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Sunday 19 Nov 2017

भीष्म साहनी की कहानियाँ

किसलय पंचोली

इंदौर ( म. प्र. )

9926560144

भीष्म साहनी मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक हैं। उनका  लेखन मंटो के लेखन की याद दिलाता  है। प्रेमचंद की मशाल को आगे बढ़ाने वाले हाथों में एक हाथ निश्चित ही भीष्म साहनी का है। उनकी अनेक कहानियों के पात्र अपनी पीड़ा, अभावों और आकांक्षाओं को बखूबी छिपाते हुए सामान्य जन के बहुत करीब पहुंच जाते हैं। उनकी लेखनी पर रशियन लेखकों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। कहानियों की भाषा सहज, सरल बोधगम्य है। उनमें क्लिष्टता कहीं नहीं है। शब्दों का आडंबर रचना वे आवश्यक नहीं मानते। कहानियों का सहज प्रवाह और सार्थक अंत उनके सकारात्मक चिंतन और दर्शन को परिलक्षित करता है। कहानियों में अवसाद, मूल्यहीनता और अनास्था के लिए कहीं जगह नहीं है। कहानियाँ न सिर्फ हमें जीवन दर्शन कराती हैं बल्कि साथ-साथ वे हमें सचेत भी करती जाती हैं। हमारे अंदर दायित्व बोध की भावना को जाग्रत करती चलती हैं। हमारी अनुभूतियों को और संवेदनशील बनाती हैं। उनकी  जिन दो कहानियों ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया वे हैं चीफ की दावत और वाङ्चू।

चीफ की दावत कहानी में वह सब कुछ है जो एक कहानी को सच्चे अर्थों में कहानी बनाकर पाठक के मानस पटल पर हमेशा के लिए यादगार बना देता है। यह इकलौती कहानी ही उन्हें  जनसामान्य का लेखक बना देने के लिए काफी है। गर साहनी जी इस कहानी के अलावा और कुछ भी न लिखते तो भी उनकी गिनती उसने कहा था के लेखक श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की तरह ही होती। बीतते समय के साथ घर के बुजुर्ग किस तरह हाशिये पर छोड़ दिए जाते हैं इस तथ्य को बखूबी रेखांकित करती है कहानी चीफ की दावत।  लेखक ने समय की आहट को तब चीन्ह लिया था जब परिवार संस्था इतनी बिखरी नहीं थी जितनी वह आज है। इस दृष्टि से यह कहानी और प्रासंगिक हो जाती है।  इस कहानी को मैंने दूरदर्शन के नाट्य रूपांतर में भी देखा था। उसके अंतिम दृश्य में अपनी धुंधलाती आँखों से सुईं में धागा पिरोती माँ का अक्स कभी धुंधला होता ही नहीं। बहुत उम्दा नाट्य रूपांतर था वह। हर हाल में माँ बच्चे की तरक्की चाहती है। यह आस ही माँ की धुंधलाती आँखों को फुलकारी की कढ़ाई करने के लिए सुई में धागा पिरोने  को प्रेरित करती है।  

वांङ्चू चीनी बौद्ध भिक्षुक वांङ्चू से मैं की मित्रता की खूबसूरत कहानी है। इतनी खूबसूरत कि पाठक को लगता है वांङ्चू उसका ही मित्र है। और वह वांङ्चू के साथ चीन और भारत का भ्रमण  करता रहता है। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री में वांङ्चू की रूचि न होना उसकी भोली सहजता को  दर्शाता है। नीलम जब उससे प्रेम का नाटक करती है तो मैं के साथ पाठक को भी लगता है वांङ्चू  के साथ छल नहीं होना चाहिए।  कैंटीन के रसोइये के मैं के पास भाग कर आने और वांङ्चू के लिए यह कहने कि बाबू आपकी बहुत याद करते थे। पाठक  की आँखों को डबडबा  देता है। सच ही है कि पड़ोसी देशों के राजनैतिक संबंध बनें या बिगड़े इंसानियत के शाश्वत होते हैं। और समय की गति के साथ हमारी मूल धारणाएं भले ही न बदलें पर उनके आग्रह परिवर्तित होते रहते हैं।