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Saturday 18 Nov 2017

अंधविश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

रामकिशोर मेहता
बी-11 शिवालय बंग्लोज
सरकारी ट्बूवेल के पास
बोपल, अहमदाबाद-380058
मो. 09408230881
अंधविश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानवीय वैचारिकी में दो विपरीत ध्रुवों की स्थितियां हैं। अंधविश्वास शब्द के स्पष्टत: दो भाग अंध और विश्वास हैं। आंख जो देखती है; हमारी सबसे प्रबल ज्ञानेन्द्री है जिसके द्वारा प्राप्त ज्ञान सबसे अधिक प्रामाणिक है। संत कबीर कहते हैं ''तुम कहते कागज की लेखी। मैं कहता अंखियन की देखी।ÓÓ अंधे के ज्ञानाभाव का क्या कहना? जहां ज्ञान है वहां विश्वास शब्द की आवश्यकता ही नहीं। विश्वास की आवश्यकता ज्ञान के अभाव वाली स्थितियों में ही पड़ती है। विश्वास अपनी संरचना में संदेह का पूरक है। विश्वास की प्रबलता संदेह की अल्पता है। इसके विपरीत विश्वास का अभाव संदेह की प्रबलता दर्शाता है। संदेह सत्य की खोज का प्रेरक है और विश्वास प्रश्न करने और उत्तर की खोज की आवश्यकता को नकारता है। अंधविश्वास कोढ़ में खाज है। अंधविश्वास आदर, श्रद्धा व भक्ति की भावना से जुड़कर जिस भाव को जन्म देता है वह है 'आस्थाÓ जिसमें मस्तिष्क के दरवाजे बिलकुल बंद रहते हैं।
दूसरी तरफ वैज्ञानिक सत्य की सतत् खोज का दृष्टिकोण है। वह अंतिम सत्य की तलाश है। वहां संदेह है। प्रश्न है। उत्तर खोजने के प्रयत्न हैं। मिलने पर उत्तर की सतत परीक्षा है। यहां प्रश्नाकुलता अंतहीन है। कुछ भी परम सत्य नहीं है। इसे कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है। पहले परमाणु को द्रव्य के सबसे छोटे अविभाज्य कण के रूप में खोजा गया। इसे सत्य माना गया परन्तु इस पर प्रश्नचिन्ह लगे। वैज्ञानिकों ने इसे लेकर खोजें की। परमाणु का भी विभाजन हुआ। इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, न्यूट्रोन आदि कणों की खोज हुई। फिर इनसे भी छोटे कण पाजिट्रोन म्यूसान, पाई म्यूसान आदि खोजे गए। अंतत: अब तक का सबसे छोटा और मूल कण जिसे हिग्सबोसोन कण (आदमी की समझ के लिए ईश्वरीय कण) जिससे मिलकर पूरे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है, खोजा गया। यह आवश्यक नहीं है कि यही अंतिम और सबसे छोटा कण हो। प्रश्न उठेंगे। खोजें जारी रहेगी।
धुर विरोधी होने के बावजूद हमारे समाज में दोनों स्थितियां कायम हैं। उसके कारण भी हैं। अंधविश्वास का रास्ता सबसे छोटा, सबसे सरल है। इसमें कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं। सब कुछ किसी और के द्वारा किया-कराया है। केवल उसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लेना है। यह यथास्थितिवाद है। यह मूर्खों व मानसिक आलसियों का स्वर्ग है। औरों के खोजे इस रास्ते पर चलकर आप मंजिल तक पहुंचेंगे ही यह आप नहीं जानते और न ही जानने की इच्छा है। आपके पास विश्वास है पर बिना किसी आधार के, जिसमें कार्य-कारण का कोई संबंध नहीं है। कोई तर्क नहीं है। यदि तर्क है भी तो आधारहीन। अपने एक अनुभव को आपके साथ बांटना चाहता हूं। मेरी साइकिल पंक्चर हो गई थी। साइकिल के साथ पैदल चल रहा था। मेरा एक मित्र भी मेरे साथ था। उससे ईश्वर के अस्तित्व पर बहस हो रही थी। उसने ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण देते हुए मुझसे कहा- ''तुम्हारी साइकिल पंक्चर हो गई है वह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर का अस्तित्व है।ÓÓ अब इस कुतर्क के बाद कौन सी बहस हो सकती थी?
