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Monday 20 Nov 2017

सार्थक लेखन के धनी भीष्म साहनी

जीवन सिंह ठाकुर

422, अलकापुरी, देवास (म.प्र.) 455001

 मो. 94240-29724

शहीद भगत सिंह के जन्म के आठ बरस बाद ‘भीष्म साहनी’ का जन्म हुआ था। भीष्म साहनी के जन्म के पूर्व 1905 बंगाल का विभाजन, 1905 गांधी जी का हिन्द स्वराज, 1907 रवीन्द्रनाथ टैगोर का ‘गौरा’ सामने आ चुका था। 1906 में साम्राज्यवाद और कट्टर धर्मांध साम्प्रदायिकता के गठजोड़ से ‘लीग’ का जन्म ‘ढाका’ में हुआ था। ‘दो राष्ट्रवाद’ की जहरबुझी सैद्धांतिकी गढ़ ली गई थी।

1906 के नकली, जहरभरे भारतीय कौम के बंटवारे ने पूरी सदी को अपनी गिरफ्त में ले लिया। एक बेहतरीन राष्ट्रीयता, दो धार्मिकताओं के खूनी कत्लोगारद में तब्दील कर दी गई। बेमिसाल सामाजिक सौहाद्र्र भरे देश को साम्राज्यवाद की भट्टी का ईंधन बना डाला।

इसी दौर के भारतीय वातावरण में 1915 में भीष्म साहनी का जन्म हुआ। इंसान का जन्म सार्थक तब होता है जब मृत्यु तक उसका रचनाकर्म, उसकी सृजनशील भूमिका, उसका उत्तरदायित्वपूर्ण जीवन, इन्हीं सभी तरह की जीवनदायी विधाओं से उसका जन्मदिन, जन्मवर्ष यादगार बनता है। भीष्म साहनी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सोवियत क्रांति (1917) के दौर में पैदा हुए थे। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति अपने इतिहास, अपने वर्तमान, अपने सामाजिक भविष्य से अलहदा नहीं रह सकता। किसी भी लेखक का यह दायित्व भी बन जाता है कि वह 1906 में पैदा की गई साम्प्रदायिकता, और राष्ट्र, समाज विभाजन की बुनियाद को समझे और अपने संघर्ष के लिए कटिबद्ध हो। भीष्म साहनी ने युग के लेखकीय उत्तरदायित्व को पूरी शिद्दत से स्वीकारा था।

स्व. भीष्म साहनी प्रगतिशील धारा के सर्वमान्य लेखक थे। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की शुरूआत हो गई थी। लेकिन अपने एक साक्षात्कार में, जो उन्होंने 1982 में दिया था, कहा था ‘‘1936 में प्रगतिशील लेखक सम्मेलन हुआ लेकिन वहां से प्रगतिशील लेखन की शुरूआत हुई हो ऐसा मैं नहीं मानता। हमारी प्राचीन मानवतावादी परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में ही समाजोन्मुख होने लगी थी। आदर्शवादी पुट देर तक बना रहा, लेकिन सामाजिक चेतना निश्चय ही बढऩे लगी’’ इसी साक्षात्कार में भीष्म साहनी ने आगे कहा था  ‘‘इसके पीछे सचेत प्रयास भी थे और वातावरण में पाई जाने वाली एक नई दायित्व भावना भी थी। इसे नवजागरण काल कहना गलत न होगा। इसमें प्राचीन संस्कृति का गौरवज्ञान भी था। समाज में पाई जाने वाली कुरीतियों, कुप्रथाओं की कटु आलोचना भी थी और आगे बढऩे, उन्नति करने की एक राष्ट्रव्यापी भावना भी थी। देशप्रेम भी था।’’ (केवल गोस्वामी  द्वारा 1982 में लिए गए साक्षात्कार से साभार)

