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Wednesday 22 Nov 2017

वांङ्चू और टोबाटेक सिंह

 

माताचरण मिश्र

ए-19, मिनाल रेसिडेंसी, गोविंदपुरा

भोपाल (म.प्र.) 462023

मो. 09893467069

साहित्य जगत में जब भी अपनी लेखनी से हाशिए पर धकेल दिए गए आम इंसानों की पीड़ा और आजादी के तुरंत बाद हुए नरसंहारों का मार्मिक वर्णन करने की बात उठेगी, भीष्म साहनी और सआदत हसन मण्टो का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। सआदत हसन मण्टो की जन्मशती तीन बरसों पहले बिना उन्हें याद किए गुजर गई। पाकिस्तान तो पाकिस्तान; हिन्दुस्तान में भी उन्हें याद करना जरूरी नहीं समझा गया। इसी से पता चलता है हम अपने $फनकारों को कितनी इज्जत बख्श करते हैं? भीष्म साहनी भी एक आदमकद ऊंचे पाये के अफसानानिगार रहे हैं। उन्होंने ‘चीफ की दावत’, ‘ओ हरामजादे’ और ‘सागमीट’ जैसी अनेकों अविस्मरणीय कहानियां लिखी हैं। इस बरस उनकी जन्मशती हम मनाने जा रहे हैं, कम से कम इसी बहाने साहित्य संसार में थोड़ी उथल-पुथल हो।

आखिर वह ऐसी कौन सी बात है जो लिखे जाने के साठ सत्तर बरसों बाद भी आज की वारदात मालूम पड़ती है। ‘वांङ्चू’ और ‘टोबाटेक सिंह’ और दोनों की दारुण यातनाओं को हम आज भी जब पढऩे बैठते हैं, बेचैन हो उठते हैं। वक्त की कोई भी गर्दिश वांङ्चू और टोबाटेक सिंह को धूमिल नहीं कर पाई। वे खरे सोने की तरह वक्त की भट्ठी में तप कर कुन्दन हो चुके हैं। सचमुच उन आम इंसानों में कितनी गहरी जिजीविषा रही होगी। ‘कोशिश करो, कोशिश करो, जमीन में गडक़र भी जीने की...’ या ‘यहां हर आत्मा अधीर है, हर वाणी में महाकाव्य पीड़ा है, हर पत्थर में चमकता हीरा है...’ गाहे बगाहे मुक्तिबोध यूं ही नहीं याद आ जाया करते। कुछ न कुछ बात तो है, क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, दुश्मन रहा है कब से दौरे जहां हमारा... (इकबाल)

बात उस ‘वांङ्चू’ से शुरू हुई थी जो भीष्म साहनी की वह जीवन्त रचना है जो उन्होंने चीन से भारत आए बौद्ध भिक्षु पर लिखी थी पर नहीं उससे थोड़ा पहले ‘टोबाटेकसिंह’ को भी जान लिया जाए जिसे सआदत हसन मण्टो ने लिखा था और जिसमें एक पागलखाने की दास्तान को सारी दुनिया की कहानी बना दिया गया है। बंटवारे के दो तीन सालों बाद पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की सरकारों को अचानक ख्याल आया कि साधारण कैदियों की तरह पागलखाने के पागलों का भी तबादला हो जाना चाहिए। ऊंचे स्तर की कांफ्रेंस हुई काजू-बादाम-पिश्ते खाए गए और पागलों के लिए भी एक दिन तय कर दिया गया। अब पागल तो पागल उन पर भी प्रतिक्रिया होनी शुरू हो गई। एक मुसलमान पागल से उसके एक पागल दोस्त ने पूछा कि मौलवी साहब, यह पाकिस्तान क्या होता है? सोच विचार के बाद उसने जवाब दिया- हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह जहां उस्तरे बनते हैं (देखा जाए तो आज पाकिस्तान सारी दुनिया के लिए आतंक का पर्याय ही है!) एक और पागल को डराया धमकाया गया तो उसने कहा मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं और न पाकिस्तान में और वह उछलकर एक पेड़ पर जाकर बैठ गया। एक एम.एस.सी. पास मुसलमान पागल जो इंजीनियर था उसने यह खबर सुन अपने सारे कपड़े उतार फेंके और नंगधड़ंग बगीचे में चलने-फिरने लगा। एक और मुसलमान पागल जिसका नाम मुहम्मद अली था उसने अपने आपको कायदे आकाम किान्ना घोषित कर दिया तो एक सरदार पागल ने अपने आपको मास्टर तारासिंह घोषित कर दिया। और तो और पागलखाने के यूरोपियन वार्ड के पागलों में यह चिंता व्याप गई कि वे जहां भेजे जाएंगे वहां उनकी हैसियत कैसी रहेगी? वहां उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाती तो नहीं खानी पड़ेगी।