अंधविश्वास से जुड़े हुए दो प्रकार के आदमी इस संसार में होते हैं। पहले वे जो अंधविश्वासों को स्थापित करते हैं और सप्रयत्न स्थापित करते हैं। धर्म, राजनीति और अर्थ सत्ता के केन्द्र में बैठे हुए ऊंचे स्तर के लोग। जनता को ज्ञान की, तर्क की सत्ता से दूर रख, अंधविश्वासी बनाए रखने से उनके हित सधते हैं। राजेन्द्र यादव के शब्दों में वे जनता को अनपढ़/अज्ञानी बनाए रखने की साजिश रचते हैं। ये लोग स्वयं अंधविश्वासी नहीं होते परन्तु उन अंधविश्वासों को मानने का प्रदर्शन अवश्य करते हैं। दूसरे वे होते हैं जो उन अंधविश्वासों का बोझा अपने सर पर ढोते-ढोते अपनी जिन्दगी तमाम कर देते हैं।
अंधविश्वासों की सबसे बड़ी शरणस्थली धर्म है। यद्यपि अर्थ व राज सत्ता भी उसे शरण दिये रहते हैं। मेरा यह कथन कि- ब्रह्म, ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, गॉड- संसार का सबसे बड़ा अंधविश्वास है, हमारे समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को स्वीकार नहीं होगा। ब्रह्म एक ऐसी परिकल्पना है जो आज तक प्रमाणित नहीं हो सकी है। जो तर्क पर कहीं से भी खरी नहीं उतरती। नेति-नेति ईश्वर की सबसे बड़ी सुविधास्थली है जहां वह सकून से रहता है। विरोध में तर्क किए जाने पर सबसे सुविधाजनक बात यह कहकर टाल दिया जाना है कि ब्रह्म तर्क का विषय नहीं, आस्था का है। आस्था, अंधविश्वास की पराकाष्ठा है। बचने का एक और रास्ता है कि यह बहस अंतहीन है।
अंधविश्वास शार्टकट की सुविधा प्रदान करते हैं। एक ईश्वर में विश्वास करने वाले व्यक्ति के लिए यह कितना सुविधाजनक है कि ब्रह्म ने अपनी इच्छा से ब्रह्माण्ड की रचना कर डाली। दूसरी तरफ वैज्ञानिक के सामने ढेरों प्रश्न होते हैं। ब्रह्माण्ड कब बना? वह महाविस्फोट जिससे ब्रह्माण्ड की रचना हुई, कब हुआ? विस्फोट के पहले ही सेकेंंड में क्या-क्या हुआ? किस प्रकार करोड़ों निहारिकाएं पैदा हुई। अपनी निहारिका जिसे हम आकाशगंगा कहते हैं उसकी ब्रह्माण्ड में क्या स्थिति है? उसमें हमारे सूर्य जैसे कितने सितारे हैं? हमारे सूर्य की आकाशगंगा में क्या स्थिति है? आकाशगंगा के केन्द्र में स्थित ब्लेकहोल कितने बड़े हैं? ब्लेकहोल क्या होते हैं? हमारे सूर्य की उम्र क्या है? वह कितने करोड़वर्ष और इसी तरह हमें रोशनी देता रहेगा? वैज्ञानिक इनके उत्तर खोजने का लगातार प्रयत्न करते रहते हैं। कुछ हद तक उत्तर पाते भी हैं। अंधविश्वासी के लिए सूर्य एक देवता है। जिसका रथ सात घोड़े खींच रहे हैं। एक वैज्ञानिक के लिए सूर्य एक खगोलीय पिण्ड है। सूर्य व चन्द्रग्रहण राहू के ग्रसने नहीं, चंद्रमा की पृथ्वी पर और पृथ्वी की चंद्रमा पर छाया पडऩे से होते हैं। कुछ धर्मों के मानने वालों के लिए पृथ्वी आज भी चपटी है, सारे ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। सूर्य, चंद्रमा व अन्य खगोलीय पिण्ड पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। उन्हें