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Wednesday 22 Nov 2017

इस यात्रा में भीष्म साहनी

केवल गोस्वामी
जे-363, सरिता विहार
मथुरा रोड, दिल्ली
भीष्म जी से कितनी बार भी मिला उनके व्यक्तित्व का एक नया रूप मेरे सामने उजागर हुआ। लगभग तीन दशक तक की निकटता में हमने अनेक यात्राएं एक साथ की। इन यात्राओं का एक काम यह हुआ कि भीष्म जी को और अधिक जानने का सुअवसर मिला, उनके कृतित्व को लेकर कभी बहसें हुर्इं, मैंने जाना कि भीष्म लेखन को और जीवन को बड़ी गंभीरता से लेते हैं इसीलिए उनके कृतित्व और व्यक्तित्व में अद्भुत समानता है जो अनायास ही दूसरों को अपनी ओर आकृष्ट करती है। उनसे बातचीत करते हुए आयु का अंतराल कभी आड़े नहीं आया। उनकी यह शिष्टता, शालीनता तथा कर्मठता, सायास नहीं अपितु उनके व्यक्तित्व का ही अभिन्न अंग है इसीलिए भीष्म जी के मित्रों की संख्या उनके विरोधियों से अधिक है।
भीष्म जी ने बताया कि उनके बचपन के दिनों में उनके घर के माहौल में बेशक कट्टरता थी। लेकिन उग्र कट्टरता नहीं थी। पिता आर्य समाजी थे और समाज सुधार की गहरी दिलचस्पी रखते थे; इसके अतिरिक्त उनके पिता की दृष्टि मध्य वर्ग के पढ़े-लिखे व्यापारी की थी। जो व्यवसायी भी है और भौतिक दृष्टि से आगे भी बढऩा चाहता है उसे मालूम है कि उसके बच्चों का भविष्य आधुनिक शिक्षा के सहारे ही उज्जवल हो पाएगा। पिता जहां अपनी बात कहते थे वहां दूसरों की सुनते भी रहे। बलराज जी से अक्सर उग्र बहसें होती थी। कभी-कभी विरोध भी होता था पर टकराव की स्थिति कभी नहीं आई। ऐसे जनतांत्रिक पारिवारिक माहौल में हम दोनों भाइयों का समुचित विकास हुआ।
बचपन को लांघ कर लडक़पन में कदम रखते हुए कब सिर से चुटिया गायब हुई, कब सिर पर थोड़े बहुत कंघी करने लायक बाल रखे जाने लगे, कब पायजामे की जगह पतलून ने ले ली, कब घर में बातचीत पंजाबी की जगह अंग्रेजी में होने लगी। चौके में खाना-खाने के बजाय परिवार मेज पर बैठने लगा। मुसलमान दोस्तों का घर में आना-जाना होने लगा। ये सब परिवर्तन समय के साथ घर में होने लगे।
बंटवारे के पश्चात माक्र्सवाद पर भी घर में चर्चा होने लगी। बलराज जी के घर छोडक़र शांति निकेतन जाने के पश्चात भीष्म जी को लगा कि उन्हें घर पर रहकर व्यापार में पिताजी का साथ देना चाहिए। व्यापार के साथ-साथ एक स्थानीय कॉलेज में अवैतनिक तौर पर पढ़ाने भी लगे और नाटक भी खेलने लगे। इससे व्यापार करते रहने की कोफ्त कुछ कम हो गई किन्तु व्यापार का तौक फिर भी दस साल तक गले में लटका रहा। देश के बंटवारे के साथ ही उससे निजात मिली।
बंटवारे के बाद भीष्म जी पंजाब के एक कॉलेज में नौकरी करने लगे; वहां उन्होंने अध्यापकों का एक संगठन बनाया जो शीघ्र ही पूरे प्रदेश का संगठन बन गया। आंदोलन भी हुए और भीष्म जी संगठन के महासचिव चुन लिए गए। उग्र गतिविधियों के कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। फिर वह जननाट्य संघ (इप्टा) में सक्रियता जुड़ गए। यहां पर भी पुलिस से लुकाछिपी चलती रही। फिर एक अन्य कॉलेज में नौकरी मिली। पांच महीने के पश्चात वहां से भी निकाले गए। उसके पश्चात पंजाब में नौकरी पाना लगभग असंभव हो गया।