पन्द्रह साल पुराना एक सिख पागल जिसका असली नाम बिशन सिंह था और जिसे सब टोबाटेकसिंह के नाम से भी जानते थे और जो बड़ी अजीब सी भाषा बोलता था। कहते हैं कि टोबाटेक सिंह में उसकी कामीनें थीं। वह यह भी नहीं जानता था कि टोबाटेक सिंह हिन्दुस्तान में है या पाकिस्तान में। वही टोबाटेक सिंह जो पन्द्रह वर्षों से खड़ा रहता था। वह एक और दिन औंधे मुंह लेटा हुआ था। कांटेदार तारों के पीछे पाकिस्तान और बीच में कामीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था वहां टोबाटेक सिंह पड़ा हुआ था।

देखा जाए तो दरअसल जहां वह गिरा और मरा हुआ पड़ा पाया गया वह जगह न हिन्दुस्तान में थी और न पाकिस्तान में, फिर भी वहां उसके तईं आजादी का अहसास जैसी ही थी जहां उसने अपने प्राण तज दिये, वह सरकारी कानून कायदों की धज्जी उड़ाते हुए आजाद इस दुनिया से गया।

कहीं न कहीं मण्टो के मन में कहीं कोई खलिश़ जैसी ही थी। बंटवारे के बाद उसे भी पाकिस्तान जाना पड़ा था जहां उसे बड़ी मशक्कत से दिन बिताने पड़े थे। उसकी रचनाओं पर अश्लीलता के आरोप लगाए गए। मुकदमे भी कायम किए गए। तभी मण्टो ने कहा था-‘‘मेरी तहरीर में कोई नुस्ख नहीं है, जिस नुस्ख को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है वह दरअसल मौजूदा निकााम का नुस्ख है। मैं हंगामा पसंद नहीं हूं और लोगों के ख्यालात में हैकाान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहकाीब, तमद्दुन और सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़ा पहनाने की कोशिश भी नहीं करता क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्जियों का काम है।’’ भीष्म साहनी हों या मण्टो, प्रगतिशील और तरक्कीपसंद लोगों में रहे हैं। हम आज भी कुछ आड़ी-टेढ़ी सीमाओं और थोथे प्रश्नों के इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं और जिनका कोई हल नहीं है, क्योंकि जो लोग हम पर फैसला लिखते हैं वे राजनेता कम अक्ल, अंधे और बहरे हैं। वे आज भी हमारी मानवीय संवेदनाओं की तिकाारत करते हैं जबकि ये दोनों ही पात्र कोई हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी या चीनी नहीं महका इंसान हैं और आम इंसानों की तरह जीने का हक मांगते रहे हैं जो उन्हें नहीं दिया जा सका और वे अभागे इंसानों की तरह ही इस दुनिया से विदा हो गए।

‘वांङ्चू’ भी एक अविस्मरणीय कहानी है। लेखक ने पहली बार उसे लालमण्डी की सडक़ पर आते हुए देखा था। धूसर रंग का चोगा पहने घुटे सिर बौद्ध भिक्षुओं की भांति। पीछे शंकराचार्य की ऊंची पहाड़ी थी और ऊपर स्वच्छ नीला आकाश और सडक़ के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे सफेदे के पेड़ों की कतार। जब से वह श्रीनगर आया था बौद्ध बिहारों के खण्डहरों और संग्रहालयों में घूम रहा था। उसकी मन:स्थिति ऐसी थी मानो वह वर्तमान से कटकर अतीत के कालखंड में विचर रहा था।

महाप्राण के पैर ही पहले दिखाए जाते थे। मूर्तियां तो बाद में बनने लगीं। बोधिसत्व के पैर देख उसे महाप्राण के पैर याद आ गए। वह महाप्राण के जन्म स्थान लुम्बिनी की यात्रा भी कर आया था। उसे देखकर लगता था वह बौद्धधर्म को पूरी तरह जान लेना चाहता था। उसे उन दिनों चल रही राजनीतिक उथलपुथल से भी कोई मतलब नहीं था। हालांकि उसकी यह तटस्थता आसपास लोगों को खटकती थी। नेहरू जी श्रीनगर आने वाले थे और उन्हें नदी के रास्ते नावों के जुलूस की शक्ल में लाया जाने वाला था परन्तु इस सबमें उसकी दिलचस्पी नहीं थी, लेखक की मौसेरी बहन नीलम उसका खूब मकााक उड़ाया करती थी और वह अपनी डेढ़ इंच की मुस्कान फेंकता था। जिसमें उसके ऊपर का होंठ थोड़ा टेढ़ा हो जाता था। उसने नीलम को चांदी के कश्मीरी चलन के दो झूमर भी भेंट किए थे। बदले में नीलम ने भी उसे कामदार चमड़े का राइटिंग पैड भेंट में दिया था। वह अक्सर फांक को फांक नहीं बांक ही कहता था। नीलम की आंखों में उसके लिए हंसी के अतिरिक्त कुछ और नहीं था। फिर एक दिन अचानक वह सारनाथ लौट गया जहां महाप्राण ने अपना प्रथम प्रवचन दिया था।

