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Friday 24 Nov 2017

तमस: सांप्रदायिकता का आख्यान

प्रो. दिनेश कुमार चौबे

पूर्वोत्तर पर्वतीय विवि

शिलांग, मेघालय

मो. 09436312134

साहित्य मानव की विकासशील प्रवृत्ति के मार्मिक अंगों की अभिव्यक्ति है, जिसमें किसी भी जाति समाज या राष्ट्र की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब होता है। साहित्य का समाज से अंतर्संबंध है। समाज का हर प्रवाह साहित्य में संकलित होता रहता है, उसकी प्रत्येक क्रिया साहित्य में दर्ज होती रहती है। उपन्यास विविधता पूर्ण मानव जीवन की रसात्मक अभिव्यक्ति है। उपन्यासकार अपने वैचारिक परिवेश की प्रयोगशाला में मानव जीवन से अन्यान्य स्तरों की घटनाओं का निरीक्षण करता है तथा तथ्यों एवं सत्यों को खोजकर उन्हें व्यक्त करता है। उपन्यास को एक विशिष्ट आकार प्रदान करने में कथानक का चयन एवं उसका व्यवस्थित कलापूर्ण प्रस्तुतिकरण ही लेखक की प्रतिभा और महानता के मानदंड हैं।

मुख्य एवं अकेला कथानक ही अपने आप में इतना मर्यादित और सुगठित, पूर्ण गति युक्त मौलिक प्रभावपूर्ण एवं अविराम होना चाहिए कि पाठक को किसी अन्य कोण की ओर दृष्टि न दौड़ानी पड़े। तमस भीष्म साहनी जी का अत्यंत सधा हुआ सारयुक्त और व्यापक कथानक से युक्त उपन्यास है। इसमें सामाजिक धार्मिक तनाव के परिप्रेक्ष्य में उस आदिम पशुत्व की भावना को अत्यंत सशक्त एवं घटना प्रधान ढंग से उभारा गया है जिसके चलते हमारा समाज समाज न रहकर फिरकों और व्यक्तियों में बंटा है। विवेच्य उपन्यास में चूंकि किसी व्यक्तिगत बखान का प्रतिबिंबन नहीं किया गया है। अस्तु संपूर्ण समाज का चित्रण होने का भाव है। इसमें समाज की विविधता के अनुरूप कथा प्रसंगों में भी विविधता परिलक्षित होती है। यह विविधता विभिन्न प्रकार की मन: स्थितियों के अनुरूप है क्योंकि समाज में प्रत्येक की मन: स्थिति प्रतिकूल होती है फिर भी इस विविधता के पीछे एक वैचारिक प्रवाह है। मानव मन की आशाओं, आकांक्षाओं, विद्रोह, कुंठा, उत्पीडऩ, विडंबना और बर्बर पशुत्व का वर्णन कर उन ज्वलंत समस्याओं से उसे परिचित कराना जिनके अस्तित्व ने हमारे देश को न केवल भौगोलिक दृष्टि से बांटा वरन मानव समुदाय के मन भी बाँट दिए। तमस में पंजाब का एक अंचल विशेष सर्जना की पृष्ठभूमि में आता है तथापि इसमें युग सत्य को रूपायित किया गया है, जिसने भारत की आत्मा को घुन की तरह खाकर-चाटकर इतना खोखला कर दिया कि विभाजन का मुंह देखना पड़ा। विभाजन का यह कहर लगातार हमें छीज रहा है। कदाचित इसी लिए तमस की प्रासंगिकता गत सदी के सातवें-आठवें दशक की अपेक्षा अधिक हो गयी है।

तमस अर्थात एक ऐसा गहन अंधकार जिसमें समाज की सारी प्रकाशवान सत्ताएं तिरोहित हो गयी हैं। एक राष्ट्र के नागरिक होते हुए हम विभिन्न धर्मों में बंटे होने के कारण सांप्रदायिकताओं को प्रश्रय देते हैं। यही संप्रदायी सोच न जाने कितने प्राणों को मृत्यु के मुख में धकेल देती है। कुछ असामाजिक तत्व केवल अपने निहित स्वार्थों के लिए सांप्रदायिकता की आग फैलाते हैं। इस सांप्रदायिक आंच में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वालों का स्याह चित्र साहनी जी ने खींचा है-

