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Thursday 23 Nov 2017

चाय ठंडी हो रही है


रमेश चन्द मीणा
मोती कुंज, 2-ए-16, जवाहर नगर, बून्दी, राज 323001
घर, दुकान या बाजार में कोई भी मिल जाए वह हाथ में पान पराग की पुडिय़ा खोल कर बड़े ही अदब से मोटी-काली मूंछों के बीच हल्के-हल्के मुस्कराता हुआ, कुछ न कुछ बोलता हुआ, गांव की राजनीति हो या देश-प्रदेश की, घंटों बैठकर या फिर खड़े-खड़े बतिया सकता था। अगर आप उसके घर या ऑटो पाट्र्स की दुकान पर चले गए या पास से भी गुजर रहे हैं तो फिर किसी की क्या मजाल कि उसकी चाय बिना पिएं  आ सकें।
दुकान देर रात तक खुलती। जहां वेल्डिंग करने, चूड़ी डालने और कम्प्रेसर आदि की सारी व्यवस्था थी। भले ही दुकान बहुत बड़ी नहीं थी फिर भी काम सारे होते थे। आसपास गांव वाले किसान, किसानों के युवा लड़के डीके ऑटो से ही ट्रेक्टर के सामान लेते, नकद तो नकद, नहीं तो उधार तो मिलना ही है। डीके किसी को वापस जाने नहीं देता था। डीके की बहुत जल्दी ही कस्बे में तूती बोलने लगी थी। कम उम्र में ही दुकान खोलकर बैठ गया था और मंडी कमिटी में अध्यक्ष बन गया था।
उसकी चाय अधिकांश ने पी होगी जिन्होंने बेशक उसके पक्ष में वोट नहीं दिए होंगे। फिर भी उसके पक्ष में इतने वोट गिरे कि वह जीत जाता है। जब युवा जिसके साथ हो, उसे कौन हरा सकता है? फिर कौन है भला ऐसा जिसने डीके की चाय दस-पांच बार नहीं पी हो। सो चाय की याद में जीत कर डीके हो जाते हैं अध्यक्ष।
उसी डीके ने एक दिन सभी चाय वालों की चाय का मजा फीका कर दिया। किसी ढाबे, चाय की थड़ी पर लोग चाय नहीं पी सके, सभी मन मार कर घर लौट जाते हैं। किसी का मन नहीं कर रहा था कि एक घूंट चाय का ले लें। चाय वाले, चाय बनाने के लिए तैयार थे, पर कोई बनाने के लिए ही नहीं कह रहा था कि चाय बना दें। लोग आ रहे थे, जा रहे थे। खुसर-फुसर का दौर था। बीडिय़ां फंूकने से आसमान धुएं से भर गया था। वे बेहद चिंता में एक ही बात कर रहे थे! अरे वह चाय!! बस इतना कहते और इधर-उधर हो जाते। जैसे पूरे कस्बे ने ठान लिया था कि नहीं पीएंगे चाय। कैसे पीएं चाय! जब वही नहीं रहा, नहीं, चाय में अब क्या टेस्ट रहा! जैसे चाय चाय तत्व से विहीन हो गई हो।
एक दिन, पूरा कस्बा सुबह-सुबह ही शोक में डूब जाता है। जब पता चलता है कि डीके चाय वाला नहीं रहा! क्या कहा? 'पागल है क्या?ÓÓ सुनने वाले ने कहने वाले को बुरी तरह से डांटा! -'बेवकूफ ! क्या बक रहा है। होश में तो है! डीके नहीं रहा! शर्म नहीं आती। एक युवा साथी के लिए सुबह-सुबह क्या ऊलजुलूल बके जा रहा है?Ó पहले वाले की पूरी बात भी नहीं सुनी गई कि इसी अंदाज में उस दिन कइयों को डीके के दोस्तों से डांट खानी पड़ी और सुनाने वाला वहां से मुंह दबाकर भागा। पर कब तक डांटते। जब सब यही कहने लगे। सच तो सच ही होता है भले ही कडुवा लगे।
 कैसे क्या हुआ? क्यों हुआ? ढेर सारे सवाल दाग दिए गए। सल्फास की गोली ले ली। अस्पताल लेकर भागे। बारां, कोटा ले जाया गया पर नहीं बचाया जा सका। उल्टियां भी कराई पर कुछ नहीं हो सका। वह चला ही गया।
कैसे ली? क्यों ली? किसने दी गोलियां? क्या वह मूर्ख था? इतनी भी समझ नहीं थी कि मरने को सल्फास ही बेेच दी। नहीं देनी चाहिए थी। कौन मेडीकल वाला था वह? बता साले के लगाते दो-चार झांपट!
