। अब एक बार फिर वह मुस्कुराया और सवारी-सवारी चिल्लाते हुए रिक्शे वालों में से एक रिक्शा पर सवार होगया।

‘हां चलो भई।’

उसने रिक्शा वाले को देखा। आह, उसके चेहरे पर कैसी चमक थी। कैसा नूर, हां नूर.... जो ईमानदारी, मेहनत और पसीने की खुशबू से फूटता है। मोहब्बत से, खुलूस से, वफा से। आह, नूर ही नूर। और चेहरा भी कैसा खिला-खिला और निखरा निखरा। ऐसी चमक तो खरे, सच्चे और ईमानदार लोगों में ही होती है.... उसने उसका लिबास देखा.... जिस्म से उठती हुई बू में मशक्कत और पसीने की खूशबू महसूस की। उसके मजबूत पांव की पिंडलियों को देखा... जो पूरे जोश के साथ पैडिल मार रहे थे। उसे इतमेनान हुआ, मुहब्बत सरहदों में तकसीम नहीं है।

मोहब्बत मुल्कों, कौमों में तकसीम नहीं है।

यह नीली छतरी वाला घर और यह छत्ता मस्जिद..... आह, ठहरो रिक्शे वाले.... सुनो! यहां एक बुलंद दरवाजा था...? है ना....? नहीं। ठहरो!! उसने आंखें बंद कर लीं। और दूसरे ही पल आंखें खोल दीं... इस बार उसकी आंखों में कुछ ज्यादा ही चमक थी। नहीं, मैं भूल रहा हूं। काफी पुरानी बात हो गई। काफी पुरानी। मगर क्या, वक्त के साथ.. ठहरो सुनो, तुम्हें कुछ याद है रिक्शे वाले? यहां शायद उस जमाने में चार खम्बे हुआ करते थे। क्यों, चार खम्बे ना....?

रिक्शे वाले ने रिक्शा रोक कर उसकी ओर देखा।

उसने मुस्कुराते हुए रिक्शे वाले की उम्र का अंदाजा लगाया... चार खम्बे.... बुलंद होने की वजह से यह मस्जिद चार खम्बा वाली मस्जिद कहलाती थी। क्यों ठीक? और यह जगह चार खम्बे की वजह से चार खम्बों वाला मुहल्ला.... मगर अब चार खम्बे तो नहीं रहे।

तीन भी नहीं........

दो भी नहीं...

एक भी नहीं.......

तो क्या मुहल्ला उजड़ गया? लोग उजड़ गए। नजरें बदल गईं...? तुम ही कहो रिक्शे वाले भाई, रिश्ते तो रिश्ते होते हैं और इंसानी रिश्तों से बढ़ कर.....

आते-जाते कुछ मुसाफिरों ने पलट कर उसकी तरफ  देखा। कुछ अर्थपूर्ण दृष्टि से मुस्कुराए भी। कुछ रुके, कुछ ने बताने वाली आंखों से उसकी तरफ  देखा। मगर वह जैसे अपनी धुन में खोया हुआ था। उसे, जैसे किसी मुतमइन कर देने वाले जवाब की कुछ ज्यादा जरूरत ही न थी।

चलो, चलो रिक्शे वाले..... उसे इतमेनान था। जगह बाकी रहती है। निशानियां किसी न किसी शकल में सुरक्षित रहती हैं। यह सब सोच कर वह एक बार फिर मुस्कुरा दिया।

‘हां यहां रोक दो। बस इसी जगह। दस कदम पीछे नीम का पेड़........... फिर मेहराब वाली मस्जिद। इससे आगे एक खण्डहरनुमा मकान.... देखो यहां तक सब ठीक है और इस खण्डहरनुमा मकान से तीन चार घर छोड़ कर घर के बाहर बरामदा.... और बरामदे में एक छोटा सा चबूतरा.... शुक्रिया रिक्शे वाले.. तो मियां कितने पैसे हुए तुम्हारे-लो, खुश रहो मियां।

रिक्शा से उतर कर उसने बड़े इतमेनान से गेट को आगे की ओर ढकेला। फिर अंदर आकर कुछ देर तक छोटे से चबूतरे को गौर से देखता रहा। निशानियां.... आह, निशानियां, समय गुजरने के बाद भी बाकी रहती हैं।

चबूतरे से जरा आगे पांच कदम के बाद सीढिय़ां थीं। सीढिय़ों पर चढ़ते ही पुराने रंग और रोगन का दरवाजा था। पर कोई नेम प्लेट नहीं थी। उसे इतमेनान था। मोहब्बत का कोई नाम नहीं हुआ करता। नेम प्लेट तो लोग बेवजह लगाया करते हैं।

भावुक होकर जैसा कि ऐसे मौकों पर अकसर होता है, जब आप काफी समय बाद या पहली बार दूर दराज का सफर तै करने के बाद अपने किसी अजीज से मिलने आते हैं...... वह जिज्ञासापूर्ण अंदाज में मुस्कुराया। और दूसरे ही पल उसने साहबख़ाना को आवाज लगाई। यद्यपि ऐसा करते हुए अपनी आवाज की थरथराहट का वह खुद भी गवाह था। और हकीकत यह थी कि किसी भी तरह वह अपने जज्बात को पोशीदा नहीं रख पा रहा था। उसने आने वाले कदमों की गिनतियां सुनीं कि यह किस ओर से आ रही होंगी और कितने कदमों के बाद, दरवाजा आता है.... फिर.....