मोहल्लों के बीच लीकें खिंच गयी थीं। हिंदुओं के मोहल्ले में मुसलमान को जाने की अब हिम्मत नहीं थी और मुसलमानों के मुहल्ले में हिंदू, सिख अब नहीं आ जा सकते थे। आँखों में संशय और भय उतर आए थे। गलियों के सिरों पर और सडक़ों के नाकों पर जगह-जगह कुछ लोग हाथों में लाठियाँ और भाले और मु_ी बांधे छिपे बैठे थे। जहां कहीं हिंदू और मुसलमान पड़ोसी एक-दूसरे के पास खड़े थे बारबार एक ही वाक्य दोहरा रहे थे बहुत बुरा हुआ है। बहुत बुरा हुआ है। इससे आगे वार्तालाप बढ़ ही नहीं पा रहा था। वातावरण में जड़ता सी उग गयी थी सभी लोग मन ही मन जानते थे कि यह कांड यहीं पर खत्म होने वाला नहीं है, लेकिन आगे क्या होगा किसी मालूम नहीं था। (तमस भीष्म साहनी पृष्ठ सं-126)

धार्मिक पाखंड एवं सांप्रदायिक दंगों के शिकार इकबाल सिंह का त्रासद आख्यान महज इकबाल सिंह तक सीमित नहीं किया जा सकता वह मुसलमानों के भय से खानपुर गाँव छोडक़र भाग खड़ा होता है और पीछे लगे तीन मुस्लिम युवकों के भय से खोहों में लुकता-छिपता है परंतु अंतत: पकड़ लिया जाता है और उसे मजबूर होकर मुसलमान बनना तथा गाय का कच्चा मांस खाना पड़ता है। इकबाल सिंह का यह चित्र यथार्थ के धरातल पर तो है ही साथ ही अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है-

निकल बाहर खंजोर के तुख्म नहीं तो अंदर से तेरी लाश निकलेगी। अभी निकले आओ नहीं तो इस पत्थर से भुरथा बना दूंगा।

बोल कलमा पढ़ेगा या नहीं? रमजान ने कहा। वह अभी भी बड़ा सा पत्थर हाथ में उठाए हुए था।

मुँह से बोल मादर----! नहीं तो देख यह पत्थर अभी तेरी खोपड़ी पर पड़ेगा।

कलमा पढ़ूँगा। सिसकियों के बीच इकबाल सिंह ने कहा।

अल्लाह हो अकबर।

नारा-ए-तकबीर! अल्लाह हो अकबर(तमस पृष्ठ-206-207)

कौमी नारेबाजी विकास के व्युत्क्रमानुपाती होती है। मजहबी दीवारों को अंधाधुंध विकास से नहीं गिराया जा सकता। भारत-पाक विभाजन की घटना सन् 1947 की वह त्रासद कथा है जिसका विष फल अभी भी दोनों देशों को भोगना पड़ रहा है और शायद अनेक कल तक भोगते रहना होगा। वतन की धरती, नदियाँ, पहाड़, खेत-खलिहान और वहाँ के बाशिंदे सब बंट गए। इसी के साथ आदमी के वहशी बनने की अनेक दर्दभरी घटनाओं का लंबा सिलसिला चल पड़ा जो आज भी मुजफ्फरनगर तक जारी है। एक सरसरी निगाह डालने पर पता चलता है कि सांप्रदायिकता की लपटों ने किस प्रकार भारत जैसे सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश को झकझोर कर रख दिया है। पिछले दो दशकों में सांप्रदायिकता का रूप और तीव्रतर हुआ है। धर्म के भावनात्मक जुड़ाव को भुनाकर तरह-तरह की सांप्रदायिक ताकतें अपना उल्लू सीधा करती हैं। बाद में यही धार्मिक आतंक का रूप ले लेता है। धार्मिक होने का अर्थ सांप्रदायिक हो जाना नहीं है बल्कि धर्म में जब सत्ता और अर्थ का मेल हो जाता है तो धर्म- धर्म नहीं बल्कि राजनीतिक रंग रूप और सांप्रदायिकता का रूप ले लेता है।

