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Saturday 18 Nov 2017

जीवन संघर्षों की दास्तान- वांङ्चू

आनंदस्वरूप श्रीवास्तव

कवितांगन, एम-2/85 जवाहर विहार

रायबरेली (उ.प्र.) 229010

मो. 09305702051

‘यार किस बूदम को उठा लाए हो? यह क्या चीज है? कहां से पकड़ लाए हो इसे? मेरे एक मित्र ने कहा।’’

‘‘बाहर का रहने वाला है, इसे हमारी बातों में कैसे रुचि हो सकती है। मैंने सफाई देते हुए कहा।’’

भीष्म साहनी का यह ‘बूदम’ और कोई नहीं बौद्ध भिक्षु वांङ्चू है जो चीन से भारत आया था। यह एक संस्मरणात्मक कहानी है जो गहरी मानवीय संवेदनाओं से सम्पृक्त है। इस कहानी को पढक़र यह सहर्ष निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भीष्म साहनी मानव मन की पीड़ा और संवेदना को बहुत गहरे जाकर समझने और परखने वाले कथाकार हैं।

 वांङ्चू का पहला पाठ कश्मीर के श्रीनगर से शुरू होता है। उस वक्त देश में स्वातंत्र्य आंदोलन शीर्ष पर था अैर राजनीति में कांग्रेस का बोलबाला था। वाङ्चू लेखक से एक बौद्ध भिक्षु की तरह मिला। श्रीनगर की लालमंडी सडक़ पर। उसका सिर घुटा हुआ था। शरीर पर लाल रंग का धूसर चोगा था। श्रीनगर शहर में आकर वह बौद्ध विहारों के खंडहरों और संग्रहालयों में घूम रहा था। वह इन्हें बड़े करीब और मन से देख रहा था। एक संग्रहालय के बाहर जब वह निकलता है तो लेखक से टिप्पणी करता है-‘एक मूर्ति के केवल पैर ही पैर बचे हैं।’

उन्हीं दिनों पं.नेहरू श्रीनगर आए थे। उन्हें ंदेखने के लिए बड़ी भीड़ उमड़ी थी। वह कुछ पल नेहरू जी को व भीड़ को देखता रहा फिर एकाएक गायब हो गया और पास के एक संग्रहालय में चला गया। यह बात लेखक के मित्रों को अच्छी नहीं लगी। उन लोगों ने वांङ्चू पर प्रश्न किए- कौन है यह? कहां का रहने वाला है? यहां क्यों आया है? लेखक उनकी शंकाओं का समाधान करता है और बताता है कि वह समझदार आदमी है और बौद्ध धर्म के बारे में बहुत कुछ जानता है। लेखक के मतानुसार वांङ्चू भक्त अधिक और जिज्ञासु कम था।

वांङ्चू वर्षों पहले चीन से सारनाथ आया था। जिन बौद्ध प्रोफेसर के साथ वह आया था वह तो कुछ साल बाद चीन लौट गए परन्तु वह यहीं रह गया। सारनाथ में रहकर उसने हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया। वह स्वभाव से अन्र्तमुखी था। वह न इस देश की और न अपने देश की राजनीति में कोई रुचि लेता। यह बात सबको कुछ हैरान सी करती।

वांङ्चू उन दिनों कोई एक सप्ताह लेखक के घर पर ही रहा। वहां उन्हीं दिनों उनकी छोटी मौसेरी बहन नीलम ठहरी हुई थी। शीघ्र ही दोनों में बड़ी अन्तरंगता बढ़ गई। बाजार से दोनों एक दूसरे के लिए गिफ्ट भी लाने लगे। लेखक ने लिखा है- नीलम जब कोई हंसी-ठिठोली करती तो उसके कान भूरे हो जाते और चेहरा लाल।

