Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

भीष्म साहनी और बलराज साहनी : दो भाई... दो दोस्त

अजय कुमार शर्मा

269 , सेक्टर -37

फरीदाबाद -121003 हरियाणा 

मो. 9868228620

भी ष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 को हुआ। यानि वे बलराज से 2 साल 3 महीने छोटे थे। बचपन में हुई नोंक-झोंक को छोडक़र पूरे जीवन दोनों में गहरी दोस्ती, प्यार और एक दूसरे के प्रति अगाध विश्वास बना रहा। दोनों का कार्यक्षेत्र भी लगभग एक-सा ही रहा। अध्यापन, अभिनय, ‘इप्टा’ के साथ जुड़ाव, लेखन, फिल्मों में अभिनय और सामाजिक कार्य... यही सब भीष्म साहनी ने भी किया।

भीष्म साहनी ने अपने लेखन में जगह-जगह अपने ऊपर पड़े बलराज के प्रभाव का जिक्र किया है। आगे चलकर तो उन्होंने ‘माई ब्रदर बलराज’ शीर्षक से एक पूरी किताब ही उन पर लिखी।

दोनों की पढ़ाई साथ ही शुरू हुई पोठोहार के गुरुकुल में। फिर डी.ए.वी. स्कूल रावलपिंडी में और उसके बाद गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में। बचपन से ही जैसा कि होता आया है, उनकी हर बात की तुलना बड़े भाई बलराज से की जाती है हर बात में वे उनसे कोसों दूर नकार आते। बलराज का चेहरा दमकता तो भीष्म के चेहरे पर रंगत ही नहीं, बलराज गोरे तो भीष्म सांवले, बलराज तगड़े तो भीष्म मरियल (बचपन में ज्य़ादातर बीमार रहने से), बलराज को पूजा के सारे मंत्र याद... तो भीष्म को कुछ भी याद नहीं..., बलराज की लिखाई तो ऐसी है जैसे मोती पिरोता है... पर छोटा (भीष्म)तो $खर दिमाग है, आवारा घूमता है... इस तुलना में भीष्म साहनी के अंदर धीरे-धीरे हीनभावना पनपने लगी। इस बारे में उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ में लिखा भी है। लेकिन कुल मिलाकर भीष्म साहनी के पहले ‘हीरो’ बलराज ही थे। उनसे लाख ‘ईष्र्या’ रखने पर भी वे उनके अनुगामी होते चले गए। बचपन में वे बलराज को भ्राताजी कहते थे और स्कूल की पढ़ाई के बाद ‘भापाजी’ कहने लगे थे। उम्र में वे दो साल छोटे थे किन्तु पढ़ाई में तीन साल।

पढ़ाई के बाद जब बलराज अपने जीवन-यापन के लिए रावलपिंडी से बाहर निकले तो भीष्म अपने पिता और उनके बीच एक दूत का सा काम करते रहे। बलराज काम के सिलसिले में कहीं भी पहुंचते... चिंतित पिता भीष्म को उनकी $खोज-$खबर लेने तुरंत ही भेज देते। लाहौर, शांतिनिकेतन, कलकत्ता, सेवाग्राम, बंबई... हर जगह वे उनका हालचाल जानने गए। जाते तो वे अपनी पिता की ढेर सी हिदायतों के साथ थे कि वे उन्हें समझा-बुझाकर वापस रावलपिंडी ले आएं... लेकिन अक्सर वे बलराज से मिलते ही, उनके रंग में रंग जाते और उनकी हां में हां मिलाते हुए खाली हाथ वापस लौट अते। इस दौरान दोनों में गर्मागर्म बहसें भी होती और गंभीर सलाह-मशविरा भी होता।

दोनों के बीच पत्रों के माध्यम से एक अटूट संबंध बलराज साहनी की मृत्यु तक बना रहा। दोनों भाई अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों से लेकर, छोटी से छोटी बात भी पत्रों के माध्यम से एक-दूसरे को बताते।

इन पत्रों में घरेलू मुश्किलों से लेकर देश-दुनिया से जुड़ी गंभीर बातों पर भी राय प्रकट की जाती। शुरू में पत्र-व्यवहार की भाषा अंग्रेजी रही, लेकिन 1953 से वे भीष्म को पंजाबी भाषा में पत्र लिखने लगे थे। 1955-1956 के दौरान भीष्म साहनी को लिखे पत्रों में उन्होंने फिल्मी-दुनिया को छोडक़र दिल्ली या श्रीनगर में बसकर अपना जीवन ‘साहित्य-सृजन’ में लगाने की बात कई बार दुहराई है। कुछ समय तक तो बलराज घर लौटकर ‘अपना शांतिनिकेतन’ स्थापित करने का सपना देखते रहे। बाद में उन्होंने यह योजना कुछ समय टालकर बंबई में अपना घर बनाया और इसकी जरूरत पर भीष्म साहनी को लंबा पत्र लिखा।

अपनी बड़ी बेटी शबनम की असफल शादी से बलराज को गहरा धक्का लगा था। इस सिलसिले में वे अपने परिवार से तो खुलकर बात नहीं कर पाते थे, लेकिन भीष्म जी को पत्रों में अपने मन की व्यथा लिखते रहे। एक पिता की मनोदशा को अभिव्यक्त करते ये पत्र बड़े ही मार्मिक हैं। शबनम की मृत्यु ने बलराज को अंदर से तोड़ दिया था। उसकी मृत्यु के बाद उन्होंने पंजाब में रहने का निर्णय लिया था और अमृतसर के पास लेखकों की बस्ती ‘प्रीतनगर’ में एक घर भी खरीद लिया था।

उन्होंने भीष्म साहनी को लिखे अपने अंतिम पत्र (8 अप्रैल 1973) में उन्हें सूचना दी थी कि वे 13 अप्रैल को पंजाब के लिए रवाना होंगे और यह आग्रह भी किया था कि वह उनके साथ चलें... लेकिन ऐसा न हो सका... वे पंजाब की बजाय दुनिया से ही चले गए। भीष्म साहनी जिन्होंने बलराज की कोई चिट्ठी नहींफाड़ी थी, जाने क्या सोच इसे फाड़ डाला था...।