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Tuesday 21 Nov 2017

हानूश: सृजनात्मकता का संकट

मंजू कुमारी

245 , गोदावरी हॉस्टल

जवाहरलाल नेहरु विवि

नई दिल्ली-110067

मो. 9871593794

हानूश भीष्म साहनी का पहला नाटक है। यह नाटक कलाकार की सृजनात्मकता को केंद्र में रखकर लिखा गया है। हानूश नाटक का पात्र हानूश, आम आदमी की तरह ताला बनाने वाला (कुफ्लसाज़) साधारण व्यक्ति होता है। उसकी बचपन से ख्वाइश होती है कि वह एक ऐसी घड़ी बनाएगा, जो बिना रुके हमेशा चल सकेगी। जिस कारण वह बदहाली की हालत में होते हुए भी जीतोड़ मेहनत करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। हानूश में हम एक कलाकार के जुनून और लगन को देख सकते हैं। हानूश ने अपने जीवन की विषम परिस्थितियों से संघर्ष करता हुए अपनी जवानी के सत्रह-अठ्ठारह वर्ष चेकोस्लोवाकिया की पहली मीनार घड़ी बनाने में लगा दिए। इस प्रकार अंत में जब वह कलाकार अपने सृजन में सफल हुआ और घड़ी नगरपालिका के मीनार पर लगाईं गई तो बादशाह सलामत ने आकर देश का गौरव बढ़ाने वाले गरीब कलाकार हानूश को सम्मानित और पुरस्कृत किया तो दूसरी ओर उसकी दोनों आँखों निकलने का भी हुक्म दे दिया, जिससे हानूश और घडिय़ाँ न बना सके।

भीष्म साहनी ने स्वयं लिखा है कि जब वह चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग गए तो उनके मित्र निर्मल वर्मा ने उन्हें हानूश की वह मीनार घड़ी दिखाई। जिसके बारे में वहां तरह-तरह की कहानियां प्रचलित थी। हानूश ऐसे ही यथार्थ और कल्पना के संयोग की उपज है। नाटक की कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी मध्यकाल में थी। लेखक का उद्देश्य घड़ी की विलक्षणता, उसके आविष्कार की लम्बी कहानी बताना भी नहीं है, जैसा कि स्थूल दृष्टि से देखने पर लगेगा।  इसके विपरीत नाटक सूक्ष्म स्तर पर मानवीय स्थिति, मानवीय नियति को प्रस्तुत करता है। ताला बनाने वाले सामान्य मिस्त्री, हानूश के माध्यम से एक कलाकार की सृजनेच्छा शक्ति और संकल्प की तीव्रता को पूरी संवेदनशीलता से तीन अंकों में प्रस्तुत किया गया है।

नाटक का प्रथम अंक हानूश, हानूश की पत्नी कात्या और बड़े भाई पादरी के आपसी संवादों से शुरू होता है। आर्थिक संकट से ग्रस्त होने के कारण हानूश के परिवार में काफी तनावपूर्ण माहौल होता है। आर्थिक तंगी की वजह से कात्या, हानूश पर झल्लाकर कहती है। जो आदमी अपने परिवार का पेट नहीं पाल सकता, उसकी इज्जत कौन औरत करेगी। हानूश का यह कहना सही है कि गरीबी और आर्थिक तंगी स्थायी नहीं होती लेकिन यह क्रूर सत्य है जिसे अनदेखा करके भी जीवन जिया नहीं जा सकता। ठीक ही कहा गया है कि धन समस्या की वजह है तो समस्या का निदान भी है।

