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Thursday 23 Nov 2017

पहेली है ये मन बेईमान

संतोष झांझी
डी/7, स्ट्रीट-12, आशीष नगर (पश्चिम)
भिलाईनगर
(छ.ग.)- 490006
मो. 9300211143
जोर की आवाज के साथ, दरवाजा खोल कोई अन्दर आया। वे एकबारगी चांैके, दिल धक से कांपा। रूद्र ने एक लिफाफा दूर से ही उनके बिस्तर पर उछाला- 'आपकी चिट्ठी...Ó फिर वैसे ही जोर की आवाज के साथ दरवाजा खोला और उढ़का गया। वे मन ही मन बुदबुदाए- 'जरा नहीं सोचते, कोई बीमार हैं। अभी-अभी ले देकर आंख लगी थी। दरवाजा धीरे से भी तो खोला और बंद किया जा सकता है। न बहू को तमीज है, न ही उसने बच्चों को तमीज सिखाई है। सिखाने पर भी नहीं सीखेंगे ये च्वींगम चबाते डिस्को डांसर बच्चे।Ó
कुहनी के बल धीरे-धीरे उठकर उन्होंने अपना चश्मा टटोला। लिफाफे पर नजऱ पड़ते ही उनके चेहरे के भाव बदले, हल्की सी मुस्कान उभरी। पूर्वी का पत्र था, साथ में राखी। वे राखी को हाथ में पकड़े कुछ देर अपलक निहारते रहे, फिर लम्बी सांस लेकर राखी वापस लिफाफे में रख दी। पत्र पढ़ते हुए उनकी आंखों के सामने वही पन्द्रह साल की अल्हड़ चंचल पूर्वी घूमती रही। क्या पूर्वी अभी भी वैसी ही होगी। उसके बाद उसे कभी देखा नहीं, चालीस साल हो गए उसे गए। कभी तो आती लौटकर, क्यों नहीं आई? वह भूली नहीं है। भूल जाती तो पत्र नहीं लिखती। बस कुछ वर्षों से साल में एक बार पत्र लिखती है केवल राखी भेजने के लिए।
उन्होंने थककर दीवार से टेक लगाकर आंखें मूंद ली।  बच्चन जी की कविता उन्हें बहुत पसंद थी। वही गुनगुनाते रहे-  पार तम के दीख पड़ता एक दीपक झिलमिलाता/जा रहा उस ओर हूं मैं मत्त मधुमय गीत गाता/इस कुपथ पर या सुपथ पर मैं अकेला ही नहीं हूं/फिर न जाने क्यों जगत यह उंगलियां मुझ पर उठाता। धीमे कदमों की आहट हुई। कुछ देर लक्ष्मी चुपचाप खड़ी उन्हें गुनगुनाते सुनती रही, फिर लम्बी सांस लेकर उनके माथे पर हाथ रखा- 'दवा खानी है उठिये। पहले चाय पी लीजिए।Ó लक्ष्मी ने चाय का कप और बिस्कुट की प्लेट उनकी तरफ बढ़ाते हुए सपाट स्वर में पूछा- 'राखी आ गई।Ó
उन्होंने लक्ष्मी के चेहरे की तरफ देखा, आज भी वही चालीस साल पुराने भाव थे पर कुछ धुंधले से। शायद चश्मे के कारण, लक्ष्मी के चेहरे की झुर्रियों के कारण या हो सकता है कमरे में घिरे शाम के धुंधलके के कारण। उन्होंने तकिये के नीचे से लिफाफा निकालकर बढ़ाया- 'पढ़ लो।Ó
-'क्या करूंगी पढ़कर? इतनी पढ़ी लिखी कहां हूं जो पढ़कर कुछ समझ सकूं।Ó कप प्लेट उठाकर लक्ष्मी ने उनके माथे को छूते हुए कहा- 'ठीक से ओढ़कर लेटिये। लगता है फिर बुखार चढ़ेगा। माथा गरम लग रहा है। मैं अभी दिया- बत्ती करके आती हूं।Ó
रात भर बुखार में चिंहुक कर वो कई बार उठे। आंखों के सामने और सपनों में वही चालीस साल पहले की पूर्वी नजर आती रही।
एक दिन उनके छोटे से स्कूल के सामने मिलिट्री की जीप आकर रूकी। उसमें से ऊंचे लम्बे कैप्टन बत्रा उतरकर अन्दर आए। बच्चों सहित दुबे सर उनके सम्मान में उठकर खड़े हो गए। वे इस अहिन्दी भाषी क्षेत्र में नए-नए आए थे। उन्हें अपनी बेटी के लिए हिन्दी में पढ़ाने वाले सर की आवश्यकता थी। ताकि उनकी बेटी दिल्ली जाकर एग्जाम दे सकें।
-'पूरे इस क्षेत्र में एक आप ही हैं जो हिन्दी पढ़ाते हैं। ऐसा मुझे बताया गया है। मेरी बेटी दसवीं जमात का एग्जाम देगी। प्लीज अगर आप उसे पढ़ा दिया करे तो...Ó