कोपरनिकस और गेलिलियो के वैज्ञानिक सत्य पच नहीं पाते। चर्च उन पर मुकदमा चलाते हैं। उनके लिए अभी भी आसमान सात हैं। खुदा सातवें आसमान पर रहते हैं। उनकी समझ में आज का आदमी आदम व हव्वा की  संतान है। हव्वा की रचना आदम की एक पसली से हुई है। वैज्ञानिकों ने खोजा कि होमो इरेक्ट्स से लेकर होमोसैपियन तक आते-आते मानव जाति होमो एरगेस्टर, होमो फ्लोरेसाई, होमो गोटेजैन्सिस, होमो हैबिलिस, होमो हाईडेलबरजेंसिस, होमो नीनडरथलेंसिस, होमो र्होडेंसिसिस, होमो रुडोलफेसिस, रेड डीयर केव मेन एवं होमो सेपियन इडलटु आदि सबस्पेसीज से गुजरी है। आधुनिक मानव को पृथ्वी पर आए 2 लाख साल से अधिक का समय नहीं हुआ है। जिसमें से अधिकतर समय उसने आदि, असभ्य मानव के रूप में ही गुजारा है।
अंधविश्वासों को प्रसारित एवं प्रचारित करने में धार्मिक महाकाव्यों का बहुत बड़ा हाथ है। ये महाकाव्य हमारी सामान्य जनता की मान्यताओं में इतने गहरे बैठे हुए हैं कि इनमें वर्णित कविसत्यों को सत्य एवं कविन्यायों को ही न्याय मान लिया गया है। जिसके कारण समाज में ढेरों अंधविश्वास पैदा हुए हैं। यहां हिन्दुओं के दो महाकाव्यों यथा रामायण (तुलसी के रामचरित मानस सहित) और महाभारत का विश्लेषण किया गया है।
रामायण में तत्कालीन जनजातीय प्रतीक चिन्हों- वानर, रिक्ष, गिद्ध आदि के कारण उन समुदाय के मनुष्यों को वानर रीछ व गिद्ध ही मान लिया गया है। महावीर हनुमान हमारे यहां आज भी बंदर के रूप में पूजे जा रहे हैं। दसों दिशाओं का ज्ञान रखने वाला रावण आज भी दशानन है। मन की गति से चलने वाला पुष्पक विमान जो कभी कुबेर के पास था। बाद में रावण ने उसे कुबेर से छीन लिया था। रावण को पराजित करने के बाद वह राम के पास आया, जिस पर बैठकर वे पलक झपकते ही वापस अयोध्या पहुंच गए। आज भी हमारी धर्मप्राण अंधविश्वासी जनता के लिए सत्य है। प्रश्न करने पर वे भूतजीवी लोग कहते हैं कि उस समय का विज्ञान भी आज जैसा विकास कर चुका था। जब आज हवाई जहाज हो सकते हैं तो उस काल में क्यों नहीं हो सकते। अंधविश्वासों में बंधा उनका मस्तिष्क कभी यह नहीं सोच पाता कि आज यदि विश्व में विमान हैं तो हजारों की संख्या में हैं, कोई एक नहीं। विमान हमारे औद्योगिक विकास की पराकाष्ठा का परिणाम है। एक आधारभूत औद्योगिक ढांचा विमान के निर्माण के लिए आवश्यक होता है जिसका कहीं कोई वर्णन हमारे महाकाव्यों में नहीं आता। हनुमान इतने शक्तिशाली हैं कि वे सूर्य को अपने गाल में रख लेते हैं, सागर को कूदकर पार कर लेते हैं, हमारी जनता को स्वीकार्य है। रावण की नाभि में अमृत। युद्ध समाप्त होने के बाद राम अपनी ईश्वरीय शक्ति से अपने पक्ष के सारे योद्धाओं को जीवित कर देते हैं (ईश्वर के पक्षपातपूर्ण व्यवहार की पराकाष्ठा) परन्तु जब लक्ष्मण को शक्ति लगती है तो हनुमान को संजीवनी लाने के लिए भेजा जाता है और वे पूरा पहाड़ ही उठा लाते हैं। सीता अग्नि से गुजर कर अपने सतीत्व की परीक्षा देती है फिर भी निष्कासित की जाती है। रामचरितमानस में आधारहीन शकुनों व अपशकुनों की भरमार है जो उस काल के अज्ञानी अंधविश्वासी समाज में प्रचलित रहे होंगे परन्तु मानस के भक्तों के हृदय में आज भी सार्थक हैं।
