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Tuesday 21 Nov 2017

दो टूक कलेजे के करता...

अलीक
वाम स्टडी सर्कल
मातृछाया, 16अ,
सुतारों का वास
रतलाम (मध्यप्रदेश) 457001
मो. 8982934121
सर्वहारा मजदूर, किसान वर्ग के जीवन द्वंद्वों से, रूरतों से प्रतिबद्ध होकर संगठित अनुशासित प्रतिरोध वर्ग जागरण और जीवन बेहतरी के लिए करना क्या असंवैधानिक, अराजकता है? जनगण के हितों की रक्षा करती इन्हीं विचार सरणियों, जीवन संघर्ष उदात्त संवेदनाओं को व्यक्त करती जब कविताएं, कला कर्म प्रकट होता है, और विस्तार पा लेता है, तो क्या यह सृजनकर्म भी 'अराजकताÓ कहलाई जाएगी?
दरअसल, जनजागरण और पीडि़त जीवन पक्ष की असंख्य कविताएं- रचनाएं जीवन संघर्ष मु$खर लिखी-रची जाती हैं। इन्हीं जीवन प्रतिबद्ध रचनाओं, कलात्मक प्रयासों से हमारा साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्ष प्रबल हुआ है। प्रतिरोध मु$खर हुआ है। जनजागरण हो पाया है। वर्ग संघर्षÓ की दुर्दम्यताओं, विकृतियों से आपदाओं-कठिनाइयों ने वर्ग अभ्युदय के दौर से ही जीवन को अनन्य दु:ख दारिद्र में घेरा है। महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की कविता 'भिक्षुकÓ ने हमारे पीडि़त वंचित जीवन संवेदनाओं, दु:ख दैन्य के कारणों, वजहों को झकझोर दिया है। पूरी कविता जीवन उद्वेग झनझनाहट भरे हुए कह उठती है :
''वह आता है
दो टूक कलेजे के करता पछताता, पथ पर आता
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को, भू$ख मिटाने को,
मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता,
दो टूक कलेजे से करता, पछताता पथ पर आता...ÓÓ
'भिक्षुकÓ कविता की जीवन करुणा और जीवित रह पाने का मार्मिक द्वंद्व, आज भी उन्हीं जीवन स्थितियों में साकार, हम सभी को झिंझोड़ रहा है। आजा दी मिलने के पूर्व और आजा दी के बाद जीवन छवियों, जीवन चित्रावलियों में वही द्वंद्व, वे ही दृश्य उपस्थित हैं। जीवन आपदाएं, मजबूरियां, कमजोरियां, क्रूरतम शोषण का शिकार होकर यही बतलाती और जतलाती हैं कि- ब्रिटिश हुकूमत के जोर , जूल्म आज भी शोषक शासक सत्ता के उपकरण बने हुए हैं। तमाम तरह के सुख और सुविधाएं उन्हीं बहुमूल्य साज सामानों के साथ शोषक वर्ग के पक्ष में विकास और जीवन बेहतरी-दिखलाने, रिझाने के मापदंड संवैधानिक संसदीय तामझाम (!) के बने हुए हैं! जबकि मेहनतकश $गरीब और $गरीब होता जा रहा है! बढ़ती हुई त$कलीफों का ग्रास बनता जा रहा है!
स्वतंत्रता संग्राम की जीवन निहित संकल्पनाओं, उम्मीदों, सदिच्छाओं और सपनों को शोषक शासक सत्ता ने चकनाचूर करते हुए, अपने दुर्ग-गढ़ों और मठों को, वोट बैंक के जातीय और सम्प्रदाय को अपने हित, अपनी सहूलियतों के मजबूत किया है। पूंजीवादी विकास की तथाकथित संवैधानिक और कानूनी रूरतों को परजीवी वर्ग के पोषण के लिए इस्तेमाल किया है। जबकि मेहनतकश शोषित वर्ग की जीवन रूरतों को मटियामेट किए जाते रहने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रखी है। जनगण के 'हाथ $खाली बजती थालीÓ जैसी विषमताएं पल्ले पड़ी हैं। शोषक शासक गर्व से कहता है, पांच रुपए में भरपेट भोजन, बाईस रुपए दिन दिहाड़ी से मेहनत$कश $गरीब, कहां $गरीब है!! वह तो अमीर और सम्पन्नता की श्रेणी में है! कितनी विद्रूप और म$खौल उड़ाए जाने वाली बात है कि- हाहाकार मचाती महंगाई, बेरोगारी, बदहाली में शोषक सत्ता झूठ बोले। बमुश्किल पेट भरे जाने की जीवन दुविधाओं और संघर्ष पर ये पंक्तियां भी गौर से पढ़ लीजिए :
''घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते
चाट रहे जूठी पत्तल वे कभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
ठहरो, अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूंगा
अभिमन्यु- जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारे दु:ख मैं अपने हृदय में खींच लूंगा।ÓÓ...
