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Tuesday 21 Nov 2017

नाटककार को सूत्रधार की तरह होना चाहिए ( दूरदर्शन के लिए किए गए लंबे साक्षात्कार के संपादित अंश)

कमल कुमार

डी-38, प्रेस एनक्लेव,

नई दिल्ली-110017

मो. 9810093217

आपने कई विधाओं में लिखा। ‘तमस’ आपकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना है। इस उपन्यास पर आपको साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था। इस उपन्यास पर फिल्म बनी, टीवी धारावाहिक- दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारित हुआ। तो भी फिल्म और धारावाहिक पर इसका विरोध हुआ और इसके विरोध में आंदोलन भी हुए। ऐसा क्यों?

 तमस विभाजनपूर्व पंजाब में सांप्रदायिक विद्वेष, हिन्दू-मुसलमानों के बीच बढ़ती खाई की तार्किक कहानी है। यदि हम अपने इतिहास से नहीं सीखते तो उसका परिणाम आने वाली पीढिय़ां भोगती हैं। विशेष रुप से आम नागरिक, निर्दोष, गरीब और असहाय लोग, व्यक्ति, परिवार और समाज सभी स्तरों पर इसके दुष्परिणाम के शिकार होते हैं।

आप पर आरोप था कि आपने हिन्दुओं की भावनाओं को आघात पहुंचाया था। आपने मुसलमानों का पक्ष लिया था। आप कम्युनिस्ट विचारधारा के हैं इसलिए दंगों को रोकने में आपने कम्युनिस्टों की भूमिका मानी?

 मेरा वतन रावलपिंडी रहा है। मैंने इस त्रासदी को स्वयं देखा है और भोगा भी है। यह उपन्यास विभाजन की भयावहता का जीवंत दस्तावेज है। आजादी हमें किस कीमत पर मिली? हमारा वतन छूटा, रिश्ते टूटे, हम अपने वतन से अपने लोगों से अलग होकर यहां आ गये थे। खाली मन, खाली हाथ, बिखरे, उजड़े और लुटे हुए। इसलिए ‘तमस’ के माध्यम से मैंने साम्प्रदायिक शक्तियों का विरोध किया। यह भी बताया कि जनून के सामने विवेक परास्त हो जाता है। विभाजन में हुए नरसंहार से आत्मा दहल जाती है। आजादी तो मिली पर भयंकर नरसंहार, विस्थापन और विद्वेष की आग से गुजरकर, स्त्रियों की इज्जत लूटी गई। मैं मानता हूं कि यह सबसे भयंकर मानवीय त्रासदी थी। यह उपन्यास मेरे अपने अनुभवों और स्मृतियों के आधार पर लिखा गया था। यह भी सच है कि कल्पना में हम उपन्यास में वर्णित घटनाओं, पात्रों और स्थितियों के विस्तार में और विवरणों में यथार्थ से भी आगे निकल जाते हैं। विभाजन की विभीषिका ने रचनाकारों के मन मस्तिष्क को झकझोर दिया था। इसीलिए खुशवंत सिंह ने ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ और ‘सूखा बरगद’ जैसे उपन्यास लिखे। देश के बंटवारे ने लोगों के मनों को भी अलगा दिया। विभाजन पर लिखे जा रहे साहित्य पर अलग से गहराई से विचार करने की जरुरत है।

‘मय्यादास की माड़ी’ में आपने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना में अपने ही लोगों के स्वार्थ और विश्वासघात को कारण माना है।

 यह सही है। अनेक देशी शासकों और सेनापतियों ने अपने ही लोगों के विरोध में अंग्रेजों का साथ दिया और अपनों के साथ विश्वासघात किया। ‘मय्यादास की माड़ी’ में इतिहास का यही प्रसंग है। पंजाब में अंग्रेजों ने वहीं के सिक्ख सेनापतियों के कारण युद्ध जीता था। उन्होंने अपने ही सिक्खों के विरोध में अंग्रेजों की मदद की थी। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें ऊंचे पदों पर नियुक्त किया। लेकिन लाखों निर्दोष सिक्ख सैनिक इस युद्ध में मारे गए थे। इस उपन्यास में एक सच्चाई और भी है कि आम आदमी को, किसी की सत्ता हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसकी जिंदगी वैसी ही चलती रहती है। जो सत्ता में आता है जनता उसी के सामने सिर झुका देती है।

 भीष्म जी आप नई कहानी पत्रिका के संपादक भी थे। आप स्वयं भी कहानी लेखक थे। आपने बहुत सी कहानियां लिखीं। ‘चीफ  की दावत’ विशेष रुप से चर्चित हुई।

