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Tuesday 21 Nov 2017

मानवीय सरोकारों के प्रतिबद्ध साहित्यकार

प्रो. अर्चना जैन

203, वात्सल्य फ्लैट, वकील

बाड़ी, एल.जी. हॉस्पिटल

के पास, मणिनगर

अहमदाबाद- 380008 (गुजरात)

मो. 079-25462646

भीष्म साहनी एक ऐसे प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिनके संपूर्ण साहित्य में कटु यथार्थ की अभिव्यक्ति है। कहानी, उपन्यास, नाट्य-साहित्य की इन तीनों विधाओं में साहनीजी ने साहित्य-सृजन किया है। इनके कथा-साहित्य पर प्रेमचंद और यशपाल की गहरी छाप देखी जा सकती है। यद्यपि साहनीजी ने प्रेमचंद और यशपाल की ग्रामीण जीवन-शैली को नहीं अपनाया है, किन्तु फिर भी वे इन दोनों साहित्यकारों से प्रभावित अवश्य रहे हैं।

साहनीजी के साहित्य का केन्द्र-बिन्दु मध्य वर्ग है। उन्होंने अपने साहित्य में यथार्थ का ऐसा रचनात्मक चित्रण किया है, जिसे पढक़र पाठक तिलमिला जाता है और पूंजीवाद को बल देने वाली प्रवृत्तियों के प्रति आक्रोश से भर उठता है। उनकी रचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि मध्य वर्ग और निम्न वर्ग पूंजीवाद और सामंतवाद के शोषण का किस सीमा तक शिकार हुए हैं। साहनीजी की सूक्ष्म और पैनी दृष्टि वहां तक पहुंची है जहां तक सामाजिक दूषणों की जड़ें फैली हैं। समाज में व्याप्त किसी भी अनाचार को वे अपने व्यंग्य-बाणों का निशाना बनाने से नहीं चूकते। अधिकांशत: पूंजीवादी और सामंतवादी ही उनके व्यंग्य का शिकार हुए हैं, जबकि मकादूर और शोषित वर्ग तो उनकी सहानुभूति के पात्र हैं। इस सामाजिक विषमता के भयंकर परिणामों से भी वे हमें अवगत कराते हैं। पूंजीवाद समाज में संस्कारहीनता, साम्प्रदायिकता, भेदभाव आदि कुरीतियों को जन्म देता है और अंतत: उसकी परिणति अराजकता, अपराध, रक्तपात जैसी दुष्प्रवृत्तियों में होती है।

साहनीजी की प्रतिबद्धता को हम दो रूपों में विभक्त कर सकते हैं : 1. सामाजिक प्रतिबद्धता 2. राजनीतिक प्रतिबद्धता। सर्वप्रथम सामाजिक प्रतिबद्धता को स्पष्टत: समझना होगा।

‘‘आज दलित-शोषित-पीडि़त जनता को कल्पनालोक की रंगीनियों में भटकाने वाला साहित्य अपेक्षित नहीं है। आज तो जनता में वही साहित्य समादृत हो सकेगा जिसमें ‘‘रोटी का राग और क्रांति की आग’’ होगी। जो साहित्य जनता को सुलाए नहीं बल्कि झकझोर कर जगाए। ऐसे साहित्य का सर्जक ही वस्तुत: प्रतिबद्ध साहित्यकार हैं।’’1