भाई के द्वारा संघर्ष किए जाने पर भीष्म का रास्ता स्वत: साफ हो गया। भीष्म के मन में भाई के प्रति आदरभाव था, कहीं-कहीं उसकी निर्भीकता उसके साहस को लेकर ईष्र्या का भाव भी था। यह बात उसके दिल को घर कर गई थी कि वह एक उत्कृष्ट व्यक्ति है उसके मुकाबले में वह सर्वथा एक निष्कृष्ट व्यक्ति है। रंग-रूप को लेकर भी मन में हीनभाव पैदा होते थे। एक गोरा चिट्टा स्वस्थ और दूसरा कमजोर और बुझा-बुझा सा। अध्यापक भी प्राय: दोनों की तुलना करते हुए कहते थे- लालाजी के दोनों बेटों में नार्थ पोल और साउथ पोल का अंतर है।
भीष्म ने बताया कि बचपन में वह दब्बू हरगिज नहीं थे। काफी शरारती थे गली-मोहल्ले से जो टप्पे (लोक गीत) और गालियां सीख कर आते, उसका प्रभाव भी उनके मन पर पड़ा, भाई शरीफ समझा जाने लगा और वह आवारा, शायद इसी के कारण वह धीरे-धीरे अन्तरमुखी होते गए, जिसे घर में उनकी विनम्रता कहीं-कहीं अतिविनम्रता समझी जाने लगी। भाई को अक्सर वीर नायक की भूमिका में देखते रहने के कारण, उनकी अपनी स्वतंत्र सोच धीरे-धीरे शिथिल पडऩे लगी। पिता के साथ व्यापार में काम करते-करते जैसे उनकी भूमिका निश्चित हो गई थी पर बीच-बीच में मन में हलचलें भी उठती थी, कभी-कभी छोटे-मोटे शौक पूरे करने का भी अवसर मिल जाया करता था, जिसके लिए कभी-कभी हल्का सा विरोध भी करना पड़ता था।
उन दिनों नाटकों में लड़कियां अभिनय नहीं कर सकती थी। उनको मंच पर लाने प्रस्ताव जब भीष्म ने रखा तो कॉलेज वालों ने इंकार कर दिया। नाटक का मंचन अन्यत्र करना पड़ा बहुत बावेला मचा पर नाटक खेला गया, रावलपिंडी शहर में उन दिनों यह मामूली बात नहीं थी। उनके लिए यह भाई की , अपने कॉलेज के अध्यापकों की छाया से मुक्त होने का संघर्ष था, किसी दूसरे की भूमिका अपनाकर व्यक्ति जूझ नहीं सकता, उसे अपने बलबूते का सहारा लेना पड़ता है।
बलराज जैसा कि उनका स्वभाव था वह प्राय: भीष्म पर हावी रहते थे, झगड़ा-बहस-मुबाहिसा बहुत होता था बचपन से शुरू होकर यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा। बचपन में तो कई बार गुत्थम-गुत्था भी हो जाते थे। बलराज लंदन से लौटे तो वह माक्र्सवादी बन चुके थे, पाकिस्तान के सवाल को लेकर बड़ी बहसें होती थी; आमतौर पर एक-दूसरे को अपने विचार व्यक्त करने और दूसरे को मनवाने की कोशिश रहती थी। बंटवारे के बाद बलराज इप्टा में सक्रिय थे बाद में भीष्म भी बम्बई चले आए। यहां पर भी बहसों की गुंजाइश थी। राजनीति पर तो बहस सदा चलती रहती। बलराज जब बड़े उत्साह से पंजाबी भाषा की ओर उन्मुख हुए तो बहसों में तूफान ही आ गया। वह भीष्म पर भी दबाव डालते थे कि वह भी पंजाबी में लिखे। भीष्म सैद्धांतिक रूप से इस प्रस्ताव से सहमत हो जाते थे किन्तु व्यवहार में कदम उठाने की हिम्मत नहीं पड़ती थी।
समय-समय पर आदमी तरह-तरह के सपने देखता है पर वे तात्कालिक परिस्थितियों के साथ कहीं जुड़े रहते हैं। नाटक खेलने वालों की दृष्टि में उत्कृष्ट अभिनय करने के सपने होते हैं, एक युवा व्यापारी के मन में निरन्तर संवरते व्यक्तित्व के सपने होते हैं पर भीष्म जी ने बताया कि उनके सपने अधिकतर दिवास्वप्न हुआ करते थे, ऐसे सपने जिनसे कोई बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा छिपी हो। मैं नहीं देख पाता था अन्दर ही अन्दर यह पूर्वाग्रह छिपा बैठा था कि महत्वाकांक्षा की लम्बी-चौड़ी उड़ानें भरने से बनता कुछ नहीं धरती के साथ-साथ चलना ही बेहतर है।
