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Tuesday 21 Nov 2017

तमस: उपन्यास का सिनेमाई रूपांतरण

जवरीमल्ल पारख

मानविकी विद्यापीठ,

इग्नू, मैदानगढ़ी,

नयी दिल्ली-110068

मो. 09810606751

प्रगतिशील आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ और हिंदी के महान कथाकार भीष्म साहनी (1915-2003) का यह शताब्दी वर्ष है। वे आजादी से पहले कांग्रेस के सदस्य रहे और बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। भीष्म साहनी का मुख्य रचना क्षेत्र कथा साहित्य था। प्राय: उनकी सभी रचनाएं काफी चर्चित रहीं लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा ख्याति ‘तमस’ से मिली जिसका प्रकाशन 1973 में हुआ था और जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। ‘तमस’ पर प्रख्यात फि़ल्मकार गोविंद निहलानी (जन्म: 1940) ने लगभग पांच घंटे लंबी इसी नाम की फिल्म का निर्माण किया था जो 1986 में दूरदर्शन पर चार भागों के धारावाहिक के रूप में दिखायी गयी थी। टीवी धारावाहिक के रूप में ‘तमस’ काफी चर्चित हुआ लेकिन कुछ स्थानों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़़े संगठनों ने विरोध प्रदर्शन भी किये और तोडफ़ोड़ भी की गयी।

विभाजन की त्रासदी ‘तमस’

‘तमस’ सांप्रदायिक उन्माद और उसके पीछे की राजनीति को उजागर करने वाला ऐसा उपन्यास है जिसकी रचना विभाजन के लगभग ढाई दशक बाद हुई थी लेकिन जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। ‘तमस’ विभाजन से ठीक पहले पंजाब के उस हिस्से की कहानी कहता है जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बना और जहां से हिंदुओं और सिखों को अपना घरबार और काम-धंधा छोडक़र भागना पड़ा था। विभाजन के समय होने वाले दंगों में हजारों-हजार हिंदू, मुसलमान और सिख मारे गये थे, औरतें बेवा हो गयीं, उनकी इज्जत लूटी गयीं, बच्चे अनाथ हो गये, परिवार बिखर गये, लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन किया गया और इस तरह मानव इतिहास में शायद पहली बार लाखों-लाख लोगों को उन जगहों से उजड़ जाना पड़ा जहां वे कई-कई पीढिय़ों से रहते आये थे। ‘तमस’ इसी भयावह त्रासदी की कहानी कहता है।

स्वयं भीष्म साहनी पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर के रहने वाले थे और विभाजन के समय तक उनका घर परिवार वहीं था और विभाजन से पूर्व वहां की राजनीति में भी कांग्रेस के कार्यकत्र्ता के रूप में उन्होंने सक्रिय भाग लिया था इसलिए विभाजन उनके लिए कोई सुनी-सुनाई कहानी नहीं थी बल्कि देखी-भोगी त्रासदी थी। जिस रावलपिंडी से उनका और उनके परिवार का कई पीढिय़ों से संबंध था, वह हमेशा-हमेशा के लिए छूट गया था। ‘तमस’ का कैनवास काफी बड़ा है। ‘तमस’ की कथा दो स्तरों पर चलती है। एक राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में और दो, इन राजनीतिक घटनाओं के कारण जनता को जिन भयावह त्रासदियों में से गुजरना पड़ा उसकी कथा के रूप में। पहले स्तर पर घटनाएं उस शतरंज के खेल की तरह हमारे सामने आती हैं जिसका मुख्य कैप्टन और निर्णायक अंग्रेज है जो इस शतरंज के खिलाडिय़ों को अपनी इच्छा के अनुसार खेलने को मजबूर करता है जबकि खिलाड़ी यही समझते हैं कि वे अपने मोहरे अपनी मर्जी से चल रहे हैं। इनमें ऐसे खिलाड़ी भी हैं जो अंग्रेजों की चालबाजी को जानते हैं लेकिन अपनी राजनीतिक मजबूरी के कारण चुप हैं और उनका प्रत्यक्ष विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं, तो कुछ खिलाड़ी ऐसे हैं जिनके लिए अंग्रेजों की यह भूमिका अपने पक्ष मेें नजर आती हैं और इस तरह वे अपनी पूरी ताकत दूसरे पक्ष को किसी भी तरीके से परास्त करने में झोंक रहे हैं। जाहिर है कि राजनीति की इस शतरंज के प्यादे देश की जनता है जो इस खेल में चली जाने वाली चालों के कारण भयावह त्रासदी में से गुजरने के लिए मजबूर हैं।

उपन्यास की शुरुआत नत्थू नामक एक दलित द्वारा सूअर के मारे जाने से होती है। एक सरकारी कारिंदा मुराद अली उससे यह काम कराता है और इस काम के लिए उसे पांच रुपये देता है। पांच रुपये उस जमाने में एक दलित के लिए बहुत बड़ी रकम है। उसे नहीं मालूम कि जब मरे हुए सूअर आसानी से मिल सकते हैं तब एक जिंदा सूअर को क्यों मरवाया जा रहा है। लेकिन जब सुबह ही सुबह नत्थू के द्वारा मारा गया सूअर शहर की मस्जिद की सीढिय़ों पर पड़ा मिलता है तो उसे समझ आ जाता है कि उससे सूअर क्यों मरवाया गया है। जाहिर है मस्जिद के बाहर मरा हुआ सूअर का मिलना सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए पर्याप्त है। यह सांप्रदायिक आग लगाने के लिए सोच-समझकर डाली गयी चिंगारी है। सूअर को मरवाकर मस्जिद की सीढिय़ों पर डालने की साजिश अंग्रेज करते हैं लेकिन वे कभी सामने नहीं आते। उसे क्रियान्वित करने का काम एक मुसलमान कारिंदा मुराद अली करता है जो एक दलित की मदद से सूअर मरवाता है और एक ईसाई दलित कालू के हाथों मस्जिद की सीढिय़ों पर डलवाता है। यह पूरा घटनाक्रम उस सत्य को सामने लाता है कि दंगे होते नहीं करवाये जाते हैं। तब अंग्रेज ऐसा करते थे तो आज भी दंगों के पीछे राजनीतिक ताकतें ही होती हैं। दंगा चाहे 1984 का हो या 1992-92 या 2002 का।