कहानी जीवन के जटिल यथार्थ का व्यापक चित्रण होती है। मैंने अपनी कहानियों में मध्यवर्ग का संसार ही रचा है। आप ‘चीफ  की दावत’ की बात कह रही हैं। मध्यवर्गीय महत्वाकांक्षा की विसंगतियों की यह कहानी ‘अपिटोम’ है। मध्यवर्ग में ऊंचे उठने की लालसा, तीव्र होती जा रही है। जैसे भी हो, चाहे रिश्तों की कीमत पर ही हो। इससे भी अधिक पीड़ादायक है, हमारे घरों में बुजुर्गों की स्थिति। उनका अनादर उन्हें घर का फालतू सामान समझकर घर के किसी कोने किनारे में डाल देना। उनके प्रति संवेदनहीनता। शामनाथ के घर में चीफ  की दावत है, अफसर घर आ रहा है। इसलिए बूढ़ी कुरुप मां को घर के पीछे एक तरह से छिपा दिया जाता है। सोचिए, शामनाथ को कोने में थकी सोई मां पर गुस्सा आता है। फिर चीफ  के सामने मां के प्रति अमानवीय व्यवहार। चीफ  को खुश करने के लिए मां को गाना गाने के लिए कहना, हो सकता था शाम नाथ मां को नाचने के लिए भी कह देता। चीफ  के कला प्रेम के लिए मां के हाथ की बनी पुरानी फुलकारी दिखाता है। जिसे चीफ इस कलात्मक फुलकारी को अपने साथ ले जाता है। आखिर मां ही चीफ  का दिल जीतने का माध्यम बनीं। परंतु शामनाथ के मां के प्रति इस व्यवहार को क्या क्षमा किया जा सकता है? नहीं! परंतु रिश्तों की विसंगति देखिए सारा अपमान सहने के बाद भी मां बेटे के उज्जवल भविष्य की कामना करती है। कमल, बचपन में मां ने एक कहानी सुनाई थी। एक युवक अपनी प्रेमिका के कहने से मां का दिल निकाल कर प्रेमिका के पास ले जाता है। रास्ते में उसे ठोकर लगती है। मां के दिल से आवाज़ आती है, ‘बेटे चोट तो नहीं लगी’। कितनी मार्मिक और आहत करने वाली सच्चाई है।

आपकी कृतियों में ‘संदेश’ नहीं होता। जो भी आप ‘कहना’ चाहते हैं कृति में घटनाओं, स्थितियों, प्रसंगों और संवादों के माध्यम से संप्रेषित होता है।

कमल, लेखकों को, विशेष रुप से नाटककार को एक सूत्रधार की तरह ही होना चाहिए। ‘तमस’ उपन्यास का नाट्यरुपातंरण हुआ और मंचन हुआ। मेरी मान्यता है कि नाटक में कही बात अधिक लोगों तक पहुंचती है। दर्शक के भीतर गहरे उतरती है। साहित्य से आगे सामान्यजनों तक बात पहुंचती है।

भीष्मजी ‘तमस’ हो, ‘कबिरा खड़ा बाजार’ में ‘हानूश’ या ‘माधवी’ सब के मूल में एक सत्य है राजनीति और धर्म दोनों की ‘सत्ता’ अपने अहंकार में विनाशकारी सिद्ध होते हैं। ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ और ‘हानूश’ के कोतवाल द्वारा इसी मूल मंत्र का ऐलान किया गया है कि मजहब के नाम पर सल्तनतें बनती हैं और सल्तनतों के साये में मजहब फलते-फूलते हैं। यह सामंतशाही का भी सत्य है और आज की राजनीति का भी यही यथार्थ है। आज राजनीति में पार्टियां ‘धर्म’ और साम्प्रदायिकता के नाम पर राजनीति कर रही हंै। आपके इस स्थिति पर क्या विचार हैं?