दरवाजा खोलने वाला व्यक्ति उसकी नजर में रहमतों वाला और बरकतों वाला था। चेहरा जैसे नूर में नहाया हुआ हो। घुंघराले बाल। लम्बा कद। संजीदा मगर मोहब्बत से भरा चेहरा। आह! यह पहचान के लम्हे भी कितने बेखुद करने वाले होते हैं और किस कदर हसीन।

‘पहचाना, आपने.....,’

वह मुस्कुरा रहा था। और मोहब्बत उसके पोर-पोर से झलक रही थी। पहचाना आपने मामू? खूब कही.... भला कैसे नहीं पहचानेंगे आप, खून तो खून होता है मामू....

उसे यकीन था, रहमतों वाले और बरकतों वाले शख्स ने अपनी बांहें पसार दी हों। सफरी थैला उसने जमीन पर रखा और बेखुद होकर मामू के गले लग गया।

‘उफ !’ कैसी ठंडक मिल रही है। बरसों बाद.... जैसे आत्मा की मौजें, एक बदन से दूसरे बदन में प्रवेश कर रही हूं.... मामू! सफर की थकन जरा उतर जाए तो.... फिर तो मैं ही मैं ... अपनी राम कहानी जरा आराम से सुनाऊंगा।

‘अंदर चलो’ पहले जरा हाथ मुंह धो कर कुछ खा पी लो। फिर बातें होंगीं।’

उफ ! किस कदर पुरजोश, और जैसा कि उसने सुना था-उसे अब इतमेनान था और हकीकत थी कि उसके दिल में एक रूहानी ठंडक उतरती जाती थी।

अंदर दाखिल होने के बाद खिड़कियों पर सरसराते रेश्मी पर्दों, कालीन, सोफे और गालीचे पर मोहब्बत भरी नजर डाली।

‘आह, मुझे सब पता है।’ उसकी आवाज जज्बात से भरी थी। ‘यह गालीचा आप कहां से लाए? पिछले बरस आप लंदन गये थे। क्यों मामू?  गए थे ना। नहीं, ताज्जुब है आपको....? कि मैं कैसे जानता हूं। अब यह सब मत पूछिए मामू... किसने क्या बताया- मगर मुझे सब मालूम है। लंदन में आप आसिम मियां से मिलने गए थे। और आसिम मियां थे कि आप को जाने ही नहीं दे रहे थे... मगर आपको अपनी खमीर से दूरी बरदाश्त नहीं हुई-- क्योंकि मामू मियां, ताज्जुब है... मुझे सब मालूम है। उफ, वतन और मिट्टी की मोहब्बत भी क्या चीज है मामू। अपने सगे छूट जाते हैं मगर... यह कमबख्त मिट्टी, मिट्टी नहीं छूटती... मुझे सब खबर है मामू। जैसे यह कि मवानी अभी भी, इस उम्र में भी परदा करती हैं। छोटों से भी और यकीनी तौर पर मुझ से भी- नहीं। मुस्कुराइए मत! मैं यहीं से मवानी की खैरियत पूछ लूंगा। कितनी छोटी मगर कितनी प्यारी बात.... मुझे यह भी पता है कि इसके बाद तो अंदर वाला कमरा है, उसकी दीवारों का रंग आसमानी है। कालीन, सोफे, पेंटिंग्स..... अब्बा ने मुझे सब कुछ बता दिया था। और यह भी कि अब मवानी और आपके अलावा घर में कोई नहीं।

‘तुम थक गए होगे?’

‘उफ, वह भावुकता से भर गया। मामू किस कदर उस पर मेहरबान हुए जा रहे थे। ठीक  उसी पल, एक छोटी सी, बारह तेरह साल की लडक़ी कमरा में दाखिल हुई। मामू ने उसे इशारे से कुछ कहा। वह बेखुद होकर मामू की ओर पलटा, जैसे किसी इंतेहाई अजीज चेहरे को न पहचानने की सूरत में जो तकलीफ  से भरा एहसास पैदा होता है... वह मचल सा गया।

आह, उसे खुद पर शर्म आ रही थी। मगर इस शर्म को उसने खुद ही दूर किया। क्यों मामू! यह शाजिया थी ना......? आसिम की छोटी वाली बेटी। तो आप उसे लंदन से ले कर आ गए। अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए।’

अपनी मालूमात में इजाफ ा करने के बाद वह बेसााख्ता हंसा। उसने देखा, मामू का चेहरा भी कम गुलनार नहीं हो रहा था।

नाश्ता करने के बाद वह मामू के पास आकर बैठ गया।

‘अभी रहोगे, ना.....?’