सूअर की मौत का बदला गाय मारने से लिया जाता है। अनाज मंडी में आग लगा दी जाती है और शहर में हुआ दंगा धीरे-धीरे गाँवों में फैल जाता है। लोगों को अपना घरबार छोडक़र भागने के लिए मजबूर किया जाता है। इस आग को रोकने के लिए कांग्रेस और कम्युनिस्टों की पहल पर सभी राजनीतिक दलों के लोग डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड के पास पहुंचते हैं तो वह अपने हाथ खड़े कर देता है। प्रतिनिधिमंडल डिप्टी कमिश्नर को सुझाव देता है कि शहर में कफ्र्यू लगा दे, या फौज बुलाले और कुछ नहीं तो एक हवाई जहाज ही शहर के ऊपर से उड़ा दे तो लोगों में दहशत कम होगी और दंगाई डर के शांत हो जाएंगे। लेकिन रिचर्ड उन्हें अमन कमेटी बनाने की सलाह देता है। यह अमन कमेटी तब बनती है जब सांप्रदायिकता की आग से शहर और गाँव जल चुके होते हैं और विडंबना यह है कि इस अमन कमेटी में भी नारे लगाने का काम वही मुराद अली करता है जो सरकार का कारिंदा है और जिसने ही इस आग को फैलाने के लिए चिन्गारी का इंतजाम किया था।

इस आग को फैलाने में सांप्रदायिक संगठनों की भी अहम भूमिका है। ‘तमस’ में भीष्म साहनी ने हिंदू सांप्रदायिक संगठनों की सोच और कारगुजारियों का विस्तार से वर्णन किया है। किस तरह धर्म और धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल सांप्रदायिक जहर फैलाने के लिए किया जाता है, इसको सत्संग के बाद होने वाली गुप्त बैठक और उसमें वानप्रस्थी जी द्वारा हिंदुओं को एकजुट होने का आह्वान करना और अपनी रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र एकत्र करने के लिए उकसाने की कोशिश में देखा जा सकता है। और इसके लिए मुसलमानों द्वारा इस तरह की कोशिशों का हवाला दिया जाता है। मुसलमान भी जामा मस्जिद में बैठकें कर रहे हैं। वे भी लाठियाँ, भाले और दूसरे असला इक_े कर रहे हैं। चूंकि मुसलमान ऐसा कर रहे हैं इसलिए हिंदुओं को भी ऐसा करना चाहिए। और ठीक ऐसा ही तर्क मुसलमान भी देते हैं। इस तरह दोनों तरफ  अविश्वास और नफरत जो कभी भी हिंसक टकराहटों में बदल सकती है, के लिए जमीन तैयार होने लगती है। उस बैठक में जब एक सुझाव यह आता है कि डिप्टी कमिश्नर से जाके मिलना चाहिए और जब यह बताया जाता है कि एक वफ़्द (प्रतिनिधि मंडल) डिप्टी कमिश्नर के यहां मिलने भी चला गया है तो उस पर प्रतिक्रिया आती है कि वह वफ़्द क्या करेगा? हिंदुओं-सिखों को अलग से जाकर मिलना चाहिए। उसे तो यह बताना है कि देखो मुसलमान क्या कर रहे हैं, अगर मुसलमान भी साथ होंगे तो तुम डिप्टी-कमिश्नर को क्या कह सकते हो? यह सारा काम कांग्रेसियों ने बिगाड़ा हुआ है। उन्होंने ही मुसलों को सिर पर चढ़ा रखा है। (तमस, पृ. 63)। सांप्रदायिकता का पूरा आधार दूसरे धर्मावलंबियों के प्रति गहरी नफरत का भाव होता है और इतिहास की गलत समझ। रणवीर नामक युवक को मास्टरजी इतिहास और धर्म की एक मिथ्या चेतना देता है और उसी का परिणाम है कि वह अपने ही पड़ोसियों और मित्रों को ‘म्लेच्छ’ और अपना धर्मशत्रु समझने लगता है। म्लेच्छ यानी मुसलमान और उनके बारे में मास्टरजी अपने शिष्यों को बताते हैं, म्लेच्छ तो गंदे लोग होते हैं, म्लेच्छ नहाते नहीं, पाखाना करके हाथ नहीं धोते, एक-दूसरे का झूठा खा लेते हैं, समय पर शौच नहीं जाते। (वही, पृ. 67)। इस तरह की शिक्षा का नतीजा है कि रणवीर को हर मुसलमान ऐसे शत्रु के रूप में दिखायी देता था जिसका वध करना धर्म का कार्य था। इस शिक्षा का ही नतीजा होता है कि ये युवक गली में इत्र बेचने वाले एक बूढ़े मुसलमान को सुनसान सडक़ पर घात लगाकर मार डालते हैं।

सांप्रदायिकता का यह जहर मुसलमान समुदाय में भी कम नहीं है। यही कारण है कि विभाजन के इस भयावह दौर में जहां मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां कई निरपराध और निरीह हिंदुओं और सिखों को जबरन मुसलमान बनाने की कोशिश हुई। ऐसी ही कोशिश सरदार हरनाम सिंह के बेटे इकबाल सिंह के साथ भी होती है जिसे जबरन मुसलमान बनाया जाता है। देवदत्त और मीरदाद जैसे कम्युनिस्ट अपने ही जमातों में अजनबी बना दिये गये हैं। मीरदाद जब मुसलमानों को समझाने की कोशिश करता है कि अगर हिंदू-मुसलमान-सिख मिल जाते हैं, उनमें इत्तहाद हो जाता है तो अंग्रेज की हालत कमजोर पड़ जाती है। अगर हम आपस में लड़ते रहते हैं तो उसकी हालत मजबूर बनी रहती है (वही, पृ. 181)। लेकिन सांप्रदायिक तनाव के दौर में जब दोनों ओर से एक दूसरे के विरुद्ध हिंसक वारदातें हो रही हैं तो ऐसी बातें कोई सुनना नहीं चाहता इतिहास की सांप्रदायिक चेतना उन पर हावी होने लगती है और इस तरह के तर्क सामने आते हैं, हमारा अंग्रेजों ने क्या बिगाड़ा है ओये? हिंदू-मुसलमान की अदावत पुराने जमाने से चली आ रही है। काफिर काफिर है और जब तक दीन पर ईमान नहीं लायेगा, वह दुश्मन है। काफिर को मारना सवाब है। (वही, 182)। अगर तुलना करें तो दोनों ओर की सांप्रदायिकता एक सी ही नफरत की भाषा बोलती है। उन्माद में यह भूल जाते हैं कि हिंसा से हिंसा ही पैदा होती है और उसका शिकार हमेशा कमजोर और लाचार लोग होते हैं। धार्मिक उन्माद के शिकार वे भी हैं जो स्वयं तो दंगों में भाग नहीं लेते लेकिन जो या तो चुपचाप ऐसा होते हुए देखते रहते हैं या दंगाइयों के लिए नैतिक और भौतिक समर्थन जुटाने में सक्रिय रहते हैं।