महाभारत का महाकाव्य भी ऐसे ही बहुत सारे अंधविश्वासों का प्रश्रय दाता है। वहां भी देवता हैं और उनके पुत्र मनुष्य हैं। अर्जुन सशरीर अपने पिता इन्द्र के देवलोक में भ्रमण कर आता है। शिव से युद्ध करता है। वहां से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करता है। स्वर्गिक नदी गंगा के पुत्र देवव्रत हैं जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त है। कर्ण सूर्य का पुत्र है (पता नहीं कुन्ती सूर्य का ताप कैसे सह पाई होगी?) जिसके पास दैविक कवच व कुण्डल हैं। भीम में दस हजार हाथियों का बल है। उसके द्वारा आकाश में उछाले गए हाथी अभी तक पृथ्वी पर वापस आकर नहीं गिरे। शायद अंतरिक्ष में कहीं घूम रहे होंगे त्रिशंकु की तरह। उन सबसे ऊपर विष्णु की सोलह कलाओं के अवतार कृष्ण हैं जिनके पास अमोघ सुदर्शन चक्र है। जिनके मुख में ब्रह्माण्ड है। जिसे खोलकर वे अर्जुन को दिखाते हैं कि महाभारत के सारे के सारे योद्धा तो पहले से ही काल ग्रसित हैं तू तो केवल निमित्त मात्र है। तू तो केवल कर्म कर। फल की इच्छा मत कर (आदमी नहीं पूर्व में दिशानिर्देशत रोबोट) और जब-जब धर्म की हानि होगी, मैं जन्म लूंगा और सब कुछ ठीक कर दूंगा (राष्ट्रीय स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के बावजूद शायद धर्म की अभी तक इतनी बड़ी हानि नहीं हुई कि उसे अवतार लेना पड़े?) आत्मा, परमात्मा, पाप, पुण्य, स्वर्ग, नरक, मोक्ष, पुनर्जन्म के अंधविश्वासों का प्रवर्तक है महाभारत का यह प्रमुख अंश गीता, जिसके अठारह अध्यायों को सुनते, प्रतीक्षा करते बैठी रही थी मरने मारने पर उतारू दुर्योधन की सेना? आश्चर्य होता है कि आज भी हम इन सबको यथार्थ माने आंख मूंदकर विश्वास किए चल रहे हैं।
आज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला पाठक/लेखक इन्हें कविसत्य के रूप में ही स्वीकार करता है। वह यह मानकर चलता है कि रामायण व महाभारत काव्य हैं। वे ऐसे काव्य हैं जिनमें कवियों की कई पीढिय़ों ने काम किया है। जिनमें हजारों क्षेपक हैं। तीन सौ से भी अधिक रामकथाएं विश्व में प्रचलित हैं। उनमें काफी भिन्नताएं हैं। ये सबकी सब इतिहास व सत्य नहीं हो सकती। महाभारत पहले 'जयÓ काव्य के रूप में लिखा गया था। इसमें केवल एक हजार श्लोक थे फिर 'भारतÓ से होते हुए 'महाभारतÓ तक पहुंचने में इसके श्लोकों की संख्या एक लाख तक पहुंची है। इसमें कितना कुछ और कब जोड़ा गया है, कितना क्षेपक है? यहां कब का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हर कवि काल सापेक्ष होता है। यदि महाभारत आज लिखा जा रहा होता तो शायद