दूसरे अंक में कलाकार की सृजन शक्ति और कला चेतना को उजागर किया गया है और साथ ही साथ सत्ता द्वारा अपनी शक्ति को कायम बनाए रखने के लिए एक कलाकार की किस हद तक अवहेलना की जा सकती है उसको भी चित्रित किया गया है। नगरपालिका हानूश को घड़ी बनाने के लिए वजीफा देती है। जिस कारण वह उस पर अपना हक़ चाहती है। गिरजेवाले धर्म के नाम पर घड़ी पर अपना हक़ चाहते हैं। यहां पर नाटककार ने व्यावसायिक सत्ता और धार्मिक सत्ता द्वारा परस्पर होने वाले आम आदमी के शोषण को उजागर किया है। इसी अंक के दूसरे दृश्य में हानूश के बेटी यान्का और हानूश के सहायक जेकब के बीच पनपते प्रेम सम्बन्ध को भी उभारा गया है। दिन प्रतिदिन घड़ी की सफलता के साथ-साथ हानूश और कात्या के बीच मधुर संबंधों को भी रेखांकित किया गया है।

तीसरे अंक में कलाकार की आंतरिक पीड़ा को उभारा गया है। हानूश की घड़ी बनाने की प्रतिभा को जानकार राजा बहुत खुश होता है। हानूश को पुरस्कार से नवाजता है और घड़ी की देखरेख का जिम्मा भी उसे ही सौंपता है। लेकिन साथ ही साथ दुबारा हानूश को घड़ी बनाने की इजाजत नहीं है इसलिए उसे उसकी आँखों से महरूम कर दिया जाता है। नाटक के माध्यम से सत्ता की अंधी नीति, उसके शासन व्यवस्था पर सहज व्यंग्य, मानवीय संवेदना की सहज अभिव्यक्ति है। कलाकार की मौत कभी नहीं होती है वह अपने सृजन के माध्यम से हमेशा जीवित रहता है। नाटक के अंत में हानूश का यह महसूस करना कि अब घड़ी कभी नहीं बंद होगी,  अर्थात उसका भेद जानने वाला उसका सहयोगी जेकब शहर से बाहर जा चुका है। हानूश के द्वंद्व, अनुभव और भावात्मक स्पर्श की ऐन्द्रिक अनुभूति के स्तर पर पाठक के मर्म को गहराई तक कचोटता है। अंत में, हानूश का यह कथन नाटक के लक्ष्य को सामने लाता है- घड़ी बन सकती है, घड़ी बंद भी हो सकती है। घड़ी बनानेवाला अंधा भी हो सकता है, मर भी सकता है लेकिन यह बहुत बड़ी बात नहीं है। जेकब चला गया, ताकि घड़ी का भेद जिन्दा रह सके, यही सबसे बड़ी बात है।

हानूश का परिवेश मध्ययुगीन है। जहां पर राजा का शासन है और उसकी सबसे बड़ी चिंता है राजा की शक्ति का संरक्षण। राजा और नगरपालिका की आपसी राजनीति के बीच अपनी-अपनी शक्ति को कायम रखने के चक्कर में पिसा आम आदमी हानूश। जैसाकि वर्तमान में भी राजनीति और राजनेताओं की आपसी कलह का शिकार आम आदमी ही होता है। वह चाहे जिस भी रूप में हो। अँधा होने के बाद हानूश काफी अंतद्र्वंद्व में जीता रहा। वह कभी अपनी सत्रह साल की मेहनत से बनी घड़ी को तोड़ देना चाहता है तो कभी अपने आपको ही समाप्त कर देना चाहता है। इसी जद्दोजहद के बीच वह अपनी जिंदगी को अंधियारों में व्यतीत करता है। अपने आपको समाप्त करने की भी कोशिश करता है। लेकिन सफल नहीं हो पाता। तभी अचानक घड़ी बंद हो जाती है। घड़ी की टिक-टिक की आवाज न सुनने पर वह परेशान हो जाता है। उसको देखकर ऐसा लगता है कि अब तक वह घड़ी की टिक-टिक से ही जिन्दा था। तमाम तरह से अपनी जद्दोजहद के बीच जीवन जीता हुआ हानूश घड़ी को न चाहते हुए भी ठीक करता है। उसे यह जानकर बहुत ख़ुशी होती है कि उसका सहयोगी जेकब शहर से दूर जा चुका है जिसके माध्यम से घड़ी का भेद खुल सकेगा और वह इस तरह हमेशा के लिए जीवित भी रहेगा। हानूश अब निश्चिंत हो जाता है कि अब यह घड़ी कभी बंद नहीं होगी और उसका राज सबको मालूम हो सकेगा।