साहित्य सृजन की बात चली तो भीष्म जी ने बताया घर में बलराज के कृतित्व और फुफेरी बहन सत्यवती,  पुरुषार्थवती और बहनोई चन्द्रगुप्त विद्यालंकार के लेखन का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा। स्कूल के दिनों में पहली कहानी लिखी थी। कुछ कविताएं भी जो कॉलेज की मैगजीन में छपी थी। ‘‘नीली आंखें’’ शीर्षक से पहली कहानी हंस में छपकर आई तो बड़ा प्रोत्साहन मिला, उस समय तक लगता था कि साहित्य सृजन एक कठिन क्रियाकलाप है तथा उत्कृष्ट प्रतिभा की अपेक्षा रखता है। दो कहानी संग्रह प्रकाशित हो जाने तक यह मन:स्थिति बनी रही। चेकोस्लोवाकिया की यात्रा के दौरान निर्मल वर्मा और भीष्म साहनी ने एक जगह पर स्वीकारा कि ‘‘हम न तो स्वयं को लेखक कह सकते हैं और न ही ऐसा मानते हैं।’’ ऐसी स्थिति मास्को से लौटने तक रही तत्पश्चात गंभीरतापूर्वक लिखने का दौर आरंभ हुआ।
जो साहित्य जीवन तथा उसकी विडम्बना पर आधारित होता है वह कालजयी होता है। उसमें पाठक की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। उसमें लाग लपेट नहीं होती। सीधी साफ प्रतिक्रिया होती है- भीष्म बता रहे थे लेखक को निश्चत ही अजनबी अनजान पाठकों के पत्रों से प्रोत्साहन मिलता है इसीलिए कहानी में सम्प्रेषणीयता की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। आलोचक की भूमिका दूसरे प्रकार की होती है वह अपनी साहित्यिक मान्यताओं के आधार पर रचना के गुण-दोष बता सकता है, पर रास्ता नहीं दिखा सकता। आलोचना जहां रचनात्मक धरातल पर रहती है तो साहित्य के विकास में अमूल्य भूमिका निभाती है पर फतवे देने वाली आलोचना साहित्य के विकास में साधक न होकर बाधक ही होती है। लेखक का उद्देश्य पाठक के दिल तक पहुंचना होता है। आलोचक के दिमाग तक नहीं।
भीष्म जी ने कहा- आज इत्मीनान से बैठकर लिखने की परम्परा छूटती जा रही है। साहित्य सृजन के क्षेत्र में एक प्रकार का तनाव आ गया है। इस क्षेत्र में परस्पर होड़ सदा से रही है इधर कुछ अधिक हो गई है। अधिकांश लेखक पुरस्कार एवं सत्कार पाने की जल्दी में है। एक अच्छी किताब का प्रकाशन सामाजिक घटना नहीं बन पाती यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं में नहीं है। बंगला में किसी अच्छी पुस्तक का प्रकाशन अथवा किसी अच्छे नाटक की प्रस्तुति विशाल जनसमुदाय के लिए एक सांस्कृतिक घटना बन जाती है, हमारे यहां गिने-चुने लेखकों तक सीमित रहती है।
प्रेमचंद का कथन सही है कि लेखक स्वभावत: प्रगतिशील होता है 1936 के आसपास यह दृष्टि अधिक सजग और स्पष्ट हुई। भीष्म का मानना है कि लेखकों, कलाकारों का संगठन ट्रेड यूनियनों की तरह काम नहीं कर सकता। संगठनात्मक काम की सामाजिक भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है पर ट्रेड यूनियनों का भी अनुशासन यहां न होकर आपसी सहयोग सैद्धांतिक जानकारी और लक्ष्य के प्रति निष्ठा अधिक सहायक होते हैं। विचारधारा भी तभी तक लेखक को निर्दिष्ट करती है जब तक वह लेखक के संवेदन का उसके रचनात्मक व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाए।