आपने अभी जो कहा वही सत्य है। मेरे नाटक तमस या हानूश या ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ हो या फिर ‘माधवी’ हो। सभी में इसी सत्ता की राजनीति पर प्रहार है। ‘तमस’ में इस धर्म की राजनीति का भयावह शिखर है। ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ की कई आवृत्तियां हुईं। रंगमंच की दृष्टि से सफल रहा। दर्शकों ने इसे सराहा पर इसका भी विरोध हुआ। वैसे ही जैसे उस सामंतशाही युग में कबीर का विरोध हुआ। कबीर को चेतावनी दी गई थी कि ‘राजा चाहे हिन्दू हो पर उसके कोतवाल तुर्क है। तुम्हें कुचल देंगे। तुम हो क्या एक जुलाहा? कबीर प्रजातांत्रिक सोच के व्यक्ति थे। सत्ता के विरुद्ध विशेष रुप से धार्मिक सत्ता, धर्म के आडम्बर, ढोंग, धर्म के नाम पर ठगी, सबका विरोध किया। उनका मानना था ‘मजहब’ इंसानों के बीच का आपसी सद्भाव नष्ट कर रहे हैं। कबीर की बात जनता तक पहुंचती हैं। जनता भी कबीर के दोहों को दोहराती है। उनकी बातों को अपनाती है। इसलिए उनकी आवाज़ समूह की, समाज की आवाज़ बन जाती है। इसलिए सिकन्दर लोदी भी कबीर को एक फरमान जारी करके विवश लौट जाते हैं। कबीर ने हिम्मत से उनके सामने कहा था ‘क्यों ब्राह्मण का बेटा तिलक लगाकर पैदा नहीं होता? क्यों तुर्क खतना कराकर पैदा नहीं होता? ईश्वर इंसानों में भेद नहीं करता’। कबीर के साथ समाज जुड़ गया था। यह नाटक इसी युग चेतना की प्रस्तुति है।

आप कबीर से बहुत प्रभावित रहे हैं।  कबीर को युग चेतावनी ‘मशाल’ रूप में माना गया था!

आप सही कह रही है। कबीर ने धार्मिक पाखण्ड का विरोध किया और समाज में एक क्रांतिकारी सोच का प्रसार किया। ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ आपातकाल के 4-5 सालों बाद आया था जो जनतंत्र के संघर्ष का अग्रदूत बना। इसका तब भी विरोध हुआ पुलिस भी आई पर उन्हें समझा कर भेज दिया गया था।

‘हानूश’ एक घड़ीसाज ‘हानूश’ के बारे में एक किवदंती है। उसको ही आपने इसकी कथा का आधार बनाया है। इसमें भी सत्ता के अहंकार को ही व्यक्त करते है।

 सही है, ‘प्राग’ के ‘हानूश’ मीनारी घड़ी बनाने वाले की कहानी है। इस कहानी ने मुझे पीड़ा दी थी। कलाकार के सृजन को भी सामंतशाही अपनी निजी सम्पत्ति मानती है। ताजमहल बनाने वाले शिल्पकारों के राजा ने हाथ कटवा दिये थे। ताकि वे ऐसा दूसरा ताजमहल न बनवा दें।

आप मेरे भीतर की गहरी पीड़ा की ही बात कह रहे हैं। ताजमहल जब भी देखा, मुझे उसमें कभी ‘सौन्दर्य’ नहीं दिखा उन शिल्पियों का चीत्कार ही सुनाई दिया।

ऐसी ही कहानी हानूश की भी है। हानूश जिसने 17 वर्ष तक दिन रात मेहनत करके मीनारी घड़ी बनाई। घर में पत्नी और बच्चे अभाव में जीने को विवश हुए। उसका श्रम सार्थक हुआ। घड़ी बन गई। उसकी सराहना भी हुई। उसको सम्मानित भी किया गया। परंतु तानाशाह के गरूर की वीभत्स नीचता, उसने हानूश की आंखे फुड़वा दी ताकि वह ऐसी दूसरी घड़ी न बना सके। इससे भी यथार्थ का एक और रूप कि उसकी पत्नी हानूश के साथ देश छोडक़र जाने से इंकार कर देती है क्योंकि राजा की सहायता से उसके घर का खर्चा चल रहा था। ऐसा यथार्थ कि इंसान की आत्मा तक कांप जाए। हानूश की मनस्थिति भी गहरे आघात से विचलित, सोचता है इस घड़ी को नष्ट कर दें परंतु नहीं। अंत में मैंने एक रास्ता निकाला। हानूश अपने कुछ सहयोगियों की सहायता से देश छोडक़र चला जाता है। ‘घड़ी का भेद’ अपने अन्तस में अपने साथ ले जाता है। राजा को एक चेतावनी देकर, ‘घड़ी बंद भी हो सकती है। घड़ी बनाने वाला मर भी सकता है। घड़ी बनाने का भेद उसके साथ ही रहेगा’। यह कलाकार की ललकार है। यह एक सृजक की आश्वस्ति है। भीतर से वह जानता है कि घड़ी बंद नहीं होगी। हानूश एक स्वाभिमानी, एक सच्चा सृजक है। सृजन नहीं मरता कभी भी, न उसका कोई स्वाभिमान नष्ट कर सकता है।

आप ‘माधवी’ के माध्यम से क्या कहना चाहते थे?