भीष्म जी ने सांप्रदायिक दंगों को अपनी आँखों से देखा था। अनुभव के आधार पर तमस की रचना की। इसमें पूर्व अनुभवों को खूब पकाया उन पर गहन विमर्श किया। उपन्यासकार ने स्वयं लिखा है- सन 42 के देशव्यापी भारत छोड़ो आंदोलन के बाद स्वतंत्रता संघर्ष की रीढ़ तोडऩे का यह षड्यंत्र था और अंग्रेजों के हाथ में सांप्रदायिकता का हथियार ही सबसे बड़ा हथियार था। (आधुनिक हिन्दी उपन्यास सं भीष्म साहनी पृ-428) तमस के अंदर झाँकने के लिए कहानी का यह स्वकथन बहुत महत्वपूर्ण है। निस्संदेह गोरों के लिए भारत जैसे बहुजातीय, बहुधर्मी, बहुभाषायी देश में शासन करने के लिए सांप्रदायिकता बड़ा कारगर हथियार था जिसका इस्तेमाल विभाजनकारी कुत्सित नीति में साफ झलकता है। ‘रिचर्ड’ के रूप में उपन्यासकार ने एक ऐसे अंग्रेज अधिकारी का चरित्र प्रस्तुत किया है जो अध्ययनशील एवं इतिहास में रुचि रखने के बावजूद बरतानिया हुकूमत की दोहरी नीतियों का प्रस्तोता है। रिचर्ड का रूप वर्तमान समय में भी हुक्मरानों के दोहरे चरित्र में दिखाई देता है। तत्कालीन शासन व्यवस्था की नीति थी कि जब मानव तमाम जज्बाती मसलों में उलझा रहे तब सांप्रदायिकता चूंकि धार्मिक अस्थाओं से जुड़ी थी, इसको भडक़ाना अति सरल था और मूल मुद्दों से प्रजा का ध्यान भटकाकर उन्हें शासक अपनी रीति-नीति पर चला सकता था। उपन्यास में चित्रित रिचर्ड भारत में कौमी दंगा भडक़ाकर शासन अबाधरूप में चलाना चाहता है। वह नगर में समस्त गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है किन्तु अमन कमेटी के लोगों के सामने सांप्रदायिक तनाव में रोकने की किसी भी कार्रवाई से वह इनकार कर देता है कि हिंदू-मुसलमान के आंतरिक धार्मिक मसलों पर हस्तक्षेप का उसे कोई हक नहीं है। यहाँ तक कि वह पत्नी लीजा के अनुरोध को भी बातों-बातों में उड़ा देता है और उसे तनाव की स्थितियों और दंगे में हताहत व्यक्तियों की सूचना तक नहीं देता। वास्तव में वह अंग्रेजी शासन की फूट डालो और राज्य करो की नीति का प्रबल पक्षधर और नुमाइंदा है। रिचर्ड भारतीयों को किस तरह झांसे में रखता है इस पर भीष्म साहनी ने जो दृश्य खींचा है वह गहन अनुभव एवं चिंतन का परिणाम है। रिचर्ड के शब्दों में-

यहाँ के लोग कुछ नहीं जानते ये वही कुछ जानते हैं जो हम इन्हें बताते हैं। फिर थोड़ी देर तक मौन रहकर बोला, ये लोग अपने इतिहास को जानते नहीं हैं, ये केवल उसे जीते भर हैं।(तमस पृ-36) रिचर्ड की इस सोच के पीछे श्रेष्ठता ग्रन्थि को देखा जा सकता है। शायद इसी सोच का नतीजा है कि सत्ता सिंहासन के इर्द-गिर्द मंडराने वालों को पुरस्कृत किया जाता है और सच्चे राष्ट्र सेवक फटेहाली में जीवन बसर करते हैं। पत्नी लीजा के सामने अपनी धूर्तता भरी चालबाजी को छिपाते हुए रिचर्ड आगे कहता है-

छोटे से उकसावे पर भडक़ उठने वाले, धर्म के नाम पर खून करने वाले सभी व्यक्तिवादी होते हैं, और सभी सफेद चमड़ी वाली औरतों को पसंद करते हैं (तमस पृ-44) इसका सटीक जवाब लीजा देती है या यह कहा जाय कि रिचर्ड की स्याह सोच का अनावरण करती है तो ज्यादा उपयुक्त होगा-