वह जब मांग रहा था गोलियां उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। मुस्कराते हुए मांगता है। पहले उससे हाल-चाल पूछे और सल्फास हाथ में आते ही धीरे से पेंट की जेब में सरका ली। बाजार से गुजरते हुए, जिससे भी मिला, मुस्कराते हुए। फिर उसे याद आया कि कोई मिलने वाला है तो ठहरकर थड़ी वाले से चार चाय के लिए बोला। बहुत सी बातें की, बातें करते हुए मुस्कराया भी, राजनीति पर कुछ बोला, चाय खत्म हुई तो एकदम चल नहीं पड़ा। पीछे मुड़कर देखा, फिर से मुस्कराया और आगे बढ़ गया।
पूरे बाजार का कोई एक किलोमीटर चक्कर काट कर घर लौटता है। घर आते ही पत्नी से चाय के लिए बोला क्योंकि घर पर आठ दस लोग पहले से बैठे हुए थे सो चाय बननी ही थी। पत्नी से पानी मांगा और कमरे में चला गया। पत्नी वापस आकर उबलते पानी में चाय की पत्ती डालती है। बस इतनी ही देर में सब कुछ हो गया। किसी को किसी तरह की खबर नहीं। कैसे रोकते? वह तो चाय बनाने के लिए कहकर कमरे में चला गया। बाहर इंतजार हो रहा था कि बहन और छोटा भाई आये हुए हंै बहुत दिनों बाद। बाहर निकल कर आयेगा। बातें करेगा। चाय अगर बने, मेहमान बाहर हों और डीके अंदर रहे। यह तो हो ही नहीं सकता! पत्नी अंदर देखने गई तो डीके खाट पर लेटे लेटे ही पत्नी से बोला-'फलां बैंक में, फलां नंबर से, फलां अलमारी में, फलांणे के पास इतना, ढिकाणे के पास उतना और तीसरे के पास इतना है....।Ó
पत्नी ने जोर से लताड़ा-'क्या बकवास लगा रखी है। बाहर चाय पर इंतजार हो रहा है, आपको पैसों की पड़ी है। बाहर आओ और चाय पिलाओ।Ó
'अब तुम पीओ और पिलाओ लोगों को- चाय। यह काम अब तुम्हें अकेले ही करना है। डीके अब किसी को कोई चाय नहीं पिलाएगा समझी।Ó वह यह कह कर थोड़ा गंभीर हुआ। उसे पहली बार अहसास हुआ और जल्दी से बोला -'बेटे और बेटी को अंदर बुलाओ, अंतिम बात बता दूं।Ó
पत्नी को दाल में काला लगा। वह घबराई, दौड़कर बच्चों को साथ लेकर आई और पूछने को हुई। डीके ने हाथ के इशारे से रोक दिया -'मुझे बोलने दो, मेरे पास अब समय कम है। तुम बोलती रहना बाद में।Ó
पर पत्नी को अब रहा नहीं गया-'बात क्या है? क्या हो गया है? बहकी-बहकी बातें क्यों किए जा रहे हो?Ó
वह फिर बीच में ही बोला-'सुनो मैंने सल्फास ले लिया है। मैं बचूंगा नहीं पर तुम्हें किसी तरह की कमी नहीं रहेगी। फलां बैंक में इतना....।Ó अब पत्नी दहाड़ मारकर रो पड़़ती है। बाहर बैठे भाई, बहन और अन्य आवाज सुनकर दौड़े चले आते हैं। किसी तरह से खींचकर वरांडे में निकाल कर लाया जाता है। गाड़ी मंगाई जाती है। डॉक्टर भाई के तो पैरों तले से जमीन खिसक जाती है। वह कई रोगियों का इलाज कर चुका होता है पर भाई को इस हालत में देख कर वह समझ नहीं पाता। उल्टियां कराने की जुगत करता है। घर में रोना-पीटना होने लगता है।