कई मायनों में भीष्म साहनी अपने विचारों, अपने लेखन में अपने द्वारा लिखे गए पत्रों में साहित्य, संस्कृति, समाज के बुनियादी तथ्यों के प्रति सजग रहते थे। लेखक बुनियादी तौर से संस्कृति, भाषा, समय का प्रवक्ता ही नहीं वरन उसके रचनात्मक विकास, उसके परिष्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भीष्म साहनी ने अपनी सांस्कृतिक एवं युग की चुनौतियों को स्वीकार करके अपनी पीढ़ी और अगली पीढ़ी के लिए विरासत का मार्ग भी प्रशस्त किया।

स्व. भीष्म साहनी ने अपनी एक ऐसी भूमिका भी चुनी थी जो अपने देश के समाज, उसके स्वतंत्रता संग्राम को सांस्कृतिक परिदृश्य में देखती है। उसके साम्राज्यवाद विरोधी-जनवादी आंदोलन को सशक्त तरीके से रेखांकित करती है। आमतौर से विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद की शोषणकारी, सर्वग्रासी रणनीतियों के खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष को उचित मूल्य नहीं मिला है। जबकि भारतीय जनता ने समग्र विश्व की तरफ से सर्वथा अनूठा, रचनात्मक संघर्ष किया है। तत्कालीन सोवियत रूस के नेताओं के बयान, लेखकों की किताबों में भारत की महान भूमिका को तहेदिल से स्वीकारा है। 1980 में भीष्म जी ने ‘‘संस्कृतियों का मिलन’’ पुस्तक का संपादन येव्गेनी चेलीशेव, आन्ना देख्तयार के साथ किया था।

इसमें सम्पादकीय टिप्पणी के साथ एक अध्याय भी लिखा था। ‘‘भारत-सोवियत मैत्री की नींव’’ (पृष्ठ 194) इसमें भीष्म साहनी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, उसके नेताओं की गहरी सृजनशीलता भूमिका को रेखांकित किया है। उक्त पुस्तक के दूसरे पैरा में भीष्म जी ने स्वामी विवेकानंद को रेखांकित किया है ‘‘स्वामी विवेकानंद का यह कथन सुविदित है कि संसार के सभी देशों में मेहनतकशों का राज होगा। परंतु बहुत कम लोग ही जानते हैं कि अपनी मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने रूस को ही वह देश बताया था, जहां से वह भावी क्रांति आएगी, जो मानव जाति के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात करेगी।’’

उपरोक्त कथन स्वामी विवेकानंद ने तब कहा था जब 1905 और 1908 की रूसी क्रांति का अता-पता नहीं था। 1917 तो अभी दूर था। भीष्म साहनी ने जनवादी संघर्ष में केवल लेखन या साहित्य के रुढ़ अर्थों तक अपने को सीमित नहीं रखा, उन्होंने भारतीय और शेष विश्व की जनता के सांस्कृतिक परिवेश और जनहित के संघर्षों के प्रति अपना जवाबदारीपूर्ण दायित्व भी निभाया है।

भीष्म साहनी ने अपने इस अध्याय में लोकमान्य तिलक के बारे में लिखा है ‘‘1907 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने आंदोलन की रूसी विधियों पर विचार किया। जुलाई 1908 में लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के विरुद्ध बम्बई में छह दिन की आम हड़ताल हुई। मुंबई के तत्कालीन गवर्नर क्लार्क ने साफ-साफ यह कहा कि बम्बई में आम हड़ताल ‘एक रूसी विधि है’ जिसे तिलक की पार्टी ने अपनाया है।’’ (पृष्ठ 195)