इनके विपरीत नत्थू है जो यह जानकर कि उसका मारा सूअर मस्जिद की सीढिय़ों पर फेंककर शहर में सांप्रदायिकता की आग लगायी गयी है, ग्लानि और पश्चाताप से भर जाता है। वह सामान्य नहीं रह पाता। उसे हर समय यही लगता है कि इस आग के लिए कहीं न कहीं वह भी जिम्मेदार है। उसकी इस बेचैनी को उसकी पत्नी भी महसूस करती है। ‘तमस’ में सांप्रदायिक हिंसा के कई भयावह दृश्य हैं। ‘तमस’ सांप्रदायिकता की इस आँधी में इंसानियत और भाईचारे के उन प्रसंगों को भी सामने लाता है जो बताते हैं कि उन्माद के इस दौर में भी कुछ लोग न सिर्फ संयम रख पाते हैं बल्कि जहां साधारण हिंदुओं और मुसलमानों ने खतरा उठाकर भी एक दूसरे की जान बचाने या उनकी मदद करने की कोशिश की है।

उपन्यास के रूप में ‘तमस’ एक सुगठित उपन्यास है। यह ‘झूठा सच’ की तरह बहुत विशाल उपन्यास नहीं है लेकिन इसमें जिन घटनाओं और प्रसंगों को शामिल किया गया है उनका विस्तार से वर्णन किया गया है। कई ऐसे प्रसंग जो पाठकों के दिल को दहला सकते थे और उनकी चेतना को झकझोर सकते थे, वे अपेक्षित असर पैदा नहीं कर पाते। भीष्म साहनी सांप्रदायिकता के दौर में अलग-अलग वर्गों, समुदायों और भिन्न-भिन्न सोच वाले लोगों की मानसिकता के कई भिन्न-भिन्न और जटिल रूपों की पहचान करने में कामयाब हैं और उन्हें उपन्यास की कथा संरचना में उपयुक्त स्थलों पर शामिल करने में भी सक्षम नजऱ आते हैं। लेकिन उनका रचनात्मक रूपांतरण करने में वे हर जगह कामयाब नहीं हुए हैं। इत्र-फुलेल बेचने वाले मुसलमान की हत्या का प्रसंग हो, या कुएँ में गिरती औरतों का प्रसंग वहां जैसा भयावह बिंब निर्मित होना चाहिए था, वैसा नहीं हो पाता। ऐसा लगता है जैसे कुछ अनबना रह गया है। उनकी भाषा में रवानगी है। पात्रों और स्थितियों के अनुसार भाषा रची गयी है। लेकिन हर कहीं वर्णनात्मकता हावी हो जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उपन्यास का महत्त्व कम हो जाता है। दरअसल, उपन्यास का कथ्य विभाजन को समझने की दृष्टि से ही नहीं आजादी के बाद सांप्रदायिक ताकतों की कारगुजारियों को समझने की दृष्टि से भी बहुत प्रासंगिक है। ‘तमस’ में जिस हिंदू संगठन की सोच और कारगुजारियों का वर्णन किया गया है लेकिन जो उपन्यास के केंद्र में नहीं है। वह अब भारतीय राजनीति के केंद्र में है। पिछले तीन दशकों में जिस तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले हुए हैं उसने देश के तानेबाने को एक बार फिर खतरे में डाल दिया है। मुसलमानों को म्लेच्छ समझ कर उनकी हत्या को धर्म समझने वाले संगठन आज देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। ऐसे समय ‘तमस’ की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। उपन्यास के रूप में भी और फि़ल्म के रूप में भी।

‘तमस’ का सिनेमाई रूपांतरण

‘तमस’ में विभाजन की जिस भयावह त्रासदी की कहानी कही गयी है उसे ही गोविंद निहलानी ने एक लंबी फि़ल्म बनाने के लिए चुना है। भीष्म साहनी की तरह गोविंद निहलानी का संबंध भी अविभाजित हिंदुस्तान के उस हिस्से (सिंध प्रांत के शहर कराची में उनका जन्म हुआ था) से था जो बाद में पाकिस्तान बना और उनके परिवार को भी पाकिस्तान छोडक़र भारत आना पड़ा।

विभाजन इतनी बड़ी त्रासदी था कि उस पर साहित्य की रचना बहुत स्वाभाविक बात है और ऐसा हुआ भी। लेकिन हिंदुस्तानी सिनेमा जो लोकप्रिय मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम था, उस पर कोई उल्लेखनीय फि़ल्म विभाजन के लगभग ढाई दशक तक नहीं बनी। विभाजन पहली बार ‘गर्म हवा’ (1973) के माध्यम से सिनेमाई पर्दे पर एक भयावह त्रासदी के रूप में सामने आया। इस फि़ल्म में बलराज साहनी ने मुख्य भूमिका निभायी थी लेकिन उनके जीते जी फिल्म का प्रदर्शन नहीं हो सका। ‘गर्म हवा’ के लगभग तेरह साल बाद ‘तमस’ को दूरदर्शन पर धारावाहिक के रूप में दिखाया गया। 1986 से पहले 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगे हो चुके थे जिसमें कई हजार लोग मारे गये थे। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनाव में जब राजीव गांधी भारी बहुमत से जीतकर आये और इस जीत में हिंदू सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का भी हाथ था, इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कथित रामजन्म भूमि का ताला खोले जाने की मांग करते हुए देशव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया। शाहबानो मामले में कांग्रेस सरकार मुस्लिम तत्ववादियों को तुष्ट करते हुए मुस्लिम स्त्री के अधिकारों को पहले ही कुचल चुकी थी और अब हिंदू सांप्रदायिक तत्वों को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने ‘राम जन्म भूमि’ के ताले भी खुलवा दिये। इस तरह देश भर में सांप्रदायिक माहौल बद से बदतर होता गया। इस स्थिति में ही गोविंद निहलानी ने ‘तमस’ पर फि़ल्म बनाने का निश्चय किया। यह सांप्रदायिक उन्माद के विरुद्ध संघर्ष में एक फि़ल्मकार का सकारात्मक हस्तक्षेप था।

