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Saturday 18 Nov 2017

भीष्म साहनी का ऐतिहासिक बयान

केवल गोस्वामी के सौजन्य से

राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ का प्रतिद्वंद्वी संगठन बनाने की घातक कार्रवाई
हमें इस बात का अत्यधिक खेद है कि जनवादी लेखक संघ के प्रस्तावित गठन के संदर्भ में राष्ट्रीय समिति के सदस्यों के नाम जारी हमारे ‘सर्कुलर’ को कुछ क्षेत्र में गलत रूप में पेश किया गया है और उसके गलत हवाले दिए गए हैं। अत: हमारे लिए सर्वसाधारण को विश्वास में लेना और इस सम्पूर्ण ‘सर्कुलर’ को ऐतिहासिक रूप से जारी करना आवश्यक हो गया है।
नई दिल्ली 18 नवम्बर 1981
प्रिय मित्र,
आपको समाचार पत्रों की रिपोर्टों के जरिए और अन्य माध्यमों से भी पता चला होगा कि कुछ लेखक मित्रों ने जनवादी लेखक संघ के नाम से लेखकों का एक संगठन बनाने की खातिर एक घोषणापत्र का मसौदा जारी किया है। उनके इस घोषणापत्र से यह स्पष्ट उजागर होता है कि उनका यह प्रयास राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के समानान्तर और एक प्रतिद्वंद्वी संगठन खड़़ा करने के लिए ही है। उनके घोषणा पत्र के मसौदे का सम्पूर्ण-पाठ ‘लोक लहर’ में तथा उसका एक अंश ‘पीपुल्स डेमोक्रेसी’ में प्रकाशित हुआ है। इस घोषणा पत्र के मसौदे पर हस्ताक्षर करने वालों ने 29 नवम्बर 1981 को दिल्ली में एक बैठक करने की तथा बाद में एक सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है। हमें यह गंभीर आशंका है कि इन लेखक मित्रों का एक समानान्तर और एक प्रतिद्वंद्वी संगठन खड़ा करने का यह कदम बढ़ती हुई वामपंथी और जनवादी एकता की मौजूदा प्रक्रिया पर चोट पहुंचाएगा और लेखकों के दिलो-दिमाग में भ्रम पैदा करेगा, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के असर से अधिकाधिक संख्या में हमारे संगठन में शामिल हो रहे हैं, जैसा कि जबलपुर के राष्ट्रीय महासम्मेलन तथा डाल्टनगंज और लखनऊ के राज्य सम्मेलनों से भी स्पष्ट प्रमाणित होता है। यह वामपंथी और जनवादी एकता भी इस वक्त समय का जबरदस्त तकाजा है। इन मित्रों के घोषणापत्र के मसौदे में यह कहा गया है कि प्रलेस का हालांकि आकाादी के पहले एक गौरवशाली अतीत रहा है लेकिन यह संगठन (प्रलेस) वस्तुत: अब अस्तित्व में ही नहीं रह गया है। इसकी एक वजह तो यह बताई गई है कि 1947 के बाद घटित होने वाले सामाजिक और अर्थिक परिवर्तनों के बारे में इसके नेतृत्व की गलत समझदारी रही है तथा दूसरी वजह यह कि इसके नेतृत्व ने आपात स्थिति के दौरान गलत रुख किया, जिसकी वजह से वह एकदम अलग-थलग पड़ गया। इन दोनों वजहों से ये मित्र यह निष्कर्ष निकालते हैं कि अब एक शून्य पैदा हो गया है जिसे भरने की जरूरत है तथा इसीलिए इस अभाव की पूर्ति की खातिर ही जनवादी लेखक संघ की स्थापना की जा रही है। यह सरासर तथ्यों की गलत बयानी और उन्हें तोड़-मरोडक़र पेश करना ही है। हम यह दावा तो नहीं करते कि हमारा संगठन शुरू से ही लगातार जबरदस्त तरीके से सक्रिय रहा है। लेकिन जिन गलतियों और कमियों के कारण हमारे संगठन को नुकसान उठाना पड़ा है, उसके लिए भी तो हम सभी ही जिम्मेदार हैं। उन लोगों के साथ ही जो इस घोषणापत्र के मसौदे के लेखकों में है। हमारे आंदोलन के प्रारंभिक दौरों के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं, क्योंकि तब हम सभी साथ मिलकर ही काम कर रहे थे। चालीस वाले दशक के उत्तराद्र्ध और पचास वाले दशक के शुरू में प्रगतिशील लेखक संघ को कमजोर करने के लिए जो शक्तियां जिम्मेदार रही हंै, उन्हें प्रस्तावित जनवादी लेखक संघ में और राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ में भी- दोनों जगह भली-भांति देखा जा सकता है।