साहनीजी के कथा-साहित्य में मुख्य रूप से मध्यवर्ग अभिव्यक्त हुआ है। साहनीजी ने मध्यवर्गीय समाज का इतना सहज और बेलौस चित्रण किया है कि लगता है उन्होंने स्वयं इस मध्यवर्गीय जीवन की समस्याओं को जिया और भोगा है। और इसीलिए वे मध्य वर्ग के प्रामाणिक पक्षधर बनकर सामने आए हैं। मध्यवर्ग का जीवन अनेक अन्तर्विरोधों के बीच पनप रहा है। सामंतवादी और पूंजीवादी व्यवस्था के निरंतर शोषण ने इस वर्ग को इतना जड़ बना दिया है कि वह अपने युग और समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं से भी वंचित है। प्रश्न है, अब उसे उस स्तर तक कैसे पहुंचाया जाए कि वह देश और समाज के विकास में अपनी उचित भूमिका निभा सके। साहनीजी ने इस वर्ग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का बड़ी कुशलता के साथ निर्वाह किया है। अपनी कलम के माध्यम से साहनीजी ने इस वर्ग को मानो गहरी नींद से जगाया है। उनके इस यथार्थवादी चित्रण पर श्री राजेश्वर सक्सेना अपना मत इस प्रकार प्रकट करते हैं- ‘‘भीष्म साहनी यथार्थवादी रचनाकार हैं। उनकी प्रत्येक रचना सोद्देश्य है। उनकी पकड़ वैज्ञानिक है। फिर भी वे अपनी प्रतिबद्धताओं में उदार और शालीन हैं। उन्होंने अपने संवेद्य-पदार्थ और उसके व्यापार को ऐतिहासिक-सामाजिक संबंधों में बांधा है तथा उसे समसामयिक हालात के अनुरूप बनाकर नई दिशा देने की कोशिश की है। साहनी जी की वस्तु और चरित्र-रचना के केन्द्र में उनकी ऐतिहासिक समझ है जो परिस्थिति और परिवेश के अन्तर्विरोधों को सामने लाती है तथा उन्हें दूर करते हुए विकासमान नतीजों तक ले जाती है। इस तरह साहनी जी की रचना में सामाजिक चेतना के विकास ने और परिपक्व होने के मुद्दे स्पष्ट किए हैं।’’2

साहनी जी की रचनाओं का एक आकर्षक बिन्दु है- आधुनिकता। उनकी प्रत्येक रचना में आधुनिकता का अंश किसी न किसी रूप में सर्वत्र विद्यमान है। बदलते हुए युग और परिवेश के अनुकूल ढलते और उसके साथ-साथ चलने की ललक उनके साहित्य में मौजूद है। साहनीजी की प्रत्येक कहानी में आशावादी दृष्टि परिलक्षित होती है, परिणामस्वरूप पाठक के हताश जीवन में आशा की एक नूतन किरण संचरित हो उठती है। वस्तुत: उनका साहित्य क्रांतिकारी भावनाओं को बल देने वाला अवश्य है, किन्तु उनकी क्रांति ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का पक्ष नहीं लेती।

साहनी जी ने ‘झरोखे’ और ‘कडिय़ां’ अपने इन दोनों उपन्यासों में मध्यवर्गीय जीवन की रुढ़ मान्यताओं और परंपराओं  पर तीखा व्यंग्य किया है। ‘झरोखे’ में जिस परिवार को विषय-वस्तु का आधार बनाया गया है वह परिवार कट्टर आर्य-समाजी है। उसमें आर्य-समाजी नियमों का दृढ़ता से पालन किया जाता है, किन्तु घर के नौकर को नौकर की हैसियत से उबरने नहीं दिया जाता। ‘कडिय़ां’ उपन्यास में पति-पत्नी के संबंधों की समस्या है। महेन्द्र नामक पात्र अपनी पत्नी को त्यागकर अन्य स्त्री के सम्पर्क में आता है। अपनी हीन भावनाओं से मुक्ति पाने के लिए वह परिवार के नैतिक संबंधों की उपेक्षा कर देता है। उसकी भावुकता के कारण उसका पूरा परिवार बिखर जाता है।