एक सप्ताह बाद वांङ्चू सारनाथ लौट आता है। उसके जाने के बाद घर के सभी लोग उसे बहुत याद करते हैं। लेखक लिखता है- वांङ्चू के चले जाने के बाद उसके साथ मेरा सम्पर्क वैसा ही रहा जैसा आमतौर पर एक व्यक्ति के साथ रहता है। गाहे-बगाहे कभी खत आ जाता। कभी किसी आते-जाते व्यक्ति से उसकी सूचना मिल जाती। वह उन लोगों में से था जो बरसों तक औपचारिक परिचय की परिधि पर ही डोलते रहते हैं, न परिधि लांघ कर अंदर आते हैं न पीछे हटकर आंखों से ओझल होते हैं।

श्रीनगर के बाद वांङ्चू की मुलाकात फिर दिल्ली में हुई। हुआ यह कि उन्हीं दिनों चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई भारत यात्रा पर आए। अपने अनुदान के सिलसिले में वांङ्चू सारनाथ से चलकर दिल्ली आया प्रधानमंत्री से मिलने। एकाएक वह सडक़ पर मिला और लेखक उसे अपने घर ले आए। घर पर उससे तमाम बातें हुई। बातों-बातों में ही उसने बताया कि दिल्ली से जाने के बाद नीलम से चिट्ठी पत्री होती रही जबकि नीलम कब की ब्याही जा चुकी थी और दो बच्चों की मां बन चुकी थी। लेखक ने इस बार जैसा देखा लिखा-

‘‘वांङ्चू में पहली जैसी भावविह्वलता नहीं थी। वह बोधिसत्व के पैरों पर अपने प्राण न्योछावर नहीं करता था लेेकिन अपने जीवन से संतुष्ट था। पहले की ही भांति थोड़ा खाता, थोड़ा पढ़ता, थोड़ा भ्रमण करता और थोड़ा सोता था।’’

वांङ्चू के चीन से भारत आने के पीछे मुख्य कारण यह था कि 1929 में उसके देश में जो राजनैतिक उथल-पुथल हुई उसमें उसका पूरा गांव जला डाला गया। वह प्रो. शान के साथ भारत चला आया था। दिल्ली प्रवास के दौरान ही लेखक ने समझाया था कि कुछ दिनों के लिए चीन चला जाए। क्योंकि उन दिनों भारत-चीन के रिश्ते कुछ सुधर रहे थे। यह सुनकर वांङ्चू ने कोई हामी नहीं भरी- बस सिर हिलाता और मुस्कराता रहा। सारनाथ पहुंचने के बाद उसका एक पत्र आया जिसमें उसने लिखा- वह अपने देश जा रहा है। लेखक पत्र पढक़र खुश भी होता है और हैरान भी- सोचता है कि वांङ्चू एक बार यहां से गया तो कहां लौटकर आने वाला।

चीन जाकर वांङ्चू ने लेखक के पास कुछ पत्र भेजे। संकोची वांङचू वहां के जनजीवन में घुल-मिल नहीं पा रहा था। गांव उसका बदल गया था। कथाकार लिखता है- वांङ्चू के लिए वैसी ही स्थिति थी जैसे भारत में रही थी। उसके मन में उछाह नहीं उठता था... वह यहां भी दर्शक बना घूमता था। उसकी इस स्थिति पर लोग शक करते। तरह-तरह के सवाल पूछते- तुम भारत में कितने वर्ष रहे? वहां क्या करते थे? भारत की विदेश नीति क्या है? नेहरू के बारे में तुम क्या जानते हो? आदि-आदि।