किसी तरह से गाड़ी में बिठाने का प्रयास करते हैं। पर डीके अड़ा है, मुझे कहीं नहीं जाना है। बोला --'तुम चाय पीओ ठंडी हो रही।Ó
पहली बार उसके कहे को सभी ने नजरअंदाज किया। किसी ने चाय की तरफ नहीं देखा। इधर से उधर दौड़ भाग की जाने लगी। अस्पताल पहुंचे। देखते ही डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए-'यहां संसाधनों की कमी है इसे आगे ले जाओ। यहां इलाज संभव नहीं होगा।Ó पीछे रह गए लोगों से डॉक्टर ने साफ  कह दिया कि अब कुछ भी नहीं हो सकता है।
डीके कार में पड़ा है। आंखे खुली हंै। चेहरे पर चिंता जैसा कुछ नहीं है। बगल में बैठा हरीश डूबी हुई आवाज में पूछ लेता है-भाई कैसा है तू?Ó
'मुझे परेशान मत करो? चुप रहो?Ó
हरीश लताड़ पडऩे पर भी बीच-बीच में पूछता रहा। और वह इसी तरह चिड़चिड़ाकर बोलता रहा। कोई तीनेक घंटे में कोटा अस्पताल पहुंचे डॉक्टरों ने आइसीयू में ले लिया, बोतलें चढ़ाई। डीके को पेट में दर्द होने लगा। वह भाई से बोला -'तू डॉक्टर है मुझे बचा ले। पेट फटा जा रहा है। दर्द सहा नहीं जा रहा है। यार इतना तो कर दे?Ó
यह वाक्य अंतिम था। फिर उसे अंदर ले लिया गया। बाहर वाले बाहर। डॉक्टर लगातार प्रयास करते रहे। डीके का बोलना सुन सके न रोना। वह आवाज फिर घुटती चली गई।
दाहसंस्कार में पूरा कस्बा उमड़ पड़ा। सभी हैरान, परेशान और चिंता में डूबे हुए। सभी की जुबान पर एक ही बात-'क्या कर लिया?, कैसे कर लिया? क्या परेशानी थी इसें?Ó
जितनी जुबानें उतनी बातें।
 सच आखिर असमय ही हमेशा के लिए उसी के साथ चला गया। कोई भला ऐसे कैसे चला जाएगा? वह कई प्रश्न छोड़ गया पीछे। लोग असमंजस में बने रहे। हरीश कुछ कह रहा है, वागीश कुछ कह रहा है, सभी कुछ न कुछ कहे जा रहे हैं। मर्जी जिसकी जो कहे, कहने वालों को कौन रोक सकता है भला। पत्नी एकदम चुप खामोश! बेहोश है! जहर लेने की बात सुनकर पुलिस भी चली आती है। आयेगी। आयी। बैठी। और वापस चली जाती है। दो दिन बाद फिर आई। बैठी। और चले गई। ऐसे गमगीन महौल में पुलिस भी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सकी।
शराब पीता था? जुआ खेलता था? शेयर बाजार में था? पता नहीं क्या! क्या! कैसी कैसी बातें? जो मन में आये कर रहे थे लोग। अंदर औरतें। दबी जुबान से बहन से हुई बातों को उठा रही थीं। भाई के आने के आधा घंटा बाद ऐसा हुआ, मूल कारण बता रही थी।
किसी ने आकर बताया कि बाजार में चर्चा है कि वह हवाला में लाखों के नीचे आ गया।
यह हवाला क्या है भाई? नहीं समझे। कुछ लोग चाय की थडिय़ों पर डिसपोजल में मुंह मारते हुए पूछ बैठते। कुछ समझदार बताने लगता-'शेयर मार्केट में पैसा लगाना और रातों-रात अमीर बन जाने का धंधा है। आज रिलायंस जहां पर है शेयर के बल पर ही तो है। वह ऐसी बड़ी-बड़ी बातें कभी-कभी करता तो था। पर वह ऐसे काम में नहीं हो सकता। बड़ा प्यारा लड़का था। क्या कमी थी उसे?