‘तमस’ की पटकथा गोविंद निहलानी और भीष्म साहनी ने मिलकर तैयार की थी। इसलिए यह माना जा सकता है कि उपन्यास से फि़ल्म में जो भी रूपांतरण हुए उसमें भीष्म साहनी की भी सहमति रही है। मोटे तौर पर फि़ल्म उपन्यास पर आधारित है और अधिकतर घटनाएं और पात्र भी वे ही हैं जो उपन्यास में हैं। गोविंद निहलानी ने भीष्म साहनी की दो कहानियों को भी फिल्म में शामिल किया है जो बंटवारे को लेकर लिखी गयी थीं। लेकिन फिल्म में उपन्यास के कुछ प्रसंगों को छोड़ भी दिया गया है जैसे सरदार हरनाम सिंह के बेटे इकबाल सिंह के प्रसंग को पूरी तरह छोड़ दिया गया है।  इसी तरह एक ब्राह्मण माता-पिता की बेटी प्रकाशो को भी उसका पड़ोसी अल्लाहरक्खा उठाकर अपने घर ले जाता है और उसे अपनी पत्नी बना लेता है। इस प्रसंग का उल्लेख तो फिल्म में आया है लेकिन इतना ही कि प्रकाशो के माता-पिता शरणार्थी कैंप में है और यह जानते हुए कि मुसलमान उसे ले गये होंगे और उसका धर्म भ्रष्ट कर चुके होंगे, उसको दुबारा हासिल करने का कोई प्रयत्न नहीं करते। इन दोनों प्रसंगों का फिल्म में नहीं लिया जाना सोद्देश्य है। स्पष्ट ही इस तरह की बहुत सी घटनाएं विभाजन के दौरान हुई हैं, यह एक सच्चाई है और एक लेखक के नाते उसका बयान करना भी जरूरी था। लेकिन जब ‘तमस’ पर फि़ल्म बनाई जा रही थी, उस समय इन प्रसंगों को शामिल किया जाना मुसलमानों के विरुद्ध भावनाएं भडक़ाने का हथियार बन सकता था। जबकि आजादी के बाद और खास तौर पर 1980 के बाद से भारत में दंगे एकतरफा हुए हैं और उनमें मुस्लिम अल्पसंख्यकों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ है। यह सिलसिला अब भी थमा नहीं है।

फि़ल्म में कुछ पात्रों के नाम भी बदले गये हैं। उपन्यास में कम्युनिस्ट नेता का नाम देवदत्त होता है जबकि फिल्म में इकबाल। इस पात्र को हिंदू की बजाए मुसलमान बना दिया गया है। उपन्यास में देवदत्त के माता-पिता का भी उल्लेख है लेकिन फि़ल्म में इकबाल के परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया गया है। उपन्यास में इत्र-फुलेल बेचने वाले बूढ़े मुसलमान की छूरा घोंपकर हत्या इंद्र नामक युवक द्वारा कराई गई है लेकिन फि़ल्म में यह कृत्य भी रणबीर के द्वारा ही कराया गया है। इसी तरह शाहनवाज के हाथों उपन्यास में एक अन्य पात्र रघुनाथ के नौकर मिलखी को मरवाया गया है जबकि फिफल्म में शाहनवाज सेठ लक्ष्मीनारायण के नौकर ननकू को मारता है। ये ऐसे परिवर्तन है जिनसे उपन्यास की मूल संरचना में कोई ऐसा बदलाव नहीं हुआ है जो फि़ल्म के कथानक को उपन्यास में निहित मकसद से दूर ले जाता हो। इतना अवश्य है कि उपन्यास में कथानक का फैलाव या अधिक पात्रों का होना उतनी मुश्किलें पैदा नहीं करता जितना कि फिल्म में कर सकता है। ‘तमस’ फिल्म का कथानक उपन्यास की तरह गठित है।

फि़ल्म में जो सबसे बड़े परिवर्तन किए गए हैं वे हैं, नत्थू (ओम पुरी) और उसकी पत्नी कर्मो (दीपा शाही) की कहानी और हरनाम सिंह (भीष्म साहनी) और नत्थू का भी उसी गुरुद्वारे में पहुंचना जहां हरनाम सिंह की बेटी जसबीर कौर (उतरा बावकर) भी है जो बाद में अन्य स्त्रियों के साथ कुएं में कूद कर आत्महत्या कर लेती है और अंत में इन्हीं हरनाम सिंह, उसकी पत्नी बंतो (दीना पाठक) और नत्थू की पत्नी कर्मो का शरणार्थी कैंप में पहुंचना जहां कर्मो एक बच्चे को जन्म देती है। उपन्यास में नत्थू और उसकी पत्नी भी होती है और सुअर को मारने और उसको मस्जिद के सामने फेेंके जाने को लेकर जो अपराधबोध उसमें होता है, वह फि़ल्म में भी दिखाया जाता है। उपन्यास में इस बात का भी उल्लेख है कि नत्थू भी अंत में मर जाता है। लेकिन कैसे, यह नहीं बताया गया है। लेकिन फिल्म में नत्थू की कहानी को बढ़ा दिया गया है और उसे एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग बना दिया गया है। फि़ल्म में नत्थू की एक बूढ़ी मां भी है। रास्ते में मां मर जाती है और अपनी पत्नी को लेकर वह दर-दर भटकता है और अंत में उसी गुरुद्वारे में शरण लेता है जिसमें हरनाम सिंह और उसकी पत्नी बंतो भी शरण लेते हैं। जब मुसलमानों से बात करने के लिए छोटा ग्रंथी जाता है, तो उसकी रक्षा के लिए नत्थू को साथ भेजा जाता है और वहां छोटे ग्रंथी के साथ-साथ नत्थू भी बलवाइयों के हाथों मारा जाता है, बाद में उसकी लाश शरणार्थी कैंप में मिलती है।