वांङ्चू की बातों से लोगों ने यही पाया कि उसकी बौद्ध धर्म में गहरी आस्था है शेष जानकारी अधूरी और हास्यास्पद है। चीन में एक संग्रहालय में उसे काम भी मिला लेकिन वहां भी उसका मन न लगा। वह हर वक्त उखड़ा-उखड़ा रहने लगा। उसे सारनाथ की अपनी कोठरी, नीम का पेड़, कैन्टीन और कैन्टीन का रसोइया याद आने लगा। उसे भारत की हिमाच्छादित हिमालय की चोटियां, श्रीनगर की झील और गंगा का शांत कछार याद आने लगी। उसका मन चीन से उचट गया। जो प्यार, स्नेह, अपनापन उसे भारत में मिला वह उसे वहां नहीं मिला। बौद्ध भिक्षु बन वह भारत आया था अब फिर बौद्ध भिक्षु बनकर भारत लौटने का मन बना लिया। यही नियति भी है और विकल्प भी। वीसा मिलने की कठिनाई जरूर हुई लेकिन भारत आने की इजाजत तो किसी तरह मिल ही गई। कोलकाता पहुंचते ही उसके सामने अलग तरह की मुसीबतें खड़ी हो गईं। एक पुलिस वाला उसे पुलिस दफ्तर ले गया। वहां उसके पासपोर्ट, परिचय पत्र अैार कागजों की छानबीन की जाने लगी। उससे तरह-तरह के सवाल पूछे जाने लगे- वह चीन क्यों गया था? वहां वह कहां रहा और क्या करता रहा? चीन से भारत क्यों भागकर आ गया। पुलिस की जांच पड़ताल और पूछताछ से वह बड़ा असहज, अटपट महसूस करने लगा। कोलकाता से सारनाथ जब वांङ्चू पहुंचा बेहद घबराया और परेशान था। उस वक्त उसका रसोइया ही दौडक़र आया वह उसे देखकर बहुत खुश हुआ। यहां उसका मन कुछ स्थिर रहा और चेहरे पर कुछ रौनक लौटी। यहां बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन वह फिर पूर्व की भांति करने लगा। इसी बीच उसने एक पत्र लेखक को लिखा कि वह दिल्ली में उसके अनुदान के लिए कुछ प्रयास कर दें। लेखक के प्रयास से सरकार की ओर से छोटा-मोटा अनुदान का भी प्रबंध हो गया। कुछ ही दिन बीते एक दरोगा आया उसे पुलिस स्टेशन वाराणसी ले गया। वहां उसे पुलिस की कोठरी में बंद किया गया और पूछताछ के लिए बड़े अधिकारियों के सामने ले जाया गया। वहां उसे फिर वही सवाल पूछे गए। तुम चीन से कब लौटे? क्यों लौटे? जो चीन से लौटना था तो यहां से गये क्यों? इस तरह उसका बड़ा लम्बा इंटरव्यू लिया गया। यहां उसे हिदायत भी दी गई कि उसे हर हफ्ते पुलिस स्टेशन बनारस में आकर हाजिरी देनी होगी। खिन्न मन से जब वह बनारस से सारनाथ लौटा तो अपनी कोठरी में सीधे न जाकर उस नीरव स्थान पर जाकर बैठ गया जहां कभी शताब्दियों पहले महाप्राण ने अपना पहला प्रवचन किया था।

लेखक लिखता है कि कुछ दिन ही बीते थे कि भारत-चीन के बीच युद्ध छिड़ गया। पुलिस के कुछ अधिकारी आए और उसे बनारस ले गए। साथ में उसका किताबों-कागजों भरा ट्रंक भी। लड़ाई बंद होने के बाद कोई एक महीने बाद वांङ्चू पुलिस हिरासत से मुक्त हुआ। पुलिस ने उसका ट्रंक वापस किया। उसमें कोई कागजात न पाकर वांङ्चू बड़ा हतप्रभ हुआ। उसकी डायरी, किताबें, पत्र, फाइलें सब दिल्ली भेज दी गई जैसा कि उसे पुलिस ने बताया। जब वह पुलिस से बहुत गिड़गिड़ाया- मुझे मेरे कागजात वापस कर दीजिए, उन पर मैंने बहुत कुछ लिखा है, वे बहुत जरूरी हैं, तो पुलिस वालों ने कहा- ‘‘मुझे उन कागजों को क्या करना है, आपके हैं, आपको मिल जाएंगे।’’

वांङ्चू सारनाथ लौट आया। वह अधमरा सा हो रहा था। यहां उसकी निगरानी के लिए एक पुलिस सिपाही की ड्यूटी भी लगा दी गई। कुछ दिनों बाद वांङ्चू का एक पत्र लेखक को मिलता है। उसमें वह लिखता है कि जैसे भी उसके कागज को बचा लिया जाए। इसके लिए उसने सरकारी अधिकारियों से सिफारिश करने के लिए भी कहा। यह भी लिखा कि प्रति सप्ताह बनारस जाकर पुलिस में हाजिरी देने के बजाय उसे महीने में सिर्फ एक बार वहां जाना पड़े क्योंकि 40 रुपए जो अनुदान मिलता है उसमें उसके 10 रुपए तो आने-जाने में खर्च हो जाते हैं। लेखक अपने सभी प्रयासों का जिक्र वांङ्चू को पत्र द्वारा कर देते।