कोई कमी नहीं थी, उसके दो बच्चे, एक लड़का दूसरी छोटी लड़की। पत्नी पढ़ाती है स्कूल में। वह दुकान, खेत और बाजार संभालता था। दो दिन से मकान का काम छेड़ दिया था। ईटें, सीमेंट डलवा रहा था। कारीगर आ रहा था।
कोई नहीं जानता, न ही जान सकता है। कोई दस साल पहले वह ठीक नौ लाख के चपेटे में था, जब शेयर मार्केट एकदम गिर गया। तब वह तेल में भाग्य आजमा रहा था। बड़ा आदमी बनने का भूत सवार था। जल्दी धन पाने का रास्ता वाया शेयर मार्केट ही जाता है। उसे पूरा विश्वास था लेकिन बहुत जल्दी ही सब कुछ लुटा चुका था। जब भी मिलता रो पड़ता। 'क्या हो गया मेरे साथ। कैसे हो गया?Ó वह एक बार पश्चाताप में बोल पड़ा -'आपने सही कहा था, मैं ही मूर्ख था जो रेत से तेल निकाल रहा था और चपेटे में आ गया।Ó
मुझे याद आता है, उस रात हम दोनों कोई तीन बजे तक इसी बात पर विचार करते रहे थे। वह अपनी बात पर अड़ा हुआ था। बोला-'एक लाख के फायदे में हूं। वह भी एक सप्ताह में। अब कौन रोक सकता है मुझे अमीर होने से?Ó यह कहते हुए वह मेरे हर तर्क को काटे दे रहा था। मुझे मजबूर होकर कहना पड़ा-'ऐसा नहीं हैं कि मैं सुनी-सुनाई कह रहा हूं। यह मेरा अनुभूत है। मैं स्वयं कोई छ: माह हवाला बाजार में रह चुका हूं और कोई सवा लाख खोकर बाहर निकल सका हूं।Ó उन दिनों रात-दिन सोचते और कई रातें आंखों में ही काली करने के बाद भी मैं महज चार सौ रुपये का फायदा पा सका हूं और हर दिन सैकड़ों या हजारों खोता रहा हूं जबकि उन दिनों मैं तनख्वाह के रूप में रोज चार सौ से अधिक नहीं कमा पा रहा था। मैंने हर तरह से सोच समझ कर देखा कि मैं कुछ भी, कैसी भी चाल, कितनी ही सोच समझकर चलूं शाम को उल्टी ही पड़ती थी। फायदा अगर किसी को था तो वह था ब्रोकर, एजेंट को, अगर वह भी लालच में शेयर बाजार में कूद पड़े तो फिर उसे बहने से कोई नहीं रोक सकता। इस दरिया में अंतत: डूबना ही पड़ता है। ऐसा कोई नहीं है जो इसे व्यवसाय बनाकर रोजी-रोटी चला सका हो। हर्षद मेहता से लेकर ऐसे हजारों है जो आये दिन आत्महत्या करते नजर आते हैं। मेरी इतनी लंबी कहानी को वह हूं हूं करके सुनता रहा। पर नहीं समझ सका। उसके पक्ष में एक लाख का होना, मेरी हर बात को मजाक मान रहा था।