ऐसी जबरर्दस्त कविता पीडि़तों का पक्ष लेकर आज भी शोषक सरकारों के गाल पर जोरदार तमाचे जड़ते हुए, क्या कुछ जीवन 'सचÓ नहीं कहती है? जीवट संघर्ष के लिए क्या कुछ नहीं उकसाती है!!  तपती और तपाती है। जीवन सरमाये यह 'भूखÓ बड़ी ही विचित्र है! कभी बद शक्ल; कभी खूबसूरत;  इसी भूख ने जीवन के विविध रुख तय किये हैं, सौन्दय रचे, तो कभी बर्बर विध्वंस भी।... 'कबीर रागÓ कविता पुस्तक में मैंने जीवन की तप तपाहट इसी भू$ख को कविता में उतारा है। दृष्टव्य है :
 ''वर्ग द्वंद्व पाटों की गडग़ड़ाहटों से
भड़की है भू$ख!
जो चटकलों चरखों ओटनियों तकुओं
मशीनों के चक्कों के नुकीले दांतों से
दिन-प्रतिदिन फैली है!
भू$ख के इतने सारे बदरंग
कैसे सौन्दर्य की अप्रतिम बेमिसाल $खूबसूरत
तस्वीर बनाने में जुटते!
भू$ख लपटती-भभकती भू$ख
सहस्रों, मुखों वाली बनैली भू$ख
तुम चांदी की जूतियों तले दबी-कुचली
तो कभी निशानियां
हमीं पर दरिन्दगी बरपाती हो;
लेकिन, हम तुम्हारा शुक्रिया अदा करते हैं कि-
तुम्हीं ने आने वाले सारे $खतरों की घण्टियों को
छेड़ दिया है, घनघना दिया है।...ÓÓ
'भिक्षुकÓ और 'भूखÓ कविता का भाव और विचार आ बदल गया होता, इन कविताओं का स्थापत्य आ दूसरे जीवन रूरत के विषय आकार चुनता, अगर जीवन बेहतरी के समूचे शोषण विहीन अवसर समानता के विकास में मौजूद रहते!
पूंजीवादी संवैधानिक जनतंत्र (!) की वे तमाम नियमावलियां, सख़्त कानून उन जीवन परिवर्तनों को, संघर्षों की जीवटता को, साहस को, तहस-नहस करते पग-पग पर मिलते हैं, जिनसे शोषक वर्ग की राजनीति और दलीय व्यवस्था शोषण की लूट को निरन्तर रखते हुए, मबूत रहे। संसद और विधानसभाओं के तथाकथित संवैधानिक खेल; मेहनतकश जनता के विरुद्ध आ भी ब्रिटिश हुकूमत की रीति-नीति के साक्ष्य $खेले जा रहे हैं। हर बार करोड़ों-करोड़ रुपए खर्च करके चुनाव होते हैं, और वे ही राजनीतिक आपराधिक (!) मा$िफया दल और उनके गुर्गे चुने जाते हैं, जो पूंजीवादी शोषण के चक्के, बर्बरतापूर्वक चलाए रख सकें! वोट दिए जाने के अधिकार से अब उकताहटें बढ़ती जा रही हैं; क्योंकि सत्ता के राजनैतिक दल-बल वे ही समर्थ नेता अदल-बदल कर आते हैं, जो विकास के नाम पर जनता जनार्दन में 'हाहाकारÓ मचाए रख सकें।
यशस्वी कवि केदारनाथ अग्रवाल ने ठीक ही लिखा है : (कविता 'जिन्दगीÓ)
''देश की छाती दरकते दे$खता हूं
व्यास मुनि को धूप में रिक्शा चलाते
भीम अर्जुन को गधे का बोझ ढोते देखता हूं।
सत्य के हरिश्चन्द्र को अन्याय घर में
झूठ की देते गवाही देखता हूं।
द्रोपदी को और शेव्या को, शची को
रूप की दुकान खोले
लाज को दो टके में बेचते मैं देखता हूं।ÓÓ...