जिन लोगों ने उपन्यास भी पढ़ा है और फि़ल्म भी देखी है, उनमें से बहुत से लोगों का मानना है कि उपन्यास की अपेक्षा फि़ल्म बहुत अधिक शक्तिशाली है। यह बहुत स्वाभाविक है। बहुत सी साहित्यिक रचनाओं पर बनने वाली फि़ल्में उतनी प्रभावशाली नहीं होती और इसका उलट भी सही है। कई साधारण सी रचनाओं पर भी बहुत प्रभावशाली फिल्में बनी हैं। लेकिन इन दोनों बातों से अलग यह भी सही है कि कुछ ऐसी उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाएं भी हैं जिन पर प्रभावशाली फि़ल्में बनी हैं। दरअसल सिनेमा और साहित्य दो बिल्कुल भिन्न कला माध्यम हैं और एक माध्यम की रचनागत उत्कृष्टता को दूसरे माध्यम में रूपांतरित करते हुए उसकी उत्कृष्टता भी रूपांतरित हो जाए, यह आवश्यक नहीं है। जिस तरह उपन्यास सिर्फ घटनाओं, प्रसंगों और पात्रों का विवरण मात्र नहीं होता। लेखक उन्हें उनकी भावनाओं, अंतद्र्वंद्वों और अंतर्विरोधों के साथ चित्रित करता है, और ऐसा करने के लिए उसका माध्यम भाषा बनती है। ठीक उसी तरह फि़ल्म में भी फि़ल्मकार को ऐसा ही करना होता है। वहां भी एक-एक शॉट ऐसे चित्र की तरह हमारे सामने आता है कि उसकी प्रभावोत्पादकता उसीसे निर्धारित होती है। जिस समय गुरुद्वारे से जसबीर कौर दूसरी औरतों का नेतृत्व करते हुए कुएं में खुदकुशी करने के लिए ले जाती है, तब का पूरा दृश्य और उससे पहले गुरुद्वारे में उसके द्वारा गाया गया भजन एक ऐसे दहशत भरे माहौल को पैदा करता है कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इसी घटना को उपन्यास में पढ़ते हुए भयावहता का एहसास तो होता है लेकिन फि़ल्म की तुलना में वह भयावहता काफी फीकी नजऱ आती है।  फि़ल्म में पूरा प्रसंग जिस दहशत को पैदा करता है उसे निर्मित करने में अभिनय, छायांकन, ध्वनि और गायन सभी का सामूहिक योगदान होता है। तनाव भरे माहौल में जब जसबीर कौर की अकेली गूंजती हुई आवाज सारे वातावरण में छा जाती है:

जो लड़े दीन के हेत सूरा सोई

पुरजा-पुरजा कट मरे

कबहू न छांड़े खेत...

इस भजन को गाने के बाद वह उठ खड़ी होती है और एक जोशीला भाषण वहां मौजूद औरतों को देती है:

गुरु की सिंहनियो, तुर्क आ गये...

हमारे लिए हुकम आ गया है...

शेरनियो मेरे साथ आओ...

‘बोले सो निहाल’ की गूंज के साथ वह शेरनी की तरह निकल पड़ती है। गुरुद्वारे के बाहर चांदनी छिटकी हुई है। उस चांदनी रात में कतार बनाकर जाती हुई ये औरतें रात के उस मोहक दृश्य को तनाव से भर देती हैं जिसे और गहरे धुएं के बादल कर देते हैं जो घरों के जलने से पैदा हुए हैं। जसबीर के चेहरे पर जो चमक नजऱ आती है वह दूसरी औरतों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रेरित करती है। छोटे-छोटे बच्चों वाली माएं भी उसका अनुगमन करते हुए कुएं की पाज तक पहुंच जाती है। सबसे पहले जसबीर कौर अपनी कमर में बंधी कटार पर हाथ रखे कुएं की पाज पर जा खड़ी होती है। कैमरा नीचे से उस दृश्य को फिल्माता है आकाश तक फैला उसका दृढ़ व्यक्तित्व जसबीर कौर के चेहरे की चमक और उसके पक्के इरादे को गगनचुंबी ऊंचाई देता प्रतीत होता है। जसबीर कौर एक क्षण को पाज पर रुकती है और दूसरे ही क्षण वह कुएं में कूद जाती है। कोई आवाज नहीं आती। उसके बाद दूसरी औरत, फिर तीसरी औरत, बच्चों वाली माएं बच्चों को गोद में लिए या उन्हें पहले धक्का देते हुए एक-एक कर कुएं में कूद जाती है। फिर चारों ओर एक गहरा सन्नाटा छा जाता है।

‘तमस’ में ऐसे कई दृश्य हैं जिनको शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। ‘तमस’ का पहला ही दृश्य जिसमें नत्थू एक बाड़े में सूअर मारने की कोशिश करता है, पूरी फि़ल्म के मिजाज को तय कर देता है। इसी तरह सुनसान गली में रणबीर द्वारा बूढ़े मुसलमान को छूरा घोंपने का दृश्य या फि़ल्म का आखिरी दृश्य जब लाशों की कतार के बीच में अपने पति को ढूंढती कर्मो और उसके पीछे गहरे काले बादल। लगता है जैसे उस अंधकार को ही मूर्तिमान कर दिया गया है, जिसने इस देश को ऐसी त्रासदी में धकेल दिया है। उस अंधकार को जिस पर उपन्यास का और फि़ल्म का भी नामकरण हुआ है, तमस।

फि़ल्म में शुरू से अंत तक आग और धुएं के कई दृश्य हैं। इस आग से न शहर अछूता है और न ही गाँव। उपन्यास भी और फि़ल्म भी बार-बार साफ तौर पर बताती है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दंगे कराने की साजिश के पीछे अंग्रेजी सत्ता का हाथ है। इस सच्चाई को जानते हुए भी सब अपने को असहाय पाते हैं और सांप्रदायिक दल और संगठन हिंदुओं और मुसलमानों को भडक़ाने में कामयाब हो जाते हैं।