हानूश नाटक सृजनात्मकता का संकट विषय पर केन्द्रित है। सृजनात्मकता का प्रश्न किसी भी कलाकार की सृजन शक्ति या उसकी निजी मौलिक प्रतिभा से सम्बंधित है। वह चाहे चित्रकार हो या कवि-लेखक या वैज्ञानिक हो। यही हुनर किसी भी कलाकार या वैज्ञानिक को समाज के अन्य व्यक्तियों से उसे अलग और अनोखा बनाता है। जैसे रंजीत देसाई के उपन्यास राजा रवि वर्मा पर आधारित फिल्म रंगरसिया के नायक राजा रविवर्मा का चित्रकारी के क्षेत्र में अनोखा योगदान रहा है। जिसने सबसे पहले देवी-देवताओं की चित्रकारी की। नाटककार मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन में कालिदास की सृजन शक्ति और स्वयं के संघर्ष पर सृजनात्मकता का संकट का सहज चित्रण मिलता है। इसी प्रकार सच्ची घटना पर आधारित फिल्म एक डाक्टर की मौत में नायक डॉ. दीपांकर राय का शोधकार्य के प्रति जुनून, लगन उन्हें चैन से जीने नहीं देता। शोध पर शोध करते हुए, करीब दस साल कुष्ठरोग के टीके की खोज में बिना किसी ऊब के अपनी जिंदगी को समर्पित करके ख़ुशी महसूस करते हैं। लेकिन दु:ख की बात यह है कि हमारा समाज और क़ानून पूरी तरह से डॉ. दीपांकर राय के इतने बड़े शोधकार्य को मजाक बनाने और डॉ. दीपांकर राय की प्रतिभा को उनके शोध कार्य को उनकी छोटी सी लैब में ही समाप्त करनेकी राजनीति शुरू कर देता है। हानूश की तरह डॉ. दीपांकर राय से भी जवाब मांगा जाता है कि उसने किसकी अनुमति से यह शोधकार्य किया है। अपने ही लोग न मध्यकाल में कलाकार की प्रतिभा को समझ पाये थे और न ही आज समझना चाहते हैं। बस अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए हानूश और डॉ. दीपांकर जैसी उभरने वाली न जाने कितनी प्रतिभाओं और उसके रिसर्च को यूं ही बिना किसी वजह के समाप्त कर दिया जाता है। मध्यकाल में भी हमें बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जब राजतंत्र में कलाकार की कलाकारी पर केवल राजा का अधिकार था। राजा अपने अनुसार अपनी शक्ति और शान को बनाए रखने के लिए कलाकार की प्रतिभा को सम्मानित करने के बजाय उसे समाप्त करने की वह पूरी कोशिश करता है। कलाकार की कला, उसकी सृजन शक्ति पर अपना अधिकार चाहता है, जिससे समाज में उसका वर्चस्व हमेशा बना रहे।ं शक्ति का प्रतीक राजा प्रजा स्वरूप कलाकार के जीवनयापन का पूरा इंतजाम करके अपने आपको महान जरूर समझता है, लेकिन एक कलाकार की कारीगरी, उसकी अपनी प्रतिभा, हुनर जिससे उसे अपनी जिंदगी में अपार ख़ुशी और सुकून मिलता है। जिस प्रतिभा और संघर्ष की उसे सराहना मिलनी चाहिए थी उसी प्रतिभा और संघर्ष का वह शिकार होकर सदा के लिए अपाहिज हो जाता है।ं पात्रों के माध्यम से नाटककार जीवन के मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ रूढि़वादी मान्यताओं पर व्यंग्य करने से भी नहीं चूकता है। एक प्रसंग आता है जब हानूश का बड़ा भाई पादरी कात्या को पैसे की अहमियत और उसका जीवन में कहाँ तक और कितना महत्त्व है, इस बात को समझाते हुए कहता है कि जीवन में ख़ुशी, सुकून पैसे से नहीं खऱीदा जा सकता है। पादरी का कथन-पैसे वाले कौन से सुखी हैं, कात्या अगर पैसे से ही सुख मिलता हो तो राजा-महाराजों जैसा सुखी ही दुनिया में कोई नहीं हो। इसी प्रकार पादरी स्वयं से जीवन के रहस्यों के बारे में प्रश्न करता है कि इंसान की जिंदगी का मकसद क्या है और क्या होना चाहिए? इस प्रश्न को लेकर परेशान रहता है और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि किसी चीज के प्रति व्यक्ति के मन में स्थिरता होनी चाहिए। हानूश मन की स्थिरता के प्रश्न पर व्यंग्य करता हुआ कहता है कि आप स्थिरता चाहते हैं, पर स्थिरता तो भाई साहिब, पोखर के पानी में ही होती है और कहीं तो मैंने स्थिरता नहीं देखी। हानूश का परिवार की आवश्कताओं पर ध्यान न देना और परिवार के प्रति उसकी लापरवाही की वजह से कात्या उसे स्वार्थी कहती है। जिसे केवल अपनी घड़ी से मतलब है। कलाकार का जुनून उसे समाज के अन्य व्यक्तियों से अलग कर और अपनी कला के प्रति समर्पण पैदा करता है। हानूश का जुनून भी ऐसा ही था जिसकी तरफ  इशारा करके कात्या उसे स्वार्थी व्यक्ति की संज्ञा देती है। जबकि सही यह है कि कलाकार स्वार्थी नहीं होता कला का नशा उसे कुछ और देख पाने या कर पाने की तरफ  ध्यान देने नहीं देता। कात्या को जब हानूश की प्रतिभा और उसके संघर्ष का एहसास होता है, तब वह कला के मर्म और उसके काम की महत्ता को समझ पाती है। फिर वह कहती है अब तुम आजाद हो। अपने वजीफे का इंतजाम करो और घड़ी बनाओ। मैं तुमसे कभी कुछ नहीं कहूँगी। हानूश का कथानक सामंतीयुग के विघटन और पूंजीवाद के आगमन का संकेत करता है। नाटक के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की गई है कि अब वह समय नहीं रहा जब सभी चीजों पर केवल राजतंत्र का शासन होता था। भीष्म साहनी जी यहीं बताने की कोशिश करते हैं कि हानूश को अंधा बना देने से विकास की गति रूक नहीं सकती है। यहाँ पर कलाकार सामंतवाद और पूँजीवाद दोनों से परेशान है फिर भी वह अपने काम को बंद नहीं करता है क्योंकि उसे आशा है कि आने वाला कल उसका अपना है।

