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Monday 20 Nov 2017

‘तमस’ पढ़ते हुए

अजय चंद्रवंशी

राजमहल चौक, फुलवारी के सामने

कवर्धा, जिला- कबीरधाम (छ.ग.)

मो. 9893728320

‘तमस’ बीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास को पढऩा एक त्रासदी से गुजरना है। इसको पढऩे से पता चलता है, स्वतंत्रता से ठीक पूर्व देश की स्थिति कितनी भयानक हो चली थी, साम्प्रदायिकता कैसे मानवता को तार-तार कर देती है, जहां आदमी को अपने पास-पड़ोस के लोग ही, जिनके साथ वह पला-बढ़ा होता है, दुश्मन नजर आने लगते हैं, जहां दूसरे धर्मों की स्त्रियों का बलात्कार, हत्या, बच्चों-बूढ़ों की हत्या का ‘धर्मयुद्ध’ घोषित किया जाता है। लेखक ने ठीक ही लिखा है ‘‘लडऩे वालों के पांव बीसवीं सदी में थे, सिर मध्ययुग में।’’ आज की स्थिति में कोई बदलाव नकार नहीं आता।

इन साम्प्रदायिक दंगों के पीछे ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और शासन करो की नीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह स्वतंत्रता की मांग से ध्यान हटाने के लिए साम्प्रदायिक झगड़े को मौन प्रोत्साहन प्रदान करती थी, जिसे रिचर्ड के व्यवहार के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट किया है। लेकिन इन दंगों के पीछे एकमात्र ब्रिटिश सरकार नहीं थी। एक तो मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक राजनीति- ‘‘ले के रहेंगे पाकिस्तान,’’ जो खुद को मुस्लिमों का एकमात्र प्रतिनिधि मानती थी, दूसरी ओर हिन्दू धार्मिक संगठन जो हिन्दू राष्ट्र का सपना देखते रहे हैं और ‘‘म्लेच्छो’’ से देश को ‘मुक्त’ करना चाहते रहे हैं, ने भी आग में घी डालने का काम किया। इन साम्प्रदायिक झगड़ों के पीछे इतिहास की परछाइयां भी है। किसी को अपने अतीत की हार का बदला लेना है, तो किसी को खोए साम्राज्य को प्राप्त करना, जो इन लोगों के जेहन में रह-रह कर उभर आता है।

खुद को अपने कौम के रहनुमा बताने वाले लोगों का भी अपना स्वार्थ होता है। नत्थू से सूअर मरवाकर मस्जिद के सामने फिंकवाने वाला मुराद अली ही था, जो आखिर में सबसे पहले नारा लगता है ‘‘हिन्दू-मुस्लिम एक हों।’’ स्वतंत्रता की लड़ाई लडऩे का दावा करने वाले कांग्रेस के नेताओं का भी स्वार्थ छुपा नहीं था। वे बड़े-बड़े ठेकेदार, बीमा एजेंट, टिकट की राजनीति करने वाले, दंगों में भी अपना स्वार्थ देख रहे थे। दरअसल हर दंगों का वर्गीय आधार भी होता है। देवदत्त कहता भी है ‘‘दोनों ओर गरीब कितने मरे, अमीर कितने मरे। इससे भी तुम्हें कई बातों का पता चलेगा।’’ इन दंगों में गरीब ही अधिक मारे जाते हैं, अमीर चाहे किसी भी धर्म के हों उन्हें कम नुकसान होता है, क्योंकि उनके एक-दूसरे से स्वार्थ सधते हैं। इन्हें लक्ष्मीनारायण और नूरइलाही के संबंधों से समझा जा सकता है।

ऐसा नहीं कि दंगों के दौरान सारे लोग अपनी मानवता खो देते हैं, कुछ लोग हमेशा होते हंै जिनमें संवेदना बची रहती है। नत्थू अनजाने में सूअर जरूर मार देता है लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसी सूअर को मस्जिद के सामने फेंका गया है तो वह बेचैन हो जाता है, उसे भय के कारण आत्मग्लानि भी होती है। हरनाम सिंह और उसकी पत्नी बंतो को एक मुस्लिम परिवार पनाह देते हैं, उनको गांव में खतरा होने की खबर भी करीम खान देता है। रघुनाथ और उसकी पत्नी की मदद उसका दोस्त शाहनवाज करता है। शाहनवाज के माध्यम से भीष्म साहनी ने आदमी के अवचेतन मन का बखूबी चित्रण किया है। शाहनवाज रघुनाथ के परिवार की खुशी-खुशी मदद करता है, लेकिन आसपास के साम्प्रदायिक माहौल उसके अवचेतन मन को प्रभावित कर रहे थे, यही कारण है कि वह अचानक नौकर मिल्खी की पीठ में जोर से लात मार देता है।

इस उपन्यास में कुछ स्थल इतने डरावने और मार्मिक हैं कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जैसे नत्थू द्वारा सूअर को मारना। ऐसा लगता है कि यहां लेखक साम्प्रदायिकता के सूअर से लड़ रहा है जो मरता ही नहीं। जसवीर सिंह का मुस्लिम बनाया जाना भी अत्यंत मार्मिक है, उसी तरह सिख महिलाओं का बच्चों को साथ लेकर कुएं में कूदना। रणवीर को हत्या की ट्रेनिंग देना, भी डरावना चित्रण है।

उपन्यास में रिचर्ड के चरित्र के माध्यम से लेखक ने ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारियों के दोहरे चरित्र को दिखाया है। एक तरफ वह अध्ययनशील, इतिहास का अध्येता, प्राकृतिक सौंदर्य का प्रेमी नजर आता है। लेकिन उसके इस ‘प्रकृति प्रेम’ की पोल लीकाा के इस कथन से खुल जाती है, जब वे दंगाग्रस्त क्षेत्र में दंगे के बाद घूमने निकलते हैं ‘‘तुम कैसे जीव हो रिचर्ड, ऐसे स्थानों पर भी तुम नए-नए पक्षी देख सकते हो, सार्क पक्षी की अवाज सुन सकते हो?’’ इस पर रिचर्ड का जवाब ब्रिटिश शासन का यथार्थ है। ‘‘इसमें कोई विशेष बात नहीं है, लीजा, सिविल सर्विस हमें तटस्थ बना देती है। हम यदि हर घटना के प्रति भावुक होने लगे तो प्रशासन एक दिन भी नहीं चल पाएगा।’’ यह विडंबना है कि लोग असली दुश्मन ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नहीं समझ पा रहे थे। और जो समझ पा रहे थे जैसे- जनरैल, उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। आखिर में जब अमन कमेटी की मीटिंग भी होती है तो कॉलेज में क्योंकि वह ‘‘न हिन्दुओं का था, न मुसलमान का, कॉलेज ईसाइयों का था।’’

कुल मिलाकर यह उपन्यास साम्प्रदायिकता, ब्रिटिश कूटनीति और उसमें उपजी समस्याओं का मार्मिक दस्तावेज है, जो आज पहले से भी अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि साम्प्रदायिक ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवार दिखाई दे रही हैं।