‘माधवी’ की कथा के माध्यम से इसी सच को सामने रखा है कि आज भी औरतें ‘माधवियां’ अपनी संकल्पहीनता में पुरूषों द्वारा छली जा रही हंै। इस समय आवश्यकता है कि स्त्रियां धर्मग्रंथों, शास्त्रों, पुराणों की स्त्री सोच से बाहर आएं। ययाति माधवी का पिता दानशीलता में विश्वविख्यात होने के लिए अपनी पुत्री का दान विश्वामित्र के शिष्य गालव को कर देता है। गालव गुरूदक्षिणा चुकाने के लिए उसे तीन राजाओं के पास पुत्र पैदा करने के लिए भेजता है। अक्षत कौमार्य के वरदान के साथ। इस सारी प्रक्रिया में माधवी अपनी अंतरात्मा के विरोध में यातना झेलती है। मन से विदीर्ण, अवसादग्रस्त और उद्विग्नता से बेचैन मातृत्व के लिए तरक्की है। अपना कार्य पूरा कर गालव के पास लौटती है। ढली देह, लावण्यहीन, परंतु प्रसन्न। गालव उसे दिये गये अक्षत कौमार्य के वरदान की याद दिलाता है परंतु वह इससे इंकार कर देती है। उसने तो गालव से एकनिष्ठ प्रेम किया आखिर अब उसी के साथ तो रहना है। पर गालव बहाने बनाता है। गुरू के आश्रम में रहने वाली स्त्री को अपनी पत्नी कैसे मान ले। माधवी वहां से लौट जाती है। गालव से कहती है, तुमने एक ही व्यक्ति से प्रेम किया, वह थे तुम, सिर्फ  अपने आप से। माधवी कहती ‘मैं तुम्हें नहीं पहचान पाई। मेरे लिए यह सब एक दु:स्वप्न था। मेरे चारों ओर राक्षस घूम रहे थे। कत्र्तव्यपरायण दानव। देखो ये तीनों राजा मेरे बच्चों के साथ स्वयंवर के लिए आए हैं। माधवी वहां से चली जाती है। वह पुरूष प्रपंच से परिचित हो चुकी थी। समूची नारी जाति को सचेत करती है कि उसने यदि इस पुरूष पति के अन्याय का विरोध किया होता तो उसके जीवन की यह दुर्दशा न हुई होती। कैसे पुरूषों ने अपने को दानवीर, गुरूभक्त, कत्तव्र्यनिष्ठ सिद्ध करने के लिए उसका ‘उपयोग’ किया। सभी उसके मानव अस्तित्व से बेपरवाह क्रूर और निर्मम थे। इसमें स्त्रीमन की सघन संवदेनात्मक जीवन दृष्टि व्यक्त होती है। वह यह भी जान गई कि गालव का अर्थ ही होता है ‘निचोडऩे वाला’। गालव ने उसके जीवन को भी अंतिम रूप तक निचोड़ा अपने आत्मदंभ, हठ और कुत्सित गुरू भक्ति के लिए। इसीलिए वह गालव के कहने से ‘अक्षत यौवना’ होने के वरदान का आह्वान नहीं करती। वह गालव को उसकी आंतरिक दरिद्रता और परास्त होने और पछताने के लिए छोड़ कर चली जाती है। धर्मशास्त्रों, पुराणों, शास्त्रों में स्त्री पिता, पुत्र, प्रेमी का आदेश पालन करती विवश स्त्री थी। या तो वह उसके लिए ‘भोग’ की साम्रगी थी या उसकी सेवा में गृहिणी। पुरूष उसे अपनी ‘सम्पत्ति’ समझता था। इसलिए माधवी कहती है ‘गालव जहां तुम्हारी यात्रा का अंत होगा वहीं से मेरी यात्रा अब शुरू होगी’। यह स्त्री विमर्श का महाभाष्य क्यों नहीं हो सकता? आपको एक प्रसंग ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’ में भी बताना चाहता हूं। कबीर की स्त्रीवादी दृष्टि भी उनकी सामाजिक धार्मिक दृष्टि की तरह प्रजातंत्रात्मक थीं। लोई, उनकी पत्नी कबीर से कहती है कि वह साहूकार के लडक़े से प्रेम करती है और वह भी उससे प्रेम करता है और उसे ब्याह करना चाहता है। कबीर उसकी बात मान लेते हैं और लोई चली जाती है। लेकिन फिर लौट आती है। कबीर पूछते है तो वह कहती है- नहीं वह अब उसी के साथ रहेगी। लोई कबीर के साथ रहती है। कबीर ने उससे कोई पुरूषवादी सवाल नहीं पूछा। इसलिए ‘माधवी’ में जो व्यक्त हुआ वह इतिहास का सच है। इतिहास का यह सच स्त्रियां बदले, अपना रास्ता बनाए जिनमें वे स्वयं अपना सम्मान करें और असंगत और अन्याय का विरोध करें।