उनकी कहानियों में ‘राधा-अनुराधा’, ‘त्रास’, ‘गलमुच्छे’, ‘निशाचर’, ‘चीफ की दावत’, ‘खून का रिश्ता’, ‘निमित्त’, ‘देवेन’, ‘खुशबू’, ‘झूमर’, ‘साग-मीट’, ‘शिष्टाचार’ आदि ऐसी कहानियां हैं जिनमें सामाजिक विसंगतियों की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति है। इन कहानियों को पढक़र साहनीजी की सूक्ष्मदृष्टि का पता चलता है। समाज की सूक्ष्मातिसूक्ष्म विसंगतियों को भी उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया है जो निश्चय ही एक सराहनीय बात है। आज ऐसे ही प्रतिबद्ध रचनाकारों की आवश्यकता है जो रचनात्मक क्रांति के द्वारा समाज में आमूल परिवर्तन लाना चाहते हैं। साहनी जी माक्र्सवाद से भी प्रभावित रहे हैं। उनके साहित्य में एक ऐसी सहजता, सरलता और सादगी है जो उनकी रचनाओं का एक विशिष्ट गुण है। पूंजीवाद और श्रमिक वर्ग के संघर्ष को उनकी अनेक रचनाओं में देखा जा सकता है। उनका यथार्थवाद सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं को उद्घाटित करता है। भीष्म साहनी की रचनात्मक प्रतिबद्धता को श्रीप्रताप ठाकुर इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-

‘‘भीष्म साहनी ने अपने कथा-साहित्य में मध्य वर्ग के संस्कारों को बदलने का रचनात्मक प्रयास किया है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में ही मनुष्य का सामाजिक उठान संभव है। भीष्म साहनी के पास मनुष्य के उत्थान और उत्कर्ष की वैज्ञानिक दृष्टि है। भीष्म साहनी ने राष्ट्रीय भावात्मक एकता की वस्तुपरक परिस्थितियों को स्पष्ट किया है।’’3

साहनीजी ने समसामयिक परिस्थितियों को पहचानकर उनके प्रकाश में अपने कथा-साहित्य की सृष्टि की है। उनका साहित्य एक रचनात्मक दायित्व-बोध से निरन्तर अनुप्राणित रहा है। उनकी कथा-कृतियों की सार्थकता यही है कि उनकी वस्तुगत घटनाओं को हम अपने इर्द-गिर्द ही घटित होते देखते हैं। साधारणीकरण की स्थिति तो यहां तक पहुंची है कि उनके पात्रों के साथ हम भी हंसने-रोने और जीने-मरने लगते हैं। उनके अनुभव हमें अपने निजी अनुभव लगने लगते हैं। लगता है जैसे उन अनुभवों से हम भी गुकारे हैं, हम भी उनसे दो-चार हुए हैं।

डॉ. श्याम कश्यप ने साहनी जी की तमाम विशेषताओं को कुछ ही शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया है। वे कहते हैं-

‘‘भीष्मजी सूक्ष्म समाजदृष्टा लेखक हैं। वे समाज के गहरे अन्तर्विरोधों को तो उद्घाटित करते ही हैं, साथ ही उन कारणों की जड़ों तक जाते हैं और उन्हें बड़े पैने तरीके से उजागर भी करते हैं। इस प्रक्रिया में न तो निम्नवर्गीय लोगों के प्रति उनकी हार्दिक सहानुभूति ही छिपी रहती है और न ही वे उन निर्मम शक्तियों को बेनकाब करने में किसी किस्म का कोई संकोच बरतते हैं जो मानवीय संबंधों को सच्चे आत्मीय मानवीय संबंध नहीं बने रहने देना चाहतीं। यह समूची प्रक्रिया भी वे अपनी पूरी कलात्मकता के साथ बड़े सहज और स्वाभाविक ढंग से घटित कराते हैं, बिना किन्हीं आग्रहों या पूर्वाग्रहों के। इसलिए कब भीष्मजी के व्यंग्य की धार किस ओर है, इसे बड़ी सावधानी से देखने और परखने की जरूरत पड़ती है। उनका व्यंग्य कोरा व्यंग्य नहीं, बल्कि प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई की तरह करुणा की अथाह गहराइयों में से उपजा हुआ व्यंग्य है, जिसकी सामाजिक सोद्देश्यता को समझने में कभी भी भूल नहीं करनी चाहिए। करुणा से उपजी हुई इस आत्मीयता और व्यंग्य के दो धारे पर चलते हुए ही वे गकाब के कलात्मक संतुलन का भी परिचय देते हैं।  उनका व्यंग्य कब आत्मीय करुणा में डूब जाता है और कब इस करुणा से उपजी हुई उनकी आत्मीयता व्यंग्य में परिवर्तित हो जाती है, इसे बड़ी बारीकी से परखने की कारूरत है। उनका सामाजिक यथार्थवादी और आलोचनात्मक दृष्टिकोण ही उनमें सही चित्रांकन की अपार क्षमता पैदा करता है।’’4