उन्हें तो ट्यूशन की हमेशा ही आवश्यकता रही थी। बिहार में संयुक्त बड़ा परिवार था उनका। दादा-दादी, माता-पिता तीन छोटे भाई, पत्नी और दो बच्चे सबकी जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। वे इस अहिन्दी भाषी क्षेत्र में रहने वाले हिन्दी भाषी परिवारों के बच्चों को स्कूल के साथ-साथ ट्यूशन भी पढ़ाते थे।
पूर्वी को वो सप्ताह में तीन-चार दिन पढ़ाने जाते। कैप्टन साहब को पता था, यहां उनका परिवार नहीं है। मैडम और पूर्वी उन्हें चाय-नाश्ता और खाना खाए बगैर कभी जाने न देती। उन्हें अक्सर खाना बनाना ही नहीं पड़ता था। मारवाड़ी घरों की बहुतायत थी। वो जहां भी ट्यूशन पढ़ाने जाते, कोई भी उन्हें भोजन किए बिना जाने न देता। वो समय ही ऐसा था। लोग दरियादिल थे।
पूर्वी बहुत सुन्दर कच्ची उम्र की चंचल बच्ची थी। कुछ दिनों से दुबे जी महसूस कर रहे थे। पूर्वी उनमें बहुत दिलचस्पी लेने लगी है। पहले तो उन्हें लगा यह उनका वहम है, पर धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया यह उनका वहम नहीं है। पूर्वी की चंचलता और सोच गलत दिशा ले रही थी। दुबे जी चिंचित हो उठे। चार महीने बाद ही पूर्वी को दसवीं के पेपर देने दिल्ली जाना था। वे गंभीर बने उसे पढ़ाते रहते। पूर्वी उन्हें पढ़ाते हुए एकटक देखती रहती जब दुबे जी की नजर उस पर पड़ती तो शर्म से उसके गाल लाल हो दहकने लगते। उसकी नजरें झुक जाती। पूर्वी की कोशिश रहती कि वे उसे रोज पढ़ाने आए।
दुबेजी समझ गए इसमें पूर्वी की कोई भूल नहीं यह उम्र ही ऐसी है। यह नजदीकियों का आकर्षण है। चालीस वर्ष पहले गल्र्स स्कूल अलग होते थे। उन दिनों को-अजुकेशन नहीं थी।
दुबे जी पैंतीस साल के शादीशुदा दो बच्चों के पिता थे पर जीवन की कठिनाइयां झेलते हुए उनकी कनपटी पर अभी से सफेदी झलकने लगी थी। यह सब देखकर भी पूर्वी के दिल में यह कैसा आकर्षण था? वो गहरी सोच में डूब जाते। मुझसे बीस-बाइस वर्ष छोटी, इस चौदह पन्द्रह साल की बच्ची को मुझमें क्या नजर आ गया?
दुबे जी जानते थे पूरा परिवार संस्कारी है पूर्वी भी बहुत संस्कारी बच्ची है। लोग तो मौका ही ढूंढते हैं ऐसी बच्चियों को बहकने और बहकाने का।
-'पूर्वी जो मैंने पढ़ा दिया उसे अब तुम याद करो रिवीजन करती रहो। मैं बीच-बीच में आकर देख लिया करूंगा।Ó
पूर्वी एकदम सकते में आ गई- 'नहीं सर, आपको रोज आना होगा। मुझे अभी कुछ भी नहीं आता। मैं फेल हो जाऊंगी।Ó
-'मैंने कहा न बीच-बीच में आता रहूंगा। बस तुम याद करो जो मैंने पढ़ाया।Ó
दुबे जी ने घर जाकर पिताजी को पत्र लिखा- 'भाई के साथ लक्ष्मी और बच्चों को दो महीने के लिए भेज दीजिए। भाई के लिए भी यहां काम मिलने की आशा है।Ó
कैप्टन साहब के घर दुबे जी पत्नी और बच्चों सहित मिलने गए। पूर्वी खुश थी उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। दुबे जी सब नोट कर रहे थे। बस इस बच्ची को सही दिशा देनी है। कच्ची उम्र के आकर्षण में बंधकर बीस बाइस वर्ष बड़े व्यक्ति से जुड़ाव महसूस कर बैठी है लड़की।
पूर्वी के एग्जाम में पन्द्रह दिन बचे थे। एक हफ्ते बाद वह दिल्ली एग्जाम देने जाने वाली थी। दुबे जी एक दिन पढ़ाकर बाहर निकले तभी कैप्टन बत्रा आ गए।
-'मास्टर साहब लगता है आपसे अब विदा लेनी पड़ेगी।Ó
-'क्या हुआ सर? ट्रांसफर हो गया क्या?Ó
-'अगले हफ्ते परिवार को दिल्ली भेज रहा था कि बच्ची को एग्जाम दिवा लाए। अगले महीने मुझे खुद जम्मू जाना पड़ेगा। अब वापस आकर क्या करेंगे? क्यों?Ó