स्व. भीष्म साहनी ने अपनी लेखनी में गांधी जी और विख्यात विचारक एवं साहित्यकार लेव तोलस्तोय (टॉलस्टॉय) के आपसी विचारों, उनके पत्र व्यवहार का जीवंत चित्रण किया है। ये पत्र रूस तथा भारत की वैचारिक यात्रा को समझने में महत्वपूर्ण हैं। भीष्म साहनी की प्रगतिशीलता नि:संदेह 1917 की सोवियत क्रांति से प्रभावित रही। लेकिन अपनी या कथित प्रगतिशीलों के विचारों के पूर्व भी हमारे भारतीय चिंतन में यह धारा रही है- इसे साहनी जी ने स्वीकारा था। इसी कारण वे ‘वाद’ को समझने, शोषणमुक्त समाज बनाने की विकास की धारा में उसकी भूमिका को देखते थे लेकिन ‘वाद’ या विचारधारा के रुढ़ अर्थों में भीष्म जी कभी गुलाम नहीं रहे। स्वयं लेनिन भी अपने वक्त में विश्व के आंदोलनों, क्रांति के अध्ययनों में उसके विश्लेषण में इस नतीजे पर पहुंचे थे कि तात्कालीन देश, समाज और समाज में बदलाव की चेतना ही क्रांति के स्वरूप को तय करती है। बात भी सही है, प्रेमचंद से प्रसाद तक, प्रसाद से निराला तक, रवींद्र, बंकिम, काजी नजरुल इस्लाम से फणीश्वरनाथ रेणु तक- आदि-आदि लेखकों में भारतीय चेतना का क्रांतिकारी स्वरूप बहुत ही स्पष्ट है। भले ही दिखावे में उन्होंने कोई ‘वाद’ का झंडा नहीं थामा था। लेकिन रचनाएं स्वयं इंसानी दुनिया की संघर्षशीलता को उजागर करती हंै।

भीष्म साहनी का ‘तमस’ 1906 में विभाजन के बीज के परिणामों का भीषण प्रतिफल है। तमस हमें 1857 से 1947 के लगभग एक पूरी शताब्दी में झांकने, उसे समझने का अवसर देता है। क्या हम नहीं देख रहे हैं कि 1947 के बाद भी पाकिस्तान, भारत में खूनखराबे और घृणा रुकी है? ‘तमस’ जैसी रचनाएं इस समाज को, इस राजनीति को बार-बार आगाह करती है। इसी संदर्भ में मैंने भीष्म साहनी जी को पत्र लिखा था। उसका उत्तर उन्होंने 17.7.1984 के पत्र में दिया। जो उनके प्रभावी विचारों को बेलाग प्रस्तुत करता है। ऐसे ही ‘तमस धारावाहिक’ के संदर्भ में उन्हें लिखा जिसका जवाब उन्होंने 11.9.86 के पत्र में दिया था। दूसरा पत्र 1988 का है। जिसमें तमस का जिक्र किया है।

‘मोहन जोशी हाजिर हो’ फिल्म में भीष्म साहनी जी ने बेहद प्रभावी भूमिका निभाई थी। भारतीय न्याय व्यवस्था का विद्रूप और उसमें पिसते हुए सामान्य लोगों का जीवंत अभिनय भीष्म जी ने किया था। इस बाबत उन्हें पत्र लिखा था इसका उत्तर 28.2.1985 के पत्र में उन्होंने दिया।

उनकी रचनाओं पर पाठकों के पत्र और उसमें निहित समीक्षा को उन्होंने सदा पसंद किया और जवाबदारी से उसकी कैफियत भी दी। ‘‘नौसिखुआ’’ कहानी पर मैंने कहा था कि इस कहानी में विस्तार की आवश्यकता थी, आपने उसे झटके से समाप्त कर दी। जवाब में उन्होंने स्वीकारा (28.12.1985) कि ‘‘बेशक कहानी को ज्य़ादा फैलाव की जरूर थी मैं आपसे सहमत हूं।’’