नरेन्द्र कोहली के महासमर जैसा होता। आज के बहुत से लेखकों ने रामायण, महाभारतकालीन पात्रों पर अपने-अपने ढंग से आज से संदर्भित करते हुए लिखा है। इन महाकाव्यों को बिना प्रश्न चिन्ह लगाए हृदयांगम कर लेना आस्था (प्रबल अंधविश्वास) का ही द्योतक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला पाठक कवि की रचना प्रक्रिया को ध्यान में रखता है। वह कवि की अतिश्योक्ति, रूपक जैसे अलंकारों के उपयोग की आवश्यकता को समझाता है। वह रचना के काल की सामाजिक, राजनीतिक, आवश्यकताओं को भी समझता है। वह जानता है कि क्यों वाल्मिकी रामायण में बुद्ध की विचारधारा का विरोध है, कि क्यों मुगलकाल में लिखी गई रामचरित मानस का कथन वाल्मिीकि रामायण से काफी भिन्न है। उसके पास ''सार-सार को गहि ले थोथा देय उड़ायÓÓ की क्षमता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला आज का मनुष्य निष्कामकर्म में कोई आस्था नहीं रखता वह फल प्राप्त करने के लिए काम करता है और वह यह विश्वास रखकर कि ईश्वर जन्म लेकर सब कुछ ठीक कर देगा, ईश्वर के इंतजार में नहीं बैठा रहता। वह यह भी जानता है कि कोई व्यक्ति बिड़ला या अम्बानी या चैतू अपने पूर्व जन्मों के कर्मफल के वशीभूत होकर नहीं बना। उसकी इससे भी सहमति नहीं कि सब कुछ ईश्वर ही करता है। न वह यह मान सकता है कि ईश्वर जो भी करता है। अच्छा करता है। यदि ऐसा होता तो फिर हमें हत्याओं, बलात्कारों व युद्धों को भी भला ही मानना पड़ता।
इन सबसे अलग बौद्ध धर्म अपनी स्थापना के समय सबसे प्रगतिशील धर्म था। इसमें आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि के लिए कोई स्थान नहीं था। बाद में इसे भी भ्रष्ट कर बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार बना दिया गया। बुद्ध की जातक कथाएं गढ़ी गई। लामाओं में उसके पुनर्जन्म स्थापित किए गये और यह धर्म भी कर्मकाण्डों व अंधविश्वासों से पट गया।
महात्मा गांधी ने ''ईश्वर सत्य है से लेकर सत्य ही ईश्वर हैÓÓ तक की एक यात्रा की। जो अंधविश्वास से वैज्ञानिक दृष्टिकोण की यात्रा थी।
अंधविश्वास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विश्लेषण करते हुए प्रकृति व (काल्पनिक परन्तु बहुजन में मान्यता प्राप्त) ईश्वर के अंतर को स्पष्ट कर लेना चाहिए। ईश्वर को प्रमाणित करने के लिए प्रकृति का बहुत ही चालाकी से उपयोग किया जाता। प्रकृति अपने नियमों से चलती है। हम प्रकृति के हिस्से हैं। हम उसके नियमों को खोज सकते हैं। समझ सकते हैं। प्रकृति के नियमों का उपयोग करते हुए आज हमें जीवन की जो सुविधाएं प्राप्त हैं उनके बारे में हमारे बीस पीढ़ी पूर्व के पूर्वज शायद कल्पना भी नहीं कर सकते थे। कल्पना करो कि यदि उनमें से आज कोई आ जाए तो वह इस दुनिया के बारे में क्या अनुमान लगाएगा। प्रकृति के पास कोई चित्रगुप्त नहीं है जो आपके पाप-पुण्यों का लेखा-जोखा रखे। प्रकृति में पुनर्जन्म