भीष्म साहनी स्वयं यह कहते हैं कि लेखक किान्दगी को देखने का एक नकारिया देता है, उन्हीं के शब्दों में- ‘‘जब लेखक की अपनी सहानुभूति और सद्भावना पाठक के दिल में उतर जाए, उसके दिल की गहराइयों तक जा पहुंचे और पाठक भी उसी सद्भावनापूर्ण नकार से दुनिया को देखने-पहचानने लगे जिस नकार से लेखक ने देखा और पहचाना था, तब ऐसा लगने लगता है जैसे किान्दगी को देखने का एक नकारिया दिया है, लेखक उसका हाथ पकडक़र अपने साथ ले चला है, और उसे अपने परिवेश को जानने समझने की नकार दी है। जब लेखक और पाठक के दिल के तार इस तरह से जुड़ जाते हैं तो कला के बहुत सारे रूपवादी गुण पीछे छूट जाते हैं। तब इस बात का बहुत महत्व नहीं रह जाता कि लेखक ने अपनी कहानी किस्सागोई के अंदाज में कही है या अपनी ओर से टिप्पणी किए बिना कहानी का विकास हुआ है कि अमुक कहानी पर आर्यसमाजी प्रभाव था या गांधीवादी का या माक्र्सवाद का, कि कहानी अंत में नसीहत करती है या नहीं करती, कि कहानी आदर्शवादी है या यथार्थवादी। इतना का$फी है कि कहानी में किान्दगी बोल रही है और पाठक के दिल को उद्वेलित कर रही है।’’5 साहनीजी के इन विचारों को पढऩे के बाद उनकी प्रतिबद्धता स्वयमेव स्पष्ट हो जाती है।

भीष्म साहनी की प्रतिबद्धता का एक और सशक्त पहलू है- राजनीतिक प्रतिबद्धता। उनकी अनेक कथा-कृतियों में विभाजन से जन्मी करुणा और पीड़ा को महसूस किया जा सकता है। अंग्रेजों की कूटनीति और हिन्दू-मुस्लिम दंगों की परिणति देश के विभाजन में हुई और इस दौरान आगजनी-लूटमार और हत्याकांड की जो भीषण दुर्घटनाएं घटित हुई उनके फलस्वरूप बेशुमार मानव हताहत या बेघरबार हो गए- इन तमाम घटनाओं को एक तार में पिरोकर साहनीजी ने ‘तमस’ उपन्यास की सृष्टि की है। कृष्णा सोबती ‘तमस’ उपन्यास के बारे में कहती हैं-

‘‘ ‘तमस’ किान्दगी की छोटी-बड़ी लड़ाइयों की कहानी नहीं। यह विभाजन जैसी ऐतिहासिक घटना का, संघर्ष का, एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसमें एक साथ लाखों लोग अपने-अपने ठिकानों से उखड़े थे।’’6

 ‘तमस’ का दर्द साहनीजी का अपना दर्द है, उसका प्रत्येक शब्द उनके हृदय से फूटा है। कृष्णा सोबती लिखती हैं- ‘‘भीष्म उस दर्द को देर तक अपने में समोए-सहेजे रहे हैं। यह उन्हें सालता रहा है और सच तो यह है कि ‘तमस’ का लेखक बरसों तक उसे पालता रहा है। ‘तमस’ इस बात का सबूत है कि एक ईमानदार लेखक की तरह भीष्म उस भोगे हुए दर्द को दूरियों में से छानते चले गए होंगे, और आखिरकार बंटवारे का वह ब्यौरा पेश कर सके जो अपने सुधरे शिल्प और प्रस्तुतिकरण में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय रहेगा।’’7