नाटक के तीसरे अंक में सृजनशीलता के प्रश्न और राजसत्ता द्वारा आमजन पर होने वाले अत्याचार को सहजता से स्वीकार करती हुई कात्या कहती है कि हम गरीब लोग बादशाहों से टक्कर नहीं ले सकते हैं। हमारी बिसात ही क्या है। हानूश का मित्र एमिल कात्या को समझाते हुए कहता है कि ऐसा नहीं है जो लोग कोई नया काम करेंगे, उन्हें तरह-तरह की जोखिमें तो उठानी ही पड़ेंगी। यही बात फिल्म एक डॉक्टर की मौत में डॉ. दीपांकर को समझाते हुए पत्रकार अमूल्य भी कहता है। नाटक की भाषा बहुत ही प्रवाहपूर्ण है। नाटक की भाषा के सम्बन्ध में डॉ. गिरीश का यह कथन बिलकुल सही है कि हानूश की मानसिक यातनाएं, द्वंद्व, सृजनशीलता, संवेदनशीलता, तन्मयता, तल्लीनता, करुणा, पीड़ा आदि मनोभावों को भी उन्होंने सहज भाषा में बड़ी ऊष्मा आतंरिक छुअन के साथ अभिव्यक्ति दी है। घड़ी के नाजुक पुर्जों को छूने की, उसकी कोमलता और आकुलता के अनुरूप ही भाषा और संवादों का अत्यंत नाजुक गठन है।  ठ्ठ