बहुत चालाक नहीं बनो, रिचर्ड मैं सब जानती हूँ। देश के नाम पर ये लोग तुम्हारे सामने लड़ते हैं और धर्म के नाम पर तुम इन्हें आपस में लडा़ते हो। क्यों ठीक है न? (पृ-45) संवाद क्रम में यह खुलकर सामने आ जाता है कि शासक की दिलचस्पी अपनी सत्ता कायम रखने के प्रति कितने गहरे तक है और इसके लिए वह तमाम सांप्रदायिक कौमी, जज्बाती काले कारनामों को अंजाम देने से रंच मात्र नहीं चूकता। उपन्यासकार का स्पष्ट अनुभव इसे बड़ी शिद्दत से पाठक के सामने रखता है रिचर्ड का यह कथन कि- डार्लिंग, हुकूमत करने वाले यह नहीं देखते कि प्रजा में कौन सी समानता पाई जाती है, उसकी दिलचस्पी तो यह देखने में होती है कि वे किन-किन बातों में एक-दूसरे से अलग हैं।(तमस पृ-45)

मूल विषय से ध्यान हटाने के लिए शासक सांप्रदायिकता का उन्माद भरता है। जज्बाती होकर जो कौमी दीवारें खींची जाती हैं वे ना तो सत्तर के दशक में विकासोन्मुख थी न इक्कीसवीं शती में विकास के कंगूरे गढऩे में सहायक हैं। उपन्यासकार स्वयं कहता है- मेरा इरादा उस कल का ऐतिहासिक परिदृश्य पेश करने का नहीं या न ही कोई दस्तावेजी नॉवेल लिखने का। एक संकटपूर्ण स्थिति की पृष्ठभूमि में विभिन्न धर्मों, वर्गों, विचारधाराओं के लोगों की प्रतिक्रिया और उनके कारनामे ही दिखलाए गए हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। (आधुनिक हिन्दी उपन्यास, सं. भीष्म साहनी, पृ-430) सांप्रदायिकता के भीतर विलुप्त एकता, भाईचारे को तलाशती उसकी पीड़ा को उभारती मानसिकता की करुण गाथा का आख्यान तमस का अनूठापन है। समाज की जिस रुग्णता को उपन्यास के केंद्र में रखा गया है वह बदस्तूर जारी है। सांप्रदायिक हत्याएँ, लूटपाट, आगजनी, धर्म परिवर्तन, बलात्कार जैसे वीभत्स कृत्य कौमी फिरकापरस्ती के प्रतिफल हैं।

 राजनीतिक पैंतरेबाजों ने विद्वेष को भडक़ाकर अपना वोट बैंक पुख्ता किया है यही कारण है आज तक हिंदू-मुसलमान के बीच सांप्रदायिक सौहाद्र्र स्थापित नहीं हो सका। दोनों वर्ग एक दूसरे के प्रति संदिग्ध रहे और इस कार्य में इतने अधिक सक्रिय हैं कि यह जान सकना कठिन है कि पहल कौन करता है और प्रतिक्रिया किस ओर से आती है क्योंकि इसके पीछे का खिलाड़ी कोई और होता है जो इन दोनों वर्गों की आँखें नहीं देख पाती। उपन्यासकार एक ऐसे यथार्थ से साक्षात्कार करता है जिस पर हमारा ध्यान सहज नहीं जाता। यथार्थ का चित्रांकन करते समय आदर्श का गला नहीं घोंटा गया है घटनाओं की गति में यदि पात्र आदर्शवादी बन गए हैं तो भीष्म जी ने उन्हें जबरन यथार्थवादी नहीं बनाया है। यथार्थ की भित्ति पर आद्धृत कथा स्वभावत: कहीं आदर्श के पुट से लैस है।

वास्तव में धार्मिक संकीर्णता एक अज्ञान रूपी अंधकार ही तो है जिसकी गहनता में आम व्यक्ति इतना खो जाता है कि अपनी अस्मिता को ही भूल जाता है। भीष्म जी ने समाज में व्याप्त गहन तिमिर को निरूपित करने का प्रयास किया है जिसके प्रभाव से मनुष्य अपनी मनुष्यता भूल जाता है मन का यह अंधकार ही उसे धार्मिक संकीर्णताओं में जकडक़र जघन्य नरसंहार करवाने तक को उन्मादित करता है। जो कि वर्तमान समाज में भी व्याप्त है तमसो मा ज्योतिर्गमय, तम से ज्योति की ओर अग्रसर होने की आकांक्षा, भीष्म जी के उपन्यासकार हृदय की विराट सोच लिए है।