यह कहना सरासर कीचड़ उछालने की हरकत ही है कि प्रगतिशील लेखक आंदोलन और उसका नेतृत्व आजादी के बाद की अवधि के परिवर्तनों का मूल्यांकन करने में विफल रहा है। हमारा आंदोलन निरंतर जनसाधारण के ध्येयों के साथ और उनके लिए सदैव सक्रिय रहा है।.... हमने विश्वशांति की रक्षा के आंदोलन में, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में, और अफ्रीकी-एशियाई एकजुटता आदि तमाम ऐसे आंदोलनों में मूल्यवान पहलकदमी की है।  यहां तक कि आपात स्थिति के दौरान भी बहुत सारे प्रगतिशील लेखकों को दमन का सामना करना पड़ा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना पड़ा। ....प्रसंगवश यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जनवादी लेखक संघ के घोषणापत्र के मसौदे पर प्रारंभिक हस्ताक्षरकर्ताओं में (जिनके नाम से उसे जारी किया गया था) कुछ ऐसे लोग भी है जिन्होंने घृणित आपात स्थिति का समर्थन किया था इनमें से एक ने तो सत्ताधारी पार्टी की सेवा करने की खातिर पद्मश्री का सम्मान तक हासिल किया था। और 1975 में गया महासम्मेलन के बाद से हमारे संगठन का सम्पूर्ण देश में, खासतौर से उत्तरी भारत में तेजी से फैलाव और विकास हुआ है तथा आज हमारे संगठन की भारत के सभी राज्यों में अत्यंत सक्रियतापूर्वक क्रियाकलाप करने वाली इकाइयां और शाखाएं हैं। ...
इस वक्त जबकि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां प्रगतिशील लेखकों की और भी मजबूत और व्यापक एकता की मांग कर रही है, राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के समानान्तर एक प्रतिद्वंद्वी संगठन खड़ा करने का हर एक प्रयास प्रगतिशील लेखकों के ध्येय को भीषण नुकसान पहुंचने वाला है।
जनवादी लेखक संघ बनाने वाले राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के जबलपुर सम्मेलन में निर्धारित रुख से भले ही अपने गंभीर मतभेदों की बात करें और उन्हें दर्शाने का प्रयास करे, उनके घोषणापत्र के मसौदे को देखने पर तो यही प्रदर्शित होता है कि उसमें प्रतिबिम्बित प्रमुख मसलों पर तकरीबन कोई मतभेद नहीं है। लेकिन जिन महत्वपूर्ण और अहम् मसलों पर उनका घोषणापत्र एकदम चुप्पी साधे हुए है, यह गंभीर चिंता की बात हो सकती है। मिसाल के लिए, मसौदे में शाांति के लिए चलाए जा रहे विश्वव्यापी संघर्ष में शामिल होने की जरूरत के बारे में बिलकुल चुप्पी साध ली गई है,...दूसरे एक अन्य महत्वपूर्ण मसले, जिस पर घोषणापत्र का मसौदा चुप्पी साधे हुए है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के साथ संघर्ष करने की जरूरत। राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ का यह दृढ़ मत है कि आर.एस.एस., विचारात्मक तौर पर और संगठनात्मक दृष्टि से भी एक अद्र्धफासिस्ट संस्था है जो कि हमारे देश में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियावाद के गठबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र बिन्दु बन चुकी है। ...