फि़ल्म यह बताने में भी कामयाब रहती है कि सांप्रदायिक संगठन किस तरह युवाओं को बरगलाते हैं और धर्म और मजहब के नाम पर अपने ही पड़ोसियों की हत्या करने, उनका अपमान करने और उन्हें दर-दर की ठोकरेें खाने के लिए मजबूर करते हैं। इस प्रतिहिंसा से कोई नहीं बचता। लेकिन इस अंधकार भरे समय में उम्मीद की किरण उन लोगों में दिखायी देती है जो खतरा उठाकर भी दूसरे की मदद करते हैं। अपने मोहल्ले में रहने वाले मास्टर करीमुद्दीन की रक्षा के लिए सरदारनी तलवार निकाल लेती है और अपनी जान को खतरे में डालकर उसकी हिफाजत करती है और उसे सुरक्षित मुस्लिम मोहल्ले तक छोडक़े आती है। ये दोनों प्रसंग उपन्यास में नहीं हैं और संभवत: भीष्म साहनी की कहानियों से लिये गये हैं। इसी तरह हरनाम सिंह और उसकी पत्नी बंतो को शरण देने वाली राजो (सुरेखा सीकरी) भी ऐसी ही साहसी महिला है। लेकिन एक दूसरे की मदद हयात बख्श (मनोहर सिंह), शाहनवाज, लाला लक्ष्मीनारायण जैसे सांप्रदायिक राजनीति करने वाले लोग भी करते हैं लेकिन सिर्फ  अपने को बचाने के लिए।

फि़ल्म का एक महत्त्वपूर्ण पात्र जरनैल सिंह (वीरेंद्र सक्सेना) है जो उपन्यास में भी है। वह एक निष्ठावान कांग्रेसी है और सनक की हद तक आजादी की लड़ाई का सेनानी है। उसके मन में अपने मकसद को लेकर किसी तरह की किंतु-परंतु नहीं है। वह हिंदू-मुस्लिम एकता में यकीन करता है और उसे मालूम है कि हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेज ही लड़वा रहे हैं। जो कुछ उसके दिल में होता है वह उसकी जबान पर भी होता है। महात्मा गांधी ने बंटवारे से पहले कहा था कि बंटवारा मेरी लाश पर होगा। यह बात जरनैल सिंह भी दोहराता है। उसके लिए कोई काम छोटा और बड़ा नहीं है। झंडा लेकर प्रभात फेरी निकालना, तामीरी काम करने के लिए नालियां और सडक़ें साफ  करना और दंगों के दौरान भी किसी भी मोहल्ले में जाकर शांति के लिए तकरीर करने में उसको किसी तरह का संकोच या भय नहीं होता। लेकिन बलवाइयों के लिए लोगों के राजनीतिक विश्वास नहीं बल्कि उनका धर्म महत्वपूर्ण होता है। जरनैल सिंह सिख है इसलिए एक दिन तकरीर करते हुए उसके सिर पर पीछे से लाठी से हमला होता है और वह मारा जाता है। फि़ल्मकार ने उसे एक अविस्मरणीय पात्र बना दिया है। फिल्म का लगभग हरेक चरित्र चाहे उसकी भूमिका कितनी ही छोटी या बड़ी क्यों न हो, वह गहरा असर पैदा करते हैं। फि़ल्मकार ने छोटी-सी-छोटी भूमिकाओं के लिए भी मंजे हुए कलाकार लिये हैं और उनकी प्रतिभा का अधिकतम उपयोग किया है। फि़ल्म के प्रत्येक प्रसंग को एक निश्चित परिणति तक पहुंचाया गया है ताकि दर्शकों को अधूरेपन का एहसास न हो। लेकिन सभी प्रसंग मिलकर एक विराट त्रासदी निर्मित करते हैं। एकरसता तोडऩे के लिए तनाव से बीच-बीच में जो राहत दी गई है, वह ऐसे प्रसंगों द्वारा जहां पात्रों की मनुष्यता सामने आती है या जहां फि़ल्मकार ने व्यंग्य की सृष्टि की है। कई बार व्यंग्य विडंबना से मिलकर आता है। इस व्यंग्य का चरम उदाहरण मुराद अली है जिसका सूअर मरवाने में भी हाथ है और जो अमन की बस में माइक हाथ में लिये अमन की अपील करता नजर आता है।

फिल्म का एक प्रमुख पात्र डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड है जिसके हाथ में जिले का प्रशासन है। एक तरफ वह प्रशासक है, तो दूसरी तरफ  उसे भारतीय इतिहास और साहित्य में भी गहरी रुचि और लगाव है। लेकिन वह इन दोनों को एक दूसरे से अलग रखता है। प्रशासक के रूप में वह अंग्रेज सत्ता के हित में जो कुछ भी संभव होता है, करता है चाहे उसका खामियाजा लोगों को क्यों न भुगतना पड़े। लेकिन जब वह इतिहास और साहित्य में रुचि दिखाता है, तब उसका रूपांतरण हो जाता है। यह द्वैत वह शुरू से अंत तक बनाकर रखता है। शुरू में जब मस्जिद की सीढिय़ों पर सूअर की लाश मिलती है और शहर के लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचते हैं तब वह कोरा आश्वासन देता है और कुछ करता नहीं। वह दंगे को भडक़ने देता है। लोगों की हत्याएं होने लगती है और अंत में आग आसपास के गाँवों तक में फैल जाती है। इतना कुछ हो जाने के बाद ही वह कफ्र्यू लगाने का आदेश देता है। रिचर्ड की यह भूमिका आज भी कमोबेश वैसी ही है फर्क बस इतना है कि अंग्रेज की जगह अब देसी साहबों ने ले ली है।

‘तमस’ में पात्रों की बातचीत कमोबेश उसी रूप में फिल्म में भी है जिस रूप में उपन्यास में वर्णित है। इसका कारण यह है कि फि़ल्म के लिए संवाद भी मुख्य रूप से भीष्म साहनी ने ही लिखे हैं। आमतौर पर हिंदी के लोकप्रिय सिनेमा में संवादों पर काफी बल होता है और उन्हें भी नाटकीय और उत्तेजक बनाकर पेश किया जाता है। लेकिन ‘तमस’ में ऐसा नहीं है। संवादों को काफी संयमित रखा गया है। जहां प्रसंग के अनुरूप पात्रों द्वारा सांप्रदायिकता भडक़ाने वाली बातें कही गयी हैं उसे ऐसे पात्रों द्वारा नियंत्रित किया गया है जो आपसी भाईचारे पर बल देते हैं और हिंदू-मुस्लिम फसाद के पीछे अंग्रेजों की चालबाजी को उजागर करते हैं। फि़ल्म में इकबाल, मीरदाद, सोहन सिंह जैसे कम्युनिस्ट और बख्शी, जरनैल सिंह जैसे कांग्रेसियों की बातों में कहीं-न-कहीं सांप्रदायिक सौहाद्र्र को वाणी दी गई है।