 ‘मौकापरस्त’ कहानी में उन्होंने राजनीतिक दांव-पेंचों को बड़ी मार्मिकता के साथ चित्रित किया है। अर्थी को चुनाव जीतने का माध्यम बनाने का अधम कृत्य जो एक राजनीतिक करता है वह आज के व्यक्ति की सत्तालोलुपता की चरमसीमा है। यों तो धार्मिक एवं साम्प्रदायिक मतभेद समूचे विश्व की एक अत्यंत प्राचीन समस्या रही है। किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भारत में अंग्रेजी शासनकाल के दौरान यह समस्या अखण्ड भारत की एक काबरदस्त कमकाोरी बनकर प्रकट हुई। इस तथ्य को साहनीजी ने स्वयं ही यों स्वीकार किया है-

‘‘अंग्रेजों ने पहली बार व्यापक स्तर पर इन मतभेदों को भारतवासियों के खिलाफ एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया और हमारी विडंबना इस बात में रही कि हमने उनकी कूटनीति को जानते-समझते हुए भी धर्म के नाम पर भडक़ उठे देश के दो टुकड़े होने दिए और परस्पर विद्वेष का विषय फैलने दिया। धार्मिक मतभेदों को जब बढ़ावा दिया जाता है तो इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक मंसूबे कार्य कर रहे होते हैं।’’8

निष्कर्षत: स्वयं साहनीजी का विधान उद्धृत करना समीचीन होगा-

‘‘साहित्य के क्षेत्र में मेरे अनुभव वैसे ही सपाट और सीधे-सादे ही रहे जैसे जीवन में। मैं समझता हूं, अपने से अलग साहित्य नाम की कोई चीका भी नहीं होती। जैसा मैं हूं, वैसी ही मैं रचनाएं भी रच पाऊंगा। मेरे संस्कार, अनुभव, मेरा व्यक्तित्व, मेरी दृष्टि-सभी मिलकर रचना की सृष्टि करते हैं। इनमें से एक भी झूठी हो तो सारी रचना झूठी पड़ जाती है... जो रचना मात्र लेखक के मस्तिष्क की उपज हो, वह अक्सर अधमरी रचना होती है, भले ही लेखक शिल्प और शब्दों का लम्बा-चौड़ा ताना-बाना बुन रहा हो। लेखक का अपना सत्य जीवन के सत्य से निराला नहीं होता। न ही जीवन का सत्य और लेखक का सत्य दो अलग-अलग सत्य होते हैं एक ही सत्य होता है और वह जीवन का सत्य होता है। उसको साहित्य वाणी देता है।’’9

संदर्भ संकेत-

1. भीष्म साहनी की कहानी-कला: प्रो. अर्चना जैन, पृष्ठ 40 पाश्र्व प्रकाशन, अहमदाबाद, सन् 2005

2. भीष्म साहनी : व्यक्ति और रचना- राजेश्वर सक्सेना- प्रताप ठाकुर, पृष्ठ 80, वाणी प्रकाशन सन् 1982

3. वही, पृष्ठ 11-12

4. वही, पृष्ठ- 157

5. अपनी बात : भीष्म साहनी, वाणी प्रकाशन, सन् 1990

6. भीष्म साहनी : व्यक्ति और रचना-राजेश्वर सक्सेना- प्रताप ठाकुर, पृष्ठ 62, वाणी प्रकाशन सन् 1982

7. वही, पृष्ठ- 62-63

80. भारत विभाजन और हिन्दी उपन्यास- हरियश, पृष्ठ 48

9. अपनी बात : भीष्म साहनी- पृष्ठ-26-27, वाणी प्रकाशन, सन् 1990