जो लेखक समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की अवधारणाओं में विश्वास रखते हैं, उन सभी लेखकों के लिए हमारे संगठन के द्वार सदैव खुले हैं। जिन मित्रों को हमारी नीतियों और हमारे कार्यक्रम के बारे में कभी कोई शंकाएं और कोई गलतफहमियां रही हैं अथवा अभी भी है उन सभी मित्रों के साथ हम सदैव खुले दिल से बहस करते रहे हैं और हम अभी भी इसके लिए तैयार हैं। हमने हमेशा अपने मंचों पर बहस-मुबाहिसों व अन्य क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए धर्मनिरपेक्ष और जनवादी लेखकों को आमंत्रित किया है और भविष्य में भी हम ऐसा करना जारी रखेंगे। हम जनवादी लेखक संघ के अपने मित्रों से अपील करते हैं कि वे प्रगतिशील लेखकों की पांतों में फूट न डालें। सभी धर्मनिरपेक्ष भावनाओं वाले, जनवादी लेखकों के लिए एक साथ मिलकर शिरकत करने और एकताबद्ध संगठन में, नेतृत्व में भागीदारी करने तक की पूरी-पूरी गुंजाइश है। एकताबद्ध संगठन के इतिहास, उसकी परम्परा और उसकी विरासत को ही आत्मसात करके राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ चल रहा है। हम इन सभी मसलों पर बहस करने के लिए और उन सभी मित्रों के जो इस आंदोलन की दिल से भलाई चाहते हैं उन्हें यथासंभव स्थान देने तक के लिए तैयार हैं।
मैंने बड़े विस्तार में जाकर लिखा है क्योंकि अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट करने के लिए यह जरूरी था। राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ का सचिव मंडल महासंघ की राष्ट्रीय समिति के सदस्यों, राज्य स्तरीय समितियों और महासंघ से संबंधित स्थानीय संगठनों से अपील करता है कि वे इस घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें तथा सभी वामपंथी और जनवादी ताकतों को साथ लेकर जैसा कि वे पहले भी करते रहे हैं अपने संगठन का विस्तार करना जारी रखें। कृपया अपने क्षेत्र के लेखकों, खासकर नौजवान पीढ़ी के लेखकों से संवाद शुरू करें, इस गहराते हुए संकट की घड़ी में जबकि देश में अलगाववादी ताकतें गड़बड़ी फैलाने का प्रयास कर रही हैं तथा साम्राज्यवादी और उनके प्रभुतावादी सहयोगी पृथ्वी पर परमाणु संहार का खतरा पैदा कर रहे हैं ऐसी नाजुक घड़ी में सभी प्रगतिशील लेखकों की एकता की जबरदस्त जरूरत के बारे में उन्हें समझाएं।
कृपया हमें लिखें, अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के बारे में हमें जानकारी देते रहें।
आपका साथी
भीष्म साहनी
महासचिव, राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ
हमें पता चला है कि इस नए संगठन के गठन का फैसला लिया जा चुका है। जाहिर है कि यह संगठन एक समानान्तर संगठन के रूप में कार्य करेगा तथा हमें यह भी आशंका है कि इसमें वामपंथी और जनवादी लेखकों की एकताबद्ध करने की प्रक्रिया ध्वस्त होगी। हमें इस बात का अत्यंत खेद है कि एक प्रतिदं्वद्वी संगठन खड़ा न करने की हमारी अपील निष्फल गई। लेकिन इस घटनाक्रम को दृष्टिगत रखते हुए भी जनवादी लेखक संघ के अपने मित्रों से हम एक बार पुन: अपील करते हैं कि वे ऐसे कदम उठाएं जिससे समान विचारों वाले लेखकों के बीच मुठभेड़ की नहींसहयोग की परिस्थितियां पैदा हों, ताकि प्रगतिशील जनवादी लेखन के महान ध्येय और भी जबर्दस्त ढंग से आगे बढ़ाएं जा सकेें तथा वामपंथी और जनवादी एकता को मजबूत किया जा सके।
नोट : आज जब आरएसएस तथा उसकी शाखाएं देश की गंगा जमुनी संस्कृति को ध्वस्त करने के लिए आक्रामक  रुख अपनाए हुए है, वामपंथी एकता के लिए इस बयान के माध्यम से पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है अत: इसका मूल पाठ सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है।