नहीं होता। आपकी संतति आपके गुण-दोष लेकर पैदा होती है। प्रकृति में भूत, प्रेत, पिशाच नहीं होते। प्रेतकर्म, तर्पण, श्राद्ध कर्म की आवश्यकता भी नहीं होती। प्रकृति के नियमानुसार जो पैदा हुआ है वह नष्ट होगा। मृत्यु निश्चित प्रतीत होती है परन्तु उसका समय, तिथि निश्चित नहीं है। यह विवाद से परे है कि चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति के कारण हमारी औसत उम्र बढ़ी है। हमने मृत्यु को पीछे ढकेला है। आज हम जानते हैं कि मृत्यु का कोई विशेष क्षण नहीं होता। यह एक लगातार होने वाली प्रक्रिया है। हमारी कुछ कोशिकाएं हर क्षण मरती रहती हैं। अंग प्रत्यार्पण के जरिए हमारे कुछ अंग किसी दूसरे के शरीर में जीवित रह सकते हैं। हम अपने शरीर में लाखों अन्य जीवों के साथ जीवित हैं। पहले हृदय की गति का रुक जाना मृत्यु माना जाता था। आज हृदय की गति को समय रहते पुन: चालू किया जा सकता है। हृदय प्रत्यारोपण भी संभव हो रहा है। शरीर की सम्पूर्ण कोशिकाओं की मृत्यु में लगभग 48 घंटे लगते हैं। प्रकृति में जादू टोना भी नहीं होते। यदि कुछ ऐसा होता हुआ दिखता है तो वह हमारा भ्रम/अज्ञान होता है। जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले जादूगर सहज स्वीकार कर लेते हैं। कभी वे उन भ्रमों को दूर करने का जोखिम भी उठाते हैं। परन्तु पाखण्डी, ढोंगी, ओझा, झाडफ़ूंक करने वाले तांत्रिक व अपने आपको अवतारी पुरुष कहने वाले तथाकथित साधु संत अपने कार्यकलापों को गुप्त ही रखते हैं ताकि जनता उनकी शक्तियों का लोहा मानती हुई अंधविश्वासों को ढोती रहे।
गणित व फलित ज्योतिष के बारे में बात किए बिना अंधविश्वास व वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर चर्चा अधूरी ही रहेगी। गणित ज्योतिष एक खरा विज्ञान है। वह ग्रह नक्षत्रों की गति व सापेक्ष स्थिति का अध्ययन है। जिनके परिणामों को जांचा परखा जाता रहता है। यह सारा अध्ययन प्रकृति के नियमों पर आधारित होता है। फलित ज्योतिष एक कोरा अंधविश्वास है। इसमें प्रकृति के किसी नियम का उपयोग नहीं है। कार्य कारण का संबंध नहीं है। कोई प्रमाणिकता नहीं है। इन पर वे ही लोग अधिक निर्भर करते हैं जिनके धंधों में अनिश्चितता अधिक होती है। इनके शिकार फिल्म इंडस्ट्री के लोग व राजनीतिज्ञ  आदि बहुत होते हैं। चूंकि ये ही वे लोग हैं जो धनवान तथा देश को दिशा देने वाले होते हैं तो उनके अनुयायी भी इन अंधविश्वासों को ढोने लगते हैं। मानव जाति के विकास के लिए उसकी अंधविश्वासों से मुक्ति आवश्यक है। उसके लिए खुला दिमाग और तर्क कर विश्लेषण करने की क्षमता का विकास किया जाना चाहिए। इसके लिए कार्लमाक्र्स जैसे वैज्ञानिक विचारधारा वाले विद्वानों  का अध्ययन आवश्यक है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं तर्कशास्त्री डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर के काम को आगे बढ़ाना है।