मैंने दूसरी तरह से समझाने के लिए, उसे बताया कि अगर तुझे ऐसा लगता है कि इसमें नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा तो ठीक है। मैं भी मान लेता हूं। पर एक बात याद रखना! जिस दिन तुझे बीस हजार का नुकसान हो जाए, उस दिन समझ लेना कि मेरी बात का आरंभ हो गया है। और जिस दिन इसका पहिया उल्टा घूमना आरंभ हो जाता है फिर इसे कोई भी ताकत सीधा नहीं घुमा सकती है। डूबने वाले के साथ कोई नहीं रहता सो बीस हजार का आंकड़ा ज्यों ही नजर आये। तत्काल बाहर हो जाना, अन्यथा तुझे कोई नहीं बचा सकेगा।Ó दरअसल यह हवाला सरासर सट्टा है। आम आदमी को लूटने का जरिया है। पता नहीं सरकार इसे किसके हित में चला रही है? मध्यवर्ग के लोग इसमें फंसे नजर आते हैं। जो भी गलती से इसमें प्रवेश कर जाता है समझो उसके उल्टे दिन आरंभ हो गए। वह जो इस रास्ते को बतलाता है वह दोस्त नहीं दुश्मन होता है। यह भी पक्का है कि लालच ही इस तरफ  लेकर जाता है। यहां पर हर व्यक्ति रुपये लेकर आता है पर वापस लेकर नहीं जा पाता। अगर किसी को कुछ मिल भी गया तो वह उसे अपने पास नहीं रोक पाता है। मु_ी में रेत की तरह फिसलता जाता है। हाथ खाली के खाली रह जाते हैं गांठ का भी खोकर चले आना होता है। पता नहीं लोग क्यों चोट खा खाकर भी पिटने के लिए यहां डटे रहते हैं? इसे संवेदी सूचकांक कहते है। जो मन की गति को इंगित करता है। किसी भी कंपनी का शेयर ऊपर नीचे हिलता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं होता है। नुकसान सभी उठाते हैं और फायदा कुछ चंद ऊपर के लोग ही उठा पाते हैं। बाकी हम तुम यहां लुटते हैं। अधिक लिप्त हुए तो फिर डूबना ही है। मैं सुबह उसे बस में बैठते-बैठते भी अपनी बात कहता हुआ चला आया था कि 'याद रखना बीस हजार का आंकड़ा।Ó वह हां करते हुए दूर होता चला जा रहा था।
महज दो माह बाद फिर मिलना हुआ तो डीके तो मुंह ऊपर ही नहीं उठा पा रहा है। बस रोए जा रहा है। बोला तो इतना भर कि-'आपने सही कहा था। मैं अपने कर्मों से लुट गया हूं। मैं पूरी तरह से सड़क पर आ गया हूं।Ó मैंने पूछा -''तू बीस हजार के घाटे पर बाहर आ सकता था?Ó
'कैसे आता मैं तो पहले ही दिन लाख के नीचे था। और सोचता रहा कि यह घाटा इसी में से पूरा हो सकता है। नहीं तो मेरे पास कहां हंै लाख, जिन्हें चुका कर बाहर आ पाता। और हर दिन नीचे और नीचे डूबता चला गया। संभलने का अवसर ही नहीं मिल सका।Ó वह थोड़ा ठहरकर बोला-'मुझे लगता था कि जब यहां लुट रहे हैं तो यहां से ही भरपाई भी होगी। जब एक लाख का फायदा चल रहा था तो नुकसान के बाद वापस फायदे में अवश्य लौटूंगा।Ó इसी झूठी उम्मीद में मृगमरीचिका के पीछे दौड़ता रहा। अब मैं बुरी तरह से थक गया हूं। लुट गया हूं। अब क्या बचा है मेरे पास!Ó इतने पश्चाताप के बाद पता चला कि वह बीच-बीच में डुबकी लगा लेता रहा है। पुराना जुआरी दिवाली पर जुआ इसी उम्मीद में खेलता है कि दो पैसे मिल जाएंगे।