भीष्म जी में एक जुझारू लेखक था तो करुणा, स्नेह, अपनेपन का सोता भी बहता था। पत्रों में अपनी नई रचना का जिक्र भी करते जैसा ‘‘नीलू, नीलिमा, नीलोफर’’ उपन्यास के प्रकाशन (राजकमल से) के बारे में बताया। मेरे जैसे अदने, लेखक की रचनाएं जो उन्हें कभी पढऩे को मिलती तो पत्र लिखकर बताते कि ‘‘आपके लेख, कहानी, पढऩे को मिलते हैं, आग्रह से पढ़ता हूं।’’ मुझे उनकी यह पंक्तियां सुकून से भर देती थी।

जब ‘‘ईस्ट पटेल नगर’’ वाले घर से सुजानसिंह पार्क वाले घर में आए तो बाकायदा पत्र लिखकर सूचना दी। साथ दो फोन नं. दिये, आग्रह से लिखा दिल्ली आओ तो जरूर मिलना। आत्मीयता से सराबोर इंसान उनमें हिलोरें लेता था। आज भीष्म साहनी हमारे बीच नहीं है। उनके जन्म और मृत्यु के बीच पूरी एक शताब्दी फैली हुई है। जिसमें गुलाम भारत और स्वतंत्र भारत का इतिहास भी है। साहित्य के दोनों पक्ष स्वतंत्रता के पूर्व तथा पश्चात मौजूद हैं। भीष्मजी इन दोनों बिन्दुओं के बीच समर्थ लेखक रहे हैं। प्रेमचंद की जमीन को ज्यादा उर्वरक बनाने में भीष्म साहनी का बेहद विनम्र लेकिन दृढ़ सार्थक योगदान रहा है।

भीष्म जी की नम्रता उनके व्यक्तित्व का बेहद सुदृढ़ पक्ष था। वे अपने विचारों के दायरे से किसी को नकारते नहीं थे। वे उसे सहमत करते यदि सहमति न भी हो तो संवाद का मार्ग बनाए रखते। यह उनके भाषणों, लेखों, साक्षात्कारों में सहज देखा जा सकता है। उन्होंने कहा था ‘‘लेखक का संवेदन अपने समय के यथार्थ को महसूस करना और आंकना है। उसके अंतद्र्वन्द्व और अन्तर्विरोध के प्रति सचेत होना है। इसी दृष्टि से उसकी पकड़ समाज के भीतर चलने वाले संघर्ष पर ज्यादा मजबूत होती है और परिवर्तन की दिशा का भी उसे भास होने लगता है। इसी के बल पर यह (लेखक) राजनीति से आगे होता है पीछे नहीं।’’ (केवल गोस्वामी को दिये साक्षात्कार से- 1982) ‘चीफ की दावत’ का मध्यवर्ग, उसकी स्थिति का चित्रण, ‘बसंती’ की वह खुरदरी जमीन, कबिरा खड़ा बाजार में, निशाचर, भटकती राख और भी अन्य रचनाओं में भीष्मजी ने अपने भारतीय समाज, उसके संघर्ष और जीवन मूल्यों की गहरी पड़ताल करते हुए गहरी मुठभेड़ भी की। भीष्म जी ने गुलामी से स्वतंत्रता तक एक सचेत इंसान की तरह एक विचार, एक व्यापक सपना देखा था कि हम सौहार्द्रपूर्ण, मूल्य आधारित, समतामूलक, समाज का निर्माण कर सकें जहां बराबरी और हंसी मुस्कान से भरे घर-आंगन हो, गरिमा के साथ ‘स्त्री-पुरुष’ जी सके, विश्व सौहाद्र्र में उसके विकास में भारत अपना बहुमूल्य योगदान कर सके। इस सपने को साकार करने और उस नई दुनिया बनाने का सपना आज भी जीवित है- वह सपना न थका है न मरा है... ‘भीष्म साहनी’, जीवित हैं- हमारे साथ हंै। फिर भी उन्हें याद करके उनके पत्र पढ़ते हुए, आज मेरा दिल भारी है, आंखें नम हैं...।