अभिनेता भीष्म साहनी

भीष्म साहनी ने ‘तमस’ फिल्म में अभिनेता के रूप में भी काम किया था। इससे पहले वे नाटकों और फि़ल्म ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ में अभिनय कर चुके थे। ‘तमस’ फिल्म में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत छोटी थी। फि़ल्म में उनका प्रवेश आधी फि़ल्म गुजर जाने के बाद होता है लेकिन उसके बाद उनकी भूमिका फि़ल्म के अंत तक बनी रहती है। ‘तमस’ में उन्होंने सरदार हरनाम सिंह की भूमिका निभायी है जिसकी गांव में छोटी सी चाय की दुकान है और जो अपनी पत्नी बंतो के साथ रह रहा है। हरनाम सिंह के दो बच्चे हैं लेकिन दोनों साथ नहीं रहते। हरनाम सिंह जिस गाँव में रहता है, वह मुसलमानों का है और पूरे गाँव में वे ही अकेले सिख हैं। इधर-उधर से आने वाली दंगों की खबरों के बीच गाँव का उनका हमउम्र करीमखान उन्हें ढांढस बंधाता रहता है कि चिंता करने की जरूरत नहीं है हमारे रहते तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। लेकिन एक दिन करीम खान आकर उसे बताता है कि वे तत्काल गांव छोडक़र चले जाएं क्योंकि दूसरे गांव के बलवाई कभी भी आकर हमला बोल सकते हैं। बंतो और हरनाम सिंह को आनन-फानन में भागना पड़ता है। दूर झाडिय़ों से वे देखते हैं कि उनका घर और दुकान पहले लूट ली जाती हैं और बाद में दोनों जला दिये जाते हैं। किसी तरह बचते-बचाते वे पास के गाँव में पहुंचते हैं और वहां वे एक मुसलमान के घर में शरण लेते हैं। घर में उस समय सिफऱ् राजो (सुरेखा सीकरी) और उसकी बहू होती है। सास उन्हें घर में शरण देती है। पीने को लस्सी देती है और उन्हें बहू के विरोध के बावजूद मियानी में छुपा देती है। थोड़ी देर बाद जब राजो का पति एहसान अली (इफ्तखार) लौटता है, तो हरनाम सिंह देखता है कि वह उसीके घर से चुराये ट्रंक को लेकर आया है। हरनाम सिंह एहसान अली को जानता है और वह उसके सामने आ जाता है। उन्हें उस ट्रंक की चाबी दे देता है। एहसान अली फिर से उसे अपने बेटे रमजान के डर से छुपा देता है। लेकिन लौटने पर रमजान को मालूम पड़ जाता है और वह उन्हें मारने के लिए कुल्हाड़ी उठा लेता है लेकिन वह भी हरनाम सिंह को पहले से जानता है इसलिए मार नहीं पाता और आखिर राजो उन्हें रात के अंधेरे में गांव के बाहर छोड़ आती है। यही नहीं वह ट्रंक में मिले गहने की पोटली भी उन्हें लौटा देती है।

वहां से निकलकर भटकते-भटकाते हरनाम सिंह एक गुरुद्वारे में शरण लेता है जहां उसकी बेटी जसबीर (उत्तरा बावकर) भी मिल जाती है। गुरुद्वारे में आसपास रहने वाले सिख परिवार इक_ा हो चुके हैं। उन्होंने मुसलमानों से मुकाबला करने के लिए हथियार भी एकत्र कर लिये हैं। दोनों तरफ बड़ी तनावपूर्ण स्थिति है। दोनों तरफ  से युद्ध जैसी तैयारियां हो रही हैं। हरनाम सिंह यह सब देखता रहता है। दोनों तरफ से गोलियां चलती हैं। हरनाम सिंह की बेटी सहित कई औरतें छोटे-छोटे बच्चों के साथ पास के कुएं में छलांग लगाकर खुदकुशी कर लेती हैं। लेकिन एकबार फिर वे किसी तरह बचकर शरणार्थी कैंप में पहुंच जाते हैं। अब तक उन्हें अपने बेटे की कोई खबर नहीं है। उस हालत में भी नत्थू (ओमपुरी) की पत्नी कर्मो (दीपा शाही) की मदद करते हैं जो अपने पति को खोज रही हैं।

‘तमस’ में हरनाम सिंह एक महत्त्वपूर्ण पात्र है। वह उन लाखों लाख लोगों की तरह एक मामूली आदमी हैं जो विभाजन के उस दौर में सांप्रदायिक नफरत के शिकार बनते हैं। एक सामान्य मध्यवर्ग के सीधे-सादे दुकानदार के रूप में वह सामने आता है, जो अपना जीवन शांति से बिताना चाहता है। एक मुस्लिम बहुल गाँव में रहते हुए भी उसे कभी असुरक्षा और अलगाव का एहसास नहीं हुआ था। गाँव के सभी लोग उसके अपने थे और उन पर उसे भरोसा था। यही कारण है कि अंत समय तक वह वहां से चले जाने से बचता रहता है। लेकिन जब उसका अपना खास मित्र करीम खान ही उसे गाँव छोडऩे के लिए कह देता है, तो उसके नीचे से जमीन खिसक जाती है। ऐसी भयावह स्थिति में एक बूढ़ा आदमी क्या कर सकता है। उसे सबसे ज्यादा चिंता अपनी बीबी की होती है जिसकी रक्षा का दायित्व भी वह अपने कमजोर कंधो पर समझता है। इस स्थिति में उसे एकमात्र सहारा अपनी दुनाली बंदूक लगती है जिसे वह घर से निकलते वक्त कंधे पर लटका लाया था। लेकिन किसी हमले का मुकाबला करने के इरादे से नहीं बल्कि ऐसी किसी स्थिति में अपनी बीबी और अपने आपको बलवाइयों के हाथों में पडऩे से बचने के लिए। इसीलिए वह घर से निकलते वक्त अपनी बीबी को कहता है, बंतो, अगर वे लोग मारने पर उतारू हुए तो मैं पहले तुझे खत्म कर दूंगा, फिर अपने को खत्म कर दूंगा। जीते-जी मैं तुझे दूसरों के हाथ में पडऩे नहीं दूंगा। यह बात वह अलग-अलग मौकों पर तीन बार दोहराता है। उसके इस कथन में न तो किसी के प्रति तल्खी होती है और न ही कोई अपराध बोध। ऐसा लगता है जैसे यही अकेला विकल्प है जो वे कर सकते हैं। बंतो भी इस बात को इसी रूप में ग्रहण करती है। अपने पति की इस बात पर वह शांति से हामी भर देती है।