‘उसने मोहब्बत और बरकतों और रहमतों वाले शख्स को बड़ी प्यारी नजरों से देखा। फिर मुस्कुरा दिया।

‘नहीं मामू, आह, कुछ वक्त आप लोगों से मिलने के लिए लाया होता मगर- छोटी सी जिन्दगी और काम बहुत से। अभी यहां भी कई लोगों से मिलना है। अरे हां, यह पूछना तो भूल ही गया.... वह फाटक वाला मुहल्ला...... चलिए यह पूछने से क्या फायदा.... बाहर निकला, तो रास्ते खुद ही अपनी मंजिल पहचान लिया करते हैं।

वह बार-बार प्रेम की बारिश से सराबोर हुआ जा रहा था। उफ , किस कदर अच्छा लग रहा है.... आपके साथ... यकीन नहीं करेंगे। जबकि आपको देखा भी नहीं था। न आपको न ही यह घर, न यह शहर। मगर अब्बा मियां के मुंह से इतनी बार इस शहर को देखने का इत्तेफाक हुआ। और आप लोगों के बारे में इतना कुछ सुना कि ... हर चीज मुंह जुबानी याद रह गई... हर चीज़ जेहन पर नक़्श हो गई। स्टेशन से लेकर यह पूरा शहर... यकीन न हो तो मुझ से किसी के बारे में भी पूछ कर देखिए...

‘अब्बा को क्या हुआ था?’

उसे महसूस हुआ। मामू की आवाज में थरथराहट है और विश्वसनीय तौर पर मोहब्बत, मोहब्बत का दर्द महसूस कर लेती है..... वह इस मोहब्बत भरे सवालनामे पर दोबारा मुस्कुराया।

अब्बा गुजर गए... गुजरने से पहले ख्वाहिशमंद थे कि काश वह आप लोगों से मिल सकते। वह यह भी चाहते थे कि अगर उनकी जिन्दगी ने वफा ना किया, तो कम से कम मैं उनकी ख्वाहिश को जरूर पूरा करूं और देखिए तो मामू मैं आपकी निगाहों के सामने हूं।

वह मुस्कुरा रहा था.. आह मोहब्बत भी कैसी खूबसूरत चीज है। मैं सच कह रहा हूं मामू। अब्बा को पता था कि उनकी जिन्दगी का चिराग गुल होने वाला है। उन्हें दिन तारीख सब कुछ पता था। मगर उनकी ताकीद थी कि मौत तमाशा नहीं है। मौत रोना-धोना नहीं है। मौत तो एक खुशगवार एहसास है। लम्बी थकान से आराम देने वाली मौत। अब्बा कहते थे। मौत से डरना नहीं चाहिए। पैदा होते ही मौत को मान लेना चाहिए। मौत को बोझ नहीं बनाना चाहिए। मौत से बोझल नहीं होना चाहिए- मौत तो सुकून का एक तोहफा है.... उसे पूरे जोश के साथ महसूस करना चाहिए....

‘इस कमरे में तुम्हारा बिस्तर लगा दूं।’

आह, वही मोहब्बत.. उसे किस कदर बात-बात पर खुशी हो रही थी। मामू भी कैसे अजीब हैं, बोल नहीं सकते, हकीकत यह है कि वह अब्बा मियां की मौत के बारे में सुन ही नहीं सकते।

‘हां मामू। मैं यहीं सो जाऊंगा। आप तकलीफ न करें बस यह बता दें कि वह फाटक वाला मोहल्ला.. खैर कोई बात नहीं। कल सुबह.... अच्छा खुदा हाफिज... शब बखैर मामू.... कल सुबह मैं यहां से चला जाऊंगा... दूसरे रिश्तेदारों से भी तो मिलना है, फिर पता नहीं कब मुलाकात हो। एक बार फिर खुदा हाफिज... शब बखैर... नहीं मेरे लिए परेशान मत होइए। जैसा कि अब्बा ने बताया था, रास्ते खुद अपनी मंजिल पहचान लिया करते हैं। मुझे कहीं भी कोई दुश्वारी नहीं होगी। ख़ुदा हाफिज़।

लोग कहते हैं , इसी तरह जिस तरह वह यहां इस घर में आया, उसी तरह उसने फाटक वाले मामू का घर भी तलाश कर लिया। फिर खुदा मालूम उसे और भी जिन घरों में जाना था, उसने एक एक करके सबसे मुलाकात की। लेकिन कहने वाले यह भी कहते हैं कि पता नहीं वह लोग.... वह थे कि नहीं, जिनकी तलाश में वह इन लोगों से मिलने आया था। शायद वह मिला और टूट कर मिला। और उसी सादगी के साथ वापस हो गया।