वह अपनी गलती मान रहा था पर तब जब सब कुछ लुट चुका था। फिर हमारी वर्षों तक मुलाकात नहीं हो सकी। वह जब भी मिला तब दूसरी दुनिया जहान की बातें करता रहा सो उस घटना को धीरे-धीरे भूलने लगे। तब पता चला जब सूचना मिली कि उसने सल्फास ले लिया। मुझे विश्वास ही नहीं हो सका। वह बात तो पुरानी है। अभी तो ऐसी कोई बात नहीं हुई।
 मां! हां, मां है उसकी। मां को क्या हुआ? वह बीमार रहती थी। शाम होने पर रोती थी। डीके सख्त नाराज हो उठता था। तो क्या हुआ? बुढ़ापा ठहरा। बच्चे स्कूल और पत्नी नौकरी पर पीछे घर में मां अकेली। घर पर डीके के आते ही वह रो पड़ती। कैसे रही वह दिनभर अकेली। उसकी अपनी गाथा थी। दुकान पर बैठना नहीं हो रहा था। शेयर की तो आदत है कभी ऊपर तो कभी नीचे होता ही रहता है। ऊंचा नीचा उठने को कौन रोक सकता है? फिर मां का बीमार रहना। उसकी देखभाल करना। एक आदमी किधर-किधर जाए। कहां कहां भागे? मां को लेकर कोटा दिखा आया था और जाने की कह तो रहा था। मुझे एकदम यही लगा कि डीके मां के दबाव में यह कदम उठा चुका है। मुझे याद नहीं आया कि पत्नी और इसके बीच में कैसे रिश्ते हंै? कभी नहीं सोचा, उसने भी नहीं बताया सो एकदम मेरा ध्यान गया मां की तरफ, की हो न हो मां की देखभाल करने न करने की जद्दोजहद में वह संतुलन खो बैठा और जाना था मां को स्वयं उससे पहले ही चला गया। वैसे वह मां को अंतत: चाय पिलाना नहीं भूलता था।
डाक्टर भाई से यही तो बात हो रही थी। बात पूरी भी नहीं हुई कि वह तो नाराज हो गया। बातें अधूरी छोड़ कर बाजार भाग गया। भाई बहन ने सोचा शाम को बात कर लेंगे। वह मां के मसले पर बिल्कुल नहीं बोल रहा था। हवाला बाजार की बात भी नहीं कर रहा था। डॉक्टर भाई से फोन पर, मां को लेकर बता तो रहा था। जब भाई आया तब वह मां को लेकर बिल्कुल भी नहीं बोला। बड़ा भाई सुबह घर आया, दोपहर को दुकान पर देख चुका था। डीके दुकान पर बैठा हुआ दिखा फिर बहन के आने पर हाजिर हो गया था।
डीके बीच में ही बातें अधूरी छोड़कर महज पन्द्रह-सोलह मिनट में ही उठ जाता है। जाते समय पूरी तरह से गुस्सा में था। गुस्सा तो जैसे उसकी नाक पर सवार रहता हो पर उतर भी जल्दी जाता था। छत्तीस मिनट बाद लौटता है। चाय बनाने के लिए कहता है। चाय वह पिलाने वाला था। पीने वाले आठ लोग थे। ऐसा पहली बार हुआ जब डीके के घर से लोग बिना चाय पिए उठ जाते हैं। लगा जैसे डीके के उठने से पहले उसकी चाय उठ गई हो। चाय की तरफ किसी का ध्यान जाने का सवाल ही नहीं था। डीके के कहने के बावजूद चाय ठंडी हो रही थी और पीने वाले होते हुए भी कोई नहीं पी रहा था।