कभीकभार वहां से वांङ्चू का खत आ जाता था। कभी लिखता था कि वह तंत्रज्ञान का अध्ययन कर रहा है तो कभी लिखता था कि वह कोई पुस्तक लिखने की योजना बना रहा है। फिर लेखक से उसकी मुलाकात दिल्ली में हुई जहां चीन के प्रधानमंत्री यू एन लाई भारत आने वाले हैं। सच पूछो तो उसे अपने देश की गतिविधियों से भी उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी फिर अचानक वह चीन लौट गया। वहां कुछ दिनों उसकी खूब आवभगत हुई। वह वहां के लोगों को भारत के रीति-विराजों, तीर्थों और मेलों-पर्वों के बारे में  बताता रहा। फिर उसे वहां कुछ फालतू से कामों में उलझा दिया गया। एक दिन कोई आदमी उसे ग्राम प्रशासन केन्द्र ले गया जहां बड़े से कमरे में पांच व्यक्तियों का दल उसके भारत निवास के बारे में पूछताछ करता रहा। बौद्ध धर्म का भौतिक आधार क्या है या द्वंद्वात्मक भौतिकवादी की तरह तुम बौद्ध धर्म को कैसे बांचते हो जैसे सवाल पूछे गए? इससे भारत की विदेश नीति के बारे में भी पूछा गया। पूछताछ घंटों चलती रही। वह कुछ उखड़ा सा महसूस करता रहा जबकि वह मूल रूप से चीन का ही बाशिन्दा था, परन्तु अब उसे भारत की याद सताने लगी। उसे सारनाथ की अपनी छोटी सी झोपड़ी याद आने लगी। जहां वह नीम के घने पेड़ के नीचे बैठ पोथी बांचा करता था। उसे सारनाथ की कैंटीन का वह रसोइया याद आने लगा जो उसे प्यार से मिलता था। उसे गंगा का तट भी याद आया जहां वह घंटों घूमता टहलता रहता था। फिर उसे कश्मीर की झील और हिमाच्छादित पर्वत और नीलम की याद आ गई जिसके प्रति वह कभी अनुरक्त था और उसने भारत लौटने की ठान ली। लेकिन चीन की सरकार ने बहुत से एतराज उठाए। उसकी नागरिकता का सवाल भी आड़े आ गया।

कलकत्ता आने पर उसने पाया लोग उसकी ओर घूर-घूर कर देख रहे हैं क्योंकि सीमा पर चीन और भारतीय सैनिकों की मुठभेड़ हुई थी और कुछ लोग मारे भी गए थे। वह स्टेशन से बाहर निकला ही था कि दो सिपाही उसे पुलिस के दफ्तर ले गए, जहां घंटेभर एक अधिकारी उसके पासपोर्ट और कागजों की छीनबीन करता रहा। सुपरिटेंडेंट ने टिप्पणी लिख दी कि उस पर नकार रखने की जरूरत है। ट्रेन में भी उसकी काफी फजीहत हुई। उसकी डेढ़ इंच की मुस्कान ओझल हो चुकी थी और अब उसके चेहरे पर त्रास उभर आया था। सारनाथ वापस पहुंच उसे थोड़ा राहत मिली। कैंटीन का रसोइया इससे लपककर मिला। उसे लगा वह अपने घर पहुंच गया है।

लेखक को अचानक फिर उसका खत मिला कि वह भारत लौट आया है।  लौटने के दसेक दिनों बाद वह चटाई पर बैठकर ग्रंथ पढ़ रहा था कि पुलिस का एक थानेदार हाथ में पर्चा रखे उसे थाने ले जाने आ गया। वहां फिर उससे सवाल पूछे गए कि जब तुम चीन वापस चले गए थे तो फिर क्यों वापस लौट आए? कलकत्ता में तो तुमने बताया था कि तुम शांति निकेतन जा रहे हो जो लौटकर यहीं आना था तो यहां से गए ही क्यों थे? बौद्ध ग्रंथों का हवाला देने के अतिरिक्त उसे और कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था। बनारस से लौटने के बाद अपनी कोठरी में जाने बजाय वह उसी नीरव पुण्य स्थान पर जाकर बैठ गया जहां शताब्दियों पहले महाप्राण ने अपना प्रथम प्रवचन दिया था।