हरनाम सिंह की भूमिका के लिए भीष्म साहनी ने एक बूढ़े सरदार की वेशभूषा धारण की है। इस वेशभूषा में वे इतने सहज लगते हैं कि फि़ल्म देखते हुए यह एहसास ही नहीं होता कि यह सरदार हरनाम सिंह नहीं बल्कि भीष्म साहनी हैं। हरनाम सिंह की भूमिका उन्होंने इतने सहज ढंग से निभायी है कि हमें सचमुच यही लगता है कि यह सांप्रदायिकता के दावानल के बीच फंसा एक लाचार और बेसहारा बूढ़ा सिख है जो अपनी बीबी के साथ आसरा ढूंढने के लिए दर-दर भटक रहा है। राजो के घर में जब राजो उन दोनों को लस्सी लाकर देती है और हरनाम सिंह उसे लेते हुए फफक कर रो पड़ता है तो उनके जीवन की विडंबना जैसे साकार हो जाती है। उनकी दुनिया एक ही दिन में  कितनी बदल गई थी। कल तक अपने घर में जिस सुख चैन की जिंदगी जी रहे थे, आज वह उनसे छीन ली गई थी और इस तरह किसी अनजान घर में दूसरे के सामने मदद के लिए हाथ फैलाना पड़ रहा था। हरनाम सिंह को अपनी असहायता और बेचारगी का जो एहसास होता है, वही उसे रोने को मजबूर कर देता है। पूरी फि़ल्म में हरनाम सिंह के आगे जो कुछ भी घटित होता है, वह असहाय की तरह उसे देखता रहता है। वह न तो उन्हें रोक सकता है और न ही कुछ कर सकता है। यहां तक कि उसकी अपनी बेटी उसके सामने दूसरी औरतों के साथ कुएं में गिरकर आत्महत्या कर लेती है। इस फि़ल्म में भीष्म साहनी एक ऐसे पात्र के रूप में सामने आते हैं जो उतना ही बोलता है जितना जरूरी है। उन्होंने अपने अभिनय से ही उस पात्र को जिया है और जहां भी बोलने की जरूरत हुई है उनकी वाणी में उनके चेहरे जैसी तरलता नजऱ आती है। इस भयावह स्थिति में भी वे अपना आपा नहीं खोते और शांत बने रहते हैं। अंदर जो हाहाकार मचा हुआ है, वह इतना शांत और गहरा है कि दर्शक भी उसके स्पर्श से अपने को बचा नहीं पाते। इस हाहाकार का कुछ एहसास शरणार्थी कैंप में होता है जब वे आंकड़ा बाबू को अपनी व्यथा-कथा सुनाता है। लेकिन वहां भी किसी के प्रति कोई शिकायत नहीं है। इसके विपरीत वह उन लोगों के प्रति अपना शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने इस भयावह घड़ी में उनकी मदद की थी और जिनके कारण ही वे जिंदा बच पाये हैं। हरनाम सिंह के मन में किसी के लिए कोई नफरत या बैर का भाव नहीं है। खास बात यह है कि ‘तमस’ में एक अभिनेता के रूप में उनका विश्वास कहीं नहीं डगमगाया है। एक अभिनेता के रूप में अपनी पहली फि़ल्म ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ के कुछ दृश्यों में जो कमजोरी कहीं-कहीं नजर आयी थी, वह ‘तमस’ में दिखायी नहीं देती। भीष्म साहनी के अभिनय में और अधिक परिपक्वता दिखायी देती है। एक अभिनेता के तौर पर भीष्म साहनी ने सांप्रदायिक उन्माद के शिकार निरपराध और निर्दोष लोगों की पीड़ा को जितने जीवंत रूप में अभिव्यक्ति दी है, वह किसी मंजे हुए कलाकार के लिए भी शायद इतना आसान नहीं होता। भीष्म साहनी के अभिनय की विशेषता ही यह है कि वह कहीं से भी अभिनय नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे भीष्म साहनी का ही इन अलग-अलग चरित्रों में कायांतरण हो गया है। जिस यथार्थपरक, संवेदनशील और मानवतावादी जीवन दर्शन से प्रेरित होकर उन्होंने अपना -लेखन-धर्म निभाया है, वही जीवन दर्शन अभिनय करते हुए भी दिखायी देता है।
'तमसÓ उपन्यास और फि़ल्म दोनों रूपों में आज भी प्रासंगिक है। इस बात से बहुत अधिक अंतर नहीं पड़ता कि फि़ल्म की तुलना में उपन्यास कम प्रभावशाली है। लेकिन इस तथ्य को नहीं भुलाया जा सकता कि फि़ल्म को प्रभावशाली बनाने में भीष्म साहनी का भी योगदान कम नहीं है। कहानी लेखक के रूप में ही नहीं, पटकथा और संवाद लेखक के रूप में भी और अभिनेता के रूप में भी। भीष्म साहनी एक लेखक के रूप में तो याद किये ही जायेंगे लेकिन वह 'तमसÓ फिल्म के लेखक के रूप में और इस फि़ल्म के एक महत्त्वपूर्ण किरदार को सिनेमा के पर्दे पर जीवित कर देने वाले महान अभिनेता के रूप में भी याद किये जायेंगे। इस शताब्दी वर्ष में सांप्रदायिकता के विरुद्ध उनके संघर्ष को याद किया जाना जरूरी है क्योंकि आज भारत में वे ही ताकतें शासन कर रही हैं जिनके विरुद्ध उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया था।