कुछ दिन बाद एक पुर्जे पर लिखी सूचना पर वह पुलिस स्टेशन बनारस अपने कागजात लेने गया तो कुल एक तिहाई कागज मिले। कागज की अधखुली पोटली को उठाते वांङ्चू को यकीन नहीं आया। उसका चेहरा जर्द पड़ गया। हाथ-पैर कांपने लगे। बीमार तो वह पहले से ही चल रहा था। कांपती टांगों से वांङ्चू पुलिन्दा बगल में दबाए सारनाथ लौट आया। कागजों में केवल एक पूरा निबंध और टिप्पणियां बची थीं।

वांङ्चू बीमार तो चल ही रहा था वह अपनी असहज स्थिति और पुलिस अधिकारियों के रवैये से और अधिक मानसिक बीमारी में आ गया। कोई महीनेभर बाद लेखक को खबर मिलती है कि वांङ्चू की मौत हो गई है। मौत से पहले वह एक पत्र लिखकर छोड़ गया था जिसमें लिखा था उसका छोटा सा ट्रंक और उसकी गिनी-चुनी किताबें लेखक को पहुंचा दी जाए। इस समाचार से लेखक को आघात  लगा। वह अपनी स्थिति पर टिप्पणी भी करता है-

‘‘उम्र के इस हिस्से में पहुंचकर इंसान बुरी खबरें सुनने का आदी हो जाता है और वे दिल पर गहरा आघात नहीं करते।’’

पहले तो सारनाथ जाने का लेखक ने मन बनाया फिर सोचने लगा वहां उसका कौन बैठा है जिसके सामने जाकर अफसोस करता। लेकिन कुछ दिन बाद वह वहां गया। उससे मिलने सारनाथ के मंत्री जी आए। मंत्री जी ने कहा- वांङ्चू बड़ा नेक दिल आदमी था, सच्चे अर्थों में बौद्ध भिक्षु था। कैंटीन का रसोइया आया वह भी कहने लगा- बाबू आपको बहुत याद करते थे। मेरे साथ आपकी चर्चा बहुत करते थे। बहुत भले आदमी थे कहते-कहते वह रुआंसा हो गया। कहानीकार ने लिखा है संसार में शायद यही अकेला जीव था जिसने वांङ्चू की मौत पर आंसू बहाए थे।

कहानी लेखक ट्रंक और कागजों का पुलिन्दा लिए दिल्ली लौट जाते हैं। रास्तेभर सोचते हैं कि वांङ्चू की पाण्डुलिपियों का क्या करें? अधूरी पाण्डुलिपियां छापेगा कौन? घर में रखेंगे तो बीवी कहेगी कचरा फैला रहे हैं। पाण्डुलिपियों को उठाते-बिठाते वह यही सोचते हैं कि एक दिन ये भी किसी गली में फेंक दिये जाएंगे। कहानी यहीं समाप्त हो जाती है।

भीष्म साहनी की यह कहानी अपने समय में कई पत्र-पत्रिकाओं में छपी और सर्वत्र इसकी बड़ी चर्चा हुई। 11 जुलाई 2003 को जब साहनी साहब का निधन हो गया तो भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से निकलने वाली पत्रिका ‘आजकल’ ने फरवरी 2004 में साहनी साहब पर विशेषांक निकाला उसमें भी यह कहानी प्रमुखता से प्रकाशित की गई। कहानी में वांङ्चू के प्रति जो सद्भावना, संवेदना और आत्मीयता साहनी साहब ने दर्शायी है वह पाठकों के अन्र्तमन को गहरे छूती है। यही कारण है यह कहानी उनकी अन्य कहानियों में एक श्रेष्ठ कालजयी रचना है।