परन्तु उसे शांति नसीब नहीं हुई। चीन और भारत के बीच जंग छिड़ चुकी थी। उसी रोज शाम पुलिस के कुछ अधिकारी जीप में आए और उसे अपनी हिरासत में ले गए। वह उद्भ्रांत और निढाल सा दीवार से टिका शून्य में कुछ देखता रहता। उसकी पोटली की तलाशी भी ली गई। कोठरी से उसका ट्रंक भी ले आया गया। उसके कागज पत्रों की जांच भी की गई। फिर उसके कागजों के पुलिन्दे को बड़े अधिकारियों के पास दिल्ली भेज दिया गया क्योंकि वहां चीनी भाषा का कोई जानकार नहीं था। लड़ाई बंद होने के बाद उसे सारनाथ वापस लौटने की इजाजत मिल गई पर ट्रंक खोलकर देखने पर उसने पाया उसके कागजात नहीं बचे हैं। उस पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। उसे लगता जैसे वह कैद में है और कोई उस पर नकार रख रहा है फिर वह समय भी आया जब उसे मिलने वाला अनुदान अचानक बंद कर दिया गया।

करीब सालभर बाद उसे एक पुर्जा मिला कि उसके कागजात वापस किए जा सकते हैं। बीमारी में भी गिरता पड़ता वह बनारस आया लेकिन उसके कागज पत्तर में एक पूरा निबंध और कुछ टिप्पणियां बची थीं, उसकी आंखों में उसी दिन से धूल उडऩे लगी थी। वह पूरी तरह टूट बिखर चुका था।

वांङ्चू के मरने की खबर भी लेखक को महीनेभर बाद मिली थी। इसलिए भी कि मरने से पहले उसने यह आग्रह किया था कि उसके ट्रंक और गिनी-चुनी किताबें लेखक को पहुंचा दी जाए।  लेखक ने लिखा है कि जब वे वांङ्चू का ट्रंक उठाकर बाहर की ओर जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि कैंटीन का रसोइया उनके पीछे भागता चला आ रहा था।

बाबू आपकी बहुत याद करते थे और उसकी आंखें डबडबा आईं। सारे संसार में शायद वही एक अकेला जीव था जिसने उसकी मौत पर दो आंसू बहाए थे। फिर उसी ने लेखक को यह भी बताया कि बेचारे को पुलिस वालों ने बहुत परेशान किया। आखिर में लेखक ने यह लिखा कि उसके ट्रंक और कागजों का पुलिन्दा साथ ले आए हैं पर सोचते हैं उसकी अधूरी पाण्डुलिपि कौन छापेगा? पत्नी रोज बिगड़ती है कि वे घर में कचरा भरते रहते हैं। तीन-चार बार तो वह सब कुछ फेंक देने की धमकी भी दे चुकी है। इसलिए वे उसे कभी किसी तख्ते पर या कभी पलंग के नीचे छिपा दिया करते हैं। परन्तु आखिर यह भी कब तक हो पाएगा? किसी दिन ये सब गली में फेंक दिए जाएंगे।

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कहानी यहां खत्म हो जाती है। पाठकों के मन में इस संसार की नीरवता और हताशा से गहरा साक्षात्कार होता है जहां किसी की भावनाओं और संवेदनाओं का कोई अर्थ नहीं रह गया है। सारा कुछ भौतिकवादी और उपयोगितावादी दृष्टि पर ही केन्द्रित हो आया है। भीष्म साहनी हों या सआदत हसन मण्टो दोनों ही कथाकारों ने इस संसार की वास्तविकता को अपनी नंगी आंखों से देखा और पहचाना था। लुटे-पिटे आम इंसानों की जद्दोकाहद और उनकी यातनाओं से रूबरू होते हुए उनके उसी संत्रास को अपनी रचना में प्रस्तुत किया। अगर उनके लिखे में उनकी पीड़ा और दर्द को सचमुच वाणी मिली है तो उसने ही इन कहानियों को क्लासिक बना दिया है। जिसके लिए वे आज भी याद किए जाते हैं।

सचमुच, कितनी त्रासदायी पीड़ा से गुजरना पड़ा वांङ्चू और टोबाटेकसिंह को कि ये कहानियां आज भी उनके रक्त-मांस से लिपटी रक्तकथाएं बन गईं। वांङ्चू हो या टोबाटेकसिंह दोनों को तिल-तिलकर मरना पड़ा। राजनीति की बिसात पर कुछ सड़े-गले फालतू से कानून कायदों के लिए भोले-भाले इन दो आम इंसानों की बलि चढ़ा दी गई पर उनका वही दुखान्त जो इन दोनों कथाकारों द्वारा रचे साहित्य में दर्ज हो गया है वही असली और सौ टके का है जो जब कभी भी पढऩे में आएगा उनका सही फैसला तो वे पाठक ही करेंगे जो नई पीढिय़ों के रूप में सामने आएंगे और वही सच भी होगा।