दरअसल, शहीद भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों, हमदर्दों का यह सही मानना था कि- ब्रिटिश बर्बर हुकूमत को उखाड़ फेंकने के बाद मदूरों और किसानों का राज जब तक स्थापित हो नहीं पाता, शोषण को जड़ मूल नष्ट नहीं किया जाता, तब तक भारत की सीधी-सादी जनता वास्तविक आजा दी से दूर ही रहेंगी। ब्रिटिश हुकूमत की जुल्म ज्य़ादतियां आ भी उन्हीं कानूनों के भेदभाव साधारण मेहनतकश जनता पर जारी है। पूंजीवादी शोषक सत्ता ने जीवन जगत के तमाम अन्तर्विरोध, भेदभाव और बुराइयों को जनता के बीच फैलाए रखे हुए, शोषण के पक्षधर उन्हीं राजनीतिक दलों-पार्टियों को अपने बगलगीर पाले पोसे रखा है जो 'अदल-बदलÓ कर क्रूरतम महीन शोषण जा री रख सकें, और उन्हें पूंजीगत लाभ पहुंचाते रहे।
जनता जनार्दन में वैज्ञानिक समाजवाद की शोषणविहीन व्यवस्था की स्थापना के क्रांतिकारी विचार, शहीद भगत सिंह के व्यक्तित्व, कृतित्व, इं$कलाबी शहादत की जीवन ऊर्जा में कम्युनिस्ट पार्टियों का वैचारिक जागरण आंदोलन और जीवन बेहतरी की लड़ाइयों का वर्गीय चेतना का जोर, सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में पनप नहीं पाया। बल्कि संसदीय पूंजीवादी जनतंत्र के विस्तार और लाभ लोभ की निरन्तरता में वर्ग सहयोगवाद का प्रतिक्रियावादी, संशोधनवादी चरित्र वाम राजनीतिक दलों की साख रहा है। वोट बैंक के लिए वाम दलों ने भी वही रास्ता चुना जिसे शोषक सत्ता के बुर्जुआ दलों ने अपनाए रखा है। वाम दलों की साख इसीलिए गिरी है चूंकि वे शहीद भगत सिंह के इंकलाबी सपने और माक्र्सवाद लेनिनवाद की आधारभूत विचारधारा पर क्रांतिकारी रास्ता अपनाने में चूक गए। जानबूझकर भटक गए। पथ भ्रष्ट होकर रह गए!...
नक्सलबाड़ी, रेल हड़ताल, छात्र नौजवानों का देशव्यापी जनान्दोलन और स्वयं स्फूर्त मध्यवर्गीय अन्ना हजारे और उनके साथियों के जनसंघर्ष ने उदासीन $गमगीन मुरझाए भारत को वास्तविक आजादी की लड़ाइयां लडऩे को प्रोत्साहित जरूर किया है! पूंजीवादी जनतंत्र के संवैधानिक ढांचे में चाहे यह अराजकता ही क्यों न हो; लेकिन मेहनतकश जनता के लिए चेतने का एक जरूरी सबक था। एक तेजतर्रार झनझनाहट, झुंझलाहट थी।
'वर्ग संघर्षÓ का यह रास्ता अग्निपथ ही है। मौजूदा स्थितियों-परिस्थितियों से 'साहित्य और कला पक्षÓ को यही चेतावनियां मिल रही हैं कि शोषित उत्पीडि़त जनता को उनकी कमजोरियों से साक्षात्कार 'जागरण के ऐसे पाठ पढ़ाए जाएंÓ कि वह शोषणकारी राजसत्ता का वास्तविक चरित्र समझे, और खुद की बेबूदी के लिए जनसंगठनों के छेड़े जा रहे संघर्ष में अपनी साझेदारी तय करें।
सत्ता के निरंकुश और $फासीवादी रुझानों से यह भी चेतावनी और सीख मिल रही है कि प्रतिरोध और प्रतिबद्धता किसी भी वक़्त  कुचली जा सकती है। तहस-नहस की जा सकती है।
इसलिए 'कला और साहित्यÓ की जन प्रासंगिकता तब ही सुरक्षित रह पाएंगी, जबकि क्रांतिकारी विचारधारा से लैस जनसंगठनों को जनता के बीच प्रचार-प्रसार मजबूत कर लिया नहीं जाता। ऐसे जुझारू साहसी जनसंगठनों की साझेदारियां विकसित करके मोर्चेबंदी को समय रहते, अवसरों को चीन्हते हुए, विस्तार फैलाव में मजबूत और सक्रिय नहीं कर लिया जाता। आसन्न $खतरे, संकट, मनुष्य जीवन की मार्मिकता को, करुणा को, जीवन इच्छाओं को, निर्ममता से नष्ट भ्रष्ट करते हुए, शोषक व्यवस्था की जनविरोधी घृणित कारगुजरियां झेलने को विवश करते रहेंगे।
बहरहाल मुक्तिबोध के ती$खे स्वर में सुनिये क्या कहते हैं :
''हाथ जोड़े रहते हैं बड़े-बड़े बुद्धिमान
बड़े-बड़े पैगम्बर
रावण के घर पहरा देते हैं
बड़े-बड़े नेतागण, बड़े-बड़े ईश्वर!
दुनिया का उदरम्भरी मध्य वर्ग थर्राकर
(रोटी की तलाश में) बेचता है आत्मा को
वेश्या के देह-सा व्यभिचार के लिए।...ÓÓ
अभी इतना ही, जीवन ऊर्जा संघर्ष मु$खर 'संवाद जारी रहेगा।