भीष्म का अधिकांश लेखन अतीत की पृष्ठभूमि पर हुआ, बसंती उपन्यास जरूर इसका अपवाद है। पूछे जाने पर भीष्म इसे अतीत के प्रति मोह तो मानते हैं क्योंकि वयसंधि के अनुभव दूर तक व्यक्ति के साथ चलते हैं किन्तु वह इसे अतीत के प्रति प्रतिबद्धता नहीं मानते। वह कहते हैं- बचपन की यादें, घर-परिवार के रिश्ते, दोस्तियां, मर्मस्पर्शी अनुभव ये सब याद आते हैं तो भावना के स्तर पर हम गहरे उद्वेलित हो जाते हैं, पर मैं कहूं कि पुराना वक्त लौट आए इस तरह की प्रतिबद्धता तो जहालत होगी। वह कहते हैं कि अपने अतीत को कला के क्षेत्र में निश्चत ही वर्तमान की दृष्टि से देखते हैं, अतीत से अपने लिए विषयवस्तु उठाना, अतीत के प्रति प्रतिबद्धता किसी काल विशेष से नहीं धारणाओं से होती है।
आज बहुत कुछ ऐसा घट रहा है जो हमें उद्वेलित करता है। सामाजिक जीवन में बढ़ती गुंडागर्दी, हर दिन मौत के घाट उतारे जाने वाले निर्दोष व्यक्तियों के बारे में खबरें। भावनात्मक स्तर पर हम निश्चय ही विचलित होते हैं पर उन पर अधिकार के साथ वही लिख सकता है जिसकी अनुभव के धरातल पर पकड़ मजबूत हो, किन्तु यह भी निर्णायक कारण नहीं, दृष्टि के सही रहते कल्पना की सहायता से बहुत कुछ लिखा जा सकता है।
तमस के धारावाहिक रूप में प्रदर्शित होने के संदर्भ में भीष्म जी का मानना था कि मीडिया का कमाल तो केवल इस बात में है कि वह एक ही वक्त में किसी कलाकृति को लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। उसकी इस क्षमता से इंकार नहीं। किताब केवल गिने-चुने लोगों तक ही पहुंच पाती है। तमस चूंकि हमारे सामाजिक जीवन के बेहद जख्मी पहलू को दर्शकों के सामने ला रहा था और एक सधे हुए निर्देशक के हाथों बड़े मार्मिक और रुचिपर्ण ढंग से उसे पेश किया जा रहा था और चूंकि उसमें कोई कृत्रिमता ज्यादा लाग-लपेट भी नहीं थी कि दर्शक उस सीरियल की ओर आकृष्ट हुए। भीष्म जी ने कहा- मैं नहीं मानता कि चूंकि तमस सीरियल विवाद का विषय बना इस कारण लोग इसकी ओर आकृष्ट हुए। विवाद तो दूसरी तथा तीसरी कड़ी के बाद ठंडा पड़ गया था लेकिन दर्शकों की रुचि बराबर अंत तक बनी रही।
साम्प्रदायिकता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिकता का विष वृक्ष अंग्रेजों के शासनकाल में ही बोया गया था। कम से कम साम्प्रदायिकता के उस रूप का जिसे आज हम देखते हैं पर आज तक हम इसे खत्म नहीं कर पाए बल्कि इसने पहले से भी उग्र रूप धारण कर लिया है और उसके साथ नए आयाम जुड़ गए हैं- जैसे आतंकवाद, विसर्जनवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि। फर्क यह है कि पहले तो हम इसके लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराया करते थे, अब किसे ठहराएं। पहले दंगों में तेज तलवार चलते थे अब पिस्तौल, बम और मशीनगनें चलती हैं। पहले हिन्दू-मुसलमान और सिख प्रमुख समुदाय माने जाते थे अब सम्प्रदायों की संख्या बढ़ गई है। सम्प्रदायों के अंदर भी भेदभाव बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने कहा- अकेली सरकार इसका हल नहीं निकाल सकती, अंतत: इसका हल जनसमुदाय के दबाव से ही होगा, इसलिए जरूरत है जनमत को सचेत और सक्रिय बनाने की। यदि आतंकवादियों की कोशिशों के बावजूद पंजाब में हिन्दू-सिख दंगे नहीं हुए तो इसका श्रेय मुख्यत: जनमत को ही जाता है। आज जिसे हम सरकार कहते हैं उसके अलग-अलग रूप, अलग-अलग प्रदेशों में मिलते हैं, इस राष्ट्रव्यापी समस्या का हल खोजना चाहते हुए भी सरकारों के भीतर पाए जाने वाले अन्तद्र्वंद्व और विरोधाभास उन्हें खोजने से असमर्थ बना देते हैं। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि की मिसाल हमारे सामने है।
जिन दिनों देश का बंटवारा हो रहा था और साम्प्रदायिक तत्व भडक़ उठे थे, उन दिनों भी मानवतावादी सेक्यूलर मान्यताओं में विश्वास रखने वाले लेखक साम्प्रदायिकता के विरुद्ध आवाज उठाते रहे थे। आज साम्प्रदायिकता की शक्तियां उग्र रूप धारण कर रही हंै। लोक का दायित्व इसके विरुद्ध अपनी आवाज उठाना, जनगण को सचेत करना और अपनी कला और साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों, मान्यताओं को सुदृढ़ बनाना हो जाता है।
भीष्म ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह कहानी की अपेक्षा उपन्यास के माध्यम से स्वयं को अधिक सुगमता से व्यक्त कर सकते हैं। उपन्यास में अपनी बात कहने की अधिक गुंजाइश होती है जो प्रत्येक लेखक की जीवन दृष्टि को प्रतिबिम्बित करती है। संस्कारों का दबाव लेखक पर भी उतना ही होता है जितना सामान्य व्यक्ति पर; केवल लेखक ही संस्कारों, मान्यताओं से जूझता रहता है। जिन्दगी से जुडऩे की चेष्टा करने वाला भी लेखक जैसे टकरावों का सामना अवश्य करेगा क्योंकि जीवन प्राय: संस्कारों और मान्यताओं के अनुरूप नहीं चलता और लेखक के लिए जीवन के यथार्थ का महत्व अधिक होता है
    (शेष पृ.48 पर)
(पृ.47 से जारी)
इसलिए ऐसे अवसर प्राय: आते हैं जब लेखक के लिए संस्कार बाधक होने लगते हैं इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक नहीं कि लेखक समाज के संस्कारों की अवहेलना करे या उनका उल्लंघन करे।
आधी सदी तक साहित्य के केन्द्र में रहकर पाठकों का अपूर्व स्नेह भीष्म जी ने प्राप्त किया है। अपने समकालीनों एवं परवर्ती पीढ़ी के लेखकों को अपार स्नेह सहयोग प्रदान किया है। कमलेश्वर के शब्दों में- ‘‘भीष्म साहनी को याद करने का मतलब है- उनके पूरे समय को याद करना। बीसवीं सदी पर उनका नाम इतनी गहराई से अंकित है कि उसे मिटाया नहीं जा सकता। आजादी के साथ और इक्कीसवीं सदी की 11 जुलाई 2003 तक यह नाम हिन्दी कथा साहित्य और नाटक लेखन का पर्याय रहा है। ऐसी अनोखी लोकप्रियता भीष्म साहनी ने प्राप्त की थी कि प्रत्येक तरह का पाठक उनकी रचना की प्रतीक्षा करता था। उनका एक-एक शब्द पढ़ा जाता था। किसी सामान्य पाठक से भी यह पूछने की जरूरत नहीं पड़ती थी कि उसने भीष्म की यह या वह रचना पढ़ी है या नहीं। उनकी कहानी या उपन्यास पर एकाएक बात शुरू की जा सकती थी। ऐसा विरल पाठकीय सौभाग्य या तो प्रेमचंद को प्राप्त हुआ था या हरिशंकर परसाई के बाद भीष्म साहनी को प्राप्त हुआ और यह भी विरल घटना है कि भीष्म को जो यश हिन्दी से मिला वह उनके जीवित रहते हिन्दी का यश बन गया। ऐसा दुर्लभ सौभाग्य भी किस रचनाकार को प्राप्त होती है? भीष्म जैसे कालजयी रचनाकार को कोई कैसे भुला सकता है?’’