-'हां बात तो आपकी ठीक है। यह अचानक आप सबका जाना अच्छा नहीं लग रहा।Ó पर अन्दर से दुबे जी ने राहत की सांस ली।
-'वह तो एक दिन होना ही था।Ó
पूर्वी हिचकियां ले लेकर रो रही थी मैडम बत्रा उसे संभाल रही थी।
-'देखो जरा इस लड़की को। पहले यहां आई तो कह रही थी कैसी बोर जगह आ गए, और अब जाने के नाम से कैसे रो रही है।Ó
जाने वाले दिन दुबे जी हाथ में मिठाई का डब्बा लेकर आए- 'कैप्टन साहब सोच रहा हूं पूर्वी जा रही है तो सदा के लिए एक रिश्ता बना लूं। आज रक्षाबंधन तो नहीं है, मेरी एक ही बहन थी एकदम यही चेहरा था उसका पूर्वी जैसा।Ó
उन्होंने जेब से राखी निकाली। पूर्वी ने राखी बांधी। दोनों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाई और खाई। पूर्वी जिस आकर्षण को कोई नाम नहीं दे पा रही थी उसे अब वह नाम मिल गया था। उसकी आंखों में आंसू थे पर चेहरे पर मुस्कान खेल रही थी। दुबे जी समझ गए, शायद पूर्वी को सही दिशा मिल गई है।
आज अपने घर परिवार में खुश थी पूर्वी। चालीस वर्ष बाद भी उस रिश्ते से जुड़ी हर वर्ष राखी भेज रही थी। उसने एक पत्र में लिखा था।
-'भैया, पता नहीं क्यों पहली बार आपको देखते ही मैंने एक अजीब सा खिंचाव और अपनापन महसूस किया था और आपकी तरफ खिंचती चली जा रही थी। वह कैसा खिंचाव था? मुझे कुछ समझ में नहीं आया। शायद आपसे कोई पूर्व जन्म का रिश्ता होगा। जब आपकी कलाई पर राखी बांधी तब जाकर मुझे समझ में आया कि मैं शायद आपसे कोई बहुत ही करीबी रिश्ता चाहती थी।Ó
लक्ष्मी ने पूर्वी का वही एक पत्र पढ़कर पता नहीं मन में कौन सी गांठ बांध ली थी। इस रिश्ते पर उसने मौन साध लिया था।
उनकी आंखें बंद थीं पर कानों में कई आवाजें आ रही थीं। उन्हें सुनाई दे रहा था। कोई कह रहा है- 'माथे पर ठंडी पट्टी रखनी चाहिए थी।Ó
-'रूद्र अपने पापा को फोन कर।Ó लक्ष्मी की घबराई हुई आवाज थी।
-'अभी अभी तो दवा पिलाकर गई हूं। चाय बिस्कुट भी दिये थे।Ó
बेहोशी के आलम में उनकी सोच सारी सीमाएं लांघ सिंगापुर तक जा पहुंची। अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पूर्वी को बहकने भटकने से बचा लिया था उन्होंने। आज वह दूर सिंगापुर में है अपने बेटे-बहू के पास... सुखी है पूर्वी... पर... पर वो खुद अपने ही मन पर अंकुश नहीं लगा पाए। आज भी... आज भी चालीस वर्षों से वह उनकी यादों में बसी है ज्यों की त्यों। जिस रिश्ते को पूर्वी ने हंसते-हंसते स्वीकार कर लिया, उसी रिश्ते को वह खुद क्यों स्वीकार नहीं कर पाए? क्यों उसकी भेजी राखी छुपाते रहे। कभी स्कूल के ड्राअर में कभी आलमारी में। रखी रह गई सारी राखियां। जीवनभर उन्होंने खुद से ही खुद को छुपाये रखा।
वे भी कहां समझ पाए थे अपने मन को। वह तो तब समझ में आया जब पूर्वी उस पाक रिश्ते में बंधकर उनसे दूर चली गई।
-'डॉक्टर साहब बुखार तो नहीं है। शरीर एकदम ठंडा लग रहा है देखिये...Ó
डॉक्टर बिना उत्तर दिये सर झुकाकर बाहर निकल गया। लक्ष्मी उनके सीने से लगी सिसक रही थी। बच्चे पास खड़े आंसू बहा रहे थे। अचानक लक्ष्मी का हाथ उनके कुर्ते की ऊपरी जेब में रखे किसी छोटे से कागज से टकराया। उसने जेब में हाथ डालकर बाहर निकाला तो छोटी-सी फोटो में एक चौदह-पन्द्रह साल की लड़की दो चोटियों का रिबन बांधे मुस्करा रही थी। बिना चश्मे और आंसू भरी धुंधवाती आंखों से भी लक्ष्मी ने पूर्वी को पहचान लिया था। उसने सबसे नजर बचाकर चुपके से फोटो अपने ब्लाउज में छुपा ली और उनके सीने से लगकर चीखकर रो पड़ी...
'बेईमान कहीं के...Ó